
‘मां’ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की वह ऊर्जा है जिससे जीवन का सृजन होता है। बच्चा जब अपनी पहली पुकार में ‘मां’ कहता है, तो वह अपने अस्तित्व की पहली पहचान देता है। चाहे संस्कृत में ‘मातृ’ हो, उर्दू में ‘अम्मी’ या अंग्रेजी में ‘मदर’, हर भाषा में इस शब्द का स्वर और ममत्व एक समान है। यह इस बात का प्रमाण है कि मां के प्रति अनुराग प्रकृति के कण-कण में व्याप्त है।
भारतीय सनातन संस्कृति में मां को जो सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, वह अद्वितीय है। हमारे शास्त्रों में मान्यता है कि आदि-शक्ति ही समस्त सृष्टि की जननी है। आज जब हम महिला सशक्तिकरण की चर्चा करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि स्त्री प्रकृति से ही सशक्त है। संतान की उत्पत्ति, उसका लालन-पालन और घर से लेकर दुनिया के हर क्षेत्र में परचम लहराना, यह उस शक्ति का प्रतीक है जो केवल नारी के पास है।

मैं स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली मानती हूँ कि मुझे जीवन में ममता के दो धरातल मिले। जहाँ जन्म देने वाली मां के आँचल में मेरा बचपन संवरा, वहीं विवाह के पश्चात सास के रूप में मिली मां ने मुझे वही असीम स्नेह और संरक्षण दिया, जिसने पराये घर को अपना बना दिया। इन दो माताओं के दुलार के बीच जब मैंने स्वयं मातृत्व के पद को धारण किया, तब मुझे अनुभव हुआ कि मां होना वास्तव में एक सुखद और अलौकिक एहसास है। स्वयं मां बनकर मैंने उस निस्वार्थ त्याग और जिम्मेदारी को समझा, जो एक औरत को पूर्ण बनाती है।
आज के आधुनिक दौर में भले ही हम साल में एक दिन ‘मदर्स डे’ मनाते हैं, परंतु भारतीय संस्कृति में तो वर्ष के चारों नवरात्र मां की शक्ति के ही आराधना पर्व हैं। प्रधानमंत्री जी द्वारा महिलाओं को दिया गया आरक्षण उनके अवसरों को बढ़ा सकता है, लेकिन उनकी आंतरिक क्षमता का लोहा पूरी दुनिया मानती है।
यह मदर्स डे केवल उपहार देने का दिन नहीं, बल्कि उस निस्वार्थ प्रेम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। मां एक ऐसा एहसास है जिसे शब्दों में बयां करना असंभव है। वह त्याग की मूर्ति भी है और शक्ति का पर्याय भी।
“मेरी जन्मदात्री मां, जिनके संस्कारों ने मुझे चलना सिखाया और मेरी पूजनीय सासू मां, जिन्होंने अपने स्नेह से मुझे इस नए घर की धुरी बनाया। आप दोनों का प्रेम ही मेरी सबसे बड़ी शक्ति है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आपका आशीर्वाद और साया मुझ पर सदैव बना रहे।”









