
लय और ताल के खूबसूरत संगम से बांधा समां, 8 वर्ष की उम्र से शुरू की तबले की साधना; रायगढ़ में 50 से अधिक शिष्यों को दे रहे प्रशिक्षण
रायगढ़। 41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह की सांस्कृतिक संध्या में कवर्धा जिले के ग्राम खरहट्टा निवासी मनीष कुमार चंद्रवंशी ने अपनी तबला वादन प्रस्तुति से शास्त्रीय संगीत के रसिकों को लय और ताल की दुनिया से रूबरू कराया। मंच पर जब तबले की थाप गूंजनी शुरू हुई तो संगीत की बारीकियों से सजी प्रस्तुति ने समारोह के वातावरण को सुरमय बना दिया। मनीष चंद्रवंशी के वादन में लय और ताल का सुंदर मेल देखने को मिला। उनकी उंगलियों से निकलती तबले की बोलियां और तालबद्ध थाप के बीच शास्त्रीय संगीत की साधना का प्रभाव दिखाई दिया। प्रस्तुति के दौरान दर्शकों ने ध्यानपूर्वक वादन का आनंद लिया और तालियों के माध्यम से कलाकार का उत्साह बढ़ाया। 22 सितंबर 2026 की सांस्कृतिक संध्या से संबंधित रिपोर्टों में भी मनीष कुमार चंद्रवंशी की तबला वादन प्रस्तुति और उनके वादन में लय-ताल के सुंदर मेल का उल्लेख किया गया है।
मनीष चंद्रवंशी की संगीत यात्रा बचपन से ही तबले की साधना से जुड़ी रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने 8 वर्ष की उम्र में तबला सीखना शुरू किया। छोटी उम्र में शुरू हुई यह साधना आगे चलकर उनकी संगीत शिक्षा और मंचीय प्रस्तुतियों का आधार बनी। तबला जैसे शास्त्रीय वाद्य में नियमित अभ्यास, लय की समझ, ताल की पकड़ और गुरु से प्राप्त प्रशिक्षण का विशेष महत्व होता है। मनीष ने इसी क्रम में अपने गुरु डॉ. हरिओम हरि से तबले की शिक्षा प्राप्त की। गुरु के मार्गदर्शन में उन्होंने तबला वादन की बारीकियों को सीखा और अपनी साधना को आगे बढ़ाया। वर्षों के अभ्यास के बाद उन्होंने संगीत को केवल मंचीय प्रस्तुति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे शिक्षण से भी जोड़ा। आज वे स्वयं तबला गुरु के रूप में नई पीढ़ी को इस कला की शिक्षा दे रहे हैं।
मनीष चंद्रवंशी की संगीत शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ रहा, जहां उन्होंने प्रथम श्रेणी में मास्टर ऑफ तबला की उपाधि प्राप्त की। खैरागढ़ का यह विश्वविद्यालय भारतीय कला, संगीत और नृत्य की शिक्षा के लिए जाना जाता है और चक्रधर समारोह से भी इसका सांस्कृतिक जुड़ाव दिखाई देता है। शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ने मनीष के वादन को अकादमिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर मजबूत आधार दिया। बचपन से शुरू हुई साधना, गुरु से प्राप्त प्रशिक्षण और उच्च शिक्षा के दौरान संगीत के व्यवस्थित अध्ययन ने उनके तबला वादन की यात्रा को आगे बढ़ाया।
चक्रधर समारोह के मंच पर उनकी प्रस्तुति में लय और ताल मुख्य आकर्षण रहे। तबला वादन में लय को बनाए रखना और ताल की संरचना के भीतर अलग-अलग बोलों तथा गतियों को प्रस्तुत करना कलाकार की साधना और अभ्यास को सामने लाता है। मनीष चंद्रवंशी ने अपनी प्रस्तुति के दौरान इसी तालबद्धता को मंच पर प्रस्तुत किया। तबले की थाप के साथ उनके हाथों की गति और संगीत की लय का तालमेल लगातार बना रहा। प्रस्तुति आगे बढ़ने के साथ तबले की आवाज समारोह स्थल पर मौजूद श्रोताओं तक पहुंचती रही और शास्त्रीय वादन की गंभीरता के बीच दर्शकों की तालियों ने कलाकार का उत्साह बढ़ाया। उपलब्ध समाचार रिपोर्ट में भी उनकी प्रस्तुति को लय और ताल के सुंदर मेल के रूप में रेखांकित किया गया है।
