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HQ Report
दंदरौआ धाम में श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन सेवा, आत्मचिंतन और भगवत प्राप्ति का दिया संदेश
ग्वालियर। नर सेवा को नारायण सेवा के समान बताते हुए कथा व्यास लव दास महाराज ने कहा कि पीड़ित मानवता की सेवा से बढ़कर कोई कार्य नहीं है। मनुष्य के जीवन में धार्मिक और आध्यात्मिक आयोजनों का उद्देश्य केवल कथा श्रवण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इन आयोजनों के माध्यम से समाजसेवा, मानव कल्याण और जरूरतमंदों की सहायता का भाव भी मजबूत होना चाहिए। शताब्दीपुरम स्थित दंदरौआ धाम में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस मंगलवार को उन्होंने कहा कि बी केयर एनजीओ द्वारा पितरों के निमित्त श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन कर मानव कल्याण की दिशा में कार्य किया जा रहा है। कथा स्थल पर स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर पीड़ित एवं जरूरतमंद लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास भी इसी सेवा भावना का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि धार्मिक आयोजन तभी अधिक सार्थक बनते हैं, जब उनसे समाज में सेवा, संवेदना, सद्भाव और परोपकार की भावना को बढ़ावा मिले। कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर आध्यात्मिक संदेशों का श्रवण किया।
कथा व्यास लव दास महाराज ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन का महत्व समझाते हुए कहा कि दूसरों की चिंता करना निश्चित रूप से अच्छी बात है, लेकिन व्यक्ति को अपने आत्मकल्याण के लिए स्वयं के भीतर भी झांकना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन अनेक प्रकार की चिंताओं, इच्छाओं, मोह और सांसारिक विषयों के बीच उलझा रहता है। ऐसे में यदि व्यक्ति अपने जीवन के मूल उद्देश्य पर विचार नहीं करता, तो वह बाहरी विषयों में ही उलझकर रह जाता है। उनके अनुसार ज्ञानी व्यक्ति अपने जीवन के मूल उद्देश्य और आत्मकल्याण पर केंद्रित होकर चिंतन करता है, जबकि अज्ञानी व्यक्ति अनेक विषयों में भटकता रहता है और धीरे-धीरे अपने वास्तविक उद्देश्य से दूर हो जाता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक साधना को जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मानव जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों के लिए नहीं मिला है, बल्कि इसके माध्यम से व्यक्ति को अपने भीतर के सत्य को पहचानने और ईश्वर की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।
लव दास महाराज ने कहा कि मानव जीवन का मूल उद्देश्य भगवत प्राप्ति है और इसके लिए भगवान की कथा का श्रवण, उनका कीर्तन तथा उनके स्वरूप का दर्शन एवं मनन महत्वपूर्ण साधन हैं। उन्होंने कहा कि श्रवण, कीर्तन और मनन के माध्यम से व्यक्ति का मन धीरे-धीरे आध्यात्मिक दिशा में अग्रसर होता है। भगवान की कथा सुनने से मन में सकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं, कीर्तन से भक्ति और श्रद्धा का भाव मजबूत होता है तथा भगवान के स्वरूप का मनन व्यक्ति को अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि धार्मिक कथा केवल सुनने का विषय नहीं है, बल्कि कथा से प्राप्त संदेश को अपने व्यवहार और जीवन में उतारना भी आवश्यक है। यदि कथा श्रवण के बाद व्यक्ति के आचरण में सेवा, करुणा, संयम, सत्य और सद्भाव का भाव आता है, तभी कथा का वास्तविक उद्देश्य सार्थक माना जा सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को नियमित रूप से भगवान का स्मरण करने और अपने दैनिक जीवन में सेवा एवं परोपकार की भावना विकसित करने का संदेश दिया।
कथा के दौरान उन्होंने मृत्यु और मोह के विषय पर भी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझाया। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य को जीवन की नश्वरता का बोध हो जाता है, तब उसे अनावश्यक मोह और आसक्ति से स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करना चाहिए। शरीर, परिवार और सांसारिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति व्यक्ति को आध्यात्मिक लक्ष्य से दूर कर सकती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन रहते ही यह समझ विकसित करनी चाहिए कि संसार की सभी वस्तुएं परिवर्तनशील हैं और स्थायी केवल ईश्वर का स्मरण तथा उसके प्रति श्रद्धा है। उन्होंने श्रद्धालुओं से भगवान के प्रति दृढ़ विश्वास रखने और जीवन के अंतिम क्षण तक भक्ति भाव बनाए रखने का संदेश दिया। महाराज ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में भगवान का भजन, सत्संग और सद्कर्मों को महत्व देना चाहिए। उन्होंने कहा कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसे केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति में व्यतीत कर देना उचित नहीं है। व्यक्ति को अपने कर्मों के माध्यम से स्वयं के साथ-साथ समाज के कल्याण में भी योगदान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपनी वाणी और व्यवहार के प्रति भी सजग रहना चाहिए। किसी के प्रति बुरा बोलने, बुरा सुनने और अनावश्यक विवादों में उलझने के बजाय व्यक्ति को अपने आचरण को सकारात्मक बनाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मनुष्य को अपने विवेक का उपयोग करते हुए ऐसा जीवन जीना चाहिए, जिससे उसके कारण किसी अन्य व्यक्ति को पीड़ा न पहुंचे। उनके संदेश में भक्ति के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं को भी विशेष महत्व दिया गया। उन्होंने कहा कि समाज में सेवा और परोपकार की भावना बढ़ेगी तो आपसी सद्भाव और सहयोग भी मजबूत होगा। इसी दृष्टि से कथा स्थल पर स्वास्थ्य शिविर का आयोजन भी श्रद्धालुओं और जरूरतमंदों के लिए सेवा का माध्यम बन रहा है। धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक सरोकारों को जोड़ने से आध्यात्मिक संदेश व्यवहारिक जीवन तक पहुंचता है और समाज में सकारात्मक वातावरण निर्मित होता है।










