
नई दिल्ली। नवजात शिशु के जन्म के साथ जुड़ा एक सामान्य किंतु रोचक प्रश्न अक्सर लोगों के मन में उठता है कि जब बच्चा जन्म लेता है तो वह पहले सांस लेता है या पहले रोता है। यह प्रश्न केवल जिज्ञासा का विषय नहीं, बल्कि मानव शरीर की जटिल जैविक प्रक्रिया और जीवन की शुरुआत से जुड़ा वैज्ञानिक तथ्य है। चिकित्सकीय दृष्टिकोण से देखें तो नवजात शिशु का रोना और सांस लेना एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं, और दोनों ही प्रक्रियाएं जन्म के तुरंत बाद लगभग एक साथ प्रारंभ होती हैं। इस विषय को समझने के लिए गर्भावस्था के दौरान भ्रूण की श्वसन प्रक्रिया और जन्म के समय होने वाले शारीरिक परिवर्तनों को समझना आवश्यक है।
गर्भ में पल रहे शिशु के फेफड़े पूरी तरह विकसित तो होते हैं, लेकिन वह वहां स्वतंत्र रूप से सांस नहीं लेता। गर्भाशय के भीतर शिशु को ऑक्सीजन नाल के माध्यम से मां के रक्त से प्राप्त होती है। प्लेसेंटा और गर्भनाल के जरिए ऑक्सीजन और पोषक तत्व भ्रूण तक पहुंचते हैं, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड और अपशिष्ट पदार्थ वापस मां के शरीर में चले जाते हैं। इस अवस्था में शिशु के फेफड़े द्रव से भरे होते हैं और उनमें हवा का प्रवेश नहीं होता। इसलिए गर्भ में शिशु का जीवन पूर्णतः मातृ-प्रणाली पर निर्भर रहता है।
जैसे ही प्रसव की प्रक्रिया पूर्ण होती है और शिशु का जन्म होता है, उसे पहली बार बाहरी वातावरण का सामना करना पड़ता है। गर्भनाल के कटने के बाद शिशु को स्वतंत्र रूप से सांस लेना अनिवार्य हो जाता है। इसी क्षण शरीर में कई जैविक परिवर्तन तीव्र गति से घटित होते हैं। तापमान में परिवर्तन, प्रकाश और ध्वनि का संपर्क तथा गर्भाशय से बाहर निकलने का दबाव शिशु के तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करता है। मस्तिष्क के श्वसन केंद्र से संकेत मिलते ही शिशु अपने फेफड़ों को फैलाने का प्रयास करता है।
पहली सांस को चिकित्सकीय भाषा में “इनिशियल ब्रीथ” कहा जाता है। यह सांस सामान्य सांस की तुलना में अधिक गहरी और शक्तिशाली होती है, क्योंकि फेफड़ों में भरे द्रव को हटाकर उनमें हवा भरनी होती है। जैसे ही हवा फेफड़ों में प्रवेश करती है, अल्वियोली नामक सूक्ष्म थैलीनुमा संरचनाएं फैलती हैं और गैस विनिमय की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। यही वह क्षण है जब शिशु वास्तव में स्वतंत्र जीवन की ओर अग्रसर होता है।
रोने की प्रक्रिया इसी पहली सांस से जुड़ी होती है। जब शिशु हवा को अंदर लेता है और फिर उसे बाहर निकालता है, तो स्वरयंत्र में कंपन उत्पन्न होता है, जिससे रोने की ध्वनि निकलती है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि से कहा जा सकता है कि सांस लेना रोने की पूर्व शर्त है। यदि शिशु सांस नहीं लेगा तो रो नहीं सकेगा। इस प्रकार सांस लेना प्राथमिक जैविक क्रिया है और रोना उसी का श्रव्य परिणाम है। हालांकि व्यवहार में दोनों प्रक्रियाएं लगभग साथ-साथ घटित होती प्रतीत होती हैं।
चिकित्सकों के लिए नवजात का रोना स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेत है। जन्म के तुरंत बाद यदि शिशु जोर से रोता है, तो इसे सामान्यतः स्वस्थ श्वसन प्रणाली और सक्रिय तंत्रिका प्रतिक्रिया का संकेत माना जाता है। रोने से फेफड़े पूरी तरह फैलते हैं और उनमें शेष द्रव बाहर निकलने में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त रोने से शिशु के शरीर में ऑक्सीजन का स्तर स्थिर होता है और रक्त संचार बेहतर होता है।
कभी-कभी कुछ नवजात शिशु तुरंत रोते नहीं हैं। ऐसी स्थिति में चिकित्सा कर्मी हल्के स्पर्श या उत्तेजना के माध्यम से उन्हें सांस लेने के लिए प्रेरित करते हैं। यदि आवश्यक हो तो ऑक्सीजन या अन्य चिकित्सकीय सहायता भी दी जाती है। नवजात शिशु की स्थिति का मूल्यांकन “एपगार स्कोर” के माध्यम से किया जाता है, जिसमें हृदय गति, श्वसन, मांसपेशीय टोन, प्रतिक्रिया और त्वचा के रंग का आकलन किया जाता है। यह परीक्षण जन्म के एक और पांच मिनट बाद किया जाता है ताकि शिशु के स्वास्थ्य की स्थिति का त्वरित आकलन किया जा सके।
वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह भी ज्ञात हुआ है कि प्रसव के दौरान हार्मोनल परिवर्तन शिशु को बाहरी जीवन के लिए तैयार करते हैं। एड्रेनालिन और अन्य तनाव हार्मोन फेफड़ों से द्रव हटाने और श्वसन तंत्र को सक्रिय करने में सहायक होते हैं। यही कारण है कि प्राकृतिक प्रसव की प्रक्रिया शिशु के लिए जैविक रूप से अनुकूल मानी जाती है, हालांकि चिकित्सकीय आवश्यकता होने पर सर्जिकल प्रसव भी सुरक्षित विकल्प है।
रोना केवल श्वसन का संकेत नहीं, बल्कि संचार का पहला माध्यम भी है। जन्म के बाद शिशु अपनी आवश्यकताओं को व्यक्त करने के लिए रोने का उपयोग करता है। भूख, असुविधा या दर्द की स्थिति में रोना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। किंतु जन्म के समय का प्रारंभिक रोना मुख्यतः श्वसन तंत्र के सक्रिय होने से संबंधित होता है।
समापन में कहा जा सकता है कि नवजात शिशु के जन्म के समय सांस लेना और रोना एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पहले सांस ली जाती है और उसी के परिणामस्वरूप रोने की ध्वनि उत्पन्न होती है, किंतु यह पूरी प्रक्रिया कुछ ही क्षणों में घटित होती है। यह क्षण जीवन की शुरुआत का प्रतीक है, जब शिशु मातृ निर्भरता से स्वतंत्र श्वसन और अस्तित्व की ओर पहला कदम बढ़ाता है। विज्ञान की दृष्टि से यह परिवर्तन मानव शरीर की अद्भुत अनुकूलन क्षमता और प्रकृति की जटिल संरचना का उत्कृष्ट उदाहरण है।









