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“दिल्ली की हवा में जहर, लोग उतरे सड़कों पर!” — इंडिया गेट पर प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन, बोले नागरिक: ‘सांस लेना भी सजा बन गया है’

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नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली एक बार फिर गैस चैंबर में तब्दील हो गई है। हर सुबह के सूरज के साथ धुंध की चादर और आंखों में चुभन — अब यह दिल्लीवासियों की नियति बन गई है। इस बार हालात इतने गंभीर हो गए कि इंडिया गेट के पास सैकड़ों लोगों ने मास्क पहनकर प्रदर्शन किया, हाथों में बैनर थे — “हमें स्वच्छ हवा चाहिए”, “सांस लेना हमारा हक है”
सरकारें जहां ‘स्पोर्ट्स डे’ और ‘मैराथन’ का आयोजन कर रही हैं, वहीं नागरिकों का कहना है — “जब हवा में जहर घुला है, तो दौड़ें कैसे?”

एयर क्वालिटी इंडेक्स पहुँचा 490 पार, सांस लेना हुआ मुश्किल

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) शुक्रवार को कई इलाकों में 490 से ऊपर दर्ज किया गया, जो ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है।
इस स्तर पर हवा में मौजूद सूक्ष्म धूलकण (PM 2.5) और जहरीली गैसें सामान्य मानकों से आठ गुना तक अधिक पाई गईं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति लंबे समय तक रहने पर फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है।

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AIIMS के पल्मोनरी एक्सपर्ट डॉ. विपिन मेहरा ने बताया —

“दिल्ली की हवा अब सिर्फ खराब नहीं, जानलेवा हो चुकी है। अस्थमा, हार्ट डिजीज और यहां तक कि कैंसर के मरीजों में वृद्धि हो रही है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक है।”

‘क्लीन एयर के लिए क्लीन मूवमेंट’ — इंडिया गेट बना विरोध का केंद्र

शनिवार सुबह इंडिया गेट के पास ‘क्लीन एयर के लिए क्लीन मूवमेंट’ नाम से लोगों ने एक शांतिपूर्ण मार्च निकाला।
हाथों में पौधे, मास्क और तख्तियां लिए सैकड़ों युवा, महिलाएं और बच्चे एक ही नारा लगा रहे थे —

“दिल्ली को जहर से आजाद करो।”

प्रदर्शन में शामिल 17 वर्षीय छात्रा ने कहा —

“हम स्कूल में स्पोर्ट्स डे मना रहे हैं, लेकिन खेलना मुश्किल हो गया है। सांस लेने में जलन होती है, फिर भी कहा जाता है कि ‘भागो, दौड़ो, खेलो’। क्या यही फिटनेस है?”

इंडिया गेट से लेकर कनॉट प्लेस तक लोगों का यह प्रदर्शन दिल्ली की बढ़ती हवा की समस्या पर सरकार का ध्यान खींचने की कोशिश थी।

दिल्ली सरकार ने कुछ दिन पहले दावा किया था कि सर्दियों के लिए ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) लागू कर दिया गया है। इसके तहत निर्माण कार्यों पर रोक, स्कूलों में छुट्टी और वाहनों की सीमित आवाजाही जैसे कदम उठाए गए हैं।
लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि “कागजों में योजना है, हवा में नहीं।”

पर्यावरणविद् सुनीता नारायण ने कहा —

“हर साल अक्टूबर-नवंबर में हम वही बयान सुनते हैं — ‘प्रदूषण नियंत्रण में है’। लेकिन सच्चाई यह है कि किसी भी सरकार के पास न दीर्घकालिक रणनीति है, न जवाबदेही। दिल्ली की हवा अब हर साल की त्रासदी बन चुकी है।”

‘हम बच्चे हैं, धुआं नहीं खा सकते’ — मासूमों की पुकार

प्रदर्शन में बड़ी संख्या में बच्चे भी मौजूद थे। कई स्कूलों ने छात्रों को ‘स्वच्छ हवा अभियान’ के तहत शामिल किया।
बच्चों के हाथों में बैनर थे — “We want to play, not to choke” और “Stop burning our future”।
12 वर्षीय आरव शर्मा ने कहा —

“हम रोज सुबह स्कूल जाते हैं तो आंखों में जलन होती है। मम्मी मास्क पहनने को कहती हैं, लेकिन क्लास में घुटन होती है।”

एक अन्य छात्रा अनन्या ने कहा —

“हमारे स्पोर्ट्स डे की प्रैक्टिस रद्द कर दी गई, क्योंकि AQI बहुत खराब था। हम अब मैदान में नहीं, क्लासरूम में दौड़ते हैं।”

