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भारतीय नौसेना कमांडर्स सम्मेलन में परिचालन तत्परता और भविष्य की तकनीक पर जोर

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नई दिल्ली। नई दिल्ली स्थित नौसेना भवन में आयोजित भारतीय नौसेना के कमांडर्स सम्मेलन में नौसेना की वर्तमान परिचालन क्षमता, भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों और तकनीकी आधुनिकीकरण से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। सम्मेलन को संबोधित करते हुए भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा भूमिका, परिचालन तत्परता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए निरंतर तैयारी पर जोर दिया गया।

सम्मेलन के दौरान जारी ‘ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा’ (Operation Urja Suraksha) का भी उल्लेख किया गया। इसे ऊर्जा आपूर्ति मार्गों और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के संदर्भ में भारतीय नौसेना की पेशेवर क्षमता तथा परिचालन तैयारी का उदाहरण बताया गया। ऊर्जा आपूर्ति की निर्बाध व्यवस्था किसी भी देश की आर्थिक और रणनीतिक आवश्यकताओं से जुड़ी होती है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा में नौसेना की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है, विशेषकर ऐसे समय में जब वैश्विक समुद्री क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की सुरक्षा चुनौतियां मौजूद हैं।

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भारतीय नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र यानी IOR (Indian Ocean Region) में अपनी समुद्री उपस्थिति के माध्यम से समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय सहयोग और राष्ट्रीय हितों से जुड़े दायित्वों का निर्वहन करती है। सम्मेलन में हिंद महासागर क्षेत्र तथा इसके बाहर भारतीय नौसेना की भूमिका और उपस्थिति से संबंधित विषयों पर भी चर्चा हुई। समुद्री क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षित समुद्री मार्ग भारत के व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

भारतीय नौसेना की समुद्री उपस्थिति को भारत के ‘MAHASAGAR’ दृष्टिकोण से भी जोड़ा गया। MAHASAGAR का व्यापक उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग, सुरक्षा और साझा विकास की भावना को आगे बढ़ाना है। समुद्री क्षेत्र में भारत की भूमिका केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय देशों के साथ सहयोग और समुद्री स्थिरता को बढ़ावा देना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। सम्मेलन में नौसेना की भूमिका को इसी व्यापक समुद्री दृष्टिकोण के संदर्भ में देखा गया।

कमांडर्स सम्मेलन में भविष्य की युद्ध और सुरक्षा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर विशेष चर्चा हुई। Artificial Intelligence (AI), Big Data, Autonomous Systems और Uncrewed Systems जैसी तकनीकों को नौसेना की परिचालन क्षमता के साथ जोड़ने के विषय पर विचार-विमर्श किया गया। तेजी से बदलती तकनीकी दुनिया में समुद्री सुरक्षा के लिए सूचना, निगरानी, संचार और निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से बड़ी मात्रा में उपलब्ध डेटा का विश्लेषण, पैटर्न की पहचान और निर्णय लेने में सहायता प्राप्त की जा सकती है। नौसेना के संदर्भ में AI आधारित प्रणालियों का उपयोग निगरानी, समुद्री क्षेत्र की जानकारी, परिचालन योजना और विभिन्न तकनीकी प्रक्रियाओं में संभावित रूप से किया जा सकता है। सम्मेलन में AI के उपयोग को भविष्य की नौसैनिक क्षमता के महत्वपूर्ण पहलुओं में शामिल करते हुए इसके प्रभावी और सुरक्षित इस्तेमाल पर विचार किया गया।

इसी प्रकार Big Data आधुनिक सैन्य और समुद्री अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। समुद्री क्षेत्र से प्राप्त विभिन्न प्रकार के आंकड़ों का विश्लेषण करके परिचालन स्थिति को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिल सकती है। बड़ी मात्रा में डेटा को तेजी से संसाधित करने की क्षमता नौसेना की सूचना आधारित निर्णय प्रणाली को मजबूत कर सकती है। सम्मेलन में डेटा आधारित क्षमता को भविष्य की परिचालन आवश्यकताओं से जोड़कर देखा गया।

Autonomous और Uncrewed Systems भी आधुनिक समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे हैं। ऐसे सिस्टम मानव जोखिम को कम करते हुए निगरानी, खोज, टोही और अन्य मिशन में उपयोग किए जा सकते हैं। समुद्री क्षेत्र में लंबी दूरी तक निगरानी और विभिन्न परिस्थितियों में संचालन के लिए इन तकनीकों की उपयोगिता का अध्ययन किया जा रहा है। कमांडर्स सम्मेलन में इन प्रणालियों के विकास और नौसैनिक परिचालन में उनके समुचित उपयोग से संबंधित विषयों पर चर्चा हुई।

