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9 साल की अरुषि अग्रवाल ने कथक की प्रस्तुति से बांधा समां

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रायगढ़, 22 सितंबर 2026। 41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह की सांस्कृतिक संध्या में महज 9 वर्ष की नन्हीं कथक नृत्यांगना अरुषि अग्रवाल ने अपनी मनमोहक प्रस्तुति से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। छोटी उम्र में मंच पर कथक की सधी हुई मुद्राओं, भावपूर्ण अभिव्यक्ति और लय-ताल के साथ प्रस्तुति देते हुए अरुषि ने अपनी नृत्य प्रतिभा का परिचय दिया। उनके नृत्य में बाल सुलभ सहजता के साथ कथक के प्रति अभ्यास और लगन की झलक दिखाई दी। प्रस्तुति के दौरान दर्शकों ने तालियों के साथ बाल कलाकार का उत्साहवर्धन किया।
अरुषि अग्रवाल कथक की शिक्षा श्रीमती तब्बू प्रवीण के मार्गदर्शन में प्राप्त कर रही हैं। कम उम्र में ही उन्होंने विभिन्न सांस्कृतिक मंचों पर अपनी कला प्रस्तुत की है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार रायगढ़ के अलावा बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग और ग्वालियर में आयोजित कार्यक्रमों में भी अरुषि ने भाग लिया है। अलग-अलग मंचों पर प्रस्तुति देने का अनुभव चक्रधर समारोह जैसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक आयोजन में उनके आत्मविश्वास के रूप में भी दिखाई दिया।
कथक भारतीय शास्त्रीय नृत्य की प्रमुख विधाओं में से एक है, जिसमें लय, ताल, पद संचालन, चक्कर, हस्त मुद्राएं और भावाभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण स्थान है। अरुषि ने अपनी प्रस्तुति में इन्हीं तत्वों के माध्यम से दर्शकों के सामने कथक की सुंदरता को प्रस्तुत किया। छोटी उम्र में किसी बड़े सांस्कृतिक मंच पर शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति देना नियमित अभ्यास और गुरु के मार्गदर्शन का परिणाम माना जा सकता है। मंच पर उनकी प्रस्तुति के दौरान नृत्य की लयबद्धता और भाव पक्ष पर विशेष ध्यान दिखाई दिया।
41वां अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा प्रमुख आयोजन है, जहां देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले कलाकारों के साथ स्थानीय और बाल कलाकारों को भी अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। वर्ष 2026 के समारोह में कथक, ओडिसी, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, मणिपुरी, कथकली, लोक संगीत और अन्य कलाओं की प्रस्तुतियां शामिल रहीं। ऐसे व्यापक सांस्कृतिक मंच पर अरुषि जैसी बाल प्रतिभा की कथक प्रस्तुति समारोह में नई पीढ़ी की भागीदारी को भी सामने लाती है।
अरुषि की प्रस्तुति का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी उम्र रही। महज 9 वर्ष की आयु में शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति के लिए आवश्यक ताल, लय और भावाभिव्यक्ति पर काम करना निरंतर अभ्यास की मांग करता है। कथक की प्रस्तुति में कलाकार को संगीत की लय के साथ अपने पैरों की गति, शरीर की मुद्रा और चेहरे के भावों का संतुलन बनाए रखना होता है। मंच पर अरुषि ने इसी अभ्यास को अपनी प्रस्तुति के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास किया।
गुरु और शिष्य की परंपरा भारतीय शास्त्रीय कलाओं की महत्वपूर्ण विशेषता रही है। कथक जैसे शास्त्रीय नृत्य में तकनीकी प्रशिक्षण के साथ प्रस्तुति की समझ और भावाभिव्यक्ति को विकसित करने में गुरु का मार्गदर्शन महत्वपूर्ण माना जाता है। अरुषि श्रीमती तब्बू प्रवीण के मार्गदर्शन में कथक सीख रही हैं। चक्रधर समारोह के मंच पर उनकी प्रस्तुति इसी प्रशिक्षण यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रही।
