
— तीन महीनों में 11 गांवों में रुककर दिखाई नई दिशा
देश के संवैधानिक पदों को अक्सर औपचारिकता और प्रोटोकॉल से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत इस छवि को तोड़ते हुए ग्राम जीवन में उतरकर विकास का एक नया मॉडल प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछले तीन महीनों में वे राज्य के 11 गांवों में रुक चुके हैं। वे न केवल ग्रामीणों से संवाद करते हैं, बल्कि गांव की गलियों में झाड़ू लगाते हैं, गाय का दूध दुहते हैं, खेतों में हल चलाते हैं, गोबर-गौमूत्र से बनी जैविक खाद तैयार करते हैं और किसानों को प्राकृतिक खेती की बारीकियां समझाते हैं।
उनका यह प्रयास न केवल गांवों में उत्साह भर रहा है, बल्कि ग्रामीण विकास, स्वच्छता, कौशल, महिला सशक्तिकरण और प्राकृतिक खेती के नए मॉडल के रूप में उभर रहा है। राज्यपाल का यह ‘ग्राम-जीवन संपर्क अभियान’ देश में संवैधानिक पद की भूमिका की भी नई व्याख्या प्रस्तुत कर रहा है।
पहला दिन: राज्यपाल ने गांव की सुबह को महसूस किया—सफाई से लेकर गौशाला तक सहभागिता
गुजरात के गांवों में राज्यपाल का पहला दिन आमतौर पर एक सक्रिय सुबह से शुरू होता है। सुबह 5 बजे जागने के बाद वे गांव की गलियों में स्वयं सफाई अभियान का हिस्सा बनते हैं। जिस गांव में वे रुकते हैं, वहां सुबह-सुबह बड़ी संख्या में ग्रामीण उनके साथ झाड़ू लेकर निकलते हैं। यह केवल प्रतीकात्मक सफाई नहीं होती, बल्कि राज्यपाल इसे जनभागीदारी का एक अहम माध्यम मानते हैं।
इसके बाद वे गांव की गौशाला पहुंचते हैं, जहां वे ग्रामीणों से संवाद करते हैं। कई बार वे खुद गायों का दूध भी दुहते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि “राज्यपाल को अपने सामने इस तरह से जुड़ा हुआ देखना, लोगों को आत्मविश्वास देता है कि हमारा नेता हमें समझता है।”
गांव के स्कूली बच्चों के बीच वे पौधारोपण, स्वास्थ्य जागरुकता और शिक्षा पर संवाद करते हैं। कई गांवों में उनके प्रयास से ‘स्वच्छ परिसर अभियान’ और ‘नर्सरी निर्माण’ शुरू हुआ है।
दूसरा दिन: खेतों में हल, जैविक खाद और प्राकृतिक खेती की कक्षाएं
राज्यपाल आचार्य देवव्रत प्राकृतिक खेती के प्रबल समर्थक हैं। हिमाचल में अपनी पूर्व सेवाकाल से ही उन्होंने गौ-आधारित खेती की पहल की, जिसका असर गुजरात में भी स्पष्ट दिखाई देता है।
ग्राम प्रवास के दूसरे दिन वे बरसों से अपनाए जा रहे रासायनिक खेती मॉडल के विकल्प के रूप में प्राकृतिक खेती की विस्तृत जानकारी किसानों को देते हैं। वे बताते हैं कि—
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एक गाय से साल भर में 30 एकड़ तक भूमि की उर्वरता बनाए रखी जा सकती है।
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जिवामृत, घनजिवामृत, बीजामृत जैसे जैविक घोल मिट्टी को जीवंत बनाते हैं।
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प्राकृतिक खेती में लागत घटती है और उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ती है।
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फसलों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अधिक रहती है।
कई गांवों में वे खुद खेतों में उतरकर हल चलाने का काम भी करते हैं। खेतों में उनका यह व्यवहार ग्रामीणों को प्रेरित करने वाला होता है। किसान बताते हैं कि “जब राज्यपाल जैसा व्यक्ति हमारे साथ खेत में खड़ा होता है, तो हमें लगता है कि खेती सचमुच गरिमा का काम है।”
गांव की नब्ज सुधारने के तरीके: महिलाओं और युवाओं पर विशेष फोकस
राज्यपाल का यह प्रवास केवल खेती तक सीमित नहीं है। वे ग्रामीण जीवन के हर पहलू पर काम करते हैं, विशेषकर—
महिलाओं के लिए:
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सैनिटरी हाइजीन पर विस्तृत बातचीत
