
भोपाल। भारतीय चिंतन परंपरा में ऐसे महापुरुष विरले ही हुए हैं, जिन्होंने विचार को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि जीवन और व्यवस्था के स्तर पर उतारने का मार्ग दिखाया। श्रद्धेय पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी उन्हीं विभूतियों में से एक थे। उन्होंने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की चेतना को आधुनिक भारत की आवश्यकताओं से जोड़ा, एकात्म मानववाद का दर्शन प्रतिपादित किया और अंत्योदय का वह सूत्र दिया, जो आज भी शासन और समाज के लिए दिशा-सूचक सिद्धांत बना हुआ है। उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर भोपाल के लालघाटी स्थित उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धासुमन अर्पित किए गए। इस अवसर पर निकट में विकसित ‘नमो वन’ का अवलोकन किया गया तथा पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प दोहराया गया। कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों, समाजसेवियों, कार्यकर्ताओं और नागरिकों की गरिमामयी उपस्थिति रही।

इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जीवन सादगी, समर्पण और राष्ट्रसेवा का प्रतीक था। उन्होंने भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य एवं पूर्व अध्यक्ष के रूप में संगठन को वैचारिक आधार दिया। उनका मानना था कि भारत की आत्मा उसकी संस्कृति में बसती है, और विकास का मॉडल भी उसी आत्मा के अनुरूप होना चाहिए। पश्चिमी विचारधाराओं की अंधानुकरण से हटकर उन्होंने भारतीय चिंतन पर आधारित एकात्म मानववाद का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसमें व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को एक अविभाज्य इकाई के रूप में देखा गया।

पुण्यतिथि कार्यक्रम में उपस्थित जनप्रतिनिधियों ने प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए कहा कि दीनदयाल जी ने अंत्योदय की जो अवधारणा दी, वह आज भी शासन का मूल मंत्र है। अंत्योदय का अर्थ है समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की किरण पहुँचाना। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि शासन की नीति और कार्यप्रणाली का आधार है। कार्यक्रम में यह भी रेखांकित किया गया कि यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने अंत्योदय के इसी सिद्धांत को व्यवहार में उतारते हुए गरीब, वंचित और जरूरतमंद वर्गों के लिए अनेक योजनाएँ प्रारंभ की हैं, जिनसे करोड़ों लोगों का जीवन स्तर ऊँचा उठा है।

भोपाल के लालघाटी स्थित प्रतिमा स्थल पर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में ‘नमो वन’ का विशेष आकर्षण रहा। यह वन क्षेत्र केवल हरित विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनजागरण का माध्यम भी है। कार्यक्रम के दौरान पौधारोपण कर यह संदेश दिया गया कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद में भी प्रकृति के साथ संतुलन और समरसता का भाव निहित है। मनुष्य को प्रकृति से पृथक नहीं, बल्कि उसका अंग मानने की भारतीय परंपरा को उन्होंने अपने विचारों में स्थान दिया।

कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ जनप्रतिनिधि विश्वास कैलाश सारंग और मालती राय ने अपने संबोधन में कहा कि दीनदयाल जी का जीवन आज के युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है। उन्होंने अल्प संसाधनों में भी उच्च आदर्शों के साथ जीवन जिया। उनका संपूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित रहा। उन्होंने कहा कि आज जब भारत विश्व पटल पर तेजी से उभर रहा है, तब दीनदयाल जी के विचार और अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं। आत्मनिर्भर भारत, गरीब कल्याण, सांस्कृतिक गौरव और समावेशी विकास—ये सभी तत्व उनके एकात्म मानववाद की ही व्यावहारिक अभिव्यक्ति हैं।