रायगढ़ में चक्रधर समारोह का आयोजन इसलिए भी विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह शहर महाराजा चक्रधर सिंह की कला साधना और संरक्षण से विकसित कथक परंपरा के लिए जाना जाता है। समारोह के मंच पर कथक की विभिन्न प्रस्तुतियां इस परंपरा को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ती हैं। अरुषि जैसी बाल कलाकार का इसी मंच पर कथक प्रस्तुत करना इस बात को सामने लाता है कि शास्त्रीय नृत्य की साधना नई पीढ़ी के बीच भी जारी है।
अरुषि की मंचीय यात्रा रायगढ़ तक सीमित नहीं रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग और ग्वालियर जैसे शहरों में भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया है। अलग-अलग स्थानों पर मंच अनुभव प्राप्त करने से कलाकार में प्रस्तुति के दौरान आत्मविश्वास विकसित होता है। चक्रधर समारोह के मंच पर उनकी प्रस्तुति में भी यह मंचीय अनुभव दिखाई दिया।
बाल कलाकारों की प्रस्तुतियां किसी भी सांस्कृतिक समारोह में विशेष आकर्षण का केंद्र बनती हैं। इसका कारण केवल उनकी कम उम्र नहीं, बल्कि यह भी है कि वे परंपरागत कलाओं को सीखकर आगे की पीढ़ी तक पहुंचाने की प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं। अरुषि ने कथक के माध्यम से इसी सांस्कृतिक परंपरा की एक झलक प्रस्तुत की। उनकी प्रस्तुति ने दर्शकों को शास्त्रीय नृत्य की ओर आकर्षित करने के साथ बाल प्रतिभाओं के लिए मंच की उपयोगिता को भी सामने रखा।
चक्रधर समारोह की नौवीं सांस्कृतिक संध्या में कई कलाकारों ने अलग-अलग नृत्य विधाओं और कलाओं की प्रस्तुतियां दीं। इसी क्रम में 9 वर्षीय अरुषि अग्रवाल की कथक प्रस्तुति भी शामिल रही। उसी संध्या में अन्य बाल कलाकारों ने भी कथक और भरतनाट्यम जैसी शास्त्रीय नृत्य विधाओं में अपनी प्रतिभा दिखाई। इससे समारोह के मंच पर वरिष्ठ कलाकारों के साथ नई पीढ़ी के कलाकारों की भागीदारी का स्वरूप भी देखने को मिला।
अरुषि की प्रस्तुति में कथक के तकनीकी पक्ष के साथ भावों की अभिव्यक्ति भी दिखाई दी। कथक की विशेषता केवल तेज पद संचालन या चक्कर लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें कथा, भाव, लय और संगीत का समन्वय होता है। कलाकार अपनी आंखों, चेहरे और हाथों की मुद्राओं के माध्यम से भावों को दर्शकों तक पहुंचाता है। अरुषि ने अपनी उम्र के अनुरूप इन पक्षों को मंच पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया।
शास्त्रीय नृत्य की साधना लंबे समय की प्रक्रिया होती है। नियमित रियाज, अनुशासन और मंचीय अनुभव के साथ कलाकार धीरे-धीरे अपनी तकनीक को बेहतर बनाता है। अरुषि के लिए भी चक्रधर समारोह जैसे मंच पर प्रस्तुति देना उनके प्रशिक्षण और अभ्यास को दर्शकों के सामने रखने का अवसर रहा। भविष्य में उनकी नृत्य यात्रा किस दिशा में आगे बढ़ती है, यह उनके निरंतर अभ्यास और प्रशिक्षण पर निर्भर करेगा।
रायगढ़ के सांस्कृतिक वातावरण में ऐसे आयोजन स्थानीय कलाकारों और विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायी मंच उपलब्ध कराते हैं। चक्रधर समारोह में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले कलाकार अपनी-अपनी विधाओं का प्रदर्शन करते हैं। स्थानीय बाल कलाकारों को भी जब इस मंच पर प्रस्तुति का अवसर मिलता है तो उन्हें बड़े कलाकारों को देखने और उनसे सीखने का अवसर मिलता है। अरुषि की भागीदारी भी इसी सांस्कृतिक वातावरण का हिस्सा रही।
