
नई दिल्ली/जोहान्सबर्ग। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में इन दिनों जिस टिप्पणी ने वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक ध्यान आकर्षित किया है, वह है दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति व्यक्त किया गया आभार। यह आभार महज़ औपचारिकता नहीं थी, बल्कि उस कठिनाई, दबाव, जिम्मेदारी और विशाल प्रबंधन की स्वीकारोक्ति थी, जिसका सामना किसी भी देश को तब करना पड़ता है जब वह दुनिया के सबसे बड़े बहुपक्षीय मंचों में से एक—G20—की मेजबानी करता है। रामाफोसा ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा, “आप हमें पहले बता देते कि G20 की मेजबानी इतनी मुश्किल होती है, तो हम शायद भाग ही लेते।” यह वाक्य भले ही हंसी-मज़ाक में कहा गया हो, लेकिन इसके भीतर छिपे अर्थों ने दुनिया भर के मीडिया और कूटनीतिक हलकों में एक गंभीर चर्चा को जन्म दिया है।
दक्षिण अफ्रीका ने 2025 में G20 की अध्यक्षता संभाली और सम्मेलन का आयोजक देश बना। यह पहली बार था जब दक्षिण अफ्रीका महाद्वीप अफ्रीका की ओर से इस प्रतिष्ठित मंच की मेजबानी कर रहा था। G20 जैसे सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं, भू-राजनीतिक तनावों, आर्थिक रणनीतियों, जलवायु संकट, डिजिटल समावेशन, वैश्विक दक्षिण के मुद्दे, स्वास्थ्य सुरक्षा, सतत विकास और कई अन्य विषयों पर दुनिया के सबसे प्रभावशाली देशों के बीच वार्ता होती है। ऐसे सम्मेलन का आयोजन सिर्फ मेजबान राष्ट्र की प्रतिष्ठा ही नहीं बढ़ाता, बल्कि उस राष्ट्र की प्रशासनिक क्षमता, प्रबंधन कौशल और कूटनीतिक मजबूतियों को भी सामने लाता है।
दक्षिण अफ्रीका के लिए यह अवसर ऐतिहासिक था, लेकिन साथ ही यह उतना ही चुनौतीपूर्ण भी था। राष्ट्रपति रामाफोसा ने जब प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात की और अनौपचारिक बातचीत में भारत की सराहना की, तो यह न केवल भारत के पिछले अनुभव की स्वीकारोक्ति थी, बल्कि यह एक तरह का कूटनीतिक धन्यवाद भी था कि भारत के अनुभव, सहयोग और समन्वय ने दक्षिण अफ्रीका को इस कठिन जिम्मेदारी को निभाने में मदद की।
भारत ने 2023 में G20 की मेजबानी करते हुए एक ऐतिहासिक और अत्यंत सफल आयोजन किया था। भारत की अध्यक्षता को दुनिया भर में ‘मनुष्य-केंद्रित विकास’ का मॉडल कहा गया, जिसने संयुक्त बयान जैसे जटिल मसले पर भी आम सहमति सुनिश्चित कर दी। भारत ने G20 में 200 से अधिक बैठकें कीं, देशभर के 60 से ज़्यादा स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए, और दुनिया को ‘भारत की जीवंत विविधता’ एक मंच पर देखने का अवसर दिया। दिल्ली में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन को दुनिया ने भारत की कूटनीति, आतिथ्य, सुरक्षा प्रबंधन और आयोजन क्षमता का अद्भुत प्रदर्शन माना।
रामाफोसा की टिप्पणी में इस भारतीय दक्षता की एक झलक सहज रूप से दिखाई देती है। उन्होंने मोदी से कहा—“आपका G20 आयोजन इतना शानदार था कि हमें लगा कि यह हम भी कर लेंगे, लेकिन जब हमने शुरुआत की, तब हमें पता चला कि यह कितना कठिन है।” यह टिप्पणी दक्षिण अफ्रीका जैसे व्यवस्थित और विकसित प्रशासनिक प्रणाली वाले देश की ओर से आई है, जिससे इस मंच की जटिलता का वास्तविक अनुमान लगाया जा सकता है।
दक्षिण अफ्रीका के सामने मुख्य चुनौतियां थी—सुरक्षा व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की आवाजाही, बहुभाषी समन्वय, विस्तृत कार्यक्रमों की श्रृंखला, वैश्विक तनावों के बीच सर्वसम्मति प्राप्त करना, और अफ्रीका महाद्वीप के मुद्दों को वैश्विक एजेंडा में प्रमुखता दिलाना। G20 के आयोजन के दौरान हर देश अपनी रणनीति को तैयार करता है, लेकिन मेजबान देश पर काम का भार कई गुना बढ़ जाता है। न केवल उसे प्रशासनिक और व्यवस्थागत चुनौतियों को संभालना होता है, बल्कि कूटनीतिक संवाद के हर मंच पर नेतृत्व भी करना होता है।
भारत ने दक्षिण अफ्रीका की मदद सिर्फ सलाह या अनुभव साझा करने तक ही सीमित नहीं रखी। भारत ने तकनीकी सहायता, संकट प्रबंधन, कूटनीतिक समन्वय, और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ एक साझा विकास दृष्टि स्थापित करने में दक्षिण अफ्रीका को महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया। इसी कारण, रामाफोसा का यह ‘थैंक्यू’ एक साधारण शब्द नहीं, बल्कि दो देशों के बीच विश्वास, दोस्ती और कूटनीतिक साझेदारी का प्रमाण है।
