
रायगढ़। 41वें चक्रधर समारोह-2026 के मंच पर नन्हीं बाल नृत्यांगना आशिका सिंघल ने अपनी कथक प्रस्तुति से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। महज 8 वर्ष की उम्र में आशिका ने जिस आत्मविश्वास, लयबद्धता और भावाभिव्यक्ति के साथ कथक के विभिन्न पक्षों को प्रस्तुत किया, वह उनकी कम उम्र में की जा रही निरंतर कला साधना की झलक देता है। उनकी प्रस्तुति में कथक के तोड़ा, 50 चक्कर, टुकड़ा, आमद और तत्कार जैसे पक्षों के साथ श्रीकृष्ण और राधा-रानी के होली-रास को नृत्य-नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया गया। भाव, लय और ताल के समन्वय से सजी इस प्रस्तुति के दौरान दर्शकों की निगाहें लगातार मंच पर टिकी रहीं और प्रस्तुति के बाद तालियों से बाल कलाकार का उत्साह बढ़ाया गया।
आशिका सिंघल की प्रस्तुति की शुरुआत ‘जय-जय जगतजननी देवी…’ स्तुति से हुई। देवी स्तुति के माध्यम से मंच पर प्रवेश के बाद उन्होंने कथक की तकनीकी प्रस्तुतियों का क्रम आगे बढ़ाया। कथक में तोड़ा, टुकड़ा, आमद और तत्कार जैसी प्रस्तुतियां कलाकार की लय, ताल, पदसंचालन और शरीर के संतुलन पर पकड़ को सामने लाती हैं। आशिका ने इन पक्षों को अपनी प्रस्तुति में शामिल किया और इसके बाद नृत्य को भावप्रधान रूप देते हुए राधा-कृष्ण के होली-रास की ओर ले गईं। इस क्रम ने प्रस्तुति को केवल तकनीकी प्रदर्शन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसमें भक्ति और श्रृंगार के सांस्कृतिक भाव भी जोड़े।
प्रस्तुति का सबसे आकर्षक पक्ष 50 चक्करों का प्रदर्शन रहा। कथक में चक्कर और तत्कार जैसी तकनीकी प्रस्तुतियां अभ्यास, संतुलन और लय पर नियंत्रण की मांग करती हैं। इतनी कम उम्र में मंच पर इनका प्रदर्शन दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण बना। आशिका के पदसंचालन के साथ घुंघरुओं की लय और संगीत की संगत ने मंचीय प्रस्तुति को प्रभावशाली रूप दिया। इसके बाद आमद और टुकड़े की प्रस्तुति ने कथक के पारंपरिक स्वरूप को आगे बढ़ाया। दर्शकों ने इन प्रस्तुतियों के दौरान तालियों के माध्यम से बाल कलाकार का उत्साहवर्धन किया।
आशिका की प्रस्तुति का दूसरा प्रमुख हिस्सा श्रीकृष्ण और राधा-रानी के होली-रास पर आधारित नृत्य-नाटिका रहा। यहां तकनीकी कथक के साथ भावाभिनय को प्रमुखता मिली। राधा-कृष्ण की होली और रास की सांस्कृतिक कल्पना को नृत्य की मुद्राओं और भाव-भंगिमाओं के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए आशिका ने प्रस्तुति में अलग रंग जोड़ा। कथक की लयकारी के साथ जब भावाभिनय जुड़ा तो मंच पर नृत्य की कहानी और पात्रों का भाव पक्ष उभरकर सामने आया। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार इस हिस्से में भी दर्शकों ने प्रस्तुति की सराहना की।
आशिका सिंघल रायपुर के राजकुमार कॉलेज में कक्षा तीसरी की छात्रा हैं। उन्होंने महज चार वर्ष की उम्र में कथक का प्रशिक्षण प्रारंभ किया था और वर्तमान में गुरु सुश्री नेहा सिंह के मार्गदर्शन में कथक की साधना कर रही हैं। इतनी कम उम्र में प्रशिक्षण शुरू करने के बाद मंच पर लगातार प्रस्तुति देना उनकी कला यात्रा की निरंतरता को दर्शाता है। अगस्त 2026 में रायपुर में आयोजित ‘पावस प्रसंग’ में भी आशिका की कथक प्रस्तुति चर्चा में रही थी, जहां उन्होंने देवी स्तुति, तोड़ा, टुकड़ा, आमद और तत्कार के साथ राधा-कृष्ण की होली-रास प्रस्तुत की थी।
आशिका की कला यात्रा चक्रधर समारोह के लिए नई नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वह राज्योत्सव और 40वें चक्रधर समारोह जैसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंचों पर भी कथक की प्रस्तुति दे चुकी हैं। वर्ष 2025 में आयोजित 40वें चक्रधर समारोह के आठवें दिन भी आशिका ने कथक प्रस्तुत किया था। उस समय उनकी आयु सात वर्ष बताई गई थी और उन्होंने भक्ति गीत पर कथक के माध्यम से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया था। एक वर्ष बाद 41वें चक्रधर समारोह में फिर मंच पर लौटना उनकी निरंतर कला साधना की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है।