सम्मेलन में साइबर ऑपरेशंस को भी महत्वपूर्ण विषय के रूप में शामिल किया गया। आधुनिक सैन्य प्रणालियां तेजी से डिजिटल नेटवर्क और सूचना प्रौद्योगिकी पर निर्भर हो रही हैं। ऐसे में साइबर सुरक्षा और साइबर क्षमताएं राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई हैं। नौसेना के संचार, नेटवर्क, डिजिटल प्रणालियों और तकनीकी ढांचे की सुरक्षा के लिए मजबूत साइबर क्षमताओं की आवश्यकता है। सम्मेलन में इस क्षेत्र की तैयारियों और भविष्य की जरूरतों पर विचार किया गया।

लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति व्यवस्था भी नौसेना की परिचालन क्षमता का महत्वपूर्ण आधार है। लंबे समय तक समुद्री क्षेत्र में तैनात रहने वाली नौसैनिक इकाइयों के लिए ईंधन, उपकरण, स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सहायता और अन्य आवश्यक संसाधनों की समय पर उपलब्धता जरूरी होती है। सम्मेलन में लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को अधिक प्रभावी और भविष्य की परिचालन आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने पर भी चर्चा की गई।

नौसेना के मानव संसाधन की क्षमता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण को भी सम्मेलन के महत्वपूर्ण विषयों में शामिल किया गया। आधुनिक तकनीक और बदलते परिचालन वातावरण के कारण नौसैनिक कर्मियों को नई प्रणालियों और तकनीकों के अनुरूप प्रशिक्षण देना आवश्यक हो गया है। प्रशिक्षण व्यवस्था में तकनीकी दक्षता, परिचालन कौशल और संयुक्त अभियानों से संबंधित क्षमताओं को विकसित करने पर जोर दिया गया।

इसके साथ ही Technology Absorption यानी नई तकनीकों को प्रभावी तरीके से अपनाने और उन्हें नौसैनिक प्रणालियों में शामिल करने पर भी चर्चा हुई। नई तकनीक विकसित करना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका व्यावहारिक उपयोग और मौजूदा प्रणालियों के साथ उसका एकीकरण है। नौसेना को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने में तकनीकी नवाचार और उसके प्रभावी अवशोषण की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी।

सम्मेलन में भारतीय नौसेना के लिए ‘Combat Ready – Credible – Cohesive – Future Ready’ बल की अवधारणा को केंद्र में रखा गया। इसका उद्देश्य नौसेना को वर्तमान और भविष्य की सुरक्षा परिस्थितियों के लिए परिचालन रूप से तैयार, विश्वसनीय, एकजुट और तकनीकी रूप से सक्षम बनाए रखना है। बदलते समुद्री सुरक्षा वातावरण में इन सभी क्षमताओं के बीच संतुलन और समन्वय को आवश्यक माना गया।

Jointness को भी सम्मेलन के विचार-विमर्श का महत्वपूर्ण आधार बनाया गया। आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए सशस्त्र सेनाओं की विभिन्न शाखाओं के बीच बेहतर समन्वय और संयुक्त कार्यप्रणाली आवश्यक है। संयुक्त संचालन से संसाधनों का बेहतर उपयोग, सूचना का साझा उपयोग और परिचालन क्षमता में समन्वय बढ़ाया जा सकता है। नौसेना की भविष्य की तैयारियों में Jointness को इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया।

Aatmanirbharta यानी आत्मनिर्भरता भी नौसैनिक क्षमता के विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रक्षा उपकरणों, तकनीकी प्रणालियों और आवश्यक संसाधनों के घरेलू विकास एवं उत्पादन को बढ़ावा देने से देश की रणनीतिक क्षमता मजबूत करने में सहायता मिल सकती है। सम्मेलन में आत्मनिर्भरता को तकनीकी विकास और परिचालन जरूरतों से जोड़ते हुए आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।

Innovation यानी नवाचार को भी भविष्य की नौसैनिक क्षमता का महत्वपूर्ण आधार माना गया। समुद्री सुरक्षा की बदलती चुनौतियों के बीच नई तकनीक, नई कार्यप्रणाली और नए परिचालन समाधान विकसित करना आवश्यक है। नवाचार के माध्यम से नौसेना अपनी क्षमताओं को लगातार आधुनिक बना सकती है और भविष्य में उभरने वाली चुनौतियों के लिए बेहतर तैयारी कर सकती है।

सम्मेलन में समुद्री सुरक्षा के व्यापक परिदृश्य पर भी विचार किया गया। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों को देखते हुए नौसेना की समुद्री उपस्थिति महत्वपूर्ण है। भारत के बड़े हिस्से का व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति समुद्री मार्गों से जुड़ी है। इसलिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा और समुद्री क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना राष्ट्रीय हितों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

‘ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा’ के संदर्भ में नौसेना की भूमिका का उल्लेख करते हुए परिचालन तत्परता की आवश्यकता पर जोर दिया गया। ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा के लिए समुद्री क्षेत्र में निगरानी, त्वरित प्रतिक्रिया और आवश्यकतानुसार परिचालन कार्रवाई की क्षमता महत्वपूर्ण होती है। इस प्रकार के अभियानों से प्राप्त अनुभवों का उपयोग भविष्य की तैयारियों को मजबूत करने में किया जा सकता है।