रामाफोसा ने यह भी माना कि भारत के अनुभव ने दक्षिण अफ्रीका को उन कई जटिल परिस्थितियों से निपटने में मदद की, जिनका अनुमान पहले नहीं लगाया जा सकता था। इस शिखर सम्मेलन के आयोजन ने दक्षिण अफ्रीका की प्रतिष्ठा बढ़ाई, अफ्रीका महाद्वीप के मुद्दों को नए मंच दिए, और वैश्विक समुदाय में दक्षिण अफ्रीका की नेतृत्व क्षमता को प्रदर्शित किया। इसके बावजूद, दक्षिण अफ्रीका के सामने कई बार कठिन परिस्थितियाँ आईं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय तनाव, जलवायु वित्त पर असहमति, और वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़े विवाद शामिल रहे।
इन परिस्थितियों ने रामाफोसा की टिप्पणी को और भी अर्थपूर्ण बना दिया। उनकी बात में न केवल एक मज़ाकिया चुटकी थी, बल्कि एक ईमानदार स्वीकारोक्ति भी थी कि G20 जैसा मंच किसी भी राष्ट्र के लिए आसान नहीं होता। और जब किसी देश को इस दिशा में भारत जैसे अनुभवी और सफल भागीदार का सहयोग मिलता है, तो यह भार कुछ हद तक कम हो जाता है।
मोदी और रामाफोसा के बीच साझा कूटनीतिक संबंधों ने पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक दक्षिण के मुद्दों को एक नई पहचान दी है। चाहे वह ग्लोबल साउथ की वर्चुअल शिखर वार्ता हो, ब्रिक्स का विस्तार हो, या अफ्रीका को G20 की स्थायी सदस्यता दिलाने का भारत का प्रयास—दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है। यह संबंध अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक, आर्थिक और वैश्विक विकास के व्यापक दृष्टिकोण तक पहुँच चुका है।
रामाफोसा का धन्यवाद ऐसे समय में आया है जब दुनिया बहुध्रुवीयता के नए मुहाने पर खड़ी है। भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अस्थिरता, जलवायु संकट और तकनीकी असमानताओं के बीच G20 देशों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे समय में मेजबान देश पर जिम्मेदारी और दबाव अत्यधिक बढ़ जाता है।
दक्षिण अफ्रीका की इस कठिन यात्रा में भारत का समर्थन न केवल तकनीकी या प्रशासनिक था, बल्कि यह एक बड़े वैश्विक दृष्टिकोण का हिस्सा था — वैश्विक दक्षिण को एकजुट करना, विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करना और एक अधिक न्यायपूर्ण वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की दिशा में मिलकर कार्य करना।
रामाफोसा के ‘थैंक्यू’ में एक और अर्थ भी छिपा है—यह भारत के पिछले G20 नेतृत्व की वैश्विक स्वीकारोक्ति भी है। भारत ने G20 को सिर्फ एक सम्मेलन के रूप में नहीं, बल्कि दुनिया की नई विकास यात्रा के मंच के रूप में पेश किया। इसी कारण, भारत की तुलना दक्षिण अफ्रीका के आयोजन से होना स्वाभाविक है, और इसी तुलना में रामाफोसा ने एक हंसी-भरे अंदाज़ में यह स्वीकार किया कि G20 की मेजबानी दिखने में जितनी भव्य लगती है, व्यवहार में उतनी ही कठिन और जटिल होती है।
इस टिप्पणी के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में व्यापक चर्चा शुरू हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि भारत की G20 अध्यक्षता को जितनी सराहना मिली है, वह इस टिप्पणी के बाद और अधिक स्पष्ट हो जाती है। दुनिया ने एक बार फिर महसूस किया कि भारत की कूटनीति सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वैश्विक मुद्दों पर ठोस नेतृत्व करने की क्षमता रखता है।
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति का यह सहज वक्तव्य, जिसने मंच पर मौजूद सभी नेताओं के चेहरे पर मुस्कान ला दी, अपने भीतर एक गहरी कूटनीतिक कहानी समेटे हुए है — एक ऐसी कहानी जिसमें भारत का अनुभव, दक्षिण अफ्रीका की मेहनत, वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाएं और भविष्य की विश्व व्यवस्था की दिशा सभी एक साथ दिखती हैं।
निष्कर्ष रूप में, यह कहा जा सकता है कि रामाफोसा का ‘थैंक्यू’ न सिर्फ दक्षिण अफ्रीका की चुनौतियों का स्वीकार था, बल्कि भारत के नेतृत्व, उसके सहयोग और उसकी वैश्विक भूमिका की एक सच्ची और हृदय से निकली प्रशंसा भी थी। यह टिप्पणी दोनों देशों के बीच दोस्ती को और गहरा करने वाली है और यह दुनिया के लिए संकेत है कि आने वाले वर्षों में भारत और दक्षिण अफ्रीका मिलकर वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं।









