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लौह पुरुष की लौ अमर—एकता के पथ पर भारत की पदयात्रा

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सालों का इतिहास जब राष्ट्र के समक्ष खुलता है, तब महान व्यक्तित्वों के नाम स्वर्णाक्षरों में उभरते हैं। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वाधीन राष्ट्र के निर्माण तक जिस पुरुष ने दूरदृष्टि, दृढ़ निश्चय और प्रशासकीय कौशल का अनुपम परिचय दिया, वह नाम है सरदार वल्लभभाई पटेल। वे केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, वे राष्ट्र-निर्माता थे, शिल्पकार थे, और भारत के भू-राजनैतिक स्वरूप को एकसूत्रता में बाँधने वाले अद्वितीय व्यक्तित्व। बिखरी रियासतों को एक प्रखर ऐतिहासिक-चेतना के साथ राष्ट्र रूप में स्थापित करना जिस कठिनतम कार्य के रूप में इतिहास दर्ज करता है, उसे पटेल ने अपनी लौह इच्छाशक्ति और कठोर निर्णय क्षमता से संभव किया। देश उनकी जयंती को केवल एक स्मरण दिवस के रूप में नहीं मनाता, बल्कि यह वह क्षण होता है जब भारत अपनी राष्ट्रीय चेतना को पुनर्जीवित करता है, और यह घोषित करता है कि अखंडता, एकता और देशनिष्ठा हमारी आत्मा है, हमारा स्वभाव है, हमारी अनन्त शपथ है।

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इसी भाव के साथ सरदार पटेल की जयंती वर्ष के अंतर्गत नागपुर, महाराष्ट्र से प्रारंभ हुई ‘‘यूनिटी मार्च’’ आज इंदौर पहुंची, और इसके साथ एक बार फिर राष्ट्रीय एकता की मशाल उज्ज्वल हुई। लौह पुरुष के प्रति श्रद्धा ही नहीं, यह यात्रा उनके विचारों का सार्वजनिक प्रसारण है। यह केवल क़दमों की गति नहीं, यह भारत की आत्मगति है। यह पैदल चलती आकांक्षा नहीं, भारत की धमनियों में बहता राष्ट्रधर्म है। इंदौर में इस यात्रा के आगमन पर जनता ने उत्साहपूर्वक स्वागत किया, जनप्रतिनिधियों ने विचार साझा किए और यह उद्घोष फिर एक बार उभरा कि भारत किसी भी परिस्थिति में खंडित होने वाली सभ्यता नहीं, बल्कि एकता के सूत्र में पिरोया हुआ जीवंत राष्ट्र है।

सरदार पटेल का जीवन इस सत्य का प्रतीक है कि नेतृत्व केवल पद नहीं होता, नेतृत्व वह शक्ति है जिससे राष्ट्र दिशा प्राप्त करता है। उन्होंने भारत की 562 रियासतों का विलय शांतिपूर्ण ढंग से संभव किया। वे जानते थे कि विविधता भारत की सुंदरता है, लेकिन विसंगति उसकी कमजोरी बन सकती है। इसलिए पटेल ने वैचारिक संवाद, कूटनीतिक सख़्ती, विश्वास निर्माण तथा दृढ़ प्रशासनिक रुख—इन सभी का संतुलित प्रयोग किया और भारत के राजनीतिक भूगोल को वह रूप दिया जिसे आज हम मानचित्र के रूप में देखते हैं। हर प्रांत, हर रियासत, हर समुदाय को समान राष्ट्र भावना में संगठित करना केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं, यह आंतरिक सांस्कृतिक पुनरुत्थान था। पटेल कहते थे कि राष्ट्र किसी एक व्यक्ति का नहीं, करोड़ों नागरिकों की सामूहिक संकल्प-शक्ति का नाम है। उनके जीवन का कार्य यही सिद्ध करता है।

नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्भव स्थल होने के कारण यह केवल यात्रा का प्रारंभ-बिंदु नहीं, यह विचार-उत्पत्ति का केंद्र भी है। यहां से प्रस्थान करने वाला ‘‘यूनिटी मार्च’’ देशभक्ति का अद्वितीय संचार बन कर उभरा है। विनम्र वेशभूषा में, देशध्वनि को मन में संजोए, अनुशासनबद्ध पंक्तियों में आगे बढ़ता यह काफिला जहां-जहां पहुंचता है, वहां राष्ट्रभावनाओं की नई तरंगें उठती हैं। नागपुर से शुरू हुआ यह प्रवाह इंदौर तक पहुंचते-पहुंचते हजारों दिलों को छू चुका है। मार्ग में गांव-नगरों में लोग तिरंगे हाथ में लिए स्वागत करते दिखे। भारत मां के जयकारों ने हवा में श्रद्धा का भार बढ़ा दिया। और जब यह यात्रा इंदौर पहुंची, तो इस शहर ने अपने हृदय-द्वार खोलकर उसका अभिनंदन किया।

कार्यक्रम मंच पर विचार-विमर्श हुआ, वक्ताओं ने पटेल के जीवन के विविध प्रसंगों पर प्रकाश डाला। उनके करुणामय व्यक्तित्व के साथ-साथ उनके लौह धैर्य का वर्णन किया गया। बताया गया कि किस प्रकार जूनागढ़ जैसे निर्णायक मामले में उन्होंने दृढ़ता दिखाई, किस प्रकार हैदराबाद के विलय ने देश के भविष्य को सुरक्षित किया, और किस प्रकार कश्मीर पर उनके सुझाव आने वाले वर्षों के लिए समझदारीपूर्ण साबित होते। यह भी स्पष्ट हुआ कि यदि पटेल जैसा नेतृत्व स्वतंत्र भारत को कुछ और वर्षों तक मिलता, तो कई चुनौतियाँ बहुत पहले संतुलित हो जातीं। पर इतिहास घटनाओं का क्रम नहीं बदलता, वह केवल भविष्य को चेतना का दीप देता है। आज वही दीप ‘‘यूनिटी मार्च’’ रूप में प्रज्वलित है।

यह यात्रा केवल अतीत की स्मृति नहीं, यह भविष्य की उद्घोषणा है। भारत 75 वर्षों बाद जिस विकास-पथ पर अग्रसर है, उसमें राष्ट्रीय एकता का मूल्य और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अनुसंधान, डिजिटल अर्थव्यवस्था, रक्षा उत्पादन, वैश्विक कूटनीति—इन सब में भारत विश्व पटल पर स्थापित हो रहा है, किंतु यदि आंतरिक सौहार्द शिथिल हो जाए, तो प्रगति की नींव कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए लौह पुरुष का स्मरण हमें केवल इतिहास पाठ नहीं देता, वह यह प्रेरणा देता है कि अखंड भारत एक विचार नहीं, राष्ट्रीय कर्तव्य है।

आज जब समाज में विविध विचारधाराएँ, राजनीतिक मतभेद, सांस्कृतिक भिन्नताएँ स्वाभाविक रूप से मौजूद हैं, तब पटेल की नीति और विचारधारा हमें संयम, समन्वय और राष्ट्रहित की प्राथमिकता की ओर लौटाती है। वे कहते थे कि मतभेद स्वाभाविक हैं, पर विघटन घातक। लोकतंत्र उसी दिन सफल है जब विचार बहस में बदलें, और बहस समाधान में। ‘‘यूनिटी मार्च’’ इसी लोकतांत्रिक संस्कृति का संदेश लेकर चला है—विचारों की विविधता भारत की शक्ति है, और राष्ट्रीय एकता उसकी आत्मा।

इंदौर में आयोजित स्वागत समारोह केवल औपचारिक आयोजन नहीं था, यह जनमन का अभिवादन था। मंच से संबोधित करते हुए प्रतिनिधियों ने कहा कि यूनिटी मार्च जैसे आयोजन युवाओं में राष्ट्रगौरव जगाते हैं। आज नई पीढ़ी तेजी से तकनीक, वैश्विक अवसरों और आर्थिक प्रतिस्पर्धा की दुनिया में आगे बढ़ रही है। उन्हें यह समझना उतना ही आवश्यक है कि भारत केवल अर्थव्यवस्था, उद्योग, विकास या आंकड़ों का देश नहीं; यह त्याग, बलिदान और देशनिष्ठा की सभ्यता है। जब युवाओं के विचारों में यह पहचान स्थापित होगी, तभी भविष्य सुरक्षित होगा। इस यात्रा का उद्देश्य यही है—विचार-जागरण, भाव-उत्थान और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का स्मरण।