चक्रधर समारोह का मंच भारतीय शास्त्रीय संगीत, नृत्य और लोककलाओं के कलाकारों को एक साथ प्रस्तुत करने वाला महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मंच है। वर्ष 2026 में 41वां चक्रधर समारोह 14 से 23 सितंबर तक रायगढ़ के रामलीला मैदान में आयोजित किया गया। जिला प्रशासन की आधिकारिक जानकारी के अनुसार समारोह के अलग-अलग दिनों में कथक, ओडिसी, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, गोटीपुआ, पंडवानी, लोक संगीत, गायन तथा तबला, संतूर, पखावज और सितार जैसे वाद्य संगीत की प्रस्तुतियां निर्धारित की गई थीं। इसी व्यापक सांस्कृतिक क्रम में मनीष चंद्रवंशी की तबला प्रस्तुति ने वाद्य संगीत की परंपरा को मंच पर सामने रखा।
मनीष चंद्रवंशी की प्रस्तुति की खासियत केवल उनका मंचीय वादन नहीं, बल्कि संगीत शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान भी है। वर्तमान में वे चक्रधर कला एवं संगीत महाविद्यालय, रायगढ़ में तबला गुरु के रूप में कार्यरत हैं। यहां वे 50 से अधिक शिष्यों को तबले की शिक्षा दे रहे हैं। इस तरह वे स्वयं मंच पर तबला वादन करने के साथ-साथ अगली पीढ़ी के कलाकारों को भी तैयार करने में भूमिका निभा रहे हैं। गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय शास्त्रीय संगीत की महत्वपूर्ण विशेषता रही है, जिसमें कलाकार अपनी साधना और अनुभव को आगे आने वाले विद्यार्थियों तक पहुंचाता है। मनीष चंद्रवंशी का शिक्षण कार्य इसी परंपरा की निरंतरता से जुड़ा दिखाई देता है।
तबले की साधना में रियाज का विशेष महत्व होता है। आठ वर्ष की उम्र से शुरू हुई मनीष चंद्रवंशी की यात्रा में वर्षों की साधना के बाद अब मंचीय प्रस्तुति और शिक्षण दोनों पक्ष जुड़ चुके हैं। तबले के बोलों को स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करना, लय को बनाए रखना और ताल की संरचना के अनुरूप वादन करना लगातार अभ्यास की मांग करता है। चक्रधर समारोह के मंच पर उनकी प्रस्तुति में इसी अभ्यास की झलक देखने को मिली। उनकी उंगलियों की गति और तबले की थाप के बीच सामंजस्य ने प्रस्तुति को प्रभावी बनाया। दर्शकों की प्रतिक्रिया भी उनके प्रदर्शन के प्रति उत्साहपूर्ण रही और प्रस्तुति के बाद तालियों से कलाकार का स्वागत किया गया।
मनीष चंद्रवंशी ने अपने वादन से यह भी प्रदर्शित किया कि शास्त्रीय वाद्य संगीत में लय स्वयं एक स्वतंत्र अभिव्यक्ति बन सकती है। तबले की थाप केवल किसी गायन या नृत्य की संगत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि एकल तबला वादन में कलाकार ताल और बोलों के माध्यम से अपनी साधना को सीधे श्रोताओं तक पहुंचाता है। चक्रधर समारोह जैसे मंच पर एकल वादन के दौरान कलाकार के लिए श्रोताओं के साथ लयात्मक संवाद स्थापित करना महत्वपूर्ण होता है। मनीष की प्रस्तुति में तबले की थाप और ताल की संरचना के माध्यम से ऐसा ही संवाद दिखाई दिया। दर्शकों ने उनकी प्रस्तुति को ध्यानपूर्वक सुना और तालियों के साथ प्रतिक्रिया दी।
रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में चक्रधर समारोह का विशेष स्थान है। संगीत सम्राट महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना और सांस्कृतिक विरासत को समर्पित यह आयोजन वर्ष 2026 में अपने 41वें वर्ष में पहुंचा। दस दिनों तक चलने वाले समारोह में देश और प्रदेश के अनेक कलाकारों ने अपनी कला प्रस्तुत की। आधिकारिक कार्यक्रम सूची में 21 सितंबर को बनारस घराने के कथक, लोक संगीत, कथक और संतूर-पखावज-तबला वादन जैसी प्रस्तुतियां दर्ज हैं, जबकि 22 सितंबर की नौवीं शाम में ओडिसी, कथकली, सितार, लोक संगीत और सूफी गायन की प्रस्तुतियां शामिल थीं। इस व्यापक कार्यक्रम में वाद्य संगीत की परंपरा को भी लगातार मंच मिला।
