
भोपाल। मध्यप्रदेश में कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) को अब केवल कंपनियों की सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में नहीं, बल्कि प्रदेश के विकास की प्राथमिकताओं को गति देने वाले महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास तेज किए जा रहे हैं। राज्य सरकार ने सीएसआर निवेश को शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, महिला सशक्तिकरण, बाल विकास, सामुदायिक विकास और अन्य जरूरतमंद क्षेत्रों से जोड़कर अधिक प्रभावी परिणाम हासिल करने पर जोर दिया है। सीएसआर कॉन्क्लेव के उद्घाटन सत्र में महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती निर्मला भूरिया ने कहा कि सीएसआर का उद्देश्य केवल गतिविधियां पूरी करना या निर्धारित लक्ष्य हासिल करना नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका वास्तविक उद्देश्य समुदायों को मजबूत करना और लोगों के जीवन में स्थायी सकारात्मक बदलाव लाना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से विविधताओं वाला राज्य है। इसलिए पूरे प्रदेश के लिए एक जैसी सीएसआर कार्ययोजना के बजाय स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों के अनुरूप अलग-अलग मॉडल विकसित किए जाने की आवश्यकता है। सरकार की प्राथमिकताओं और कॉरपोरेट संस्थानों की विशेषज्ञता, तकनीकी क्षमता तथा वित्तीय संसाधनों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित कर विकास योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
मंत्री श्रीमती निर्मला भूरिया ने कहा कि सीएसआर परियोजनाओं के चयन में सबसे पहले वास्तविक जरूरतों की पहचान की जानी चाहिए। जिस क्षेत्र में जिस प्रकार की समस्या है, वहां उसी के अनुरूप निवेश और परियोजना तैयार की जाए। उन्होंने सीएसआर साझेदारियों में स्पष्ट प्राथमिकताओं, जरूरतों की मैपिंग, प्रभावी मॉनिटरिंग और परिणामों के मापन को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना था कि किसी परियोजना में कितनी राशि खर्च हुई, कितनी गतिविधियां आयोजित हुईं या कितने कार्यक्रम किए गए, यह अपने आप में सफलता का पर्याप्त पैमाना नहीं है। वास्तविक सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि संबंधित परियोजना से लोगों के जीवन में कितना बदलाव आया और उसका प्रभाव कितने समय तक कायम रहा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार सीएसआर कंपनियों के साथ मिलकर ऐसी योजनाओं को बढ़ावा देना चाहती है जिनके परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दें और जिनका मूल्यांकन भी किया जा सके। इसके लिए सरकारी विभागों और कंपनियों के बीच नियमित संवाद, बेहतर सूचना व्यवस्था और परियोजनाओं की प्रगति की निगरानी आवश्यक होगी।
मंत्री ने राष्ट्रीय सीएसआर पोर्टल के साथ मध्यप्रदेश के पंखुड़ी पोर्टल को भी महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि इन प्लेटफॉर्म के जरिए प्रदेश की विकास आवश्यकताओं, संभावित परियोजनाओं, निवेश के अवसरों और उपलब्ध संसाधनों की जानकारी एक स्थान पर उपलब्ध कराई जा सकती है। इससे सरकार और कॉरपोरेट जगत के बीच संपर्क अधिक व्यवस्थित हो सकेगा। अभी कई बार कंपनियां अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार सीएसआर परियोजनाएं चुनती हैं, जबकि दूसरी ओर सरकारी विभागों और जिलों में कई ऐसी जरूरतें मौजूद रहती हैं जहां निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता और संसाधनों की आवश्यकता होती है। यदि दोनों पक्षों के बीच बेहतर सूचना का आदान-प्रदान हो तो उपलब्ध सीएसआर संसाधनों को जरूरतमंद क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सकता है। पंखुड़ी पोर्टल इसी दिशा में एक सेतु के रूप में काम कर सकता है। सरकार का प्रयास है कि संभावित सीएसआर साझेदारों को प्रदेश की वास्तविक जरूरतों और तैयार परियोजनाओं की जानकारी उपलब्ध हो, जिससे वे अपनी विशेषज्ञता और संसाधनों के अनुसार उपयुक्त क्षेत्र का चयन कर सकें।