कथक की परंपरा में रायगढ़ का अपना विशेष स्थान है। महाराजा चक्रधर सिंह के समय में संगीत और नृत्य को संरक्षण मिला और रायगढ़ घराने की कथक परंपरा विकसित हुई। वर्तमान में चक्रधर समारोह इस विरासत को व्यापक मंच प्रदान करता है। इसी मंच पर नई पीढ़ी के कलाकारों की प्रस्तुतियां परंपरा की निरंतरता को सामने लाती हैं। अरुषि की प्रस्तुति को भी इसी व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ में देखा जा सकता है।
अरुषि की प्रस्तुति के दौरान दर्शकों की प्रतिक्रिया उत्साहपूर्ण रही। मंच पर उनकी प्रस्तुति ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा और प्रस्तुति के बाद तालियों से उनका उत्साह बढ़ाया गया। बाल कलाकार के लिए इतने बड़े सांस्कृतिक मंच पर दर्शकों के सामने प्रस्तुति देना स्वयं में महत्वपूर्ण मंचीय अनुभव है। यह अनुभव भविष्य में उनके आत्मविश्वास और मंचीय समझ को विकसित करने में उपयोगी हो सकता है।
कम उम्र में कला सीखने वाले बच्चों के लिए परिवार का सहयोग भी महत्वपूर्ण होता है। नियमित प्रशिक्षण, अभ्यास और कार्यक्रमों में भागीदारी के लिए परिवार को समय और संसाधन उपलब्ध कराने पड़ते हैं। अरुषि की अब तक की मंचीय भागीदारी से यह स्पष्ट है कि उन्हें विभिन्न शहरों में अपनी कला प्रस्तुत करने के अवसर मिले हैं। इन अवसरों के माध्यम से उनकी कथक यात्रा आगे बढ़ रही है।
चक्रधर समारोह में अरुषि की प्रस्तुति ने यह भी संदेश दिया कि शास्त्रीय कलाओं की साधना उम्र की सीमा से बंधी नहीं है। सही मार्गदर्शन और नियमित अभ्यास के साथ छोटी उम्र के कलाकार भी बड़े मंच पर अपनी कला प्रस्तुत कर सकते हैं। हालांकि शास्त्रीय नृत्य में परिपक्वता समय के साथ आती है, लेकिन शुरुआती प्रशिक्षण कलाकार की आगे की यात्रा के लिए आधार तैयार करता है।
रायगढ़ में आयोजित इस समारोह में बाल कलाकारों की मौजूदगी ने कार्यक्रम की विविधता को और बढ़ाया। जहां एक ओर अनुभवी और प्रतिष्ठित कलाकारों ने अपनी साधना प्रस्तुत की, वहीं दूसरी ओर बच्चों और युवाओं ने भी शास्त्रीय नृत्य की अपनी तैयारी दर्शकों के सामने रखी। अरुषि की कथक प्रस्तुति इसी क्रम का हिस्सा रही।
कथक के प्रति अरुषि की रुचि और उनकी अब तक की मंचीय यात्रा आने वाले वर्षों में और विकसित हो सकती है। उनके लिए वर्तमान समय सीखने, अभ्यास करने और विभिन्न मंचों का अनुभव प्राप्त करने का है। गुरु के मार्गदर्शन में लगातार प्रशिक्षण के साथ वे कथक के तकनीकी और भाव पक्ष को और गहराई से समझ सकती हैं।
41वें चक्रधर समारोह में उनकी प्रस्तुति रायगढ़ की सांस्कृतिक स्मृतियों में बाल प्रतिभा के रूप में दर्ज हुई। 9 वर्षीय अरुषि ने अपनी उम्र से जुड़े सहज उत्साह के साथ कथक की शास्त्रीय प्रस्तुति को मंच पर रखा। दर्शकों की प्रतिक्रिया ने उनके प्रदर्शन को प्रोत्साहन दिया। समारोह के मंच से मिले इस अनुभव को उनकी नृत्य यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है।
अरुषि अग्रवाल की कथक प्रस्तुति ने 41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह में नई पीढ़ी की शास्त्रीय कला साधना की झलक प्रस्तुत की। श्रीमती तब्बू प्रवीण के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहीं 9 वर्षीय अरुषि ने लय, ताल और भावाभिव्यक्ति के साथ मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाई। रायगढ़, बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग और ग्वालियर जैसे शहरों में प्रस्तुति का अनुभव रखने वाली अरुषि के लिए चक्रधर समारोह का यह मंच उनकी कला यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव रहा।
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