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नफ़रत के सौदागरों,सद्भावना पंजाब से सीखो अशोक गोयल

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Bureau Report

दबदबा ब्यूरों……. आज जबकि देश के किसी न किसी भाग से नफ़रत, हिंसा, दंगा, फ़साद, मॉब लिंचिंग, मस्जिद, नमाज़, अज़ान के विरोध व समुदाय अथवा सम्प्रदाय विशेष को लक्षित कर सरे आम नफ़रती भाषणबाज़ी करने जैसी ख़बरें सुनाई देती हों ऐसे समय में जब देश के किसी भी कोने से साम्प्रदायिक सद्भाव व सामाजिक एकता की कोई ख़बर सुनाई दे तो निश्चित रूप से ऐसा प्रतीत होने लगता है कि सदियों से सांझी तहज़ीब व विरासत के साथ रहना वाले हमारे देश भारत में साम्प्रदायिक ताक़तों की तमाम सक्रियता व कोशिशों के बावजूद यहाँ तक कि सत्ता संरक्षित ऐसे दुष्प्रयासों के बाद भी अभी भी हमारे देश में साम्प्रदायिक एकता व सद्भाव की ठंडी व सुकून बख़्शने वाली हवा चल रही है। और निश्चित रूप से यही सुकून बख़्श सद्भावना पूर्ण ठंडी हवा हमारे देश की अनेकता में एकता जैसी विश्वव्यापी अवधारणा को प्रमाणित करती है। हालाँकि देश के अनेक राज्य अनेकता में एकता के तमाम ऐतिहासिक,आध्यात्मिक व धार्मिक उदाहरण पेश करते हैं परन्तु पंजाब जैसी संतों व पीरों फ़क़ीरों की पावन धरती ने इस विषय में हमेशा से ही अपना अग्रणी किरदार निभाया है। उदाहरण के तौर पर जब पांचवें सिख गुरु, गुरु अर्जन देव जी ने 1588 में स्वर्ण मंदिर की संग ए बुनियाद रखी तो इस पुनीत कार्य के लिये उन्होंने उस समय के सुप्रसिद्ध क़ादिरी सूफ़ी फ़क़ीर मियां मीर बख़्श उर्फ़ मियां मीर को चुना। गुरु अर्जन देव और मियां मीर के बीच गहरी आध्यात्मिक मित्रता थी। उस दौर में मियां मीर को उनकी पवित्रता, भक्ति और मानवता के लिए विश्वव्यापी सम्मान प्राप्त था। गुरु अर्जन देव जी ने सिख धर्म की सर्वधर्म समभाव की मूल भावना को दुनिया को दिखाने के लिये ऐसा किया था। ऐसा कर गुरु अर्जन देव ने यह साबित कर दिया कि सिख धर्म की बुनियाद प्रेम, एकता और भाईचारे पर आधारित है। सिखों के विश्व के सबसे बड़े धार्मिक स्थल की बुनियाद मियां मीर जैसे मुस्लिम सूफ़ी संत से रखवाए जाने पर निःसंदेह पूरे विश्व में यह संदेश गया कि सिख धर्म सभी धर्मों का सम्मान करता है और मानवता को एकजुट करने में विश्वास रखता है। इसी तरह पहले सिख गुरु,गुरु नानक देव् जी का भी अनेक मुस्लिमों फ़क़ीरों से गहरा प्यार था। इनमें मुस्लिम समुदाय से ही सम्बन्ध रखने वाले मर्दाना का नाम ख़ासतौर पर सिख इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखा जाता है। गुरु नानक व मर्दाना के बीच गहरा आध्यात्मिक और मैत्रीपूर्ण संबंध था। मर्दाना की सादगी, भक्ति और गुरु नानक के प्रति निष्ठा ने उन्हें सिख इतिहास में विशेष स्थान दिलाया। मर्दाना गुरु नानक के साथ लगभग 27 वर्षों तक रहे। इसी तरह 1705 में घटी सरहिंद की वह घटना इतिहास में एक मील के पत्थर के समान है जिसमें मलेरकोटला के नवाब शेर मुहम्मद ख़ान ने औरंगज़ेब के शासनकाल के तत्कालीन न्यायाधीश वज़ीर ख़ान के उस आदेश का अदालत में खड़े होकर सार्वजनिक तौर पर विरोध किया था जिसमें गुरुगोविंद सिंह के दो बच्चों 9 वर्षीय साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह और 7 वर्षीय साहिबज़ादा फ़तेह सिंह को दीवार में ज़िंदा चुनवाने का हुक्म दिया गया था। इस क्रूर सज़ा का तत्कालीन नवाब मलेरकोटला शेर मोहम्मद ख़ान ने यह कहते हुये विरोध किया था कि मासूम बच्चों को मारना इस्लाम की शिक्षाओं के विरुद्ध है। उन्होंने तर्क दिया था कि युद्ध