1195 करोड़ रुपये से अधिक का सीएसआर निवेश
मध्यप्रदेश में सीएसआर गतिविधियों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम के प्रबंध संचालक श्री चंद्रमौली शुक्ला ने कॉन्क्लेव में सीएसआर के कानूनी और संस्थागत ढांचे की जानकारी देते हुए बताया कि कंपनी अधिनियम, 2013 के बाद पात्र कंपनियों के लिए सीएसआर एक संस्थागत व्यवस्था के रूप में सामने आया है। निर्धारित पात्रता पूरी करने वाली कंपनियों को पिछले तीन वित्तीय वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का कम से कम दो प्रतिशत सीएसआर गतिविधियों पर व्यय करना होता है। उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश में वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान लगभग 1,195.34 करोड़ रुपये सीएसआर पर खर्च किए गए। यह राशि प्रदेश में सीएसआर के माध्यम से उपलब्ध वित्तीय संसाधनों के बड़े आधार को दर्शाती है। हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सीएसआर निवेश का क्षेत्रवार वितरण समान नहीं है और जेंडर इक्विटी तथा महिला सशक्तिकरण से जुड़े क्षेत्रों में निवेश की हिस्सेदारी करीब दो प्रतिशत रही है। इससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले समय में महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता के क्षेत्र में सीएसआर भागीदारी बढ़ाने की पर्याप्त संभावनाएं हैं।
श्री शुक्ला ने कहा कि प्रदेश में सीएसआर को अधिक प्रभावी बनाने के लिए राज्य और जिला स्तर पर जरूरतों की बेहतर मैपिंग करनी होगी। प्रत्येक जिले की सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं। कहीं शिक्षा के बुनियादी ढांचे की आवश्यकता अधिक है तो कहीं स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने की जरूरत है। कुछ क्षेत्रों में पोषण, महिला आजीविका, कौशल विकास, पेयजल, स्वच्छता या सामुदायिक बुनियादी ढांचे से जुड़ी जरूरतें प्राथमिक हो सकती हैं। ऐसे में एक सामान्य मॉडल के बजाय जिला स्तर पर प्राथमिकताएं तय करना उपयोगी होगा। उन्होंने कहा कि सरकारी प्राथमिकताओं और सीएसआर कंपनियों की रुचि का बेहतर मिलान किया जाना चाहिए। इससे कंपनियां ऐसे क्षेत्रों में निवेश कर सकेंगी जहां उनकी विशेषज्ञता का वास्तविक उपयोग हो और सरकार की योजनाओं को भी अतिरिक्त सहयोग प्राप्त हो।
उन्होंने सीएसआर पोर्टल को और मजबूत करने तथा सरकारी विभागों, कॉरपोरेट संस्थानों और अन्य साझेदारों के बीच सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि ऐसी परियोजनाओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जिनके परिणाम स्पष्ट रूप से मापे जा सकें और जिन्हें लंबे समय तक संचालित किया जा सके। किसी गांव या क्षेत्र में एक बार संसाधन उपलब्ध करा देने के बाद परियोजना समाप्त हो जाए, इसके बजाय ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है जिसमें समुदाय स्वयं उस व्यवस्था को आगे बढ़ाने में सक्षम हो। इसके लिए स्थानीय संस्थाओं, स्वयं सहायता समूहों, पंचायतों, सामाजिक संगठनों और अन्य हितधारकों की भागीदारी महत्वपूर्ण हो सकती है। सीएसआर निवेश को स्थायी प्रभाव से जोड़ने के लिए परियोजना की योजना बनाते समय ही उसके संचालन, रखरखाव, स्थानीय भागीदारी और परिणामों के मूल्यांकन की व्यवस्था पर विचार किया जाना आवश्यक है।

सरकार बनेगी सुविधा प्रदाता और समन्वयक