मनीष चंद्रवंशी के लिए चक्रधर समारोह में प्रस्तुति इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि यह वही रायगढ़ है जहां वे वर्तमान में तबला शिक्षा से जुड़े हुए हैं। एक ओर वे चक्रधर कला एवं संगीत महाविद्यालय में विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दे रहे हैं और दूसरी ओर उसी सांस्कृतिक नगरी के प्रतिष्ठित समारोह में स्वयं कलाकार के रूप में मंच पर उपस्थित हुए। इस प्रकार उनकी भूमिका एक साथ कलाकार और गुरु की रही। मंच पर उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया, जबकि कक्षा में वे नई पीढ़ी को उसी कला की तकनीक और अनुशासन सिखा रहे हैं।
तबले की शिक्षा देने वाले गुरु के रूप में 50 से अधिक विद्यार्थियों के साथ उनका जुड़ाव यह दर्शाता है कि उनकी गतिविधि केवल व्यक्तिगत मंचीय उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। किसी भी शास्त्रीय कला की परंपरा तब आगे बढ़ती है जब कलाकार स्वयं साधना करने के साथ-साथ विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करता है। मनीष चंद्रवंशी भी अपने अनुभव और प्रशिक्षण को शिष्यों तक पहुंचा रहे हैं। इससे तबला वादन की परंपरा को स्थानीय स्तर पर आगे बढ़ाने में योगदान मिलता है। रायगढ़ जैसे सांस्कृतिक शहर में तबले के विद्यार्थियों को नियमित प्रशिक्षण मिलना वहां के संगीत वातावरण के लिए भी महत्वपूर्ण है।
मनीष चंद्रवंशी का संबंध कवर्धा जिले के ग्राम खरहट्टा से है। ग्रामीण परिवेश से निकलकर शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना उनकी संगीत यात्रा का उल्लेखनीय पक्ष है। बचपन में तबले से जुड़ने के बाद उन्होंने गुरु से प्रशिक्षण लिया, उच्च संगीत शिक्षा हासिल की और प्रतिष्ठित मंचों तक पहुंचे। आज वे रायगढ़ में तबला गुरु के रूप में विद्यार्थियों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में उन्हें कई प्रतिष्ठित मंचों पर तबला वादन कर चुके कलाकार के रूप में भी उल्लेखित किया गया है।
चक्रधर समारोह के दौरान जब तबले की थाप गूंजी तो शास्त्रीय संगीत के वातावरण में कवर्धा और रायगढ़ के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव भी दिखाई दिया। कलाकार का मूल संबंध कवर्धा से है, उनकी वर्तमान कर्मभूमि रायगढ़ है और मंच चक्रधर समारोह का था। इस तरह छत्तीसगढ़ के अलग-अलग सांस्कृतिक क्षेत्रों की प्रतिभा एक ही मंच पर सामने आई। समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से कलाकार आते हैं, वहीं स्थानीय और क्षेत्रीय कलाकारों को भी मंच दिया जाता है। मनीष चंद्रवंशी की प्रस्तुति इसी स्थानीय प्रतिभा और शास्त्रीय संगीत साधना के मेल का उदाहरण बनी।
उनकी प्रस्तुति के दौरान तबले की थाप के साथ लय का उतार-चढ़ाव श्रोताओं का ध्यान खींचता रहा। तबला वादन में हाथों की गति और बोलों की स्पष्टता के साथ ताल की निरंतरता बनाए रखना आवश्यक होता है। मंच पर प्रस्तुत किए जाने वाले वादन में कलाकार को समय और प्रस्तुति की प्रकृति के अनुसार अपनी गति और ऊर्जा को नियंत्रित करना पड़ता है। मनीष चंद्रवंशी ने अपनी प्रस्तुति में ताल के अनुशासन को बनाए रखते हुए वादन किया। यही कारण रहा कि उनकी प्रस्तुति को श्रोताओं ने तालियों से सराहा। उपलब्ध रिपोर्ट में भी कार्यक्रम स्थल के तालियों से गूंजने का उल्लेख किया गया है।
