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चक्रधर समारोह: ओडिसी नृत्य में नैना कुसुम ने प्रस्तुत किया दुर्गा तांडव

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रायगढ़। 41वें चक्रधर समारोह-2026 की आठवीं सांस्कृतिक संध्या में ओडिसी नृत्यांगना नैना कुसुम ने अपनी ऊर्जावान और प्रभावशाली प्रस्तुति से मंच पर शक्ति और भक्ति का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया। उन्होंने ओडिसी नृत्य की पारंपरिक भाव-भंगिमाओं, लय और मुद्राओं के माध्यम से ‘दुर्गा तांडव’ की प्रस्तुति दी। मां दुर्गा के पराक्रम और महिषासुर मर्दिनी स्वरूप को केंद्र में रखकर की गई इस प्रस्तुति में नृत्य की गति, भावाभिव्यक्ति और ऊर्जा का प्रभावी संयोजन देखने को मिला। प्रस्तुति के दौरान मंच पर ओडिसी की शास्त्रीय गरिमा के साथ शक्ति आराधना का भाव उभरकर सामने आया और दर्शकों ने तालियों के साथ कलाकार का उत्साह बढ़ाया।
नैना कुसुम गुरु आर्य नंदे की शिष्या हैं और पिछले पांच वर्षों से रायपुर में ओडिसी नृत्य का प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने ओडिसी नृत्य की बारीकियों, भावाभिनय, लय, मुद्राओं और मंचीय प्रस्तुति पर निरंतर अभ्यास किया है। चक्रधर समारोह जैसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंच पर उनकी प्रस्तुति उनके कला प्रशिक्षण और साधना की एक महत्वपूर्ण झलक के रूप में सामने आई। गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा प्राप्त करने वाली नैना ने अपनी प्रस्तुति में तकनीकी पक्ष के साथ विषय की भावनात्मक अभिव्यक्ति पर भी ध्यान केंद्रित किया।
‘दुर्गा तांडव’ को ओडिसी की शक्तिशाली और आकर्षक नृत्य रचनाओं में गिना जाता है। उपलब्ध कार्यक्रम विवरण के अनुसार इसकी रचना आदि गुरु शंकराचार्य से जुड़ी मानी जाती है। इस प्रस्तुति में देवी दुर्गा की शक्ति, पराक्रम और महिषासुर मर्दिनी स्वरूप को नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। नैना कुसुम ने इसी भावभूमि को अपने नृत्य में प्रस्तुत किया। उनके पदसंचालन, मुद्राओं और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से प्रस्तुति का विषय स्पष्ट रूप से दर्शकों तक पहुंचा।
इस प्रस्तुति की एक विशेषता इसके पीछे जुड़े अनुभवी गुरुजनों का मार्गदर्शन भी रहा। उपलब्ध विवरण के अनुसार गीत निर्देशन गुरु लक्ष्मीकांत पालित, स्वर-संगीत रचना गुरु धनेंद्रश्वर तथा नृत्य निर्देशन गुरु डॉ. गजेंद्र कुमार पांडा का रहा। इन सभी कलात्मक पक्षों के समन्वय ने ‘दुर्गा तांडव’ को एक संपूर्ण नृत्य प्रस्तुति का स्वरूप दिया। नृत्य में केवल गति और तकनीक ही नहीं, बल्कि संगीत, भाव और विषय की एकरूपता भी महत्वपूर्ण होती है। नैना कुसुम की प्रस्तुति में इन पक्षों का समन्वय दिखाई दिया।
चक्रधर समारोह की आठवीं संध्या में ओडिसी की यह प्रस्तुति इसलिए भी उल्लेखनीय रही कि एक ही मंच पर भारतीय शास्त्रीय नृत्य की अलग-अलग परंपराओं और शैलियों को स्थान दिया गया। नैना कुसुम की प्रस्तुति के साथ इसी संध्या में सारंगढ़ की आर्या नंदे ने भी ओडिसी नृत्य प्रस्तुत किया। इसके अलावा कथक, लोकसंगीत, नृत्य नाटिका और अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी कार्यक्रम का हिस्सा रहीं। इस विविधता ने आठवीं सांस्कृतिक संध्या को भारतीय कला की अनेक धाराओं के संगम का स्वरूप दिया।
नैना कुसुम की कला यात्रा में विभिन्न प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंचों पर प्रस्तुतियां भी शामिल रही हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने ताज फेस्टिवल, आगरा, ऑल इंडिया डांस फेस्टिवल, भिलाई-दुर्ग और देवप्रसाद फेस्टिवल 2026, भुवनेश्वर जैसे मंचों पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। इन मंचों पर ओडिसी नृत्य की प्रस्तुति के माध्यम से उन्होंने अपनी कला को दर्शकों तक पहुंचाया। चक्रधर समारोह में प्रस्तुति इसी यात्रा की एक और महत्वपूर्ण कड़ी रही, जहां उन्हें देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए कलाकारों के साथ एक प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंच साझा करने का अवसर मिला।