श्री चंद्रमौली शुक्ला ने मध्यप्रदेश सीएसआर फैसिलिटेशन गाइडलाइंस 2017 का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य में सरकार की भूमिका सुविधा प्रदाता और समन्वयक की है। इसका उद्देश्य कंपनियों पर किसी विशेष क्षेत्र में निवेश का दबाव बनाना नहीं, बल्कि उन्हें प्रदेश की प्राथमिकताओं और वास्तविक जरूरतों से परिचित कराना है। सरकारी तंत्र कंपनियों को परियोजनाओं के लिए आवश्यक जानकारी, स्थानीय परिस्थितियों और संभावित साझेदारों से जोड़ने में सहायता कर सकता है। इसी तरह कंपनियां अपनी विशेषज्ञता, तकनीक और संसाधनों के माध्यम से सरकारी प्रयासों को पूरक समर्थन दे सकती हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी विभाग, कंपनियां, विकास संस्थाएं, सिविल सोसायटी और स्थानीय समुदाय यदि एक साझा उद्देश्य के साथ काम करें तो सीएसआर परियोजनाओं का प्रभाव अधिक व्यापक हो सकता है।
कॉन्क्लेव में यह भी स्पष्ट किया गया कि सीएसआर के प्रभाव को बढ़ाने के लिए केवल धनराशि उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। परियोजनाओं की गुणवत्ता, क्रियान्वयन क्षमता, स्थानीय भागीदारी और परिणामों की निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी क्षेत्र में शिक्षा के लिए सीएसआर निवेश किया जा रहा है तो केवल भवन निर्माण तक सीमित रहने के बजाय विद्यार्थियों की उपस्थिति, सीखने के स्तर, शिक्षकों की क्षमता और डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता जैसे परिणामों पर भी ध्यान दिया जा सकता है। इसी प्रकार स्वास्थ्य क्षेत्र में केवल उपकरण उपलब्ध कराने के बजाय उनकी उपयोगिता, मरीजों तक सेवाओं की पहुंच और स्वास्थ्य परिणामों को भी परियोजना के मूल्यांकन का हिस्सा बनाया जा सकता है। इस प्रकार गतिविधि आधारित दृष्टिकोण से परिणाम आधारित दृष्टिकोण की ओर बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
61 लाख से अधिक बच्चों तक पहुंच का अवसर
महिला एवं बाल विकास आयुक्त श्री संदीप जी. आर. ने सीएसआर को बाल पोषण और शुरुआती बाल विकास से जोड़ते हुए कहा कि बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्ष उसके संपूर्ण विकास की बुनियाद तय करते हैं। विशेष रूप से जीवन के पहले छह वर्ष और शुरुआती 1000 दिन पोषण, वृद्धि और विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इस अवधि में पोषण और देखभाल से संबंधित समय पर किए गए हस्तक्षेप का प्रभाव बच्चे के आगे के जीवन पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि बाल विकास केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। समाज, परिवार, स्थानीय संस्थाओं और निजी क्षेत्र की भागीदारी भी इस दिशा में महत्वपूर्ण है। सीएसआर के माध्यम से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग यदि स्थानीय जरूरतों के अनुसार किया जाए तो बड़ी संख्या में बच्चों और परिवारों तक अतिरिक्त सहायता पहुंचाई जा सकती है।
आयुक्त ने बताया कि मध्यप्रदेश में लगभग 97,882 आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से 61 लाख से अधिक संवेदनशील एवं जरूरतमंद बच्चों की पोषण संबंधी आवश्यकताओं पर काम किया जा रहा है। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों तक पहुंच बनाने के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों का मजबूत होना आवश्यक है। सीएसआर के माध्यम से इन केंद्रों के बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने, आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने, स्वास्थ्य एवं पोषण सेवाओं को मजबूत करने तथा स्थानीय स्तर पर नवाचारों को बढ़ावा देने की पर्याप्त संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि आंगनवाड़ी केंद्र केवल पोषण वितरण का स्थान नहीं हैं, बल्कि बच्चों के शुरुआती विकास और परिवारों के साथ संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं। इसलिए इन केंद्रों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार विकसित करना बाल विकास की दृष्टि से उपयोगी हो सकता है।
