
नई दिल्ली। हर साल जनवरी से मार्च के बीच देश के बड़े शहरों में एक अलग तरह की हलचल देखने को मिलती है। यह हलचल किसी चुनाव या त्योहार की नहीं, बल्कि नर्सरी एडमिशन की होती है। तीन से चार साल के बच्चों के माता-पिता के लिए यह समय किसी परीक्षा से कम नहीं होता। फॉर्म भरने से लेकर दस्तावेज जुटाने तक और फिर स्कूलों की पहली, दूसरी और तीसरी लिस्ट का इंतजार करने तक, पूरी प्रक्रिया कई परिवारों के लिए मानसिक दबाव का कारण बन जाती है। सवाल उठता है कि आखिर नर्सरी में एडमिशन करवाने में इतना पंगा क्यों है और अगर किसी बच्चे का नाम लिस्ट में नहीं आता तो आगे क्या विकल्प होते हैं।
दरअसल, नर्सरी एडमिशन का मुद्दा मुख्य रूप से बड़े शहरों में ज्यादा गंभीर होता है, जहां अच्छे और नामी स्कूलों की संख्या सीमित है, जबकि आवेदकों की संख्या हजारों में होती है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, गुरुग्राम और नोएडा जैसे शहरों में एक-एक स्कूल में सीटें 80 से 150 के बीच होती हैं, जबकि आवेदन कई गुना ज्यादा आ जाते हैं। ऐसे में प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।
नर्सरी एडमिशन की प्रक्रिया को लेकर अक्सर अभिभावकों में भ्रम रहता है। अधिकांश निजी स्कूल पॉइंट बेस्ड सिस्टम अपनाते हैं। इसमें पड़ोस की दूरी, सिब्लिंग यानी उसी स्कूल में पढ़ रहा भाई-बहन, एलुमनाई यानी माता-पिता का उसी स्कूल से पढ़ा होना, गर्ल चाइल्ड, सिंगल पेरेंट, ट्रांसफर केस आदि जैसे मानदंडों पर अंक दिए जाते हैं। जिन बच्चों के कुल अंक अधिक होते हैं, उनका नाम मेरिट लिस्ट में शामिल किया जाता है।
समस्या तब शुरू होती है जब अभिभावक अपने बच्चे के लिए केवल दो-तीन नामी स्कूलों में ही आवेदन करते हैं। वे मानकर चलते हैं कि बच्चा योग्य है, घर पास है, और इसलिए नाम आ जाएगा। लेकिन जब पहली लिस्ट में नाम नहीं आता तो परिवार में चिंता का माहौल बन जाता है। कई बार दूसरी और तीसरी लिस्ट तक भी इंतजार करना पड़ता है।
लिस्ट में नाम न आने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहला कारण सीटों की सीमित संख्या है। दूसरा, पॉइंट सिस्टम में कम अंक मिलना। उदाहरण के लिए यदि घर स्कूल से 1 किलोमीटर के भीतर है तो 30 अंक मिल सकते हैं, लेकिन 3 किलोमीटर दूर होने पर अंक कम हो जाते हैं। इसी तरह सिब्लिंग या एलुमनाई प्वाइंट न होने से कुल स्कोर घट जाता है।
कुछ अभिभावक यह भी शिकायत करते हैं कि प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। हालांकि शिक्षा विभाग समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी करता है और स्कूलों को पॉइंट सिस्टम व चयन सूची सार्वजनिक करने के लिए कहता है, फिर भी कई बार माता-पिता को लगता है कि चयन प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है।
यदि किसी बच्चे का नाम पहली लिस्ट में नहीं आता तो घबराने की आवश्यकता नहीं होती। आमतौर पर स्कूल दो या तीन वेटिंग लिस्ट जारी करते हैं। कई अभिभावक एक से अधिक स्कूलों में चयनित होने पर किसी एक में एडमिशन ले लेते हैं और अन्य स्कूलों में सीट छोड़ देते हैं। ऐसे में वेटिंग लिस्ट वाले बच्चों को मौका मिल जाता है।
इसके अलावा, अभिभावक संबंधित स्कूल से संपर्क कर वेटिंग पोजिशन जान सकते हैं। कुछ स्कूल अभिभावकों को ईमेल या नोटिस बोर्ड के माध्यम से जानकारी देते हैं। यदि किसी को लगता है कि उनके बच्चे के पॉइंट की गणना में गलती हुई है तो वे निर्धारित समय सीमा के भीतर आपत्ति भी दर्ज करा सकते हैं।