ओडिसी नृत्य की अपनी विशिष्ट शास्त्रीय परंपरा है, जिसमें शरीर की मुद्राएं, लय, पदसंचालन, भाव और संगीत एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। ‘दुर्गा तांडव’ जैसे विषय में नृत्य की ऊर्जा और भावाभिव्यक्ति का महत्व और बढ़ जाता है। देवी के पराक्रम और महिषासुर मर्दिनी स्वरूप को प्रस्तुत करते समय कलाकार को नृत्य के साथ विषय की भावनात्मक शक्ति को भी अभिव्यक्त करना होता है। नैना कुसुम ने इसी भावभूमि को केंद्र में रखकर प्रस्तुति दी, जिसमें शक्ति और भक्ति दोनों पक्षों का समावेश दिखाई दिया।
41वें चक्रधर समारोह का आयोजन 14 से 23 सितंबर 2026 तक रायगढ़ के रामलीला मैदान में किया जा रहा है। महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना और रायगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को समर्पित इस दस दिवसीय आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों से कलाकार हिस्सा ले रहे हैं। शास्त्रीय नृत्य, शास्त्रीय संगीत, लोककला, गायन, वादन और साहित्य की विभिन्न विधाओं को कार्यक्रम में स्थान दिया गया है। ऐसे मंच पर नैना कुसुम की ओडिसी प्रस्तुति रायगढ़ में शास्त्रीय नृत्य की विविधता को और समृद्ध करती है।
आठवीं सांस्कृतिक संध्या में आर्या नंदे की ओडिसी प्रस्तुति भी आकर्षण का केंद्र रही। सारंगढ़ से ताल्लुक रखने वाली आर्या नंदे ने गुरु देव प्रसाद दास परंपरा में प्रशिक्षण प्राप्त किया है और देश-विदेश के विभिन्न मंचों पर ओडिसी प्रस्तुत की है। एक ही शाम में आर्या नंदे और नैना कुसुम की ओडिसी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को इस शास्त्रीय नृत्य शैली के अलग-अलग कलाकारों की प्रस्तुति देखने का अवसर दिया। इसके साथ बनारस घराने का कथक, रायगढ़ घराने का कथक, लोकसंगीत और नृत्य नाटिका ने शाम को बहुरंगी सांस्कृतिक स्वरूप प्रदान किया।
नैना कुसुम की ‘दुर्गा तांडव’ प्रस्तुति में शक्ति और भक्ति की विषयवस्तु प्रमुख रही। मां दुर्गा के महिषासुर मर्दिनी स्वरूप को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए उन्होंने भावों और मुद्राओं का इस्तेमाल किया। मंच पर विषय की गंभीरता और नृत्य की ऊर्जा के बीच संतुलन दिखाई दिया। दर्शकों की प्रतिक्रिया भी प्रस्तुति के दौरान बनी रही और कार्यक्रम के समापन पर तालियों के माध्यम से कलाकार का उत्साहवर्धन किया गया।
चक्रधर समारोह जैसे मंच पर किसी शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति कलाकार के लिए अपनी कला को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने का अवसर होती है। यहां देश के विभिन्न हिस्सों से कलाकार और कला प्रेमी जुटते हैं। रायगढ़ की अपनी कथक परंपरा के बीच ओडिसी जैसी अन्य शास्त्रीय नृत्य विधाओं को भी स्थान मिलना समारोह की सांस्कृतिक व्यापकता को दर्शाता है। नैना कुसुम ने इसी मंच पर ‘दुर्गा तांडव’ के माध्यम से ओडिसी की शक्ति-प्रधान अभिव्यक्ति को दर्शकों के सामने रखा।
चक्रधर समारोह की आठवीं संध्या में एक ओर नन्हीं प्रतिभाओं ने अपनी कला प्रस्तुत की, वहीं दूसरी ओर अनुभवी और प्रशिक्षित कलाकारों ने भी शास्त्रीय नृत्य की परंपराओं को मंच पर जीवंत किया। इस क्रम में नैना कुसुम की प्रस्तुति ने ओडिसी की भावप्रधान और ऊर्जावान शैली को सामने रखा। कार्यक्रम की विभिन्न प्रस्तुतियों में गुरु-शिष्य परंपरा और वर्षों की कला साधना का पक्ष भी स्पष्ट दिखाई दिया।
‘दुर्गा तांडव’ की प्रस्तुति के साथ नैना कुसुम ने चक्रधर समारोह के मंच पर ओडिसी की शक्ति, भक्ति, लय और भाव का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया। मां दुर्गा के पराक्रम और महिषासुर मर्दिनी स्वरूप की नृत्यात्मक अभिव्यक्ति ने आठवीं सांस्कृतिक संध्या में एक विशिष्ट रंग जोड़ा। गुरु आर्य नंदे के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण प्राप्त कर रही नैना कुसुम की यह प्रस्तुति 41वें चक्रधर समारोह की उन सांस्कृतिक झलकियों में शामिल रही, जहां भारतीय शास्त्रीय नृत्य की विविध परंपराएं एक ही मंच पर दिखाई दे रही हैं।
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