उन्होंने कहा कि सीएसआर संस्थाएं आंगनवाड़ी केंद्रों में आधारभूत सुविधाओं के साथ-साथ नवाचारी कार्यक्रमों को भी सहयोग दे सकती हैं। इसमें पोषण जागरूकता, माता-पिता की क्षमता वृद्धि, बच्चों के लिए सीखने की सामग्री, स्वास्थ्य जांच, स्वच्छता, पेयजल, रसोई और अन्य आवश्यक सुविधाओं को मजबूत करना शामिल हो सकता है। हालांकि प्रत्येक परियोजना का चयन स्थानीय आवश्यकता और सरकारी प्राथमिकताओं के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि परियोजनाओं का उद्देश्य समुदाय को लंबे समय तक लाभ पहुंचाना होना चाहिए।
स्थानीय खाद्य सामग्री से पोषण सुधार की पहल
श्री संदीप ने स्थानीय संसाधनों पर आधारित पोषण समाधानों का उदाहरण देते हुए ‘रंगीन रोटी’ जैसी पहल का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौष्टिक सामग्री को रोजमर्रा के भोजन में शामिल करके ऐसे मॉडल विकसित किए जा सकते हैं जो परिवारों के लिए व्यवहारिक और स्वीकार्य हों। सहजन की पत्तियां, मिलेट्स और अन्य स्थानीय पौष्टिक खाद्य पदार्थों को भोजन में शामिल करने से पोषण संबंधी जागरूकता बढ़ाई जा सकती है। इस तरह की पहल का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यदि पोषण समाधान स्थानीय खान-पान की आदतों के अनुरूप हों तो समुदाय उन्हें अपनाने में अधिक सहज महसूस कर सकता है।
उन्होंने कहा कि पोषण संबंधी किसी भी पहल में केवल सामग्री उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। परिवारों को यह जानकारी भी देना जरूरी है कि स्थानीय खाद्य सामग्री का उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, स्वयं सहायता समूहों, महिलाओं और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से ऐसे मॉडल विकसित किए जा सकते हैं। सीएसआर संस्थाएं इसमें तकनीकी विशेषज्ञता, प्रशिक्षण, संचार सामग्री और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने में सहयोग कर सकती हैं। इससे सरकारी कार्यक्रमों के साथ निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता को जोड़ा जा सकता है।
उन्होंने मध्यप्रदेश में सीएसआर निवेश की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रदेश देश की आबादी में लगभग छह प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है, जबकि राष्ट्रीय सीएसआर व्यय में राज्य की हिस्सेदारी करीब 1.44 प्रतिशत है। इस अंतर को देखते हुए प्रदेश में सीएसआर निवेश बढ़ाने की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। यदि राज्य की वास्तविक जरूरतों और कंपनियों की प्राथमिकताओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो तो भविष्य में सीएसआर संसाधनों का बड़ा हिस्सा मध्यप्रदेश की विकास आवश्यकताओं से जोड़ा जा सकता है।
श्योपुर और विदिशा की साझेदारियों का उल्लेख
कॉन्क्लेव में सीएसआर के माध्यम से किए जा रहे विभिन्न प्रयासों के उदाहरण भी सामने रखे गए। श्योपुर में ब्रिटानिया फाउंडेशन और विदिशा में अमेरिकन इंडिया फाउंडेशन की पहलों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि ऐसी साझेदारियां सरकारी प्रयासों को पूरक समर्थन प्रदान कर सकती हैं। इन उदाहरणों से यह संकेत मिलता है कि जब निजी संस्थाएं स्थानीय परिस्थितियों और सरकारी प्राथमिकताओं को समझते हुए परियोजनाएं तैयार करती हैं, तो उनके माध्यम से मौजूदा व्यवस्थाओं को अतिरिक्त मजबूती दी जा सकती है।
