
नीमच। मध्यप्रदेश के नीमच जिले के मोरवन क्षेत्र में गुरुवार को उस समय तनाव फैल गया, जब स्थानीय ग्रामीणों ने कथित रूप से मोरवन औद्योगिक क्षेत्र में निर्माणाधीन फैक्ट्री पर पथराव कर दिया। ग्रामीणों का आरोप है कि यह फैक्ट्री पास के मोरवन बांध के जल स्रोत को प्रदूषित कर रही है और प्रशासन ने उनकी शिकायतों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की। ग्रामीणों के आक्रोश का आलम यह था कि उन्होंने नारेबाजी करते हुए “बांध बचाओ, फैक्ट्री हटाओ!” का आंदोलन शुरू कर दिया।
सूत्रों के अनुसार, दोपहर करीब 12 बजे सैकड़ों ग्रामीण ट्रैक्टरों और मोटरसाइकिलों पर सवार होकर मोरवन औद्योगिक क्षेत्र पहुंचे और फैक्ट्री के गेट पर प्रदर्शन करने लगे। कुछ देर बाद स्थिति बिगड़ गई और भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया। इससे फैक्ट्री के शीशे टूट गए और अफरा-तफरी मच गई।
पुलिस बल ने संभाली स्थिति, कई ग्रामीण हिरासत में
घटना की जानकारी मिलते ही नीमच एसपी और जावद एसडीएम मौके पर पहुंचे। उन्होंने पुलिस बल की अतिरिक्त टुकड़ियां भेजकर हालात पर काबू पाया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को खदेड़ते हुए कई ग्रामीणों को हिरासत में लिया।
जावद थाना प्रभारी ने बताया कि “स्थिति अब नियंत्रण में है। पथराव करने वालों की पहचान की जा रही है। किसी को कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी।”
हालांकि, ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि प्रशासन केवल फैक्ट्री मालिकों का पक्ष ले रहा है और गांवों की आवाज को अनसुना कर रहा है। उनके अनुसार, यह फैक्ट्री मोरवन बांध से महज एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, और इसका रासायनिक कचरा सीधे जल स्रोत में जा रहा है, जिससे खेतों की सिंचाई पर असर पड़ रहा है।
ग्रामीण बोले – “हमारे खेत और पानी दोनों खतरे में”
ग्रामीणों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों से मोरवन बांध का पानी दूषित हो गया है। गांवों में मवेशियों की बीमारियाँ बढ़ी हैं और पीने के पानी से दुर्गंध आ रही है। स्थानीय किसान नेता कृष्णा पाटीदार ने बताया, “हमने कई बार तहसील और कलेक्टर कार्यालय में आवेदन दिया कि फैक्ट्री का कचरा जांचा जाए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। जब हमारे बच्चों का स्वास्थ्य दांव पर लग गया, तब हम सड़क पर उतरने को मजबूर हुए।”
एक अन्य ग्रामीण गीता बाई ने कहा, “यह सिर्फ एक फैक्ट्री की बात नहीं, हमारे जीवन का सवाल है। अगर बांध दूषित हो गया, तो पूरे इलाके का भविष्य अंधकार में चला जाएगा।”
फैक्ट्री प्रबंधन ने आरोपों से किया इनकार
दूसरी ओर, फैक्ट्री प्रबंधन ने ग्रामीणों के आरोपों को निराधार बताया है। फैक्ट्री के प्रवक्ता ने कहा, “हम पर्यावरणीय मानकों का पालन करते हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति से ही संचालन किया जा रहा है। हमारे यहां से किसी भी प्रकार का हानिकारक पदार्थ जल स्रोत में नहीं छोड़ा जाता।”
उन्होंने यह भी बताया कि फैक्ट्री से निकलने वाले अपशिष्ट जल को ट्रीटमेंट प्लांट के माध्यम से शुद्ध किया जाता है और फिर पुनः उपयोग में लाया जाता है। “कुछ स्थानीय तत्व राजनीतिक लाभ के लिए लोगों को भड़का रहे हैं,” उन्होंने कहा।
प्रशासन ने बनाई जांच समिति
नीमच जिला प्रशासन ने इस घटना के बाद तत्काल तीन सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी है। यह समिति फैक्ट्री परिसर, आसपास के जल स्रोतों और प्रदूषण के संभावित प्रभावों की जांच करेगी। जिला कलेक्टर ने कहा कि “यदि फैक्ट्री पर्यावरण मानकों का उल्लंघन करती पाई गई, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही नुकसान का आकलन कर पीड़ित ग्रामीणों को राहत देने की योजना पर विचार होगा।”
कलेक्टर ने ग्रामीणों से अपील की कि वे कानून व्यवस्था बनाए रखें और किसी भी अफवाह पर ध्यान न दें। उन्होंने कहा कि “सरकार जनता की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है, किसी के साथ अन्याय नहीं होगा।”
इलाके में तनाव बरकरार, पुलिस तैनाती जारी
घटना के बाद से ही मोरवन और आसपास के गांवों में तनाव का माहौल है। पुलिस ने फैक्ट्री परिसर के आसपास बैरिकेडिंग कर दी है और इलाके में भारी बल तैनात किया गया है। ग्रामीणों की अगुवाई कर रहे किसान संगठनों ने घोषणा की है कि जब तक फैक्ट्री बंद नहीं होती, आंदोलन जारी रहेगा।
बताया जा रहा है कि अगले सप्ताह मोरवन, कचनारा और सुकलद गांवों के लोग सामूहिक रूप से जिला मुख्यालय पहुंचकर “बांध बचाओ मार्च” निकालेंगे।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने जताई चिंता
पर्यावरणविदों ने भी इस मामले पर चिंता जताई है। रीवा विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. एन.एस. वर्मा का कहना है, “यदि फैक्ट्री से निकलने वाला अपशिष्ट मोरवन बांध में जा रहा है, तो यह गंभीर पर्यावरणीय संकट बन सकता है। यह केवल स्थानीय जल स्रोतों को नहीं, बल्कि खाद्य श्रृंखला को भी प्रभावित करेगा।” उन्होंने सुझाव दिया कि प्रशासन को तत्काल जल गुणवत्ता परीक्षण कराना चाहिए और दीर्घकालिक समाधान की दिशा में कदम उठाने चाहिए।
ग्रामीणों का संघर्ष और उम्मीद
मोरवन क्षेत्र के ग्रामीण इस आंदोलन को “जीवन रक्षा अभियान” बता रहे हैं। उनका कहना है कि वे कानून के दायरे में रहते हुए अपनी बात सरकार तक पहुँचाना चाहते हैं। फिलहाल, गांवों में शांति तो है, लेकिन गुस्सा अब भी शांत नहीं हुआ है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि “हम अपने बच्चों के भविष्य के लिए लड़ रहे हैं, फैक्ट्री मालिकों के खिलाफ नहीं। बस चाहते हैं कि हमारा बांध और हमारी मिट्टी सुरक्षित रहे।”