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बालिकाओं की पढ़ाई और सुरक्षा
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महिला स्वयं सहायता समूहों के उत्पादों को बाज़ार से जोड़ने की सलाह
कई गांवों में वे महिलाओं के साथ बैठकर हस्तशिल्प, गृह उद्योग और पोषण पर चर्चाएं करते हैं।
युवाओं के लिए:
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करियर मार्गदर्शन सत्र
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डिजिटल स्किल्स और कृषि आधारित तकनीक की जानकारी
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नशा मुक्ति अभियान
उनकी कोशिश रहती है कि ग्रामीण युवा, गांव में ही रोजगार के विकल्प तलाशें और पलायन कम हो।
गांवों की वास्तविक समस्याओं को समझना और तुरंत कार्रवाई
राज्यपाल के प्रवास का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि वे गांव की समस्याओं को प्रत्यक्ष रूप से देखते हैं। वे गांव की गलियों, स्कूलों, आंगनवाड़ियों, स्वास्थ्य केंद्रों, पानी सप्लाई पाइपलाइन, सड़क, शौचालय और बिजली स्थितियों को व्यक्तिगत रूप से निरीक्षण करते हैं।
जिन समस्याओं को तत्काल हल किया जा सकता है, उनके लिए मौके पर ही अधिकारियों को दिशा-निर्देश देते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि “राज्यपाल साहब यहां आते हैं तो कार्रवाई उसी समय शुरू हो जाती है। यह हमें भरोसा दिलाता है कि हमारी बात सुनी जा रही है।”
गांव क्यों चुनते हैं राज्यपाल? स्वयं बताते हैं—“जितना सीखता हूं, उतना धरातल समझ में आता है”
राज्यपाल का कहना है—
“यदि हम गांवों में नहीं जाएंगे, तो हमें वास्तविक भारत समझ ही नहीं आएगा। गांव ही देश की आत्मा है। मैं जब गांव में रुकता हूं, लोगों के बीच बैठता हूं, उनके घरों में जाता हूं, खेतों में काम करता हूं, तो न केवल उनकी समस्याएँ समझता हूं बल्कि उनसे सीख भी लेता हूं। यह मेरे लिए एक सेवा और सीखने का अवसर है।”
उनका खेती-केंद्रित जीवन और गुरुकुल पृष्ठभूमि उन्हें प्राकृतिक जीवनशैली से जोड़ती है। वे मानते हैं कि “भारत का विकास गांवों से ही निकलेगा, शहरों से नहीं।”
संवैधानिक पद पर होते हुए इस तरह का कदम क्यों महत्वपूर्ण?
भारत में राज्यपाल की भूमिका को अक्सर केवल प्रोटोकॉल, अभिभाषण और औपचारिक बैठकों तक देखा जाता है। लेकिन गुजरात के राज्यपाल ने इसे जमीन से जोड़ा है। इससे यह संदेश गया कि—
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राज्यपाल भी सामाजिक परिवर्तन का बड़ा माध्यम बन सकते हैं
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उच्च संवैधानिक पद से प्रेरक नेतृत्व और जनभागीदारी को बल मिलता है
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ग्रामीण विकास की दिशा में राज्य मशीनरी संवेदनशील होती है
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सुशासन की नई मिसाल कायम होती है
राज्यपाल के गांव प्रवास के बाद कई जिलों में सफाई अभियान, कचरा प्रबंधन और प्राकृतिक खेती को लेकर नई योजनाएँ बनी हैं।
गांवों की प्रतिक्रिया: “राज्यपाल हमारे बीच में रहते हैं, इसलिए हम उन्हें अपना मानते हैं”
गांवों के बुजुर्ग बताते हैं—
“हमने पहले कभी ऐसा नहीं देखा कि कोई इतना बड़ा पद लेकर हमारे बीच बैठा हो। वे हमारे खेत में मिट्टी पकड़ते हैं, हमारे बच्चों को पढ़ाते हैं, हमारी बहनों से बात करते हैं… इससे हमें लगता है कि हम महत्वपूर्ण हैं।”
युवाओं का कहना है—
“उनकी बातों से प्रेरणा मिलती है। हमें लगता है कि हम भी कुछ कर सकते हैं, गांव में ही रहकर।”
महिलाएँ कहती हैं—
“राज्यपाल ने हमारी समस्याएँ सुनीं, बेटियों की शिक्षा पर बात की। यह हमारे लिए गर्व की बात है।”
प्राकृतिक खेती और गांव मॉडल क्यों बना राष्ट्रीय चर्चा का विषय?
