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Gen Z को चाहिए अच्छी सैलरी, लंबी नौकरी नहीं! ‘फ्लेक्सिबल फ्यूचर’ का दौर, रिपोर्ट में खुलासा — काम से ज्यादा महत्व वर्क-लाइफ बैलेंस को

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HQ Report

नई दिल्ली। अगर आप सोचते हैं कि नई पीढ़ी नौकरी को जीवनभर का सहारा मानती है, तो अब यह सोच बदलनी होगी। हाल ही में जारी एक सर्वे रिपोर्ट ने बताया है कि Gen Z यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं के लिए अब लंबी नौकरी या स्थायी जॉब से ज्यादा महत्वपूर्ण है “फ्लेक्सिबल फ्यूचर” — यानी लचीला करियर, बेहतर सैलरी और मानसिक संतुलन वाला जीवन।

यह रिपोर्ट ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म डेलॉइट और लिंक्डइन जॉब ट्रेंड एनालिसिस 2025 के हवाले से सामने आई है, जिसमें भारत समेत 15 देशों के 60,000 से अधिक युवाओं से बात की गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के करीब 72% Gen Z प्रोफेशनल अब लंबी नौकरी के बजाय “सीखते रहो और आगे बढ़ो” मॉडल को प्राथमिकता दे रहे हैं।

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स्थिरता नहीं, अब ‘फ्रीडम’ है प्राथमिकता

रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय Gen Z कर्मचारियों का झुकाव अब “गिग और हाइब्रिड जॉब मॉडल” की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। इसका अर्थ है कि वे एक ही कंपनी में वर्षों तक टिके रहने के बजाय अलग-अलग प्रोजेक्ट्स या अस्थायी जॉब्स में काम करना पसंद करते हैं।
करीब 68% युवा ने कहा कि वे ऐसी नौकरी चाहते हैं जिसमें समय की लचीलापन और काम की आजादी मिले। वहीं 54% युवाओं का मानना है कि यदि उन्हें मानसिक शांति और परिवार के साथ समय बिताने का अवसर न मिले, तो वे उच्च वेतन वाली नौकरी भी छोड़ सकते हैं।

दिल्ली की 24 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल साक्षी जैन का कहना है, “हम सिर्फ सैलरी के लिए नहीं, बल्कि आत्म-संतुष्टि के लिए काम करना चाहते हैं। अगर कंपनी हमारे जीवन को ‘ऑफिस टाइम’ में बांध देती है, तो वहां टिके रहना मुश्किल हो जाता है।”


‘क्वाइट क्विटिंग’ और ‘जॉब हॉपिंग’ बन रहे नए ट्रेंड

रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में “क्वाइट क्विटिंग” और “जॉब हॉपिंग” का चलन तेजी से बढ़ा है। क्वाइट क्विटिंग का मतलब है कि युवा कर्मचारी अपनी निर्धारित जिम्मेदारियों से आगे का काम करने से इंकार कर रहे हैं, यानी ‘ओवरटाइम’ नहीं, ‘माइंडटाइम’ को प्राथमिकता।

वहीं, “जॉब हॉपिंग” यानी बार-बार नौकरी बदलना अब एक सामान्य प्रवृत्ति बन गई है। लगभग 45% Gen Z प्रोफेशनल हर दो साल में अपनी नौकरी बदलते हैं। कारण — वे नई स्किल्स सीखना चाहते हैं और बेहतर भुगतान वाले अवसरों की तलाश में रहते हैं।

कैरियर काउंसलर डॉ. प्रतीक अग्रवाल बताते हैं, “पुरानी पीढ़ी जहां एक ही संस्था में 20-25 साल निकाल देती थी, वहीं नई पीढ़ी चाहती है कि हर तीन साल में कुछ नया सीखा जाए। उनके लिए ‘स्थिरता’ नहीं, ‘विकास’ अहम है।”


कंपनियों के लिए चुनौती — कैसे रोकें टैलेंट को

कंपनियों के लिए यह ट्रेंड बड़ी चुनौती बन गया है। जब युवा कर्मचारी कुछ वर्षों में ही संगठन छोड़ देते हैं, तो इससे टैलेंट रिटेंशन और संगठनिक स्थिरता प्रभावित होती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 61% भारतीय एचआर मैनेजरों ने माना कि Gen Z कर्मचारियों को लंबे समय तक बनाए रखना कठिन हो गया है।

इस स्थिति से निपटने के लिए कंपनियाँ अब “फ्लेक्सिबल पॉलिसी” अपना रही हैं — जैसे वर्क फ्रॉम होम, हाइब्रिड वर्किंग, चार डे वीक, मेंटल हेल्थ ब्रेक्स और स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम
आईटी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी इंफोसिस के एक अधिकारी ने बताया, “हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि नई पीढ़ी सिर्फ नौकरी नहीं, जीवनशैली चाहती है। इसलिए अब कंपनियाँ वेतन से ज्यादा ‘अनुभव’ बेच रही हैं।”


पैसे की अहमियत अब भी कायम

हालांकि लचीलापन और वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करने वाली यह पीढ़ी वेतन को लेकर भी व्यावहारिक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 73% Gen Z युवाओं ने बेहतर सैलरी को अपनी नौकरी बदलने का प्राथमिक कारण बताया।
यानी वे संतुलन चाहते हैं, लेकिन आर्थिक सुरक्षा के बिना नहीं। उनके लिए “अच्छी लाइफ” का अर्थ है — अच्छी इनकम, फ्री टाइम और स्किल ग्रोथ

मुंबई की एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहे अर्णव तिवारी कहते हैं, “हम सैलरी के लिए काम करते हैं, पर गुलामी के लिए नहीं। अब ‘9 से 9 ऑफिस कल्चर’ पुराना हो गया है।”


रिमोट वर्क और डिजिटल स्किल्स का बढ़ा महत्व

महामारी के बाद डिजिटल स्किल्स और रिमोट वर्क की मांग तेजी से बढ़ी है। रिपोर्ट में पाया गया कि भारत में Gen Z कर्मचारियों में से 84% लोग ऐसी नौकरियों को तरजीह देते हैं, जो उन्हें कहीं से भी काम करने की स्वतंत्रता दें।

इस ट्रेंड ने फ्रीलांसिंग, कंटेंट क्रिएशन, डिजिटल मार्केटिंग और ऐप डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों को नया उछाल दिया है।
लिंक्डइन की रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो वर्षों में “फ्रीलांस जॉब्स” की खोज में 37% वृद्धि हुई है।


वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर बदलता नजरिया

विशेषज्ञों का कहना है कि Gen Z का यह दृष्टिकोण किसी विद्रोह का नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता का प्रतीक है। यह पीढ़ी अब “जियो काम करने के लिए” नहीं, बल्कि “काम करो जीने के लिए” के सिद्धांत पर चल रही है।

कॉर्पोरेट साइकोलॉजिस्ट डॉ. नेहा शर्मा कहती हैं — “पहले तनाव को नौकरी का हिस्सा माना जाता था, अब Gen Z कहती है कि तनाव नौकरी का विकल्प नहीं हो सकता। वे मानसिक शांति को सफलता का हिस्सा मानते हैं।”

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