
नई दिल्ली | जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में छात्रसंघ चुनाव के परिणामों ने एक बार फिर से छात्रों की राजनीति में नया समीकरण पेश कर दिया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने इस बार जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 15 में से 8 काउंसलर पदों पर जीत दर्ज की है, जबकि कुछ पदों पर वोटों की गिनती अब भी जारी है। शुरुआती रुझान बताते हैं कि इस बार जेएनयू की राजनीति में वामपंथी संगठनों की पकड़ कमजोर होती दिख रही है, वहीं एबीवीपी ने कैंपस में अपनी मजबूत मौजूदगी का संकेत दे दिया है।
गिनती के शुरुआती रुझानों में ABVP आगे
शुक्रवार देर रात शुरू हुई वोटों की गिनती शनिवार सुबह तक जारी रही। जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, एबीवीपी समर्थकों के चेहरों पर उत्साह साफ झलकने लगा। विश्वविद्यालय के कुल 15 काउंसलर पदों में से अब तक आए नतीजों के अनुसार, एबीवीपी ने 8 सीटों पर जीत दर्ज कर ली है, जबकि 4 सीटें वाम गठबंधन (लेफ्ट यूनिटी) के खाते में गई हैं। तीन सीटों पर मतगणना जारी है, जिनमें से दो पर एबीवीपी को बढ़त बताई जा रही है।
वोटों की गिनती विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन में सख्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच की जा रही है। मतगणना स्थल के बाहर छात्र संगठन अपने झंडे-बैनर लेकर जुटे हुए हैं और जीत के नारे लगा रहे हैं।
जेएनयू में ABVP का बढ़ता प्रभाव
पिछले कुछ वर्षों में जेएनयू को वामपंथी राजनीति का गढ़ माना जाता रहा है। लेफ्ट यूनिटी में शामिल AISA, SFI, AISF और DSF ने लंबे समय तक विश्वविद्यालय में अपना दबदबा बनाए रखा था। लेकिन इस बार एबीवीपी ने न केवल उन्हें कड़ी टक्कर दी है बल्कि कई पारंपरिक वामपंथी सीटों पर सेंध भी लगाई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ABVP का यह प्रदर्शन ‘राष्ट्रीय मुद्दों और छात्र कल्याण योजनाओं’ पर आधारित कैंपेन का परिणाम है। संगठन ने इस बार ‘सुरक्षित कैंपस’, ‘अकादमिक पारदर्शिता’, ‘छात्रवृत्ति में वृद्धि’ और ‘महिला सुरक्षा’ जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया था।
लेफ्ट यूनिटी को झटका
लेफ्ट यूनिटी (AISA, SFI, AISF और DSF) इस चुनाव में एकजुट होकर मैदान में उतरी थी, लेकिन मतदाताओं का रुझान इस बार उनके खिलाफ दिखाई दिया। शुरुआती रुझानों में उन्होंने कई सीटों पर बढ़त बनाई थी, मगर अंतिम चरणों में एबीवीपी ने बढ़त हासिल कर ली।
एक वामपंथी उम्मीदवार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हमने छात्रों के अकादमिक अधिकारों और लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा के मुद्दे उठाए, लेकिन लगता है कि कैंपेनिंग के स्तर पर एबीवीपी हमसे आगे रही।”
चुनाव प्रचार में नए मुद्दों का प्रभाव
इस बार जेएनयू चुनाव में पारंपरिक वैचारिक बहसों के साथ-साथ व्यावहारिक मुद्दे भी केंद्र में रहे। छात्रावासों की स्थिति, भोजन की कीमतें, ऑनलाइन क्लासों की सुविधा, लैंगिक समानता और प्लेसमेंट जैसी बातें एबीवीपी और अन्य संगठनों के प्रचार का प्रमुख हिस्सा बनीं।
एबीवीपी के कैंपेन मटेरियल में “शिक्षा और राष्ट्र निर्माण” का नारा सबसे प्रभावी साबित हुआ। संगठन ने डिजिटल मीडिया और सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म्स का भी प्रभावी इस्तेमाल किया, जिससे नए छात्रों तक उसका संदेश तेजी से पहुंचा।
उत्साह और जश्न का माहौल
एबीवीपी के कार्यकर्ता परिणामों के बीच ही कैंपस में ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न मनाने लगे। विश्वविद्यालय के गेट नंबर 4 के बाहर बड़ी संख्या में छात्र जुटे, जिन्होंने “ABVP जिंदाबाद” और “विकास की जीत हुई” जैसे नारे लगाए। वहीं, वामपंथी संगठनों के सदस्य अभी भी अंतिम परिणामों की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
जेएनयू परिसर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि किसी प्रकार की झड़प या अव्यवस्था न हो। प्रशासन ने पुलिस बल को भी सतर्क रहने का निर्देश दिया है।
पिछले चुनावों से तुलना
2019 और 2022 में हुए छात्रसंघ चुनावों में वामपंथी गुटों ने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और महासचिव जैसे प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की थी। लेकिन 2025 के इस चुनाव में एबीवीपी का प्रदर्शन यह संकेत दे रहा है कि छात्र राजनीति का संतुलन धीरे-धीरे बदल रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव जेएनयू में वैचारिक विविधता के विस्तार का प्रतीक है, जहां अब राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को भी छात्र राजनीति में महत्व मिल रहा है।
उम्मीदवारों की प्रतिक्रियाएँ
एबीवीपी की ओर से विजयी काउंसलर उम्मीदवार ने कहा,
> “यह जीत सिर्फ एबीवीपी की नहीं, बल्कि हर उस छात्र की है जो जेएनयू को शैक्षणिक उत्कृष्टता और राष्ट्रीय जिम्मेदारी के केंद्र के रूप में देखता है। हमने वादे नहीं, काम करने की नीयत लेकर चुनाव लड़ा था।”
वहीं लेफ्ट यूनिटी की उम्मीदवार ने कहा,
> “नतीजे चाहे जो हों, हम जेएनयू की लोकतांत्रिक परंपरा को बनाए रखेंगे और छात्रों के अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगे।”
कैंपस में शांति की अपील
विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों से संयम बनाए रखने की अपील की है। रजिस्ट्रार कार्यालय से जारी बयान में कहा गया, “चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। सभी छात्र संगठनों से अपेक्षा की जाती है कि वे परिणामों का सम्मान करें और विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों को सामान्य रूप से चलने दें।”
राजनीतिक संकेत और भविष्य की राह
जेएनयू में एबीवीपी की यह जीत छात्र राजनीति के राष्ट्रीय परिदृश्य में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। माना जा रहा है कि इसका असर अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों — जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय (DU), हैदराबाद यूनिवर्सिटी और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी — के छात्र चुनावों पर भी पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. राकेश मिश्रा का कहना है,
> “जेएनयू लंबे समय से वामपंथी विचारधारा का केंद्र रहा है। मगर इस बार का परिणाम स्पष्ट संकेत है कि छात्रों की नई पीढ़ी अब वैचारिक से ज्यादा व्यवहारिक मुद्दों पर ध्यान दे रही है।”