सरकार का उद्देश्य यह है कि ऐसी साझेदारियों को केवल एक-दो परियोजनाओं तक सीमित न रखा जाए, बल्कि सफल मॉडल की पहचान कर उन्हें अन्य जिलों की जरूरतों के अनुसार भी विकसित किया जा सके। इसके लिए परियोजनाओं का दस्तावेजीकरण, परिणामों का मूल्यांकन और अनुभवों का साझा किया जाना महत्वपूर्ण होगा। यदि किसी जिले में कोई मॉडल सफल होता है तो उसकी उपयोगिता और व्यवहारिकता का अध्ययन कर दूसरे क्षेत्रों में उसके अनुकूलित रूप को लागू किया जा सकता है। इससे सीएसआर निवेश के प्रभाव को व्यापक स्तर पर बढ़ाया जा सकेगा।
शिक्षा के क्षेत्र में भी सीएसआर की व्यापक संभावनाएं
सीएसआर के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में भी कई प्रकार के हस्तक्षेप किए जा सकते हैं। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में स्कूलों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के साथ डिजिटल शिक्षा, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं, खेल सुविधाएं, स्मार्ट कक्षाएं और विद्यार्थियों के कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता का उपयोग किया जा सकता है। हालांकि प्रत्येक परियोजना को स्थानीय आवश्यकता के आधार पर तैयार किया जाना आवश्यक है। जहां भवन की आवश्यकता है वहां आधारभूत ढांचे को प्राथमिकता दी जा सकती है और जहां भवन पर्याप्त हैं वहां सीखने के परिणामों में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है।
शिक्षा क्षेत्र में सीएसआर निवेश का प्रभाव मापने के लिए विद्यार्थियों की उपस्थिति, सीखने की क्षमता, डिजिटल संसाधनों का उपयोग और कौशल विकास जैसे संकेतकों को देखा जा सकता है। इससे कंपनियों और सरकार दोनों को यह समझने में सहायता मिलेगी कि निवेश से वास्तविक परिवर्तन कितना आया। इसी प्रकार शिक्षक प्रशिक्षण और समुदाय की भागीदारी को भी परियोजनाओं में शामिल किया जा सकता है। इससे स्कूलों में उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है।
स्वास्थ्य सेवाओं को भी प्राथमिकता से जोड़ने पर जोर
स्वास्थ्य के क्षेत्र में सीएसआर की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने, आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराने, स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम चलाने और जांच सेवाओं को मजबूत करने के लिए सीएसआर संसाधनों का उपयोग किया जा सकता है। विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों में जहां सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं को अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता है, वहां कॉरपोरेट संस्थाओं की तकनीकी और वित्तीय क्षमता उपयोगी हो सकती है।
हालांकि स्वास्थ्य क्षेत्र की परियोजनाओं में भी परिणाम आधारित दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होगा। केवल उपकरण उपलब्ध कराने के बजाय यह देखा जाना आवश्यक है कि उनका उपयोग कितनी नियमितता से हो रहा है, कितने लोगों तक सेवाएं पहुंच रही हैं और संबंधित स्वास्थ्य संकेतकों में क्या बदलाव आया है। इसी तरह स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों में समुदाय की भागीदारी और स्थानीय भाषा में संचार को प्राथमिकता देने से कार्यक्रमों की पहुंच बढ़ाई जा सकती है।
महिला सशक्तिकरण और आजीविका में निवेश की संभावना
सीएसआर के क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण को भी महत्वपूर्ण स्थान दिए जाने की आवश्यकता सामने आई। मध्यप्रदेश में महिला स्वयं सहायता समूहों, कौशल विकास, उद्यमिता, रोजगार और स्थानीय आजीविका के क्षेत्रों में सीएसआर संस्थाएं सहयोग कर सकती हैं। महिलाओं को प्रशिक्षण, बाजार से जोड़ने, डिजिटल माध्यमों का उपयोग सिखाने और उत्पादों की बिक्री के लिए अवसर उपलब्ध कराने से उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ाने में सहायता मिल सकती है।