राज्यपाल के लगातार प्रयासों से—
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युवाओं में खेती के प्रति आकर्षण बढ़ा
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रासायनिक खादों का उपयोग कुछ गांवों में 40% तक घटा
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देसी नस्ल की गायों की मांग बढ़ी
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स्कूलों में ‘प्राकृतिक खेती क्लब’ की शुरुआत हुई
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स्वच्छता मिशन में गांवों की सक्रियता बढ़ी
कई विशेषज्ञ इसे “गुजरात का ग्राम विकास प्रयोग” बता रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यह मॉडल पूरे देश में लागू किया जा सके तो प्राकृतिक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़ा फायदा होगा।
राज्यपाल की दिनचर्या: साधारण लेकिन प्रेरक
राज्यपाल का ग्राम प्रवास प्रोटोकॉल से मुक्त होता है। वे नर्मी, सादगी और अनुशासन के साथ पूरा दिन गांवों में बिताते हैं।
सुबह 5:00 बजे—गांव में सफाई अभियान
सुबह 6:30 बजे—गौशाला का भ्रमण, दूध दुहना, पशुपालकों से बातचीत
सुबह 8:00 बजे—नाश्ता और ग्राम सभा
सुबह 10:00 बजे—स्कूल और आंगनवाड़ी निरीक्षण
दोपहर 12:30 बजे—किसानों से संवाद, खेतों में हल चलाना
दोपहर 3:00 बजे—महिला समूहों से बैठक
शाम 5:00 बजे—स्वच्छता और जल संरक्षण चर्चा
शाम 7:00 बजे—गांव में चौपाल और सीधे सवाल-जवाब
उनकी चौपालें अब कई गांवों की परंपरा बन चुकी हैं।
भारत के ग्रामीण विकास मॉडल के लिए क्या है यह संकेत?
राज्यपाल के मॉडल से यह संदेश मिलता है कि—
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विकास का असली मॉडल जनभागीदारी आधारित होना चाहिए
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सरकारी योजनाएँ तभी सफल होंगी जब अधिकारी और नेता गांव में उतरेंगे
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प्राकृतिक खेती भारत को खाद आयात निर्भरता से मुक्त कर सकती है
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रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता की समस्याएं सिर्फ बैठकों से नहीं, ज़मीन पर जाकर ही समझी जा सकती हैं
विशेषज्ञों की राय है कि यह ‘ग्राम-प्रवासी प्रशासन’ की नई परिभाषा है, जो आने वाले समय में देशभर में अपनाई जा सकती है।
गांव को समझने और जोड़ने की यह पहल बन सकती है भारत का भविष्य मॉडल
राज्यपाल आचार्य देवव्रत का ग्राम-केंद्रित मॉडल न केवल गुजरात बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणादायक है। जिस तरह वे गांवों में सरलता से उतरकर सफाई, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, कृषि और स्थानीय समस्याओं पर काम कर रहे हैं, वह ग्रामीण विकास के असली अर्थ को सामने लाता है।
उनकी शैली बताती है कि संवैधानिक पद केवल औपचारिकता का नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम भी हो सकता है।
गांवों में उनकी उपस्थिति यह संदेश देती है कि “भारत गांवों में बसता है, और भारत का विकास गांवों से ही निकलता है।”
श्री एम एल गोयल
- सी-201 सन वैली सिटी सेंटर एरिया ग्वालियर (म.प्र.)