नौसेना की भूमिका केवल युद्धकालीन परिस्थितियों तक सीमित नहीं रहती। शांतिकाल में भी समुद्री निगरानी, समुद्री डकैती से निपटने, मानवीय सहायता, आपदा राहत, खोज एवं बचाव तथा क्षेत्रीय सहयोग जैसे कार्यों में नौसेना की भूमिका होती है। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री उपस्थिति इस व्यापक जिम्मेदारी का हिस्सा है।

कमांडर्स सम्मेलन वरिष्ठ नौसैनिक नेतृत्व के लिए वर्तमान परिचालन परिस्थितियों की समीक्षा और भविष्य की रणनीति पर विचार-विमर्श का महत्वपूर्ण मंच रहा। सम्मेलन में तकनीकी आधुनिकीकरण के साथ-साथ प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स, साइबर सुरक्षा और संयुक्त संचालन जैसे विषयों को एक साथ रखा गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि भविष्य की नौसैनिक क्षमता केवल हथियार प्रणालियों पर निर्भर नहीं होगी, बल्कि मानव संसाधन, तकनीक, सूचना और संस्थागत समन्वय भी उतने ही महत्वपूर्ण होंगे।

AI और स्वायत्त प्रणालियों के बढ़ते उपयोग के बीच तकनीकी सुरक्षा और विश्वसनीयता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। किसी भी आधुनिक डिजिटल प्रणाली को नौसैनिक संचालन में शामिल करने से पहले उसकी सुरक्षा, विश्वसनीयता और परिचालन उपयोगिता का परीक्षण आवश्यक होता है। इसी प्रकार मानव नियंत्रण, साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण से जुड़े पहलुओं को भी महत्व देना होगा। सम्मेलन में आधुनिक तकनीक के व्यापक उपयोग के साथ उससे जुड़ी आवश्यक क्षमताओं पर विचार किया गया।

भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में रक्षा विनिर्माण और तकनीकी विकास भी महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। नौसेना के लिए स्वदेशी जहाज, सेंसर, संचार प्रणाली, हथियार प्रणाली और अन्य उपकरण विकसित करने के प्रयासों से देश की औद्योगिक और तकनीकी क्षमता को बढ़ावा मिल सकता है। इस दिशा में अनुसंधान संस्थानों, उद्योग और नौसेना के बीच सहयोग महत्वपूर्ण रहेगा।

प्रशिक्षण व्यवस्था में भी नई तकनीकों को शामिल करने की आवश्यकता बढ़ रही है। AI, डिजिटल सिमुलेशन, स्वायत्त प्रणालियों और साइबर तकनीक से जुड़े प्रशिक्षण के माध्यम से नौसैनिक कर्मियों को भविष्य के परिचालन वातावरण के लिए तैयार किया जा सकता है। प्रशिक्षण और तकनीक का यह संयोजन नौसेना की मानव क्षमता को आधुनिक तकनीकी आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने में सहायक हो सकता है।

सम्मेलन में चर्चा किए गए सभी विषयों का साझा उद्देश्य भारतीय नौसेना को Combat Ready, Credible, Cohesive और Future Ready बनाए रखना रहा। इसके लिए परिचालन तत्परता के साथ तकनीकी आधुनिकीकरण, प्रशिक्षण, आत्मनिर्भरता, नवाचार और संयुक्त कार्यप्रणाली पर समान रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है।

नई दिल्ली स्थित नौसेना भवन में आयोजित कमांडर्स सम्मेलन में हुए विचार-विमर्श से भारतीय नौसेना की भविष्य की प्राथमिकताओं की व्यापक तस्वीर सामने आई। समुद्री सुरक्षा के बदलते स्वरूप के बीच नौसेना को पारंपरिक क्षमताओं के साथ-साथ AI, Big Data, Autonomous Systems, Uncrewed Systems और Cyber Operations जैसी आधुनिक क्षमताओं से लैस करने पर जोर दिया गया।

कुल मिलाकर, भारतीय नौसेना कमांडर्स सम्मेलन में परिचालन तत्परता, समुद्री सुरक्षा, तकनीकी आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखते हुए विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। ‘ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा’ से मिले परिचालन अनुभवों, हिंद महासागर क्षेत्र में नौसेना की निरंतर उपस्थिति और MAHASAGAR दृष्टिकोण के साथ भविष्य की तकनीकी क्षमताओं को जोड़ने पर जोर रहा। Jointness, Aatmanirbharta और Innovation के सिद्धांतों के आधार पर भारतीय नौसेना को एक Combat Ready – Credible – Cohesive – Future Ready बल के रूप में विकसित करने की दिशा में चर्चा की गई।

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