
भोपाल। मध्यप्रदेश की जेल व्यवस्था में सुधारात्मक सेवाओं को अधिक मानवीय और प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए जेल महानिदेशक डॉ. वरुण कपूर ने केंद्रीय जेल भोपाल में प्रदेश के प्रथम ‘साइको सोशल केयर सेंटर’ का उद्घाटन किया। यह केंद्र जेल विभाग और गांधीनगर स्थित राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MOU) के अंतर्गत ‘प्रोजेक्ट प्रहरी’ के तहत स्थापित किया गया है। इस पहल का मूल उद्देश्य जेलों में निरुद्ध ऐसे बंदियों की मानसिक एवं सामाजिक समस्याओं को समय रहते पहचानना है, जो मानसिक रूप से बीमार, तनावग्रस्त, अवसाद से प्रभावित अथवा विभिन्न परिस्थितियों के कारण भावनात्मक दबाव में हैं। केंद्र के माध्यम से ऐसे बंदियों को आवश्यकता के अनुसार परामर्श, मानसिक सहयोग, व्यवहार संबंधी मार्गदर्शन और पुनर्वास से जुड़ी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था विकसित की गई है। जेल विभाग के अनुसार सुधारात्मक सेवाओं का उद्देश्य केवल बंदियों की सुरक्षा और निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके व्यवहार, मानसिक स्थिति और भविष्य के सामाजिक पुनर्वास पर भी ध्यान देना आवश्यक है। इसी सोच के तहत शुरू किए गए इस केंद्र को जेलों में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित जरूरतों को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार केंद्र की कार्यप्रणाली में बंदियों की मानसिक एवं सामाजिक स्थिति का आकलन, तनाव के संकेतों की पहचान, आवश्यकतानुसार काउंसलिंग तथा व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन के लिए मार्गदर्शन जैसी गतिविधियां शामिल होंगी। इससे जेल प्रशासन को उन परिस्थितियों को समझने में मदद मिल सकेगी, जिनका प्रभाव बंदी के व्यवहार और मानसिक स्थिति पर पड़ता है।
‘प्रोजेक्ट प्रहरी’ की पृष्ठभूमि में मानसिक स्वास्थ्य को बनाया गया प्रमुख केंद्र-बिंदु। मध्यप्रदेश जेल विभाग और राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, गांधीनगर के बीच हुए MOU से पहले भी इस दिशा में प्रशिक्षण और व्यवहारिक स्तर पर कार्य किया जा चुका है। अगस्त 2026 में हुए समझौते के तहत प्रदेश की जेलों में साइको-सोशल काउंसलिंग की मजबूत व्यवस्था विकसित करने की योजना सामने रखी गई थी। इसके लिए राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों को भोपाल स्थित क्षेत्रीय जेल प्रबंधन एवं शोध संस्थान में आमंत्रित कर 6 जुलाई से 12 जुलाई तक सात दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस प्रशिक्षण में प्रदेश की विभिन्न जेलों के 28 अधिकारी-कर्मचारियों को मानसिक तनाव से जूझ रहे बंदियों की पहचान और काउंसलिंग से संबंधित प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षित कर्मचारियों में मेल नर्स, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन, मुख्य प्रहरी और प्रहरी जैसे विभिन्न स्तर के कर्मचारी शामिल थे। प्रशिक्षण का उद्देश्य जेल कर्मचारियों को यह समझने के लिए तैयार करना था कि किसी बंदी के व्यवहार में असामान्य परिवर्तन, अत्यधिक तनाव, भावनात्मक असंतुलन अथवा सामाजिक समस्याओं के संकेतों को किस प्रकार पहचाना जा सकता है और आवश्यकता पड़ने पर उसे उचित सहायता तक कैसे पहुंचाया जा सकता है। प्रशिक्षण के बाद संबंधित कर्मचारियों द्वारा अपनी-अपनी जेलों में तनावग्रस्त बंदियों के साथ काउंसलिंग की गई तथा प्राप्त फीडबैक और परिणामों की समीक्षा की गई। विभाग के स्तर पर सामने आए अनुभवों के आधार पर इस व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और स्थायी रूप देने के लिए राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय के साथ MOU को आगे बढ़ाया गया। इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मानसिक स्वास्थ्य को केवल चिकित्सकीय समस्या के रूप में देखने के बजाय बंदियों की सामाजिक परिस्थितियों, व्यवहार, भावनात्मक स्थिति और सुधार की संभावनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है।
