
मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए ज्योतिरादित्य सिंधिया
भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों के बाद लिया गया एक निर्णय आज भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह निर्णय था—कांग्रेस की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री पद के चयन का। इसी एक फैसले ने न केवल राज्य की सत्ता की दिशा बदली, बल्कि उस नेता की राजनीतिक राह भी मोड़ दी, जिन्हें उस समय मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। वह नेता थे—ज्योतिरादित्य सिंधिया।
चुनाव परिणाम और सत्ता की दहलीज
वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 15 वर्षों बाद सत्ता में वापसी की। पार्टी को 230 सदस्यीय विधानसभा में 114 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा 109 सीटों पर सिमट गई। बहुमत के बेहद करीब पहुंची कांग्रेस के लिए सरकार बनाना चुनौतीपूर्ण तो था, लेकिन उससे भी बड़ी चुनौती थी—मुख्यमंत्री पद का चयन।
चुनाव परिणामों के बाद प्रदेश और देशभर में यह चर्चा तेज हो गई थी कि ग्वालियर राजघराने से आने वाले युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल सकते हैं। सिंधिया को कांग्रेस का भविष्य, युवाओं का चेहरा और ग्वालियर-चंबल अंचल का मजबूत नेता माना जा रहा था।
मुख्यमंत्री पद की दौड़
मुख्यमंत्री पद की दौड़ में तीन प्रमुख नाम सामने थे—ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह। हालांकि दिग्विजय सिंह ने स्वयं मुख्यमंत्री पद की रेस से बाहर होने की बात कही थी, लेकिन उनका प्रभाव और संगठनात्मक पकड़ निर्णय प्रक्रिया में महत्वपूर्ण मानी जा रही थी।
दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान के समक्ष सबसे बड़ा सवाल था कि सरकार की स्थिरता कैसे सुनिश्चित की जाए। विधायकों के समर्थन, वरिष्ठता और प्रशासनिक अनुभव के आधार पर अंततः पार्टी नेतृत्व ने कमलनाथ के नाम पर मुहर लगा दी।
वही ‘एक फैसला’
यही वह फैसला था जिसने ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री बनने से रोक दिया। माना गया कि सिंधिया के पास अपेक्षित संख्या में विधायकों का सीधा समर्थन नहीं था, जबकि कमलनाथ को वरिष्ठ नेता होने के साथ-साथ संगठन और संसाधनों का अनुभवी चेहरा माना गया।
कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सार्वजनिक रूप से पार्टी के निर्णय का समर्थन किया, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यहीं से असंतोष की शुरुआत हो गई थी।
बढ़ता असंतोष और टूटती सरकार
कमलनाथ सरकार के कार्यकाल के दौरान सिंधिया समर्थक विधायकों की उपेक्षा के आरोप लगातार सामने आते रहे। सरकार अल्पमत में थी और आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही थी। मार्च 2020 में यह असंतोष खुलकर सामने आ गया, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और उनके साथ 22 से अधिक विधायक भी पार्टी से अलग हो गए।
इस घटनाक्रम के चलते कमलनाथ सरकार गिर गई और प्रदेश में एक बार फिर भाजपा की सरकार बन गई।
भाजपा में नई भूमिका
कांग्रेस छोड़ने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हुए और केंद्र सरकार में मंत्री बने। हालांकि वे मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंचे, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उन्होंने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।
राजनीति को मिला बड़ा सबक
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि 2018 में कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद का फैसला अलग लिया होता, तो संभवतः प्रदेश की राजनीति की तस्वीर आज कुछ और होती। यह घटनाक्रम इस बात का उदाहरण बन गया कि एक निर्णय किस तरह पूरी राजनीतिक व्यवस्था को बदल सकता है।
आज भी मध्यप्रदेश की राजनीति में जब सत्ता परिवर्तन और दल-बदल की चर्चा होती है, तो ज्योतिरादित्य सिंधिया और 2018 का मुख्यमंत्री चयन निर्णय एक अहम संदर्भ के रूप में सामने आता है।