के नियमों में महिलाओं और बच्चों को नुक़्सान नहीं पहुंचाया जाता, और यह कृत्य धार्मिक रूप से अनुचित है। यही वजह है कि मलेरकोटला आज भी पंजाब का ऐसा मुस्लिम बहुल क्षेत्र है जहां हिंदू, सिख और मुस्लिम हमेशा शांति से रहते आ रहे हैं। यहाँ तक कि 1947 के भारत-पाक विभाजन के दौरान जब पंजाब के बड़े इलाक़े में भयानक दंगे हुए उस समय भी मलेरकोटला में कोई हिंसा नहीं हुई। यहाँ के सिखों ने मलेरकोटला के मुस्लिमों की न केवल रक्षा की बल्कि उन्हें पाकिस्तान की ओर कुछ भी नहीं करने दिया। क्योंकि वे गुरु गोविंद सिंह के दोनों साहबज़ादों को दीवार में ज़िंदा चुने जाने के नवाब के विरोध को हमेशा याद रखते आ रहे हैं। यहां तक कि 1947 में पड़ोसी क्षेत्रों से भागे मुस्लिमों को भी मलेरकोटला में शरण तक मिली थी। साम्प्रदायिक सद्भावना की मिसाल पेश करने वाली पंजाब की इसी पवित्र धरती से पिछले दिनों एक और ख़ुशगवार ख़बर सुनाई दी। यहाँ के मशहूर शहर पटियाला के निकट एक गांव में 18वीं-19वीं शताब्दी की बताई जा रही एक मस्जिद जोकि देश के विभाजन के बाद से सुनसान पड़ी थी उस वीरान मस्जिद भवन को स्थानीय सिख परिवारों संभाल रखा था। क्योंकि आसपास मुस्लिम आबादी की कमी थी जिससे यहाँ नमाज़ की अदायगी नहीं हो पा रही थी। विगत 21 अक्टूबर को सरपंच हरप्रीत सिंह के नेतृत्व में सिख समुदाय ने औपचारिक रूप से इस मस्जिद को स्थानीय मुस्लिम परिवारों और वक़्फ़ बोर्ड को सौंप दिया। सिखों ने न केवल मस्जिद व उसकी ज़मीन वापस की बल्कि इस जीर्ण अवस्था की मस्जिद के जीर्णोद्धार हेतु 5 लाख रुपये का योगदान भी दिया। इस घटना पर केवल मुस्लिम या सिख ही नहीं बल्कि स्थानीय हिंदू समुदाय द्वारा भी ख़ुशी मनाई गयी और सब ने मिलकर मिठाइयां बांटकर इस अवसर पर सामूहिक रूप से जश्न मनाया। अब यहां मुस्लिम समाज द्वारा रोज़ाना नमाज़ अदा की जा रही है। ऐसी ही ख़बर अमृतसर ज़िले की अजनाला तहसील के रायज़ादा गांव से आई। रावी नदी के तट पर बसे इस गांव में एक मस्जिद 1947 से बंद पड़ी थी। लगभग खंडहर का रूप ले चुकी इस मस्जिद को भी स्थानीय सिख किसानों ने संभाल रखा था परन्तु नमाज़ के लिए इसका भी उपयोग नहीं हो रहा था। गत 21 अक्टूबर को ही यहां के सरपंच सरदार ओमकार सिंह के नेतृत्व में सिख, हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और दलित समुदाय के लोगों ने मिलकर इस मस्जिद को मुस्लिम समुदाय को सौंप दिया। और विगत शुक्रवार को विशेष जुमे की नमाज़ के दौरान पहली बार यहां अज़ान की आवाज़ सुनाई दी। इस में सैकड़ों लोग शामिल हुए। इस मस्जिद के जीर्णोद्धार में 8 लाख रुपये ख़र्च हुए, जिसमें आधे से अधिक रक़म का योगदान सिख भाइयों द्वारा किया गया। अब यहाँ प्रतिदिन पास ही स्थित गुरुद्वारे से गुरबानी की और मस्जिद से अज़ान की आवाज़ें एक साथ गूंजती है, जो सद्भाव की अनोखी तस्वीर पेश करती है। यहाँ भी सभी समुदाय के ग्रामवासियों ने इस अवसर पर जश्न मनाया और मिठाइयां बांटकर उत्सव मनाया। पंजाब व हरियाणा में भी पूर्व में इसी तरह की कई ख़बरें आती रही हैं। ऐसी ख़बरें उन स्वयंभू राष्ट्रवादियों के लिये सबक़ सीखने वाली हैं जिन्हें संस्कारों में नफ़रत हिंसा और विद्वेष में ही हासिल हुआ है। आज टी वी डिबेट में ज़हरीली ख़बरों में, धर्मगुरुओं के बयानों में नेताओं के भाषणों में हर जगह प्रायः नफ़रत ही परोसी जा रही है। नफ़रत के ऐसे सौदागरों को और राष्ट्र विभाजक तत्वों को दरअसल पंजाब से सद्भावना सीखने की ज़रुरत है।

अशोक गोयल आईपीएस (रि.)

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