काउंसलिंग से तनाव कम करने और सकारात्मक व्यवहार को बढ़ावा देने की कोशिश। केंद्रीय जेल भोपाल में स्थापित साइको सोशल केयर सेंटर में बंदियों की व्यक्तिगत एवं सामाजिक परिस्थितियों को समझने के साथ-साथ उनके मानसिक तनाव को कम करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। जेल में रहना अपने आप में ऐसी परिस्थिति है, जिसमें व्यक्ति को परिवार से दूरी, कानूनी प्रक्रिया, भविष्य को लेकर चिंता, सामाजिक संबंधों में बदलाव और कारावास की परिस्थितियों जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी परिस्थितियों में प्रत्येक बंदी की मानसिक प्रतिक्रिया अलग-अलग हो सकती है। इसलिए किसी भी बंदी की समस्या को केवल अनुशासन या व्यवहार के दृष्टिकोण से देखने के बजाय उसके पीछे मौजूद मानसिक एवं सामाजिक कारणों को समझना सुधारात्मक व्यवस्था के लिए उपयोगी हो सकता है। केंद्र के माध्यम से बंदियों को अपनी समस्याओं पर बातचीत करने, आवश्यक मार्गदर्शन प्राप्त करने और सकारात्मक सोच विकसित करने के लिए सहयोग दिया जाएगा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पहल में आत्मनियंत्रण, सामाजिक जिम्मेदारी की भावना, सकारात्मक दृष्टिकोण और व्यवहार में सुधार से संबंधित गतिविधियों पर भी जोर दिया जाएगा। जरूरत के अनुसार बंदियों की आगे की सहायता और फॉलोअप की व्यवस्था विकसित करने का भी उद्देश्य है। इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष हिंसक व्यवहार की संभावनाओं को कम करना है। यदि किसी बंदी में लगातार तनाव, भावनात्मक असंतुलन या व्यवहार में गंभीर परिवर्तन दिखाई देता है, तो समय रहते उसकी पहचान कर उचित काउंसलिंग और सहायता उपलब्ध कराने से स्थिति को गंभीर होने से रोकने में मदद मिल सकती है। इसी प्रकार मानसिक रूप से परेशान बंदियों को अकेलेपन या निराशा की स्थिति से बाहर लाने के लिए संवाद और मनो-सामाजिक सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस पहल का लक्ष्य किसी बंदी को केवल वर्तमान कारावास की अवधि में सहायता देना नहीं, बल्कि उसके भीतर ऐसे सकारात्मक व्यवहार और आत्मनियंत्रण को विकसित करना भी है, जो भविष्य में समाज में लौटने के बाद उसके पुनर्वास में सहायक हो सके।
मास्टर ट्रेनर तैयार करने की योजना से प्रदेशभर में विकसित होगा प्रशिक्षित मानव संसाधन। प्रोजेक्ट प्रहरी की व्यवस्था को केवल भोपाल की केंद्रीय जेल तक सीमित रखने के बजाय इसे प्रदेश की अन्य जेलों तक ले जाने की दिशा में भी योजना बनाई गई है। MOU के तहत चयनित जेल अधिकारियों और कर्मचारियों को राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, गांधीनगर में मास्टर ट्रेनर कोर्स कराने की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले अधिकारी-कर्मचारी आगे जेल विभाग के भीतर अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को साइको-सोशल काउंसलिंग से संबंधित प्रशिक्षण देने में भूमिका निभाएंगे। इससे एक ऐसा प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने का प्रयास होगा, जो जेलों में बंदियों की मानसिक और सामाजिक जरूरतों को समझने, तनावग्रस्त बंदियों की पहचान करने और आवश्यकता के अनुसार उन्हें मनो-सामाजिक सहयोग उपलब्ध कराने में सक्षम हो। इस मॉडल में एक ओर विशेषज्ञ संस्थान से तकनीकी एवं प्रशिक्षण सहयोग प्राप्त होगा, वहीं दूसरी ओर जेल विभाग के अपने अधिकारी-कर्मचारी स्थानीय स्तर पर इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने का काम करेंगे। इससे भविष्य में प्रत्येक मामले के लिए बाहरी सहायता पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय जेल विभाग के भीतर ही प्रशिक्षित कर्मियों का एक नेटवर्क तैयार किया जा सकेगा। इस व्यवस्था का महत्व इसलिए भी है क्योंकि प्रदेश की जेलों में बंदियों की परिस्थितियां और जरूरतें अलग-अलग हो सकती हैं। स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित कर्मचारी बंदियों के साथ नियमित संपर्क में रहते हैं, इसलिए वे उनके व्यवहार में होने वाले बदलावों को अपेक्षाकृत जल्दी पहचान सकते हैं। हालांकि गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मामलों में विशेषज्ञ चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता बनी रहेगी, लेकिन प्रारंभिक पहचान, संवाद, काउंसलिंग और आवश्यक सेवाओं तक पहुंच बनाने की व्यवस्था सुधारात्मक प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। विभाग द्वारा पहले किए गए प्रशिक्षण और उसके बाद मिले फीडबैक को इसी व्यापक व्यवस्था की आधारभूमि के रूप में देखा जा रहा है।