सीएसआर निवेश के माध्यम से महिला समूहों को केवल प्रशिक्षण देकर छोड़ने के बजाय उनके उत्पादों के लिए बाजार, ब्रांडिंग, पैकेजिंग और डिजिटल बिक्री जैसी सुविधाओं से जोड़ा जा सकता है। इससे परियोजना का प्रभाव प्रशिक्षण की अवधि से आगे भी जारी रह सकता है। इसी तरह स्थानीय संसाधनों पर आधारित उद्यमों को बढ़ावा देने से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
जिलों की जरूरत के अनुसार तैयार होंगी परियोजनाएं
कॉन्क्लेव में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि मध्यप्रदेश के अलग-अलग जिलों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। इसलिए सीएसआर निवेश की योजना बनाते समय जिला स्तर पर जरूरतों की मैपिंग महत्वपूर्ण होगी। किसी जिले में आदिवासी क्षेत्रों की विशेष आवश्यकताएं हो सकती हैं, किसी जिले में पोषण या स्वास्थ्य प्राथमिकता हो सकती है, जबकि औद्योगिक क्षेत्रों में कौशल विकास और पर्यावरण से जुड़े मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसी आधार पर परियोजनाओं का चयन करने से निवेश का प्रभाव अधिक लक्षित किया जा सकेगा।
जिला प्रशासन, संबंधित विभाग और स्थानीय संस्थाएं संभावित परियोजनाओं की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। कंपनियों को भी अपनी विशेषज्ञता और सीएसआर प्राथमिकताओं के आधार पर परियोजनाओं का चयन करने का अवसर मिल सकता है। यदि दोनों पक्षों के बीच नियमित संवाद और सूचना साझा करने की व्यवस्था मजबूत होती है तो परियोजनाओं के दोहराव को कम किया जा सकता है और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
परिणामों की निगरानी होगी महत्वपूर्ण कड़ी
नए सीएसआर रोडमैप में मॉनिटरिंग और मूल्यांकन को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। किसी भी परियोजना की शुरुआत से पहले उसके लक्ष्य और अपेक्षित परिणाम स्पष्ट किए जाने की आवश्यकता बताई गई। इसके बाद निर्धारित अवधि में प्रगति की समीक्षा की जा सकती है। इससे यह पता लगाने में सहायता मिलेगी कि परियोजना अपने उद्देश्य की दिशा में आगे बढ़ रही है या उसमें बदलाव की आवश्यकता है।
परिणामों का मापन केवल आंकड़ों तक सीमित न रखकर लाभार्थियों के अनुभव और समुदाय में हुए बदलाव को भी शामिल किया जा सकता है। इससे परियोजना की वास्तविक उपयोगिता समझने में मदद मिलेगी। सफल परियोजनाओं को दस्तावेजीकृत कर उनके मॉडल को अन्य क्षेत्रों में अपनाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जा सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमित संवाद को महत्वपूर्ण माना गया है।
सरकार और उद्योग के बीच मजबूत होगा समन्वय
सीएसआर कॉन्क्लेव का एक प्रमुख उद्देश्य सरकार और कॉरपोरेट क्षेत्र के बीच संवाद को मजबूत करना भी रहा। सरकार ने स्पष्ट किया कि निजी क्षेत्र के पास संसाधनों के साथ-साथ तकनीकी विशेषज्ञता और प्रबंधन क्षमता भी है। वहीं सरकारी विभागों के पास स्थानीय जरूरतों, योजनाओं और प्रशासनिक व्यवस्था की जानकारी होती है। इन दोनों क्षमताओं को एक साथ लाकर विकास परियोजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
इसके लिए केवल सीएसआर कंपनियों और सरकार के बीच संबंध पर्याप्त नहीं होंगे। स्थानीय निकाय, गैर-सरकारी संगठन, समुदाय आधारित संगठन, स्वयं सहायता समूह, विकास संस्थाएं और स्थानीय नागरिक भी साझेदारी का हिस्सा बन सकते हैं। परियोजना के डिजाइन से लेकर क्रियान्वयन और मूल्यांकन तक विभिन्न हितधारकों की भूमिका स्पष्ट होने से योजनाओं की प्रभावशीलता बढ़ सकती है।
सीएसआर को स्थायी विकास से जोड़ने की तैयारी
सरकार का जोर ऐसे सीएसआर मॉडल पर है जिसमें परियोजना समाप्त होने के बाद भी उसका लाभ समुदाय को मिलता रहे। इसके लिए स्थानीय क्षमता निर्माण, समुदाय की भागीदारी और परियोजनाओं के संचालन की स्थायी व्यवस्था पर ध्यान देना होगा। उदाहरण के लिए यदि किसी गांव में जल संरक्षण का काम किया जाता है तो स्थानीय समुदाय को उसके रखरखाव और उपयोग की जिम्मेदारी समझाना भी जरूरी होगा। यदि किसी आंगनवाड़ी केंद्र में सुविधाएं विकसित की जाती हैं तो उनके नियमित रखरखाव की व्यवस्था भी परियोजना का हिस्सा होनी चाहिए।