सरकारी स्कूलों और कुछ राज्यों में संचालित ईडब्ल्यूएस या आरटीई कोटे के तहत भी नर्सरी में एडमिशन की व्यवस्था होती है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित सीटों पर चयन लॉटरी सिस्टम से होता है। यदि सामान्य श्रेणी में नाम नहीं आता तो पात्र अभिभावक इस विकल्प पर भी विचार कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि नर्सरी एडमिशन को लेकर बढ़ता तनाव समाज में शिक्षा के प्रति प्रतिस्पर्धात्मक सोच का परिणाम है। कई माता-पिता मानते हैं कि यदि बच्चे को शुरुआत से ही नामी स्कूल मिल गया तो उसका भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। इसी सोच के कारण एडमिशन प्रक्रिया को लेकर दबाव बढ़ जाता है।
शिक्षा विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि तीन या चार साल की उम्र में स्कूल का ब्रांड उतना महत्वपूर्ण नहीं होता, जितना कि बच्चे का भावनात्मक और मानसिक विकास। एक सुरक्षित और सकारात्मक वातावरण किसी भी बच्चे के लिए अधिक जरूरी है।
यदि किसी बच्चे का नाम किसी भी स्कूल की लिस्ट में नहीं आता तो भी विकल्प समाप्त नहीं होते। कई स्कूलों में बाद में सीट खाली होने पर एडमिशन दिया जाता है। इसके अलावा, कुछ नए या कम चर्चित स्कूल भी अच्छी शिक्षा दे रहे हैं। अभिभावकों को केवल नाम के बजाय स्कूल की गुणवत्ता, शिक्षकों का अनुभव, इंफ्रास्ट्रक्चर और दूरी जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए।
नर्सरी एडमिशन के दौरान दस्तावेजों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। जन्म प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, पासपोर्ट साइज फोटो आदि दस्तावेज समय पर और सही रूप में जमा करना आवश्यक है। छोटी सी त्रुटि भी आवेदन को प्रभावित कर सकती है।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा असर माता-पिता की मानसिक स्थिति पर पड़ता है, जिसका प्रभाव अनजाने में बच्चे पर भी पड़ सकता है। कई बार बच्चे को इंटरव्यू या इंटरेक्शन के लिए तैयार करते समय अभिभावक उस पर अनावश्यक दबाव डाल देते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि इस उम्र में बच्चे को स्वाभाविक रहने दें और उसे परीक्षा जैसा माहौल महसूस न होने दें।
सरकार और शिक्षा विभाग समय-समय पर प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने के प्रयास करते रहे हैं। ऑनलाइन आवेदन प्रणाली, स्पष्ट दिशा-निर्देश और शिकायत निवारण तंत्र जैसी व्यवस्थाएं इसी दिशा में कदम हैं। फिर भी, मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है।
अंततः यह समझना जरूरी है कि नर्सरी एडमिशन जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं है। यदि पहली बार में नाम नहीं आता तो यह असफलता नहीं है। धैर्य, जानकारी और सही योजना के साथ आगे बढ़ने पर समाधान मिल जाता है।
नर्सरी में एडमिशन को लेकर जितना पंगा दिखाई देता है, वह दरअसल सीमित सीटों और बढ़ती अपेक्षाओं का परिणाम है। अभिभावकों को शांत रहकर सभी विकल्पों पर विचार करना चाहिए और बच्चे के समग्र विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए।
हर बच्चा अपनी गति से सीखता और बढ़ता है। एक स्कूल की लिस्ट में नाम न आना उसके भविष्य का फैसला नहीं करता। सही मार्गदर्शन और सकारात्मक वातावरण ही बच्चे की असली नींव है।