सुधारात्मक सेवाओं में मानवीय दृष्टिकोण को मजबूत करने की दिशा में पहल। जेल व्यवस्था को परंपरागत रूप से सुरक्षा, अनुशासन और निगरानी से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन आधुनिक सुधारात्मक दृष्टिकोण में बंदी के व्यवहार और मानसिक स्थिति को समझना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी संदर्भ में केंद्रीय जेल भोपाल में शुरू किया गया साइको सोशल केयर सेंटर जेल विभाग की सुधारात्मक सेवाओं को मानसिक स्वास्थ्य और पुनर्वास से जोड़ने का प्रयास है। जेल महानिदेशक डॉ. वरुण कपूर की पहल के तहत विकसित की जा रही इस व्यवस्था में बंदियों को उनकी समस्याओं को समझने और आवश्यक सहयोग प्राप्त करने का अवसर देने पर जोर है। केंद्र में उपलब्ध सेवाओं के माध्यम से यह प्रयास किया जाएगा कि तनावग्रस्त या मानसिक रूप से परेशान बंदियों की पहचान समय रहते हो तथा उन्हें उनकी जरूरत के अनुसार परामर्श और सहायता मिल सके। सकारात्मक व्यवहार, आत्मनियंत्रण और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों पर काम करने का उद्देश्य बंदियों के भीतर सुधार की संभावनाओं को मजबूत करना है। साथ ही हिंसक व्यवहार अथवा गंभीर तनाव की परिस्थितियों की समय रहते पहचान जेल प्रशासन के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि इससे सुरक्षा और सुधारात्मक दोनों उद्देश्यों को बेहतर ढंग से साधने में मदद मिल सकती है। राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय के साथ सहयोग इस पहल को प्रशिक्षण और विशेषज्ञता का आधार प्रदान करता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने पहले ही मध्यप्रदेश के जेल अधिकारियों-कर्मचारियों को प्रशिक्षण प्रदान किया है और आगे मास्टर ट्रेनर तैयार करने की प्रक्रिया के माध्यम से इस मॉडल को व्यापक बनाने की योजना है। इस प्रकार भोपाल से शुरू हुई व्यवस्था को प्रदेश की अन्य जेलों में चरणबद्ध रूप से लागू करने का उद्देश्य रखा गया है। केंद्रीय जेल भोपाल में शुरू किए गए केंद्र के अनुभव, उसकी कार्यप्रणाली और प्राप्त परिणामों का मूल्यांकन भविष्य के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भोपाल से प्रदेश की अन्य जेलों तक विस्तार की दिशा में पहला कदम। केंद्रीय जेल भोपाल में प्रदेश के प्रथम साइको सोशल केयर सेंटर की शुरुआत को मध्यप्रदेश की जेलों में मानसिक स्वास्थ्य, काउंसलिंग और पुनर्वास संबंधी सेवाओं को व्यवस्थित रूप देने की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय के साथ सहयोग के माध्यम से तैयार की जा रही व्यवस्था में प्रशिक्षण, काउंसलिंग, मानसिक एवं सामाजिक समस्याओं की पहचान, व्यवहारगत सुधार और आवश्यक फॉलोअप को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है। विभाग का लक्ष्य यह है कि जेलों में निरुद्ध बंदियों की मानसिक स्थिति को भी सुधारात्मक प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा माना जाए और उन्हें आवश्यकता के अनुसार समय पर सहयोग मिल सके। केंद्रीय जेल भोपाल में स्थापित केंद्र से प्राप्त अनुभवों और परिणामों का अध्ययन करने के बाद प्रदेश की अन्य जेलों में भी इस मॉडल को चरणबद्ध तरीके से लागू किए जाने की योजना है। इस पहल के माध्यम से जेल प्रशासन और बंदियों के बीच संवाद की भूमिका को भी अधिक महत्व मिल सकता है। किसी बंदी की समस्या को समय रहते समझना, उसके व्यवहार में बदलाव को पहचानना और उसे उचित मार्गदर्शन उपलब्ध कराना सुधारात्मक सेवाओं की प्रभावशीलता बढ़ाने में सहायक हो सकता है। साथ ही मानसिक स्वास्थ्य संबंधी गंभीर मामलों में विशेषज्ञ सेवाओं से जोड़ने की व्यवस्था को भी इस पूरी प्रणाली का आवश्यक हिस्सा बनाए जाने की आवश्यकता रहेगी। प्रोजेक्ट प्रहरी का व्यापक उद्देश्य इसी दिशा में एक संस्थागत तंत्र विकसित करना है, जिसमें बंदियों की सुरक्षा के साथ-साथ उनका मानसिक संतुलन, सकारात्मक व्यवहार और समाज में भविष्य का पुनर्वास भी सुधारात्मक प्रक्रिया का हिस्सा बने। केंद्रीय जेल भोपाल में शुरू हुआ यह पहला साइको सोशल केयर सेंटर इसी व्यापक सोच की प्रारंभिक कड़ी है और इसके अनुभवों के आधार पर प्रदेश की अन्य जेलों में व्यवस्था के विस्तार की दिशा तय की जाएगी।