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चक्रधर समारोह की नवमीं शाम राकेश शर्मा की सूफियाना आवाज के नाम

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रायगढ़। 41वें अंतरराष्ट्रीय चक्रधर समारोह-2026 की नवमीं सांस्कृतिक संध्या रायगढ़ के स्थानीय कलाकार और प्रसिद्ध सूफी गायक राकेश शर्मा की सुरमयी प्रस्तुति के नाम रही। शास्त्रीय संगीत की बुनियाद और सूफियाना अंदाज के मेल से सजी उनकी गायकी ने समारोह के मंच को अलग रंग प्रदान किया। भक्ति गीतों से लेकर सूफी और गजल की प्रस्तुतियों तक उनकी आवाज ने श्रोताओं को संगीत की विविध अनुभूतियों से जोड़े रखा। प्रस्तुति के दौरान समारोह स्थल पर संगीत का वातावरण बना रहा और दर्शकों ने तालियों के साथ कलाकार का उत्साहवर्धन किया। जिला रायगढ़ की आधिकारिक जानकारी में भी 22 सितंबर की नौवीं सांस्कृतिक संध्या में राकेश शर्मा की सूफी गायन प्रस्तुति को कार्यक्रम का हिस्सा बताया गया है।
चक्रधर समारोह की नौवीं शाम का स्वरूप शुरुआत से ही शास्त्रीय नृत्य, वाद्य संगीत, लोककला और गायन की विविध विधाओं से सजा रहा। इसी क्रम में रायगढ़ के राकेश शर्मा ने सूफी गायन और गजल की प्रस्तुति दी। उनकी गायकी में शास्त्रीय संगीत की पकड़ के साथ सूफी संगीत की भावप्रधान अभिव्यक्ति दिखाई दी। भक्ति भाव से जुड़े गीतों और सूफियाना रंग वाली रचनाओं के माध्यम से उन्होंने श्रोताओं के सामने गायन की अलग-अलग शैलियों का अनुभव प्रस्तुत किया। स्थानीय कलाकार होने के कारण उनकी प्रस्तुति में रायगढ़ की संगीत परंपरा से जुड़ाव का पक्ष भी दिखाई दिया।
राकेश शर्मा की संगीत यात्रा रायगढ़ की समृद्ध सांगीतिक परंपरा से जुड़ी रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने रायगढ़ घराने के प्रसिद्ध संगीतज्ञ स्वर्गीय राजाराम गुरु से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की। बचपन से ही संगीत के प्रति उनकी रुचि रही और आगे चलकर उन्होंने गायन को अपनी साधना का माध्यम बनाया। शास्त्रीय संगीत के प्रशिक्षण के साथ उन्होंने सूफी गायन की दिशा में भी अपनी पहचान विकसित की। चक्रधर समारोह जैसे बड़े सांस्कृतिक मंच पर उनकी प्रस्तुति इसी लंबी संगीत साधना और मंचीय अनुभव की एक महत्वपूर्ण कड़ी रही।
राकेश शर्मा की कला यात्रा में टेलीविजन के संगीत कार्यक्रम का अनुभव भी शामिल रहा है। प्रकाशित जानकारी के अनुसार उनका चयन सोनी टीवी के संगीत कार्यक्रम ‘फेम एक्स-चल उड़िये’ के लिए हुआ था। इस दौरान उन्हें गायक पलाश सेन और दलेर मेहंदी से संगीत संबंधी मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों में अपनी प्रस्तुतियां दीं। इस अनुभव ने उनकी गायकी के मंचीय विस्तार में भी भूमिका निभाई और आगे चलकर वे छत्तीसगढ़ के अलग-अलग प्रतिष्ठित सांस्कृतिक आयोजनों से जुड़े।
