
रचना: ममता श्रवण अग्रवाल, सतना
दीपक भारतीय संस्कृति का प्रतीक है — उजाले का, ज्ञान का, और आशा का। हर दीप जब जलता है, तो न केवल अंधकार को मिटाता है, बल्कि मानव के भीतर के तमस (अज्ञानता) को भी दूर करने का संदेश देता है। कवयित्री ममता श्रवण अग्रवाल की यह रचना “ऐ दीप मुझे भी ज्योतित कर दे” आत्मशुद्धि, जागरण और मानवता की भावना से ओतप्रोत है।
🔸 अंतस् के अंधकार से मुक्ति की पुकार
कवयित्री प्रारंभ में दीप से विनम्र प्रार्थना करती हैं —
“ऐ दीप मुझे भी दीपित कर दे,
मेरे अन्तस् के कलुष तमस को,
निज आभा से आलोकित कर दे।”
यह पंक्तियाँ केवल एक दीप से नहीं, बल्कि ईश्वर या चेतना से संवाद का भाव रखती हैं। कवयित्री अपने भीतर के अंधकार — क्रोध, अज्ञान और नकारात्मकता को मिटाकर प्रकाश (ज्ञान और सद्भावना) से भर जाना चाहती हैं।
🔸 अज्ञानता और क्रोध की ज्वाला में जलता मन
कविता के दूसरे चरण में कवयित्री कहती हैं —
“अज्ञानता के अंधकार में,
हर क्षण डूबा रहता मन,
और क्रोध की अग्नि में,
जलता रहता यह जीवन।”
यह मानव मन की वास्तविक स्थिति का चित्रण है — जहाँ अज्ञान और क्रोध जीवन को जलाते रहते हैं। कवयित्री दीप से विनती करती हैं कि वह अपनी एक किरण देकर इस अंधकार को मिटा दे, ताकि जीवन में प्रकाश और शांति का संचार हो।
🔸 दीपक से सीखने की प्रेरणा
दीपक स्वयं जीवन का प्रतीक बन जाता है। वह जलकर दूसरों को प्रकाश देता है। कवयित्री कहती हैं —
“तूने ही सिखलाया हमको,
कैसे जीते अंधकार को,
कैसे मन में भरें उजाला,
कैसे समझें हम प्यार को।”
दीपक की यह शिक्षाएँ आत्मबल, सकारात्मकता और प्रेम का संदेश देती हैं। कवयित्री दीपक से प्रार्थना करती हैं कि वह अपनी ऊर्जा देकर उन्हें भी ऊर्जा से भर दे —
“इतनी ऊर्जा देकर हमको,
अब स्व ऊर्जा से उर्जित कर दे।”
🔸 संगठन और एकता की ज्योति
कविता का यह अंश समाज के सामूहिक उजियारे की बात करता है —
“एक एक दीपों ने मिलकर,
मिटा दिया जग का अंधियारा।
घोर अमावश की तिमिर निशा ये,
आज बनी पूनम का उजियारा।”
यह संदेश देता है कि जब हम सब एक साथ एकता और संगठन की भावना से कार्य करते हैं, तो कोई भी अंधकार स्थायी नहीं रह सकता। कवयित्री चाहती हैं कि यह संगठन शक्ति उन्हें भी प्राप्त हो, ताकि वह समाज में उजाला फैला सकें —
“बना संगठन शक्ति तेरी,
यह शक्ति हमें भी वितरित कर दे।”
🔸 मानवता और करुणा का प्रकाश
अंतिम चरण में कवयित्री अपने जीवन का उद्देश्य बताती हैं —
“आज मानवता पीड़ित है,
गूंज रहा क्रंदन ही क्रंदन,
पोंछ सकूं मैं अश्रु किसी के,
ऐसा कर दे मेरा मन।”
यह पंक्तियाँ कवयित्री के हृदय की संवेदनशीलता को दर्शाती हैं। वह चाहती हैं कि उनके भीतर दया की ज्योति प्रज्वलित हो, जिससे वे दूसरों के दुखों को कम कर सकें। यही मानवता का सर्वोच्च प्रकाश है।
🌟 संदेश और सार
यह कविता दीपावली के आलोक पर्व के साथ-साथ जीवन के अंधकार को मिटाने का संदेश देती है। दीपक यहाँ केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि आत्मा का प्रतीक है — जो ज्ञान, करुणा, ऊर्जा और एकता का स्रोत है। कवयित्री की यह प्रार्थना प्रत्येक पाठक के हृदय में यह प्रेरणा जगाती है कि—
“हम भी किसी के जीवन में प्रकाश बनें,
और मानवता की ज्योति जलाते रहें।”








