
केंद्रीय बजट 2026-27 केवल आय-व्यय का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के विजन का ठोस रोडमैप है। इस बजट की सबसे सशक्त विशेषता यह है कि इसमें महिलाओं को कल्याण की परिधि से बाहर निकालकर राष्ट्र की आर्थिक शक्ति के केंद्र में स्थापित किया गया है।
महिला सशक्तिकरण के लिए ₹5.00 लाख करोड़ का ऐतिहासिक आवंटन यह स्पष्ट संकेत देता है कि सरकार महिलाओं को अब केवल योजनाओं की लाभार्थी नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की निर्णायक भागीदार मान रही है। यह दृष्टिकोण भारतीय नीति-निर्माण में एक महत्वपूर्ण वैचारिक बदलाव को दर्शाता है।
बजट में देश के हर जिले में बालिका छात्रावासों की स्थापना का प्रावधान शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में क्रांतिकारी कदम है। इसके साथ ही महिला उद्यमियों को ₹2 करोड़ तक के ऋण, स्वयं सहायता समूहों के उत्पादों के विपणन हेतु ‘SHE Marts’, तथा उद्योगों के सहयोग से वर्किंग वुमन हॉस्टल्स का निर्माण—ये सभी पहलें महिलाओं के लिए एक संपूर्ण आर्थिक इकोसिस्टम तैयार करती हैं।
विशेष रूप से स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 10 करोड़ से अधिक महिलाओं को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने का प्रयास ग्रामीण भारत में आत्मनिर्भरता, रोजगार सृजन और सामाजिक परिवर्तन की नई लहर पैदा करेगा। यह नारी शक्ति को केवल घरेलू सीमाओं से मुक्त नहीं करेगा, बल्कि उन्हें उद्यम, नवाचार और नेतृत्व के अवसर भी प्रदान करेगा।
‘विकसित भारत’ का सपना तब तक अधूरा है, जब तक महिलाएं आर्थिक, सामाजिक और नीतिगत निर्णयों में समान भागीदारी न करें। बजट 2026-27 इस सच्चाई को स्वीकार करता है और उसे व्यवहार में उतारने का साहसिक प्रयास करता है।
निस्संदेह, यह बजट आने वाले वर्षों में भारत की विकास गाथा में नारी शक्ति को केंद्रीय भूमिका में स्थापित करने वाला दस्तावेज़ सिद्ध होगा।
— ईशा त्रिपाठी सूरी
संस्थापिका / अध्यक्षा
शिवशक्ति जनकल्याण ट्रस्ट








