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13 अक्टूबर 2026, मंगलवार। आज आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि है। शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की आराधना का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां चंद्रघंटा की पूजा से साहस, शांति, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति की कामना की जाती है। नवरात्रि के इस पावन अवसर पर श्रद्धालु माता की आराधना, मंत्र जाप और पूजा-पाठ के माध्यम से सुख-समृद्धि तथा परिवार की मंगलकामना करते हैं। मंगलवार का दिन होने के कारण हनुमानजी की पूजा और धार्मिक साधना का भी विशेष महत्व माना जाता है। प्रस्तुत है आज का पंचांग, तिथि-नक्षत्र, राहुकाल, नवरात्रि की धार्मिक मान्यताएं और मेष से मीन तक सभी 12 राशियों का विस्तृत राशिफल।
आज का पंचांग
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दिन: मंगलवार
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तारीख: 13 अक्टूबर 2026
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विक्रम संवत: 2083
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शक संवत: 1948
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अयन: दक्षिणायन
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ऋतु: शरद ऋतु
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मास: आश्विन
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पक्ष: शुक्ल पक्ष
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तिथि: तृतीया रात्रि 11:27 बजे तक, इसके बाद चतुर्थी
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नक्षत्र: विशाखा, 14 अक्टूबर की रात्रि 1:43 बजे तक; इसके बाद अनुराधा
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योग: प्रीति रात्रि 8:24 बजे तक, इसके बाद आयुष्मान
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सूर्योदय: प्रातः 6:34 बजे
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सूर्यास्त: सायं 6:14 बजे
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राहुकाल: सायं 3:20 बजे से 4:48 बजे तक
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दिशाशूल: उत्तर दिशा
नोट: पंचांग के समय स्थान के अनुसार बदल सकते हैं। यहां समय आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए पंचांग के आधार पर दिए गए हैं।
शारदीय नवरात्रि: मां चंद्रघंटा की आराधना का दिन
शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां चंद्रघंटा का स्वरूप साहस, शक्ति और निर्भयता का प्रतीक है। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित रहता है, इसी कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है।
मां चंद्रघंटा को शक्ति और शांति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि उनकी आराधना करने से साधक में आत्मविश्वास बढ़ता है और वह कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा प्राप्त करता है। नवरात्रि के इस दिन श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं, माता को पुष्प अर्पित करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
धार्मिक परंपराओं में मां चंद्रघंटा की उपासना को भय, नकारात्मकता और मानसिक अशांति से मुक्ति की कामना से भी जोड़ा जाता है। श्रद्धालु माता के समक्ष अपनी मनोकामनाएं रखते हैं और जीवन में साहस, धैर्य तथा विवेक बनाए रखने का संकल्प लेते हैं।
मां चंद्रघंटा की पूजा कैसे करें?
प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को स्वच्छ कर मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप का ध्यान करें। माता को पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। श्रद्धा के अनुसार दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती के पाठ या मंत्र जाप किया जा सकता है।
मां चंद्रघंटा की आराधना के लिए प्रचलित मंत्र है:
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥
पूजा के दौरान मन में शांति, परिवार के कल्याण और सभी के सुखी जीवन की कामना करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा में श्रद्धा, संयम और सद्भाव का विशेष महत्व है।
मां कूष्मांडा की पूजा और चतुर्थी का महत्व
नवरात्रि की चतुर्थी तिथि मां दुर्गा के कूष्मांडा स्वरूप को समर्पित मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां कूष्मांडा सृष्टि की ऊर्जा और सृजन शक्ति का प्रतीक हैं। उन्हें आरोग्य, समृद्धि और सकारात्मकता की कामना के साथ पूजा जाता है।
मां कूष्मांडा की आराधना में श्रद्धालु परिवार के स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और जीवन में सकारात्मकता की प्रार्थना करते हैं। मान्यता है कि उनकी भक्ति से व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा और मानसिक संबल मिलता है।
मां कूष्मांडा का प्रचलित मंत्र है:
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥
ध्यान रहे कि 13 अक्टूबर को उपलब्ध पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि रात्रि 11:27 बजे तक है। इसके बाद चतुर्थी तिथि प्रारंभ होगी। इसलिए चतुर्थी से संबंधित पूजा का समय स्थानीय पंचांग और अपनी परंपरा के अनुसार निर्धारित करना उचित रहेगा।
नवरात्रि में मंत्र जाप और धार्मिक उपाय
नवरात्रि को शक्ति उपासना, साधना और आत्मचिंतन का पर्व माना जाता है। श्रद्धालु इन दिनों अपनी आस्था और पारिवारिक परंपरा के अनुसार मंत्र जाप, दुर्गा पाठ, भजन-कीर्तन और दान-पुण्य करते हैं।
लक्ष्मी प्राप्ति और समृद्धि की कामना
धार्मिक परंपराओं में मां लक्ष्मी की उपासना को समृद्धि, संतोष और आर्थिक कल्याण की कामना से जोड़ा जाता है। नवरात्रि में श्रद्धालु स्वच्छ पूजा स्थल पर दीप प्रज्वलित कर मां दुर्गा और मां लक्ष्मी का स्मरण कर सकते हैं।
आपके उपलब्ध कराए गए धार्मिक विवरण में ‘ॐ श्रीं ॐ’ मंत्र के जाप का उल्लेख है। श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार इसका जाप कर सकते हैं। इसे धार्मिक आस्था का अभ्यास समझना चाहिए; आर्थिक लाभ की निश्चित गारंटी के रूप में नहीं।
माता को भोग अर्पित करने की परंपरा
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तृतीया तिथि: आपके दिए गए विवरण के अनुसार माता को दूध का भोग अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।
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चतुर्थी तिथि: मालपुए का भोग लगाने की परंपरा का उल्लेख है।