राकेश शर्मा की प्रस्तुतियों का दायरा केवल रायगढ़ तक सीमित नहीं रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों में उनके द्वारा राज्योत्सव, बस्तर महोत्सव, राजिम मेला, मैनपाट कार्निवाल, तातापानी महोत्सव, महेश महोत्सव और चक्रधर समारोह जैसे आयोजनों में प्रस्तुति देने का उल्लेख मिलता है। अलग-अलग सांस्कृतिक मंचों पर प्रस्तुति के अनुभव ने उनके गायन को विविध दर्शक वर्गों तक पहुंचाया। चक्रधर समारोह में उनकी प्रस्तुति इसलिए भी उल्लेखनीय रही कि यह उनके अपने क्षेत्र की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा मंच है।
नौवीं शाम में राकेश शर्मा की गायकी का केंद्र सूफी और गजल का रंग रहा। सूफी गायन की परंपरा में भाव, शब्द और सुर के माध्यम से आध्यात्मिक तथा मानवीय अनुभूतियों को अभिव्यक्ति दी जाती है। राकेश शर्मा ने इसी भावभूमि में अपनी प्रस्तुति को आकार दिया। शास्त्रीय संगीत से प्राप्त उनकी प्रशिक्षण पृष्ठभूमि ने गायकी को सुर और लय का आधार दिया, जबकि सूफियाना अंदाज ने प्रस्तुति में भावात्मक विस्तार जोड़ा। यही संयोजन उनकी प्रस्तुति की विशेष पहचान के रूप में सामने आया।
चक्रधर समारोह के मंच पर स्थानीय कलाकारों को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता रहा है। राकेश शर्मा की प्रस्तुति इस परंपरा का उदाहरण रही। देश और प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से आए स्थापित कलाकारों के बीच रायगढ़ के कलाकार को उसी मंच पर अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर मिला। इससे समारोह में स्थानीय सांगीतिक प्रतिभाओं और राष्ट्रीय स्तर की कला परंपराओं के बीच संवाद का वातावरण बना। राकेश शर्मा ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से रायगढ़ की स्थानीय संगीत प्रतिभा को भी सामने रखा।
नौवीं सांस्कृतिक संध्या में राकेश शर्मा से पहले और उनके साथ कई अन्य विधाओं की प्रस्तुतियां भी हुईं। कार्यक्रम में सारंगढ़ की दीक्षा रथ ने ओडिसी नृत्य प्रस्तुत किया, केरल से आए गुरु कोट्टक्कल नंदकुमारन नायर ने कथकली की प्रस्तुति दी और खैरागढ़ की प्रो. डॉ. लवली शर्मा ने सितार वादन किया। इसके अलावा लहरगंगा-पुनरिक साहू और उनके दल ने छत्तीसगढ़ी लोक संगीत की प्रस्तुति दी। इन अलग-अलग कला विधाओं के बाद राकेश शर्मा की सूफी गायकी ने शाम को गायन की भावप्रधान अभिव्यक्ति से जोड़ा।
इस सांस्कृतिक क्रम ने चक्रधर समारोह की उस विशेषता को सामने रखा जिसमें एक ही मंच पर भारत की अलग-अलग शास्त्रीय और लोक परंपराओं को स्थान मिलता है। ओडिसी की नृत्यगत भंगिमाओं, कथकली की नाट्य-अभिव्यक्ति, सितार के शास्त्रीय स्वरों और छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के बाद सूफी गायन ने कार्यक्रम को एक अलग संगीतात्मक आयाम दिया। राकेश शर्मा की आवाज ने इसी विविधता के बीच गायन की भावप्रधान परंपरा को प्रस्तुत किया।
राकेश शर्मा की संगीत साधना का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनके गुरु स्वर्गीय राजाराम गुरु से प्राप्त प्रशिक्षण भी है। रायगढ़ की संगीत परंपरा में राजाराम गुरु का नाम महत्वपूर्ण रूप से जुड़ा रहा है और उनके शिष्य के रूप में राकेश शर्मा ने शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं। इसी प्रशिक्षण की पृष्ठभूमि में उन्होंने आगे सूफी गायन को अपनी अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बनाया। चक्रधर समारोह के मंच पर उनकी प्रस्तुति में शास्त्रीय संगीत की यह आधारभूमि और सूफियाना गायकी का मेल दिखाई दिया।
