
नई दिल्ली। भारत में कंप्यूटर विज्ञान शिक्षा की नींव रखने वाले प्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद् प्रोफेसर राजारमन का निधन हो गया। वे 89 वर्ष के थे। देशभर के तकनीकी जगत, शिक्षाविदों और उनके पूर्व छात्रों में शोक की लहर है। उन्हें भारत में कंप्यूटर शिक्षा का ‘पितामह’ (Father of Computer Science Education in India) कहा जाता था।
भारत में कंप्यूटर शिक्षा के संस्थापक
प्रो. राजारमन उन चुनिंदा वैज्ञानिकों में शामिल थे जिन्होंने भारत में कंप्यूटर विज्ञान को एक विषय के रूप में पहचान दिलाई।
1960 के दशक में जब देश में कंप्यूटर शब्द भी नया था, तब उन्होंने आईआईटी कानपुर में भारत का पहला कंप्यूटर साइंस कोर्स शुरू किया। उन्होंने न केवल पाठ्यक्रम बनाया, बल्कि छात्रों को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की व्यवहारिक समझ देने के लिए प्रयोगात्मक प्रयोगशालाएं भी शुरू कीं।
उनके प्रयासों से 1970 के दशक में भारत के विश्वविद्यालयों में कंप्यूटर शिक्षा की औपचारिक शुरुआत हुई।
आईआईटी कानपुर से जुड़ी उनकी विरासत
प्रोफेसर राजारमन का अधिकांश कार्यकाल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर में बीता, जहाँ वे कंप्यूटर साइंस विभाग के संस्थापक प्रमुख रहे।
उन्होंने सैकड़ों छात्रों को प्रशिक्षित किया, जिनमें कई बाद में भारत के आईटी क्षेत्र की बड़ी हस्तियां बनीं।
इन्फोसिस के संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति, विप्रो के टेक्नोलॉजी प्रमुख, और कई अन्य प्रसिद्ध वैज्ञानिक व उद्योगपति उनके शिष्य रहे हैं।
नारायण मूर्ति ने उन्हें याद करते हुए कहा —
“प्रो. राजारमन ने हमें केवल प्रोग्रामिंग नहीं सिखाई, बल्कि सोचने का तरीका सिखाया। उन्होंने भारत में कंप्यूटर शिक्षा को आकार दिया और हम सब उनके ऋणी हैं।”
पहली कंप्यूटर टेक्स्टबुक के लेखक
भारत में कंप्यूटर साइंस के छात्रों के लिए सबसे पहली किताब “फंडामेंटल्स ऑफ कंप्यूटर्स” (Fundamentals of Computers) प्रो. राजारमन ने लिखी थी।
यह किताब 1970 के दशक में प्रकाशित हुई और आने वाले तीन दशकों तक यह भारत के लगभग हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में कंप्यूटर विज्ञान की “बाइबल” मानी गई।
उन्होंने लगभग 10 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें “एनालिसिस एंड डिजाइन ऑफ एल्गोरिदम्स”, “पैरेलल कंप्यूटिंग” और “द आर्ट ऑफ प्रोग्रामिंग” जैसी पुस्तकें आज भी संदर्भ ग्रंथ के रूप में उपयोग की जाती हैं।
देश में कंप्यूटर क्रांति के सूत्रधार
प्रो. राजारमन ने उस दौर में कंप्यूटर को आम आदमी के उपयोग का माध्यम बनाने की दिशा में काम किया, जब कंप्यूटर केवल सरकारी प्रयोगशालाओं तक सीमित थे।
वे विज्ञान और शिक्षा के लोकतंत्रीकरण में विश्वास रखते थे।
उनके नेतृत्व में 1980 के दशक में आईआईटी कानपुर ने भारत के पहले माइक्रोप्रोसेसर आधारित शिक्षण कंप्यूटर किट विकसित की थी, जिसने बाद में स्कूली स्तर पर कंप्यूटर शिक्षा की नींव रखी।
उनके छात्र और सहयोगी बताते हैं कि उन्होंने भारत में कंप्यूटर साइंस को इंजीनियरिंग से जोड़कर एक स्वतंत्र शैक्षणिक अनुशासन के रूप में स्थापित किया।
राष्ट्रीय स्तर पर योगदान
प्रो. राजारमन कई राष्ट्रीय समितियों के सदस्य रहे। उन्होंने यूजीसी (UGC), एआईसीटीई (AICTE) और डीएसटी (DST) जैसी संस्थाओं के माध्यम से कंप्यूटर शिक्षा के मानक तय किए।
उन्होंने देश के कई विश्वविद्यालयों में कंप्यूटर विभाग स्थापित करने में परामर्श दिया।
भारत सरकार ने शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण (1998) और शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (1969) से सम्मानित किया था।
सादगी और समर्पण की मिसाल
सहयोगियों के अनुसार, प्रो. राजारमन हमेशा विनम्र और सादगीप्रिय रहे। वे कहते थे —
“शिक्षा का असली उद्देश्य केवल नौकरी देना नहीं, बल्कि सोचने और सृजन करने की क्षमता जगाना है।”
उनका जीवन छात्रों के लिए एक उदाहरण था। वे हर कक्षा में समय पर पहुंचते थे और जटिल सिद्धांतों को सरल उदाहरणों से समझाते थे।
अंतरराष्ट्रीय पहचान
प्रो. राजारमन के शोध कार्यों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली। उन्होंने अमेरिका के एमआईटी (MIT) और ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अतिथि प्रोफेसर के रूप में काम किया।
उनके शोध पत्र IEEE Transactions on Computers जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।
उन्होंने भारत में कंप्यूटर नेटवर्किंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के क्षेत्र में शुरुआती अनुसंधान को प्रोत्साहित किया।
उनकी प्रेरणा और प्रभाव
प्रो. राजारमन का प्रभाव केवल तकनीकी जगत तक सीमित नहीं था। उनके कई छात्रों ने आगे चलकर आईआईटी, आईआईएम और प्रमुख शोध संस्थानों में अध्यापन और प्रशासनिक पदों पर कार्य किया।
उनकी सोच थी कि “भारत को आत्मनिर्भर बनना है तो तकनीक को समझने और सिखाने के अपने मॉडल विकसित करने होंगे।”
देशभर में श्रद्धांजलि
उनके निधन की खबर फैलते ही आईआईटी कानपुर, आईआईटी दिल्ली, और आईआईटी मद्रास समेत सभी प्रमुख संस्थानों में शोकसभा आयोजित की गई।
आईआईटी कानपुर के निदेशक ने कहा —
“प्रो. राजारमन ने जो विरासत छोड़ी है, वह सदियों तक भारतीय तकनीकी शिक्षा को दिशा देती रहेगी।”
प्रधानमंत्री ने भी सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि देते हुए लिखा —
“प्रो. राजारमन ने भारत को डिजिटल भविष्य की दिशा दी। उनका योगदान अमिट रहेगा।”









