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शिक्षा की दिशा पर प्रश्न उठाती कविता ‘किताबों में क्या पढ़ाना है’

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ग्वालियर। समकालीन साहित्य जगत में सामाजिक सरोकारों को स्वर देती रचनाओं की श्रृंखला में कवि संजीव जैन की कविता ‘किताबों में क्या पढ़ाना है’ इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। कविता में शिक्षा व्यवस्था, नैतिक मूल्यों और राजनीतिक विडंबनाओं पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं।

 

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कवि ने अपनी रचना में सबसे पहले यह विचार सामने रखा है कि यदि समाज को बेहतर बनाना है तो शिक्षा की दिशा स्पष्ट होनी चाहिए। वे लिखते हैं—“पहले तय करिये कैसा जहान बनाना है, फिर ये सोचिये किताबों में क्या पढ़ाना है।” इस पंक्ति के माध्यम से उन्होंने शिक्षा के उद्देश्य और उसके प्रभाव पर विमर्श की आवश्यकता जताई है।

 

शिक्षा और संवेदना का संतुलन

 

कविता में बुद्धि और संवेदना के संतुलन पर विशेष बल दिया गया है। कवि का मानना है कि केवल पुस्तकीय ज्ञान पर्याप्त नहीं, बल्कि दिल और दिमाग के बीच संवाद आवश्यक है। “अक़्ल का काम है दिल से भी राब्ता रखना” जैसी पंक्तियाँ इस भाव को स्पष्ट करती हैं।

 

साथ ही, सही और गलत के सूक्ष्म अंतर को समझने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है। कवि के अनुसार, यही समझ जीवन को दिशा देती है और व्यक्ति को जिम्मेदार नागरिक बनाती है।

 

आत्ममंथन और ईमानदारी का संदेश

 

कविता में आत्मनिरीक्षण का संदेश भी प्रमुखता से उभरता है। “अपने गिरेबान में झाँक के देखिये पहले” जैसी पंक्तियाँ व्यक्ति को स्वयं का मूल्यांकन करने की प्रेरणा देती हैं। कवि ने सच को जानने, मानने और पहचानने को ईमानदारी का आधार बताया है।

 

राजनीति पर व्यंग्य

 

रचना के अंतिम चरण में राजनीति की विडंबनाओं पर व्यंग्य किया गया है। कवि लिखते हैं कि सियासत एक अजीब खेल है, जहाँ जीत और हार के मायने बदल जाते हैं। यह टिप्पणी वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर गहरा कटाक्ष मानी जा रही है।

 

साहित्य प्रेमियों में सराहना

 

साहित्यकारों और पाठकों ने कविता को सामाजिक चेतना से ओतप्रोत रचना बताया है। उनका कहना है कि ऐसी रचनाएँ शिक्षा और नैतिक मूल्यों पर पुनर्विचार की प्रेरणा देती हैं।

 

‘किताबों में क्या पढ़ाना है’ केवल एक कविता नहीं, बल्कि समाज के लिए एक विचारोत्तेजक प्रश्न है, जो शिक्षा, नैतिकता और जिम्मेदारी के नए आयाम खोलती है।

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