राकेश शर्मा की गायकी को लेकर प्रकाशित जानकारी में यह भी सामने आया है कि उनकी संगीत यात्रा में अलग-अलग मंचों और संगीतकारों से सीखने के अवसर जुड़े रहे। टेलीविजन के संगीत कार्यक्रम में भागीदारी के दौरान उन्हें पलाश सेन और दलेर मेहंदी जैसे कलाकारों से मार्गदर्शन मिला। इसके बाद स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के सांस्कृतिक आयोजनों में प्रस्तुति का सिलसिला जारी रहा। इस अनुभव ने उन्हें विभिन्न प्रकार के दर्शकों के सामने अपनी गायकी प्रस्तुत करने का अवसर दिया।
नवमीं शाम में उनकी प्रस्तुति का एक प्रमुख पक्ष भक्ति से सूफी रंग तक की संगीत यात्रा रहा। भक्ति गीतों में जहां आध्यात्मिक भाव और समर्पण की अभिव्यक्ति दिखाई देती है, वहीं सूफी गायन में प्रेम, आध्यात्मिकता और मानवीय संवेदना के विविध स्वर मिलते हैं। राकेश शर्मा ने अपनी गायकी में इन दोनों भावभूमियों को स्थान दिया। उनकी आवाज के माध्यम से श्रोताओं को संगीत की इन विविध अभिव्यक्तियों का अनुभव हुआ। कार्यक्रम के दौरान दर्शकों की सहभागिता और तालियों ने प्रस्तुति के प्रति उनकी रुचि को सामने रखा।
चक्रधर समारोह का इतिहास रायगढ़ की कला-साधना और महाराजा चक्रधर सिंह की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा हुआ है। इस समारोह में कथक सहित भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य की अनेक विधाओं को मंच मिलता रहा है। वर्तमान आयोजन में भी देश-प्रदेश के कलाकारों के साथ स्थानीय प्रतिभाओं को प्रस्तुति का अवसर दिया गया। राकेश शर्मा की सूफी गायकी इसी व्यापक सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बनी, जहां शास्त्रीय और लोक परंपराओं के साथ आधुनिक मंचीय अभिव्यक्तियां भी दर्शकों तक पहुंचती हैं।
रायगढ़ की सांगीतिक पहचान में शास्त्रीय संगीत के साथ लोक और सूफी गायन की भी अपनी जगह है। ऐसे में स्थानीय कलाकार राकेश शर्मा की प्रस्तुति ने इस सांगीतिक विविधता को मंच पर सामने रखा। उनकी आवाज में शास्त्रीय प्रशिक्षण की पृष्ठभूमि और सूफियाना गायकी का अनुभव एक साथ दिखाई दिया। समारोह में मौजूद श्रोताओं के लिए यह प्रस्तुति रायगढ़ की अपनी संगीत प्रतिभा को सुनने और अनुभव करने का अवसर भी रही।
नौवीं सांस्कृतिक संध्या में राकेश शर्मा के साथ निशा शर्मा ने भी गायन की प्रस्तुति दी। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार निशा शर्मा स्वर्गीय राजाराम गुरु की पौत्री हैं और बचपन से संगीत के वातावरण में पली-बढ़ीं। उन्होंने प्रयाग संगीत विश्वविद्यालय से विशारद की डिग्री हासिल की है तथा शास्त्रीय और सूफी गायन से जुड़ी हुई हैं। राजिम मेला सहित विभिन्न सांस्कृतिक मंचों पर उनकी प्रस्तुतियों का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार एक ही शाम में रायगढ़ की संगीत परंपरा से जुड़े दो कलाकारों की गायन प्रस्तुतियां देखने को मिलीं।
