
महाकाल की नगरी में प्रकृति का उत्सव
वन आधारित आजीविका, औषधीय परंपरा और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा
उज्जैन। आध्यात्मिकता, संस्कृति और प्रकृति का अद्भुत संगम तब देखने को मिला जब उज्जैन के दशहरा मैदान में आयोजित श्री महाकाल वन मेले का शुभारंभ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विधिवत किया। यह आयोजन केवल एक मेला नहीं, बल्कि प्रकृति, परंपरा और प्रगतिशील विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की एक सशक्त पहल के रूप में सामने आया। मुख्यमंत्री ने मेले में लगाए गए विभिन्न प्रदर्शनी स्टॉलों का अवलोकन किया और एम.एफ.पी. पार्क द्वारा निर्मित प्राकृतिक “होली रंग गुलाल” तथा “महाकाल स्मृति उपहार” का विमोचन कर कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि वन मेले में वन औषधियों, लघु वनोपज और प्राकृतिक उत्पादों के सुव्यवस्थित स्टॉल लगाए गए हैं, जिनके माध्यम से वन आधारित आजीविका को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह मेला प्रदेश की समृद्ध जैव विविधता और आदिवासी एवं वनवासियों की परंपरागत ज्ञान-सम्पदा को सामने लाने का सशक्त माध्यम है।
आध्यात्म और प्रकृति का संगम

उज्जैन, जिसे महाकाल की नगरी के रूप में विश्वभर में जाना जाता है, सदियों से आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रहा है। ऐसे पावन स्थल पर वन मेले का आयोजन एक प्रतीकात्मक संदेश देता है—कि प्रकृति ही हमारी मूल शक्ति है। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति को माता का स्थान दिया गया है। वृक्ष, वनस्पतियाँ और औषधियाँ केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं।
उन्होंने कहा कि महाकाल की नगरी में आयोजित यह वन मेला पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में जन-जागरूकता बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा। यहां लगाए गए स्टॉल केवल उत्पादों का प्रदर्शन नहीं कर रहे, बल्कि यह बता रहे हैं कि किस प्रकार वन आधारित संसाधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकते हैं।
एम.एफ.पी. पार्क की नवाचार पहल

कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण एम.एफ.पी. (माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस) पार्क द्वारा निर्मित प्राकृतिक “होली रंग गुलाल” और “महाकाल स्मृति उपहार” का विमोचन रहा। मुख्यमंत्री ने इन उत्पादों को पर्यावरण अनुकूल और स्वास्थ्य की दृष्टि से सुरक्षित बताते हुए कहा कि रासायनिक रंगों के दुष्प्रभावों को देखते हुए प्राकृतिक रंगों का उपयोग समय की आवश्यकता है।
एम.एफ.पी. पार्क द्वारा तैयार किए गए ये उत्पाद स्थानीय लघु वनोपज और प्राकृतिक तत्वों से निर्मित हैं, जिससे न केवल पर्यावरण की रक्षा होती है बल्कि वनवासियों और स्व-सहायता समूहों को रोजगार भी मिलता है। “महाकाल स्मृति उपहार” के माध्यम से उज्जैन की धार्मिक पहचान और स्थानीय हस्तशिल्प को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में भी यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
वन आधारित आजीविका को बढ़ावा

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रदेश सरकार वन आधारित आजीविका को सुदृढ़ करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि लघु वनोपज संग्रहण, प्रसंस्करण और विपणन की बेहतर व्यवस्था से हजारों परिवारों को सीधा लाभ मिल रहा है। वन मेले में प्रदर्शित उत्पादों में शहद, औषधीय जड़ी-बूटियाँ, प्राकृतिक तेल, बांस शिल्प, हस्तनिर्मित वस्तुएँ और जैविक उत्पाद शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि प्रदेश में आदिवासी और वनवासी समुदायों की आजीविका का बड़ा हिस्सा वनों पर आधारित है। सरकार का प्रयास है कि इन समुदायों को आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
औषधीय परंपरा का पुनर्जागरण

वन मेले में आयुर्वेदिक और हर्बल उत्पादों की विशेष प्रदर्शनी लगाई गई। विशेषज्ञों ने विभिन्न औषधीय पौधों के उपयोग और उनके लाभों की जानकारी दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद विश्वभर में मान्यता प्राप्त कर रही है। मध्यप्रदेश की जैव विविधता इस दिशा में अपार संभावनाएँ रखती है।
उन्होंने कहा कि यदि हम पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ें, तो न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल कर सकते हैं, बल्कि वैश्विक बाजार में भी अपनी पहचान बना सकते हैं।
स्व-सहायता समूहों की सहभागिता
मेले में बड़ी संख्या में महिला स्व-सहायता समूहों ने भाग लिया। उन्होंने हस्तनिर्मित उत्पादों, खाद्य सामग्री और प्राकृतिक वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाई। मुख्यमंत्री ने महिलाओं की सक्रिय भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि महिला सशक्तिकरण के बिना समग्र विकास संभव नहीं है।
उन्होंने कहा कि स्व-सहायता समूह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सरकार इन समूहों को वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और विपणन सुविधा प्रदान कर रही है।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश
वन मेला केवल व्यापारिक गतिविधि नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है। कार्यक्रम में वृक्षारोपण, जल संरक्षण और जैव विविधता पर आधारित प्रदर्शनी लगाई गई। स्कूली विद्यार्थियों और युवाओं ने भी बड़ी संख्या में भाग लेकर पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी का परिचय दिया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे अधिक से अधिक वृक्षारोपण करें और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करें।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सजी संध्या
वन मेले के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया। आदिवासी लोकनृत्य, भजन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने वातावरण को उल्लासमय बना दिया। मुख्यमंत्री ने कलाकारों की सराहना करते हुए कहा कि संस्कृति और प्रकृति का संबंध अभिन्न है।
आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश की दिशा में कदम
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि “आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश” की परिकल्पना तभी साकार होगी जब ग्रामीण और वन क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। वन मेले जैसे आयोजन स्थानीय उत्पादों को मंच प्रदान करते हैं और उन्हें बाजार से जोड़ते हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार वन उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्य, प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना और निर्यात प्रोत्साहन की दिशा में कार्य कर रही है।
नागरिकों की उत्साहपूर्ण सहभागिता
दशहरा मैदान में आयोजित इस वन मेले में बड़ी संख्या में नागरिकों ने भाग लिया। परिवारों, विद्यार्थियों और पर्यटकों ने स्टॉलों का अवलोकन किया और प्राकृतिक उत्पादों की खरीदारी की। लोगों ने इस आयोजन को ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक बताया।
श्री महाकाल वन मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति और विकास के संतुलन का उत्सव है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को नई दिशा और ऊर्जा प्रदान की। प्राकृतिक “होली रंग गुलाल” और “महाकाल स्मृति उपहार” का विमोचन इस बात का प्रतीक है कि परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल सकती हैं।
उज्जैन की पावन भूमि से उठी यह पहल पूरे प्रदेश के लिए संदेश देती है कि वन संपदा का संरक्षण और सतत उपयोग ही समृद्धि का मार्ग है। यदि इसी प्रकार प्रकृति आधारित अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलता रहा, तो मध्यप्रदेश न केवल आर्थिक रूप से सशक्त होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी उदाहरण प्रस्तुत करेगा।








