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जेंटलमैन नहीं, वुमेन गेम है क्रिकेट… पहले महिलाओं का ही होता था वर्ल्ड कप!

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महिला क्रिकेट की रोमांचक यात्रा: इंग्लैंड से शुरू हुआ था सिलसिला, भारत ने बदली इसकी दिशा

नई दिल्ली। हम अक्सर क्रिकेट को “जेंटलमैन गेम” कहते हैं, लेकिन अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि क्रिकेट पहले “लेडीज़ गेम” था।
जी हाँ, जिस खेल को आज पुरुषों की लोकप्रियता ने नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है, उसकी असली अंतरराष्ट्रीय शुरुआत महिलाओं ने की थी — और पुरुषों से भी पहले उन्होंने वर्ल्ड कप खेला था।
आज जब महिला क्रिकेट वैश्विक स्तर पर तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है, तो यह जानना दिलचस्प है कि इसकी नींव कब, कैसे और किन संघर्षों से रखी गई।


18वीं सदी में महिलाओं की बल्ले-बल्ले

महिला क्रिकेट का इतिहास 18वीं सदी के इंग्लैंड से शुरू होता है।
सबसे पहला दर्ज किया गया महिला क्रिकेट मैच 1745 में हुआ था — इंग्लैंड के सरे (Surrey) प्रांत में ब्रैमली और हैम्बल्डन गाँव की महिलाओं के बीच।
यह मैच देखने हजारों लोग पहुँचे थे, और दिलचस्प बात यह थी कि विजेता टीम को नकद इनाम मिला।
उस दौर में यह खेल महिलाओं के लिए सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने जैसा था, क्योंकि तब क्रिकेट को केवल पुरुषों का खेल माना जाता था।

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धीरे-धीरे इंग्लैंड में महिलाओं के लिए क्लब बनने लगे और 19वीं सदी के अंत तक महिला क्रिकेट का एक अलग ढांचा विकसित हो चुका था।
हालाँकि तब तक इसे शौकिया खेल ही माना जाता था, और खिलाड़ियों को प्रशिक्षण या आर्थिक सहयोग नहीं मिलता था।


1930 में बनी Women’s Cricket Association

महिलाओं ने संगठित स्तर पर कदम रखा 1926 में, जब इंग्लैंड में Women’s Cricket Association (WCA) की स्थापना हुई।
इस संस्था ने महिला क्रिकेट को औपचारिक पहचान दी।
इसके बाद 1934 में इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच पहला अंतरराष्ट्रीय महिला टेस्ट मैच खेला गया।
यही वह दौर था जिसने “Women’s Cricket” को एक नए युग में पहुँचा दिया।

दिलचस्प है कि पुरुषों का वर्ल्ड कप 1975 में हुआ, लेकिन महिलाओं का पहला वर्ल्ड कप 1973 में ही खेला जा चुका था।
इस लिहाज से महिला क्रिकेट दुनिया के क्रिकेट विश्व कप इतिहास में अग्रणी रही।


पहला महिला विश्व कप: जब पुरुष पीछे रह गए

1973 में इंग्लैंड की क्रिकेट प्रशासक रेचल हेहो फ्लिंट (Rachael Heyhoe Flint) ने महिला वर्ल्ड कप आयोजित करने का विचार रखा।
उसी साल, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जमैका, त्रिनिदाद और टोबैगो, और अंतरराष्ट्रीय महिला टीम (Young England) ने भाग लिया।
इंग्लैंड की टीम ने फाइनल में ऑस्ट्रेलिया को हराकर खिताब जीता — और यह सब पुरुषों के पहले विश्व कप (1975) से दो साल पहले हुआ था।
इस उपलब्धि के बाद महिला क्रिकेट को मीडिया में सीमित मगर ऐतिहासिक पहचान मिली।

रेचल हेहो फ्लिंट को बाद में “Mother of Women’s Cricket” कहा गया। उन्होंने साबित किया कि खेल में लिंग नहीं, हुनर मायने रखता है।


भारत में महिला क्रिकेट का आगमन

भारत में महिला क्रिकेट की शुरुआत थोड़ी देर से हुई।
1973 में ही “Women’s Cricket Association of India (WCAI)” की स्थापना हुई, जिसकी अगुवाई महेंद्र कुमार शर्मा ने की।
भारत ने 1976 में पहली बार टेस्ट मैच खेला — वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ़।
टीम की कप्तान थीं शांतारंगा स्वामी, जो बाद में भारतीय महिला क्रिकेट की प्रतीक बनीं।

1982 में भारत ने अपना पहला महिला विश्व कप आयोजित किया — यह महिला क्रिकेट इतिहास में भारत की बड़ी भूमिका का आरंभ था।
हालाँकि तब संसाधन सीमित थे; खिलाड़ियों को ट्रेन तक का टिकट खुद खरीदना पड़ता था और कई बार यूनिफॉर्म के लिए भी इंतज़ाम खुद करने होते थे।
लेकिन इन परिस्थितियों में भी भारतीय टीम ने दुनिया को दिखाया कि वह किसी से कम नहीं।


2005: BCCI के अधीन आया महिला क्रिकेट

लंबे संघर्ष के बाद 2005 में महिला क्रिकेट BCCI (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) के अधीन आया।
इसके बाद महिला खिलाड़ियों को वही सुविधाएँ और प्रोफेशनल ट्रेनिंग मिलने लगीं जो पुरुष टीम को मिलती थीं।
यहीं से भारतीय महिला क्रिकेट का “सुनहरा अध्याय” शुरू हुआ।

मिताली राज, झूलन गोस्वामी, और बाद में हरमनप्रीत कौर जैसी खिलाड़ियों ने न केवल शानदार प्रदर्शन किया, बल्कि भारत में महिला क्रिकेट को नई पहचान दी।
2017 का विश्व कप (इंग्लैंड) इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा — जब हरमनप्रीत की तूफानी शतक ने पूरे देश को महिला क्रिकेट का फैन बना दिया।


आज का दौर: महिला प्रीमियर लीग और ग्लोबल पहचान

आज महिला क्रिकेट न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बल्कि आर्थिक और लोकप्रियता के स्तर पर भी नई ऊँचाइयों पर है।
2023 में भारत में शुरू हुई Women’s Premier League (WPL) ने इसे अभूतपूर्व मंच दिया।
महिला खिलाड़ियों की बोलियों ने करोड़ों का आंकड़ा पार किया, और यह पहली बार था जब महिला क्रिकेट को व्यावसायिक रूप से उतना सम्मान मिला जितना पुरुष क्रिकेट को वर्षों से मिलता आया है।

ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, भारत और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में अब महिला खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय आइकन माना जाता है।
सोशल मीडिया पर उनकी फैन फॉलोइंग लाखों में है और विज्ञापन जगत में उनकी उपस्थिति लगातार बढ़ रही है।

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