चक्रधर समारोह में वाद्य संगीत की परंपरा को लगातार महत्व दिया जाता रहा है। आधिकारिक कार्यक्रम में 15 सितंबर को दिल्ली के निशित गंगानी की तबला वादन प्रस्तुति, जबकि 21 सितंबर को संतूर-पखावज-तबला वादन की प्रस्तुति निर्धारित थी। इससे स्पष्ट है कि समारोह के कार्यक्रम में तबला वादन को अलग-अलग रूपों में स्थान दिया गया। मनीष चंद्रवंशी की प्रस्तुति ने इस परंपरा में क्षेत्रीय कलाकार की भागीदारी को सामने रखा।
तबले की थाप के साथ संगीत का ताल पक्ष जिस तरह सामने आया, वह शास्त्रीय संगीत के विद्यार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण रहा। एक ओर मंच पर प्रस्तुति देखने वाले सामान्य श्रोता थे, तो दूसरी ओर संगीत से जुड़े विद्यार्थी और कलाकार भी समारोह का हिस्सा थे। ऐसे मंच पर कलाकार का वादन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संगीत की तकनीक और परंपरा का प्रदर्शन भी होता है। मनीष चंद्रवंशी स्वयं शिक्षक हैं, इसलिए उनकी प्रस्तुति में कलाकार और गुरु दोनों पक्षों की साधना दिखाई दी। उनकी प्रस्तुति के बाद मिली तालियां दर्शकों की प्रतिक्रिया का हिस्सा रहीं।
मनीष चंद्रवंशी की यात्रा में गुरु डॉ. हरिओम हरि का विशेष स्थान है। तबले की प्रारंभिक और उन्नत शिक्षा में गुरु का मार्गदर्शन कलाकार के लिए महत्वपूर्ण होता है। आठ वर्ष की उम्र से शुरू हुई उनकी तबला साधना को गुरु के प्रशिक्षण ने दिशा दी। इसके बाद खैरागढ़ विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने तबला वादन को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया। इस शिक्षा और साधना का परिणाम मंच पर दिखाई दिया, जहां उन्होंने चक्रधर समारोह जैसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन में तबला वादन प्रस्तुत किया।
इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से प्रथम श्रेणी में मास्टर ऑफ तबला की उपाधि प्राप्त करना उनकी शैक्षणिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है। खैरागढ़ लंबे समय से भारतीय शास्त्रीय संगीत और ललित कलाओं की शिक्षा से जुड़ा केंद्र है। चक्रधर समारोह की आधिकारिक जानकारी में भी विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और कलाकारों की समारोह में भागीदारी दर्ज है। इस प्रकार मनीष चंद्रवंशी की शिक्षा और वर्तमान मंचीय गतिविधि दोनों छत्तीसगढ़ की कला-संगीत परंपरा से जुड़ती हैं।
उनकी प्रस्तुति का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी रहा कि शास्त्रीय संगीत की साधना उम्र नहीं, निरंतर अभ्यास से मजबूत होती है। आठ वर्ष की उम्र में तबला सीखना शुरू करने वाले मनीष आज स्वयं 50 से अधिक विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। यह एक लंबी संगीत यात्रा का परिणाम है, जिसमें सीखने के साथ सिखाने की जिम्मेदारी भी शामिल हो गई है। चक्रधर समारोह में उनका प्रदर्शन इसी यात्रा का मंचीय पड़ाव रहा। दर्शकों के सामने उन्होंने तबले के माध्यम से अपनी साधना प्रस्तुत की और शिष्यों के लिए भी एक उदाहरण रखा।
रायगढ़ के चक्रधर समारोह में प्रस्तुत होने वाले कलाकारों की विविधता इस आयोजन की एक प्रमुख विशेषता है। यहां कथक और अन्य शास्त्रीय नृत्य विधाओं के साथ तबला, पखावज, संतूर, सितार और गायन जैसी संगीत विधाओं को भी मंच मिलता है। आधिकारिक कार्यक्रम सूची में 2026 के दस दिवसीय समारोह के दौरान अलग-अलग दिनों में अनेक शास्त्रीय और लोककलात्मक प्रस्तुतियां दर्ज हैं। मनीष चंद्रवंशी की तबला प्रस्तुति इसी बहुरंगी सांस्कृतिक आयोजन में शास्त्रीय वाद्य संगीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।