निशा शर्मा की मौजूदगी ने भी कार्यक्रम में रायगढ़ की संगीत परंपरा की निरंतरता को सामने रखा। एक ओर राकेश शर्मा ने स्वर्गीय राजाराम गुरु से प्राप्त शास्त्रीय संगीत प्रशिक्षण के बाद सूफी गायन में अपनी पहचान बनाई, वहीं निशा शर्मा का संगीत संस्कार भी उसी संगीत परंपरा से जुड़ा बताया गया है। दोनों की प्रस्तुतियों ने नौवीं सांस्कृतिक संध्या को स्थानीय संगीत परंपरा के दृष्टिकोण से भी विशेष बनाया।
राकेश शर्मा की संगीत यात्रा में एक नई उपलब्धि का उल्लेख भी हालिया रिपोर्ट में किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने प्रसिद्ध गायक कैलाश खेर के साथ भक्ति गीत ‘Hey Hanuman’ में अपनी आवाज दी है। यह गीत फिल्म ‘रामायण: एक कथा’ से जुड़ा बताया गया है और रिपोर्ट में इसके 25 सितंबर को रिलीज होने की जानकारी दी गई है। इस उपलब्धि का उल्लेख राकेश शर्मा की संगीत यात्रा के नए पड़ाव के रूप में किया गया है।
चक्रधर समारोह की नौवीं शाम का कार्यक्रम इसलिए भी उल्लेखनीय रहा कि इसमें एक ही मंच पर शास्त्रीय नृत्य, वाद्य संगीत, लोक संगीत और सूफी गायन के अलग-अलग रूप दिखाई दिए। कार्यक्रम की आधिकारिक सूची में 22 सितंबर को दीक्षा रथ का ओडिसी, गुरु कोट्टक्कल नंदकुमारन नायर का कथकली, प्रो. डॉ. लवली शर्मा का सितार वादन, लहरगंगा-पुनरिक साहू का लोक संगीत और राकेश शर्मा का सूफी गायन दर्ज है। इससे शाम की सांस्कृतिक विविधता स्पष्ट होती है।
राकेश शर्मा की प्रस्तुति में रायगढ़ की स्थानीय कला प्रतिभा और भारतीय सूफी संगीत की परंपरा का मेल देखने को मिला। उनके लिए चक्रधर समारोह केवल एक और मंच नहीं बल्कि अपने क्षेत्र की कला-संस्कृति से जुड़े प्रमुख आयोजन का मंच भी है। यहां प्रस्तुति देने से स्थानीय कलाकारों को अपने ही सांस्कृतिक परिवेश के दर्शकों के सामने कला प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। राकेश शर्मा ने इसी अवसर को अपनी गायकी से जोड़ा और शास्त्रीय तथा सूफियाना संगीत का रंग प्रस्तुत किया।
उनकी गायकी की विशेषता यह रही कि प्रस्तुति को केवल एक शैली तक सीमित नहीं रखा गया। शास्त्रीय संगीत की बुनियाद से निकली आवाज ने भक्ति गीतों और सूफी गायन के बीच सहजता से अपनी जगह बनाई। गजल की भावात्मकता और सूफियाना अंदाज ने कार्यक्रम में संगीत का एक अलग रंग जोड़ा। श्रोताओं ने उनकी प्रस्तुति को ध्यानपूर्वक सुना और तालियों से कलाकार का उत्साह बढ़ाया।
रायगढ़ के संगीत प्रेमियों के लिए यह प्रस्तुति स्थानीय प्रतिभा को बड़े सांस्कृतिक मंच पर देखने का अवसर भी रही। चक्रधर समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले कलाकारों के साथ रायगढ़ और आसपास के कलाकारों को मंच मिलना आयोजन की व्यापकता को दर्शाता है। राकेश शर्मा ने अपनी प्रस्तुति से इसी स्थानीय प्रतिभा को सामने रखा और अपनी संगीत साधना की झलक श्रोताओं तक पहुंचाई।
चक्रधर समारोह की नौवीं शाम में सितार की सुरमयी तान के बाद जब राकेश शर्मा की सूफियाना गायकी ने मंच संभाला तो कार्यक्रम का संगीतात्मक स्वरूप एक नए रंग में बदल गया। डॉ. लवली शर्मा के सितार वादन ने जहां शास्त्रीय वाद्य संगीत की अनुभूति कराई, वहीं राकेश शर्मा ने स्वर और शब्दों के माध्यम से भावप्रधान संगीत प्रस्तुत किया। इस क्रम ने शाम को वाद्य और गायन दोनों की दृष्टि से विविध बनाया।
