
रेल प्रशासन की अनदेखी से आक्रोश, यात्रियों को जबलपुर-सतना जाने की मजबूरी
कटनी। मध्यप्रदेश के प्रमुख रेल जंक्शनों में शुमार कटनी जंक्शन (KTE) आज भी बुनियादी यात्री सुविधाओं और ट्रेन ठहराव के मामले में गंभीर उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। स्थिति यह है कि करीब दो दर्जन महत्वपूर्ण एक्सप्रेस एवं सुपरफास्ट ट्रेनें कटनी जंक्शन से होकर गुजरती तो हैं, लेकिन यहां एक मिनट का भी ठहराव नहीं देतीं। इससे जिले के हजारों यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
विडंबना यह है कि जिन ट्रेनों को पकड़ने के लिए कटनी के यात्रियों को जबलपुर या सतना तक जाना पड़ता है, वही ट्रेनें इन दोनों स्टेशनों पर नियमित रूप से रुकती हैं। इससे आम नागरिकों में यह भावना प्रबल होती जा रही है कि रेल प्रशासन कटनी को किसी बड़े जंक्शन के बजाय एक साधारण ग्रामीण स्टेशन की तरह देख रहा है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल विपरीत है।
कटनी जंक्शन : नाम जंक्शन, व्यवहार साधारण स्टेशन जैसा
कटनी जंक्शन भारतीय रेलवे के तीन प्रमुख रेल मार्गों—हावड़ा–मुंबई, जबलपुर–सिंगरौली और कटनी–बीना मार्ग का संगम है। यहां से प्रतिदिन सैकड़ों यात्री उत्तर भारत, दक्षिण भारत, पश्चिम भारत और पूर्वी भारत की ओर सफर करते हैं। इसके बावजूद कटनी जंक्शन को वह महत्व नहीं मिल पा रहा, जिसका वह वास्तविक हकदार है।
रेलवे के ही आंकड़ों के अनुसार कटनी जंक्शन से प्रतिदिन हजारों यात्री आवागमन करते हैं। स्टेशन पर प्लेटफॉर्म की संख्या, यार्ड की क्षमता और तकनीकी सुविधाएं भी पर्याप्त हैं, लेकिन इसके बावजूद कई प्रमुख ट्रेनें यहां बिना रुके निकल जाती हैं।
इन ट्रेनों के ठहराव नहीं होने से सबसे अधिक परेशानी
कटनी जंक्शन से न रुकने वाली ट्रेनों में कई लंबी दूरी की महत्वपूर्ण गाड़ियाँ शामिल हैं, जिनका ठहराव यदि कटनी में हो, तो पूरे विंध्य और महाकौशल अंचल को लाभ मिल सकता है। यात्रियों का कहना है कि:
दिल्ली, मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता जाने वाली कई ट्रेनें कटनी को नजरअंदाज कर देती हैं।
इन्हीं ट्रेनों के लिए यात्रियों को मजबूरी में जबलपुर (लगभग 100 किमी) या सतना (लगभग 90 किमी) जाना पड़ता है।
अतिरिक्त यात्रा खर्च, समय की बर्बादी और शारीरिक परेशानी झेलनी पड़ती है।
यात्रियों की पीड़ा: “कटनी में प्लेटफॉर्म हैं, फिर ट्रेन क्यों नहीं?”
कटनी निवासी यात्रियों का कहना है कि जब स्टेशन पर पर्याप्त प्लेटफॉर्म, लाइनें और तकनीकी व्यवस्था उपलब्ध है, तो फिर ठहराव न देना पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।
एक वरिष्ठ यात्री का कहना है—
> “हम टैक्स देते हैं, रेलवे का उपयोग करते हैं, लेकिन हमें अपने ही शहर से ट्रेन पकड़ने का अधिकार नहीं मिलता। क्या कटनी के नागरिक दूसरे दर्जे के यात्री हैं?”
एक छात्र ने कहा—
> “परीक्षा या नौकरी के इंटरव्यू के लिए हमें रात में जबलपुर जाना पड़ता है, जिससे खर्च और जोखिम दोनों बढ़ जाते हैं।”
व्यापार, उद्योग और शिक्षा पर भी पड़ रहा असर
कटनी केवल एक यात्री नगर नहीं है, बल्कि यह सीमेंट उद्योग, खनन, व्यापार और शिक्षा का भी प्रमुख केंद्र है। यहां बड़ी संख्या में व्यापारी, उद्योगपति, विद्यार्थी और नौकरीपेशा लोग निवास करते हैं।
ट्रेन ठहराव न होने से—
व्यापारियों को दूसरे शहरों से संपर्क में कठिनाई होती है
निवेशकों की आवाजाही प्रभावित होती है
विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षार्थियों को अतिरिक्त संघर्ष करना पड़ता है
पर्यटन और धार्मिक यात्राएं भी प्रभावित होती हैं
राजनीतिक प्रतिनिधियों की चुप्पी पर भी सवाल
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह समस्या वर्षों से चली आ रही है, लेकिन जनप्रतिनिधियों और सांसद-विधायकों की ओर से ठोस प्रयास नहीं हो पा रहे। कभी-कभार ज्ञापन दिए जाते हैं, पत्राचार होता है, लेकिन परिणाम शून्य रहता है।
रेलवे बोर्ड और जोनल स्तर पर बार-बार मांग उठाए जाने के बावजूद अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है।
रेल प्रशासन का पक्ष: तकनीकी कारण या उदासीनता?
रेल प्रशासन की ओर से अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि—
समय सारणी (टाइम टेबल) की बाध्यता
ट्रैक व्यस्तता
ऑपरेशनल कारण
इसके चलते सभी ट्रेनों का ठहराव संभव नहीं है।
हालांकि यात्रियों का सवाल है कि जब वही ट्रेनें सतना और जबलपुर में रुक सकती हैं, तो कटनी में क्यों नहीं?
कटनी को मिलना चाहिए उसका हक
स्थानीय संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और व्यापारिक संस्थाओं का मानना है कि:
कम से कम 20–25 प्रमुख ट्रेनों का ठहराव तुरंत दिया जाए
कटनी को “ए-ग्रेड जंक्शन” के अनुरूप सुविधाएं मिलें
समय सारणी में संशोधन कर यात्रियों की मांग को प्राथमिकता दी जाए
आंदोलन की चेतावनी
यदि शीघ्र समाधान नहीं हुआ, तो नागरिक मंचों द्वारा—
हस्ताक्षर अभियान
ज्ञापन
जन आंदोलन
सांसदों के माध्यम से संसद में प्रश्न
उठाने की तैयारी की जा रही है।
कटनी जंक्शन केवल एक स्टेशन नहीं, बल्कि लाखों लोगों की जीवनरेखा है। इसे उपेक्षा के अंधेरे से निकालकर उसका वास्तविक महत्व देना समय की मांग है। यदि रेल प्रशासन ने अब भी ध्यान नहीं दिया, तो जनआक्रोश और बढ़ना तय है।
कटनीवासी यह सवाल पूछ रहे हैं—
“जब ट्रेनें हमारे शहर से गुजरती हैं, तो रुकती क्यों नहीं?”