इसी तरह महिला स्वयं सहायता समूहों को केवल उपकरण उपलब्ध कराने के बजाय उन्हें बाजार और वित्तीय प्रबंधन से जोड़ना अधिक स्थायी परिणाम दे सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में केवल डिजिटल उपकरण देने के बजाय शिक्षकों और विद्यार्थियों को उनका प्रभावी उपयोग सिखाना जरूरी होगा। स्वास्थ्य क्षेत्र में केवल मशीन उपलब्ध कराने के बजाय प्रशिक्षित मानव संसाधन और रखरखाव की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी। इस तरह सीएसआर परियोजनाओं को दीर्घकालिक प्रभाव से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
मध्यप्रदेश में बढ़ सकती है सीएसआर की भूमिका
मध्यप्रदेश में 1,195 करोड़ रुपये से अधिक का सीएसआर निवेश और राज्य की राष्ट्रीय सीएसआर हिस्सेदारी को लेकर सामने आए आंकड़े इस क्षेत्र में आगे विस्तार की संभावनाओं को दर्शाते हैं। सरकार का प्रयास है कि उपलब्ध निवेश को विकास की प्राथमिकताओं से जोड़कर उसका प्रभाव बढ़ाया जाए। इसके लिए कंपनियों को प्रदेश की वास्तविक जरूरतों की जानकारी देना, तैयार परियोजनाओं की पहचान करना और निवेश के बाद परिणामों की निगरानी करना महत्वपूर्ण होगा।
महिला एवं बाल विकास विभाग के स्तर पर बच्चों के पोषण और शुरुआती विकास से जुड़ी बड़ी संख्या में सेवाओं तक पहुंच उपलब्ध है। लगभग 97,882 आंगनवाड़ी केंद्र और 61 लाख से अधिक बच्चों तक पहुंच का यह नेटवर्क सीएसआर संस्थाओं के लिए व्यापक साझेदारी की संभावना प्रस्तुत करता है। यदि स्थानीय जरूरतों के अनुसार परियोजनाएं तैयार की जाती हैं तो बुनियादी सुविधाओं, पोषण, स्वास्थ्य, जागरूकता और नवाचार के क्षेत्रों में अतिरिक्त सहयोग प्राप्त हो सकता है।
जरूरत, निवेश और परिणाम के बीच बनेगा सीधा संबंध
सीएसआर कॉन्क्लेव में सामने आया नया दृष्टिकोण मूल रूप से जरूरत, निवेश और परिणाम के बीच सीधा संबंध स्थापित करने पर आधारित है। इसका उद्देश्य यह है कि जहां आवश्यकता सबसे अधिक हो, वहां उपलब्ध संसाधनों को प्राथमिकता के साथ पहुंचाया जाए और निवेश के परिणामों का नियमित मूल्यांकन किया जाए। इससे सीएसआर को केवल खर्च की गई राशि या आयोजित गतिविधियों के आधार पर देखने के बजाय उसके सामाजिक प्रभाव के आधार पर समझने की दिशा मजबूत होगी।
सरकार, कॉरपोरेट क्षेत्र और सामाजिक संगठनों के बीच बेहतर समन्वय के साथ यदि जिला स्तर पर जरूरतों की मैपिंग, परियोजनाओं का वैज्ञानिक चयन, पारदर्शी क्रियान्वयन और नियमित मूल्यांकन किया जाता है तो सीएसआर के माध्यम से प्रदेश के विकास प्रयासों को अतिरिक्त गति मिल सकती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, महिला सशक्तिकरण और सामुदायिक विकास जैसे क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भागीदारी सरकारी योजनाओं को पूरक सहयोग प्रदान कर सकती है।
मध्यप्रदेश सरकार की ओर से सीएसआर के लिए तैयार किए जा रहे इस रोडमैप में स्थानीय जरूरतों को प्राथमिकता, कंपनियों की विशेषज्ञता का उपयोग, सरकारी प्राथमिकताओं से तालमेल, डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से जानकारी साझा करना और परिणामों की निगरानी प्रमुख आधार के रूप में सामने आए हैं। आने वाले समय में इन व्यवस्थाओं को और मजबूत किए जाने से राज्य में सीएसआर निवेश के लिए नए अवसर विकसित हो सकते हैं। सरकार की कोशिश है कि सीएसआर संसाधनों का उपयोग ऐसे क्षेत्रों में हो जहां उनका प्रत्यक्ष और दीर्घकालिक लाभ समाज के जरूरतमंद वर्गों तक पहुंच सके और विकास की प्रक्रिया में समुदायों की भागीदारी भी मजबूत हो।









