
📍 पटना/बिहार, बिहार में पिछले हफ्तों से सुर्खियों में रहे हिजाब विवाद (hijab row) का अब एक बड़ा नया अध्याय सामने आया है। वह डॉक्टर नुसरत परवीन, जिनका मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सरकारी कार्यक्रम में हिजाब खींचकर हटाया था और जिसके बाद उनका सरकारी नौकरी ज्वाइन करना विवादित बना हुआ था, उन्होंने आखिरकार अपनी नौकरी ज्वाइन कर ली है। इस बदलाव ने इस मामला को काफी विवादास्पद राजनीति और सामाजिक बहस के बीच सकारात्मक मोड़ दिया है।
विवाद कैसे शुरू हुआ?
यह पूरा मामला 15 दिसंबर 2025 को तब शुरू हुआ जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आयुष डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र वितरित करने के कार्यक्रम में मौजूद थे। उस कार्यक्रम में डॉ. नुसरत परवीन अपनी हिजाब (hijab/veil) पहने आई थीं और जब उन्हें नियुक्ति पत्र देने की बारी आई, तो मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से उनका हिजाब खींच दिया था, जिससे उनका चेहरा सामने आ गया। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में तेजी से चर्चा का विषय बन गया।
यह कदम बहुतों को व्यक्तिगत और धार्मिक सम्मान से जुड़ी संवेदनशीलता का उल्लंघन प्रतीत हुआ और विपक्षी पार्टियों ने मुख्यमंत्री के इस व्यवहार की कड़ी आलोचना की। सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे मानवाधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दे के रूप में उठाया।
नौकरी ज्वाइन करने में देरी और सरकारी कोशिशें
डॉ. नुसरत को 15 दिसंबर 2025 को नियुक्ति पत्र मिला था और उन्हें Sabalpur प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) में आयुष डॉक्टर के रूप में दर्ज़ किया गया। इसके बाद उन्हें 20 दिसंबर 2025 को नौकरी ज्वाइन करने के लिए कहा गया, लेकिन उन्होंने तत्काल रूप से ड्यूटी ज्वाइन नहीं की. सरकार ने इसका डेडलाइन कई बार बढ़ाया और उन्हें 31 दिसंबर तथा फिर 7 जनवरी 2026 तक समय दिया है ताकि वह तनाव और सामाजिक दबाव के बावजूद ड्यूटी ज्वाइन कर सकें.
इस दौरान राज्य सरकार, कुछ वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं ने पिछले विवाद के प्रभाव को कम करने और माहौल सामान्य करने की कोशिश की है, ताकि मामला व्यक्तिगत निर्णय तक सीमित रहे और डॉक्टर उन पदों पर काम कर सकें जिनके लिए उन्हें चयन मिला है।
आखिर क्या हुआ — नौकरी ज्वाइन की पुष्टि
लंबे समय के चर्चाओं, मीडिया कवरेज और विवाद के बाद अब डॉ. नुसरत परवीन ने 6 जनवरी 2026 को अपनी नौकरी ज्वाइन कर ली है। यह जानकारी पटना के सिविल सर्जन डॉ. अविनाश कुमार सिंह और संबंधित अधिकारियों द्वारा आधिकारिक रूप से साझा की गई है। उन्होंने बताया कि नुसरत ने मेडिकल फिटनेस जांच पूरी की और उसी दिन विभाग में शामिल हो गईं।
उनकी ड्यूटी ज्वाइन करने की प्रक्रिया इस कार्यक्रम के कुछ हफ्ते बाद पूरी हुई, जिससे इस लंबे मामलों की अनिश्चितता और बहस को समाप्त होते देखा जा रहा है। यह घटना सरकारी डेटा के अनुसार पिछले 23 दिनों के बाद हुई है, जब शुरूआती विवाद का वीडियो वायरल हुआ था।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ
इस घटना को लेकर राजनीतिक दलों और समाज के अलग‑अलग तबकों की प्रतिक्रियाएँ रहीं।
विपक्षी पार्टियों ने शुरुआत में मुख्यमंत्री और सरकार पर धार्मिक‑आधार पर भेदभाव और नारी सम्मान के उल्लंघन के आरोप लगाए थे। RJD सहित अन्य नेताओं ने इस विषय को संवैधानिक अधिकारों और व्यक्तिगत आज़ादी के मुद्दे के रूप में उठाया।
वहीं कुछ सरकार समर्थक नेताओं और केंद्रीय नेतृत्व ने कहा कि मुख्यमंत्री का व्यवहार किसी नैतिक या व्यक्तिगत अपमान के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए और उन्होंने दावा किया कि यह किसी भी प्रकार का धार्मिक द्वेष नहीं था। विवाद के दौरान कुछ विधायकों तक ने बीमार राजनीती की भी आलोचना की थी।
विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक चित्र आगे भी बिहार की राजनीति का हिस्सा रहेगा, खासकर आगामी चुनाव और सामाजिक बहसों के संदर्भ में।
डॉ. नुसरत परवीन का पक्ष
डॉ. नुसरत परवीन और उनके परिवार ने शुरुआती दिनों में विवाद के बाद कोलकाता में अपने घर लौटने की खबरें दी थीं, और मीडिया सूत्रों के मुताबिक उन्होंने थोड़े समय के लिए बिहार का रुख़ करना छोड़ दिया था क्योंकि यह घटना उनके लिए भावनात्मक और मानसिक रूप से भारी साबित हो रही थी।
कुछ दिनों के लिए यह माना जा रहा था कि वे सरकारी नौकरी ज्वाइन नहीं करेंगी, लेकिन सरकार द्वारा बढ़ाया गया समय और उनके परिजनों द्वारा किये गए मनाने के बाद उन्होंने अपना निर्णय बदल दिया और ड्यूटी ज्वाइन की प्रक्रिया पूरी की।
घटना के प्रभाव और आगे की राह
यह विवाद राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और कार्यस्थल की गरिमा से जुड़े जटिल मुद्दों को सामने लाया है। यह मामला निजी धार्मिक पहचान, सरकारी कार्यक्रमों में सम्मान के तौर‑तरीकों और कार्यस्थल पर लैंगिक और धार्मिक संवेदनशीलता जैसे महत्वपूर्ण विषयों को उजागर करता है।
डॉ. नुसरत परवीन की नौकरी ज्वाइन करना इस मामले को एक व्यावसायिक और संवैधानिक परिणाम की ओर ले गया है, जिसमें यह देखा जा रहा है कि विवादों के बावजूद व्यक्ति को अपने पात्र सरकारी पद पर नियुक्ति लेने का अधिकार मिलता है।
डॉ. नुसरत परवीन, जिनका हिजाब मुख्यमंत्री द्वारा हटाया गया था और जिन्होंने पहले ड्यूटी ज्वाइन करने में विलंब किया, उन्होंने अब सरकारी नौकरी ज्वाइन कर ली है। इस घटना ने राजनीतिक बवाल, सामाजिक बहस और व्यक्तिगत आज़ादी से जुड़े मुद्दों को जन‑मानस में तेज़ी से उभारा, लेकिन अब जब वे अपने पद पर जुड़ चुकी हैं, इस प्रकरण ने एक कानूनी‑व्यावसायिक निष्कर्ष पाया प्रतीत होता है।