‘पराली’ पर फिर आई राजनीति की धूल

हर साल की तरह इस बार भी प्रदूषण का दोष पराली जलाने पर डाल दिया गया है। पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं बढ़ी हैं, और सैटेलाइट डेटा दिखा रहा है कि राजधानी की हवा में 38% प्रदूषण इसी स्रोत से आया है।
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पराली सिर्फ एक हिस्सा है। असली जिम्मेदार दिल्ली की वाहन उत्सर्जन, निर्माण धूल, और औद्योगिक धुआं है।

दिल्ली बीजेपी और आम आदमी पार्टी (AAP) के बीच इस मुद्दे पर फिर आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया।
AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने कहा —

“केंद्र सरकार राज्यों के साथ समन्वय नहीं बना पा रही। प्रदूषण रोकना सभी की जिम्मेदारी है, न कि किसी एक दल की।”
वहीं बीजेपी प्रवक्ता ने पलटवार करते हुए कहा —
“दिल्ली सरकार सिर्फ विज्ञापन चला रही है, लेकिन सड़कों की सफाई और वाहन नियंत्रण पर कोई काम नहीं हो रहा।”

डॉक्टरों ने दी चेतावनी — ‘मास्क से नहीं बचेगी दिल्ली’

दिल्ली के बड़े अस्पतालों में सांस संबंधी मरीजों की संख्या में 30% बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
सर गंगा राम अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार,

“सिर्फ मास्क पहनना पर्याप्त नहीं है। प्रदूषण का असर आंखों, त्वचा और दिल तक जा रहा है। लगातार जहरीली हवा में रहने से लोगों की जीवन प्रत्याशा घट रही है।”

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह स्थिति यूं ही बनी रही तो आने वाले 10 सालों में दिल्लीवासियों की औसत उम्र तीन से चार साल घट सकती है।

‘ग्रीन जोन’ बनने की बातें अब तक सिर्फ कागजों में

दिल्ली सरकार ने पिछले वर्ष घोषणा की थी कि शहर के 10 इलाकों को ‘ग्रीन जोन’ बनाया जाएगा — यानी प्रदूषण-नियंत्रित क्षेत्र, जहां वाहनों की एंट्री सीमित होगी और हरे-भरे पौधे लगाए जाएंगे।
लेकिन इस योजना की प्रगति बेहद धीमी है।
साउथ दिल्ली के निवासी ने बताया —

“यहां न पेड़ बढ़े हैं, न हवा सुधरी है। सिर्फ बोर्ड लग गए हैं कि ‘ग्रीन जोन में आपका स्वागत है’। असल में, ये ‘ग्रे जोन’ हैं।”

‘मैराथन में दम घुटा’ — सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

इसी बीच राजधानी में आयोजित ‘दिल्ली फिटनेस रन’ ने भी विवाद खड़ा कर दिया। प्रदूषण के बीच मैराथन करवाने पर नागरिकों ने सवाल उठाए।
एक यूजर ने लिखा —

“जब हवा में जहर है, तो फिटनेस रन का क्या मतलब?”
दूसरे ने तंज किया —
“यह मैराथन नहीं, फेफड़ों की परीक्षा है।”

कई प्रतिभागियों ने खुद बताया कि दौड़ते समय उन्हें सांस फूलने और आंखों में जलन की समस्या हुई।

सरकार की सफाई — ‘स्थिति पर नजर, जल्द राहत की उम्मीद’

दिल्ली के पर्यावरण मंत्री ने बयान जारी कर कहा —

“सरकार ने वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए हैं। स्मॉग टावर, एंटी-स्मॉग गन और वाटर स्प्रिंकलर लगातार काम कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में स्थिति में सुधार होगा।”

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल अस्थायी उपाय हैं। असली बदलाव तभी संभव है जब दीर्घकालिक नीतियां लागू हों — जैसे

  • सार्वजनिक परिवहन का विस्तार

  • इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रोत्साहन

  • और औद्योगिक क्षेत्रों में सख्त निगरानी।

‘सांस की कीमत नहीं समझी तो देर हो जाएगी’

प्रदूषण के खिलाफ इंडिया गेट पर हुआ यह प्रदर्शन एक प्रतीक बन गया है —
एक ऐसी राजधानी का प्रतीक, जो विकास की दौड़ में सांसों को गिरवी रख चुकी है।
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यह लड़ाई राजनीति की नहीं, जीवन की लड़ाई है।

एक बुजुर्ग महिला प्रदर्शनकारी ने कहा —

“हमने देश को आजादी दिलाई थी, अब हवा को आजाद कराना है।”

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