मंच पर तबले की आवाज के साथ वातावरण में एक अलग तरह की लयात्मक ऊर्जा दिखाई दी। कलाकार के हाथों की गति और तबले की थाप के बीच तालमेल ने प्रस्तुति को क्रमबद्ध रखा। तबले के बोलों की स्पष्टता और लय के अनुशासन ने श्रोताओं का ध्यान बनाए रखा। प्रस्तुति समाप्त होने के बाद दर्शकों की तालियों ने कलाकार के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। इस तरह मनीष चंद्रवंशी का प्रदर्शन संगीत प्रेमियों के लिए एक यादगार सांस्कृतिक क्षण बना।
मनीष चंद्रवंशी की पहचान केवल एक मंचीय तबला वादक की नहीं है। वे तबला शिक्षक के रूप में भी लगातार सक्रिय हैं। चक्रधर कला एवं संगीत महाविद्यालय में 50 से अधिक विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देना उनके शिक्षण पक्ष को दर्शाता है। विद्यार्थियों को तबले की प्रारंभिक तकनीक से लेकर लय और ताल की समझ तक पहुंचाना नियमित अभ्यास और धैर्य की मांग करता है। एक गुरु के रूप में वे अपनी सीखी हुई कला को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
कवर्धा के ग्राम खरहट्टा से शुरू हुई यह संगीत यात्रा रायगढ़ के चक्रधर समारोह के मंच तक पहुंची। बचपन में तबले से परिचय, गुरु डॉ. हरिओम हरि से प्रशिक्षण, खैरागढ़ से मास्टर ऑफ तबला की शिक्षा और फिर रायगढ़ में तबला गुरु के रूप में कार्य—मनीष चंद्रवंशी की उपलब्धियों की यह श्रृंखला उनके संगीत जीवन की तस्वीर प्रस्तुत करती है। उनके मंचीय वादन में वर्षों की साधना और अभ्यास का प्रभाव दिखाई दिया। समारोह में मिली दर्शकों की प्रतिक्रिया ने इस प्रस्तुति को और यादगार बनाया।
41वें चक्रधर समारोह में मनीष कुमार चंद्रवंशी का तबला वादन इस मायने में भी उल्लेखनीय रहा कि उन्होंने साधना, मंच और शिक्षण—तीनों पक्षों को एक साथ सामने रखा। एक ओर तबले की थाप से उन्होंने समारोह के श्रोताओं को लय और ताल का अनुभव कराया, दूसरी ओर उनके 50 से अधिक शिष्य रायगढ़ में इस कला को सीख रहे हैं। इस तरह उनकी संगीत यात्रा व्यक्तिगत प्रदर्शन से आगे बढ़कर कला परंपरा को आगे ले जाने से भी जुड़ती है।
चक्रधर समारोह की सांस्कृतिक संध्या में उनकी प्रस्तुति ने एक बार फिर यह दिखाया कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की शक्ति उसकी विविधता और निरंतर साधना में है। तबला जैसे वाद्य की प्रस्तुति में कलाकार की उंगलियों की गति से लेकर ताल की संरचना तक हर स्तर पर अभ्यास की आवश्यकता होती है। मनीष चंद्रवंशी ने अपने वादन के माध्यम से इसी साधना को मंच पर प्रस्तुत किया। कवर्धा की धरती से निकलकर रायगढ़ की सांस्कृतिक नगरी में अपनी कला प्रस्तुत करने वाले मनीष के लिए यह मंच उनकी संगीत यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा।
मनीष चंद्रवंशी की तबले की थाप ने 41वें चक्रधर समारोह की सांस्कृतिक संध्या में शास्त्रीय संगीत की लय को जीवंत किया। आठ वर्ष की उम्र में शुरू हुई तबला साधना आज मंचीय प्रस्तुतियों और 50 से अधिक शिष्यों को प्रशिक्षण देने तक पहुंच चुकी है। लय और ताल के सुंदर संयोजन से सजी उनकी प्रस्तुति पर दर्शकों की तालियों ने कलाकार का उत्साह बढ़ाया। कवर्धा के ग्राम खरहट्टा से रायगढ़ तक की उनकी यह यात्रा शास्त्रीय संगीत के प्रति निरंतर साधना और गुरु-शिष्य परंपरा की निरंतरता को सामने लाती है।