चक्रधर समारोह जैसे बड़े सांस्कृतिक मंच पर बाल कलाकारों की प्रस्तुति का अपना अलग महत्व होता है। यहां देश के विभिन्न हिस्सों से आए अनुभवी और स्थापित कलाकार अपनी कला प्रस्तुत करते हैं। ऐसे मंच पर किसी बाल कलाकार को प्रस्तुति का अवसर मिलना उसके लिए मंचीय अनुभव हासिल करने का माध्यम बनता है। आशिका ने इसी वातावरण में कथक की तकनीकी और भावप्रधान दोनों प्रस्तुतियां रखीं। उनकी प्रस्तुति में जहां अभ्यास का पक्ष दिखाई दिया, वहीं बाल कलाकार के स्तर का स्वाभाविक उत्साह और मंचीय ऊर्जा भी नजर आई।
कथक की साधना केवल नृत्य की गति नहीं, बल्कि लय, ताल, भाव और अनुशासन का निरंतर अभ्यास है। आशिका की प्रस्तुति में इन सभी पक्षों का संयोजन दिखाई दिया। 50 चक्करों जैसे तकनीकी अंश के साथ तत्कार और आमद की प्रस्तुति ने उनकी तालबद्धता को सामने रखा, जबकि राधा-कृष्ण के होली-रास ने भावाभिनय का पक्ष उजागर किया। इस प्रकार एक ही प्रस्तुति में कथक के तकनीकी और भावात्मक दोनों आयाम देखने को मिले।
चक्रधर समारोह की सांस्कृतिक परंपरा में गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष स्थान है। आशिका गुरु नेहा सिंह के मार्गदर्शन में कथक सीख रही हैं। भारतीय शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा में गुरु से प्राप्त प्रशिक्षण के साथ नियमित अभ्यास और मंचीय अनुभव महत्वपूर्ण माने जाते हैं। आशिका की कला यात्रा में कम उम्र से शुरू हुआ प्रशिक्षण, विभिन्न मंचों पर प्रस्तुति और चक्रधर समारोह जैसे प्रतिष्ठित आयोजन में लगातार भागीदारी इसी क्रम को सामने लाती है।
41वें चक्रधर समारोह का आयोजन 14 से 23 सितंबर 2026 तक रायगढ़ में किया जा रहा है। जिला रायगढ़ की आधिकारिक वेबसाइट पर समारोह के विभिन्न दिनों के कलाकारों और प्रस्तुतियों का विवरण उपलब्ध कराया गया है। समारोह में कथक के साथ ओडिसी, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, मणिपुरी, कथकली, गोटीपुआ, पंडवानी, लोकसंगीत, वादन, गायन और अन्य कला विधाओं को स्थान दिया गया है। इस व्यापक सांस्कृतिक परिवेश में आशिका की कथक प्रस्तुति नई पीढ़ी की शास्त्रीय नृत्य प्रतिभा की एक झलक के रूप में सामने आती है।
चक्रधर समारोह में स्थानीय और युवा कलाकारों को मंच दिए जाने का क्रम लगातार दिखाई देता है। आशिका की प्रस्तुति भी इसी व्यापक सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रही। बड़े मंच पर बाल कलाकार की प्रस्तुति दर्शकों को यह देखने का अवसर देती है कि शास्त्रीय नृत्य की परंपरा किस प्रकार नई पीढ़ी तक पहुंच रही है। आशिका के मामले में चार वर्ष की उम्र से शुरू हुई कथक साधना आठ वर्ष की उम्र में प्रतिष्ठित मंच पर दिखाई दी, जहां उन्होंने तकनीकी नृत्य और भावप्रधान प्रस्तुति दोनों को जोड़ा।
रायगढ़ के चक्रधर समारोह में कथक की प्रस्तुतियों का अपना विशेष स्थान है। समारोह महाराजा चक्रधर सिंह की कला विरासत से जुड़ा है और यहां कथक के अलग-अलग घरानों तथा शैलियों के कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। ऐसे वातावरण में आशिका जैसी बाल कलाकार की उपस्थिति कथक की नई पीढ़ी को मंच पर सामने लाती है। उनके नृत्य में पारंपरिक तकनीकी पक्षों के साथ राधा-कृष्ण की सांस्कृतिक कथाओं को जोड़ना दर्शकों के लिए प्रस्तुति को सहज और भावपूर्ण बनाने वाला पक्ष रहा।
आशिका की प्रस्तुति के दौरान घुंघरुओं की आवाज, ताल की गति और मंचीय भावाभिव्यक्ति एक साथ दिखाई दी। कथक की पहचान में घुंघरुओं और पदसंचालन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। तत्कार में पैरों की गति और ताल का संयोजन विशेष अभ्यास मांगता है। वहीं चक्करों में शरीर का संतुलन और लय बनाए रखना आवश्यक होता है। इन दोनों पक्षों के साथ भावाभिनय को जोड़ते हुए आशिका ने अपनी प्रस्तुति को अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ाया।
