
कटनी। जिले के शासकीय महाविद्यालय विजयराघवगढ़ में नई शिक्षा व्यवस्था के अनुरूप जैविक खेती विषय को लेकर विद्यार्थियों में बढ़ती रुचि के बीच प्रायोगिक परीक्षाएं सफलतापूर्वक सम्पन्न हुईं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत संचालित इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों को पारंपरिक कृषि पद्धतियों के साथ-साथ आधुनिक एवं टिकाऊ खेती की तकनीकों से अवगत कराना है। महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. सुषमा श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में विद्यार्थियों को जैविक खेती की व्यावहारिक जानकारी प्रदान की गई। प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. अरुण कुमार सिंह एवं डॉ. सुमन पुरवार के सहयोग से कार्यक्रम को व्यवस्थित रूप से संचालित किया गया, जिसमें जैविक कृषि विशेषज्ञ रामसुख दुबे ने विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को जैविक खाद निर्माण, प्राकृतिक कीटनाशकों के उपयोग, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने की तकनीक, फसल चक्र एवं पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। इसके साथ ही उन्हें खेत स्तर पर इन तकनीकों के प्रयोग की विधि भी समझाई गई, जिससे वे भविष्य में इनका व्यावहारिक उपयोग कर सकें। प्रशिक्षण उपरांत स्नातक द्वितीय एवं तृतीय वर्ष के विद्यार्थियों की लिखित एवं मौखिक प्रायोगिक परीक्षाएं आयोजित की गईं। इस दौरान बाह्य परीक्षक अश्विनी कुमार गर्ग एवं आंतरिक परीक्षक रामसुख दुबे ने विद्यार्थियों के ज्ञान और कौशल का मूल्यांकन किया। परीक्षाओं का आयोजन सुव्यवस्थित ढंग से किया गया, जिसमें महाविद्यालय के समस्त स्टाफ ने सक्रिय सहयोग प्रदान किया।
महाविद्यालय प्रशासन के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में जैविक खेती विषय को चुनने वाले विद्यार्थियों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण बढ़ती पर्यावरणीय जागरूकता, रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों के प्रति बढ़ती समझ तथा जैविक उत्पादों की बाजार में बढ़ती मांग है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक खेती न केवल मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में सहायक है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य के लिए भी अधिक सुरक्षित है। यही कारण है कि युवा पीढ़ी इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित हो रही है। महाविद्यालय में दिए जा रहे इस प्रकार के प्रशिक्षण विद्यार्थियों को स्वरोजगार के अवसर भी प्रदान कर सकते हैं, जिससे वे भविष्य में कृषि आधारित उद्यम स्थापित कर आत्मनिर्भर बन सकें। प्राचार्या डॉ. सुषमा श्रीवास्तव ने बताया कि महाविद्यालय का उद्देश्य केवल शैक्षणिक ज्ञान प्रदान करना ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को व्यावहारिक कौशल से भी सशक्त बनाना है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में जैविक खेती का महत्व और बढ़ेगा, ऐसे में विद्यार्थियों को इस क्षेत्र में प्रशिक्षित करना अत्यंत आवश्यक है।
प्रशिक्षण समन्वयकों ने भी बताया कि महाविद्यालय में समय-समय पर इस प्रकार के व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे, ताकि विद्यार्थियों को नवीनतम कृषि तकनीकों की जानकारी मिलती रहे। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि विद्यार्थी केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें वास्तविक परिस्थितियों में काम करने का अनुभव भी प्राप्त हो। इस अवसर पर उपस्थित शिक्षकों ने विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि वे जैविक खेती के क्षेत्र में नवाचार करें और इसे एक व्यवसाय के रूप में अपनाने का प्रयास करें। उन्होंने बताया कि सरकार भी जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित कर रही है, जिनका लाभ उठाकर युवा किसान अपने भविष्य को सुरक्षित बना सकते हैं। विजयराघवगढ़ महाविद्यालय में आयोजित यह प्रशिक्षण एवं प्रायोगिक परीक्षा कार्यक्रम न केवल शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि इसने विद्यार्थियों को एक नई दिशा भी प्रदान की है। यह पहल आने वाले समय में क्षेत्र में जैविक खेती को बढ़ावा देने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।