यात्रा मार्ग में हुए सांस्कृतिक कार्यक्रमों, गीत-संगीत प्रस्तुतियों, प्रेरक उद्गारों और सैकड़ों स्वयंसेवकों के अनुशासन ने यह चित्र निर्मित किया कि ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ केवल नारा नहीं बल्कि अनुभव है। रास्ते भर शौर्यगीत गूंजते रहे—कभी वंदे मातरम्, कभी झंडा ऊंचा रहे हमारा, कभी रघुपति राघव राजा राम। छोटे-छोटे बच्चे भी हाथ में तिरंगा लिए यात्रियों के साथ कदम मिलाते नज़र आए। वृद्ध लोग अपने घरों के दरवाजे पर खड़े होकर यात्रियों पर पुष्पवर्षा करते दिखे। यह दृश्य बताता है कि राष्ट्रभाव किसी विशेष वर्ग तक सीमित नहीं, यह जन-जन का भाव है।

भारत के वर्तमान परिदृश्य में यह यात्रा विशेष महत्व रखती है। विश्व राजनीति में नए समीकरण बन रहे हैं। सामरिक गठबंधन बदल रहे हैं। अर्थव्यवस्था में रफ्तार तेज है, लेकिन प्रतिस्पर्धा उससे भी तेज। भारत इस वैश्विक दौर में नेतृत्व क्षमता के साथ खड़ा है, परंतु किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच उसकी आंतरिक एकता है। इसलिए जब ‘‘यूनिटी मार्च’’ जैसे कार्यक्रम देश में होते हैं, तो वे केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं रहते, वे राष्ट्रीय सुरक्षा का सामाजिक आयाम बन जाते हैं।

आजादी के बाद से लेकर आज तक भारत कई चुनौतियों से गुजरा। अलगाववादी प्रवृत्तियाँ, सीमावर्ती संघर्ष, सांप्रदायिक तनाव, राजनीतिक अस्थिरता—इतिहास इन सबका साक्षी है। पर भारत हर बार और अधिक मजबूत होकर उभरा, क्योंकि इसकी जड़ों में सांस्कृतिक एकता है। यह एकता सरदार पटेल की अनुपम देन है। उन्होंने भारत के भू-आकार को जोड़ा ही नहीं, दिलों को भी जोड़ा। आज यदि देश का नागरिक अरुणाचल से गुजरात तक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक ही तिरंगे पर गर्व करता है, तो यह भावना पटेल की धमनियों से प्रवाहित होकर आज तक जीवित है।

अंत में यह कहा जा सकता है कि नागपुर से प्रारंभ हुआ और इंदौर तक पहुंचा यूनिटी मार्च सरदार पटेल के संकल्प का जीवंत स्तम्भ है। यह भारत की युवाशक्ति को संदेश देता है कि राष्ट्र की अखंडता केवल शासन का विषय नहीं, वह नागरिक धर्म है। लौह पुरुष पटेल का जीवन कहता है कि मजबूत राष्ट्र वही, जहाँ मतभिन्नता हो सकती है पर मनभिन्नता नहीं। जहां संघर्ष हो सकते हैं पर समाधान राष्ट्रहित में निकलता है। जहां विविधता हो सकती है पर विभाजन नहीं।

इंदौर की भूमि पर यह यात्रा अगले पड़ावों की ओर आगे बढ़ चुकी है। पथ लंबा है, लेकिन कदम दृढ़ हैं। यह यात्रा आने वाले शहरों, गांवों, राज्यों में भी यही संदेश लेकर जाएगी—हम 140 करोड़ हैं पर भारत एक है। सरदार पटेल की लौ आज भी जल रही है। यह लौ बुझने वाली नहीं, यह संकल्प की अग्नि है। आज भी कोई पूछे कि भारत किससे बंधा है, तो उत्तर स्पष्ट है—वह बंधा है एकता से, त्याग से, समर्पण से, और उस लौह पुरुष से जिसने कहा था कि ताकत हथियारों में नहीं, राष्ट्रप्रेम में होती है।

और इसलिए यह यात्रा आगे बढ़ती है। कदम दर कदम, धड़कन दर धड़कन, पीढ़ी दर पीढ़ी। भारत फिर कहता है—हम एक हैं। हम अखंड हैं। और यह अखंडता सरदार पटेल की भेंट है, जिसे यह राष्ट्र सदैव प्रणाम करता रहेगा।

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