राधा-कृष्ण के होली-रास ने प्रस्तुति में सांस्कृतिक और भावनात्मक रंग जोड़ा। होली-रास से जुड़े प्रसंगों में रंग, उमंग, भक्ति और राधा-कृष्ण के पारंपरिक भावों को नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। आशिका ने इस विषय को नृत्य-नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया। इससे पहले किए गए तकनीकी कथक अंशों के बाद यह भावप्रधान खंड प्रस्तुति में स्वाभाविक बदलाव लेकर आया और दर्शकों को कथक के अभिनय पक्ष से भी परिचित कराया।
आशिका सिंघल की यह प्रस्तुति इसलिए भी उल्लेखनीय रही कि इसमें कम उम्र और मंचीय आत्मविश्वास का संयोजन दिखाई दिया। आठ वर्ष की उम्र में किसी बड़े सांस्कृतिक मंच पर प्रस्तुति देना अपने आप में मंचीय अनुभव का अवसर है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि प्रस्तुति में तकनीकी कथक के साथ भाव और कथा को भी शामिल किया गया। उपलब्ध विवरण के अनुसार दर्शकों ने उनकी प्रस्तुति पर तालियों के माध्यम से प्रतिक्रिया दी।
इस प्रस्तुति के माध्यम से एक बार फिर यह दृश्य सामने आया कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य की परंपरा केवल वरिष्ठ कलाकारों तक सीमित नहीं है। बच्चे और युवा कलाकार भी कम उम्र से प्रशिक्षण लेकर मंचों पर अपनी प्रतिभा प्रस्तुत कर रहे हैं। आशिका की कला यात्रा इसका एक उदाहरण है। चार वर्ष की उम्र से शुरू हुआ प्रशिक्षण, गुरु नेहा सिंह का मार्गदर्शन, राज्योत्सव और चक्रधर समारोह जैसे मंचों पर प्रस्तुति तथा अब आठ वर्ष की उम्र में 41वें चक्रधर समारोह में कथक की प्रस्तुति—इन सभी पड़ावों से उनकी कला यात्रा का क्रम सामने आता है।
41वें चक्रधर समारोह में आशिका की प्रस्तुति के साथ मंच पर कथक की एक और पीढ़ी दिखाई दी। अनुभवी कलाकारों के बीच नन्हीं नृत्यांगना का प्रदर्शन दर्शकों के लिए अलग आकर्षण रहा। कथक की तकनीकी प्रस्तुति, देवी स्तुति, 50 चक्कर, तत्कार और राधा-कृष्ण की होली-रास—इन अलग-अलग हिस्सों ने कार्यक्रम को विविधता दी। यही विविधता चक्रधर समारोह जैसे आयोजन की खासियत भी है, जहां एक ही मंच पर कला की अलग-अलग पीढ़ियों और शैलियों को स्थान मिलता है।
आशिका के नृत्य में दिखाई देने वाली लय और भाव की संगति उनकी प्रस्तुति का प्रमुख पक्ष रही। कथक में लयकारी के साथ भावाभिनय का संतुलन प्रस्तुति को पूर्णता देता है। तकनीकी अंशों में जहां पैरों की गति और चक्कर दर्शकों का ध्यान खींचते हैं, वहीं भावप्रधान अंशों में चेहरे के भाव और हाथों की मुद्राएं कथा को आगे बढ़ाती हैं। आशिका की प्रस्तुति ने दोनों पक्षों को क्रमबद्ध तरीके से सामने रखा।
चक्रधर समारोह की आठवीं सांस्कृतिक यात्रा में नन्हीं प्रतिभाओं की प्रस्तुतियों का यह सिलसिला भारतीय शास्त्रीय कलाओं के भविष्य की ओर भी संकेत करता है। हालांकि किसी कलाकार की आगे की यात्रा का आकलन समय और निरंतर साधना के साथ ही किया जा सकता है, लेकिन मंच पर इतनी कम उम्र में प्रशिक्षण के परिणाम प्रस्तुत करना दर्शकों के लिए निश्चित रूप से आकर्षण का विषय रहा। आशिका ने जिस तरह कथक के विभिन्न अंश प्रस्तुत किए, उससे उनके प्रशिक्षण और अभ्यास की झलक मिली।
रायपुर की आठ वर्षीय आशिका सिंघल ने रायगढ़ के चक्रधर समारोह में अपनी कथक प्रस्तुति से एक यादगार मंचीय क्षण जोड़ा। देवी स्तुति से शुरू होकर तोड़ा, टुकड़ा, आमद, 50 चक्कर और तत्कार से गुजरती हुई प्रस्तुति जब श्रीकृष्ण-राधा के होली-रास तक पहुंची, तो कथक के तकनीकी और भावात्मक दोनों पक्ष सामने आए। गुरु नेहा सिंह के मार्गदर्शन में चार वर्ष की उम्र से कथक सीख रही आशिका की यह प्रस्तुति 41वें चक्रधर समारोह में नई पीढ़ी की कला साधना की एक खूबसूरत झलक रही।