एकात्म मानववाद की अवधारणा को समझाते हुए वक्ताओं ने कहा कि यह दर्शन व्यक्ति को केवल आर्थिक प्राणी नहीं मानता, बल्कि उसे शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा से युक्त संपूर्ण सत्ता के रूप में देखता है। पश्चिमी अर्थशास्त्र जहाँ मनुष्य को उपभोक्ता या उत्पादक तक सीमित कर देता है, वहीं दीनदयाल जी का चिंतन मनुष्य की समग्र उन्नति पर बल देता है। उनके अनुसार विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मानव जीवन में संतुलन, नैतिकता और आत्मिक उन्नयन लाना भी है। इसी दृष्टि से उन्होंने विकेंद्रीकरण, ग्रामोदय और स्वदेशी पर जोर दिया।
कार्यक्रम में यह भी उल्लेख किया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज देश में गरीबों के लिए आवास उपलब्ध कराने की दिशा में ऐतिहासिक कार्य हुआ है। प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से करोड़ों परिवारों को पक्की छत मिली है। उज्ज्वला योजना के तहत गैस चूल्हे की व्यवस्था कर महिलाओं को धुएँ से मुक्ति दिलाई गई है। स्वच्छ भारत अभियान ने देश को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया है। आयुष्मान भारत योजना के माध्यम से गरीब परिवारों को निःशुल्क उपचार की सुविधा मिली है। ये सभी पहल अंत्योदय की भावना से प्रेरित हैं।
उच्च शिक्षा और सैन्य क्षमता के क्षेत्र में भी देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। नई शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा को भारतीय मूल्यों से जोड़ते हुए वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाया जा रहा है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़े कदम उठाए गए हैं। स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देकर भारत ने अपनी सैन्य क्षमता को सुदृढ़ किया है। यह सब उस आत्मविश्वास का परिणाम है, जिसकी नींव दीनदयाल जी जैसे विचारकों ने रखी थी।
भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित जनसमूह ने संकल्प लिया कि वे दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को केवल स्मरण तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि अपने जीवन और कार्य में उतारेंगे। ‘नमो वन’ में पौधारोपण के माध्यम से यह संदेश भी दिया गया कि पर्यावरण संरक्षण आज की अनिवार्य आवश्यकता है। एकात्म मानववाद का दर्शन भी यही सिखाता है कि विकास का मार्ग प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही प्रशस्त किया जा सकता है।
कार्यक्रम के दौरान दीनदयाल जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि उनका जन्म साधारण परिवार में हुआ, किंतु असाधारण प्रतिभा और राष्ट्रभक्ति ने उन्हें विशिष्ट बना दिया। प्रारंभिक अवस्था में ही माता-पिता का साया उठ जाने के बावजूद उन्होंने कठिन परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त की। वे मेधावी छात्र थे और जीवन के आरंभ से ही राष्ट्रसेवा की भावना से ओत-प्रोत थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में उन्होंने देशभर में संगठन कार्य किया और बाद में भारतीय जनसंघ के संगठन को सुदृढ़ आधार दिया।
उनकी लेखनी और भाषणों में स्पष्टता, तर्क और भारतीयता का समन्वय दिखाई देता था। ‘एकात्म मानववाद’ पर दिए गए उनके व्याख्यान आज भी राजनीतिक चिंतन की धरोहर माने जाते हैं। उन्होंने कहा था कि भारत को अपनी समस्याओं का समाधान अपने स्वभाव और परंपरा के अनुरूप खोजना होगा। यही कारण है कि आज भी उनके विचार नीति-निर्माताओं और समाजचिंतकों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि अंत्योदय केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सम्मान और स्वाभिमान से जीवन जीने की व्यवस्था है। जब किसी गरीब को अपना घर मिलता है, जब किसी महिला को धुएँ से मुक्ति मिलती है, जब किसी किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिलता है, तब अंत्योदय साकार होता है। इसी भावना के साथ केंद्र और राज्य सरकारें कार्य कर रही हैं।
भोपाल में आयोजित इस श्रद्धांजलि कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि विचारों की शक्ति समय और परिस्थितियों से परे होती है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जीवन और दर्शन आने वाली पीढ़ियों को मार्गदर्शन देता रहेगा। ‘नमो वन’ में लगाए गए पौधे केवल हरियाली के प्रतीक नहीं, बल्कि उस संकल्प के प्रतीक हैं कि भारत का विकास प्रकृति, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के समन्वय से होगा।
अंत में उपस्थित जनप्रतिनिधियों और नागरिकों ने एक स्वर में कहा कि वे दीनदयाल जी के दिखाए मार्ग पर चलते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की रोशनी पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध रहेंगे। एकात्म मानववाद और अंत्योदय के सिद्धांतों पर आधारित समावेशी विकास ही सशक्त, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि पर किया गया यह नमन केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस विचारधारा के प्रति पुनः समर्पण है, जो भारत को विश्व में विशिष्ट पहचान दिलाने की क्षमता रखती है।