कार्यक्रम की समग्रता में राकेश शर्मा की प्रस्तुति ने रायगढ़ की स्थानीय संगीत प्रतिभा को राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंच से जोड़ने का काम किया। उनकी गायकी में गुरु से प्राप्त शास्त्रीय प्रशिक्षण, विभिन्न मंचों का अनुभव और सूफी संगीत के प्रति उनकी साधना एक साथ दिखाई दी। चक्रधर समारोह के दर्शकों के सामने उन्होंने अपनी कला का ऐसा रूप प्रस्तुत किया जिसमें भक्ति, शास्त्रीयता, सूफियाना भाव और गजल की संवेदना एक साथ मौजूद रही।
41वें चक्रधर समारोह की नवमीं सांस्कृतिक संध्या इस मायने में भी खास रही कि कार्यक्रम ने रायगढ़ की स्थानीय सांस्कृतिक पहचान और देश की विविध कला परंपराओं को एक ही मंच पर जोड़ा। सारंगढ़ की दीक्षा रथ का ओडिसी, केरल की कथकली परंपरा, खैरागढ़ का सितार वादन, बालोद का लोक संगीत और रायगढ़ का सूफी गायन—इन प्रस्तुतियों ने एक ही शाम में अलग-अलग सांस्कृतिक रंगों को सामने रखा।
राकेश शर्मा की प्रस्तुति के दौरान श्रोताओं के बीच संगीत को लेकर उत्साह दिखाई दिया। भक्ति और सूफी गीतों की भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने कार्यक्रम में आध्यात्मिक और सांगीतिक वातावरण बनाया। उनकी आवाज में शास्त्रीय संगीत की साधना और सूफी गायन की संवेदना का संयोजन सुनाई दिया। प्रस्तुति के बाद तालियों की गूंज ने कलाकार के प्रति दर्शकों की सराहना को व्यक्त किया।
राकेश शर्मा की कला यात्रा यह भी बताती है कि स्थानीय स्तर पर लगातार साधना करने वाले कलाकारों को जब बड़े मंच मिलते हैं तो उनकी प्रतिभा व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचती है। रायगढ़ की संगीत परंपरा में प्रशिक्षण प्राप्त कर उन्होंने टेलीविजन के संगीत कार्यक्रम से लेकर राज्य और राष्ट्रीय स्तर के सांस्कृतिक आयोजनों तक अपनी प्रस्तुतियां दीं। अब चक्रधर समारोह की नौवीं शाम में उनकी सूफियाना गायकी ने उन्हें फिर अपने शहर के प्रमुख सांस्कृतिक मंच पर प्रस्तुत किया।
चक्रधर समारोह की नवमीं शाम में राकेश शर्मा का गायन केवल एक प्रस्तुति भर नहीं रहा, बल्कि रायगढ़ की संगीत परंपरा की स्थानीय अभिव्यक्ति के रूप में भी सामने आया। शास्त्रीय संगीत की शिक्षा, सूफी गायन की साधना और अलग-अलग मंचों के अनुभव ने उनकी प्रस्तुति को व्यापक स्वरूप दिया। उनके साथ निशा शर्मा की गायन प्रस्तुति ने भी कार्यक्रम में रायगढ़ की सांगीतिक विरासत के स्थानीय पक्ष को मजबूत किया।
इस तरह 41वें अंतरराष्ट्रीय चक्रधर समारोह की नवमीं सांस्कृतिक संध्या में राकेश शर्मा की सूफियाना आवाज ने कार्यक्रम को भाव, सुर और संगीत की अलग पहचान दी। शास्त्रीय संगीत की बुनियाद से निकली उनकी गायकी ने भक्ति गीतों, सूफी रंग और गजल की संवेदनाओं को एक साथ मंच पर प्रस्तुत किया। रायगढ़ की धरती से जुड़े इस कलाकार की प्रस्तुति ने नौवीं शाम को स्थानीय प्रतिभा और भारतीय संगीत की विविध परंपराओं के सुंदर संगम के रूप में यादगार बनाया।
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