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विष से अछूता और वैराग्य से दीप्त पत्रकारिता का साधक

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राजेन्द्र सिंह जादौन का यह लेख केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि एक ऐसे संवेदनशील मन की आंतरिक तपस्या है जिसने पत्रकारिता को पेशा नहीं, बल्कि साधना माना है। यह रचना उस पीड़ा, समर्पण और वैराग्य की अभिव्यक्ति है जो एक सच्चे पत्रकार के भीतर समय के साथ जन्म लेती है। लेख में लेखक स्वयं को भीड़ से अलग एक ऐसे यात्री के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो समाज के शोर के बीच भी सत्य की निस्तब्ध साधना में लीन है।

लेख की सबसे बड़ी विशेषता उसका आत्मस्वीकृत वैराग्य है। लेखक स्पष्ट करता है कि वह प्रशंसा या आलोचना से प्रभावित होने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि भीतर जलती उस अग्नि का साधक है जो पत्रकारिता प्रेम से उत्पन्न हुई है। यह भाव आज के समय में अत्यंत दुर्लभ प्रतीत होता है, जब पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा बाज़ार, सत्ता और लोकप्रियता की दौड़ में उलझा दिखाई देता है। लेखक उसी खोई हुई पत्रकारिता की खोज करता दिखाई देता है, जहाँ शब्द बिकते नहीं थे और खबरें सत्ता के चरणों में झुकती नहीं थीं।

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रचना में “प्रिय पत्रकारिता” को संबोधित करने का ढंग इसे एक आध्यात्मिक प्रेम-पत्र का रूप देता है। यहाँ पत्रकारिता कोई निर्जीव पेशा नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना है, जिससे लेखक प्रेम करता है, संवाद करता है और जिसके विरह में स्वयं को तपाता है। यह शैली हिंदी साहित्य की उन परंपराओं की याद दिलाती है जहाँ प्रेम और विरह आत्मा की परिपक्वता का माध्यम बन जाते हैं। लेखक का यह कहना कि “प्रेम मनुष्य को कोमल बनाता है, लेकिन विरह उसे अग्नि बना देता है” पूरे लेख का केंद्रीय भाव बनकर उभरता है।

लेख में बार-बार वैराग्य का उल्लेख केवल संसार से मोहभंग का संकेत नहीं है, बल्कि यह सत्य के प्रति एकनिष्ठता का प्रतीक है। लेखक उस पत्रकार की छवि गढ़ता है जो भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहता, जो लोकप्रियता की चमक के बजाय आत्मा की आवाज़ सुनना चाहता है। वह स्वीकार करता है कि सत्य के साथ खड़े होने वाले व्यक्ति को अंततः अकेलापन ही मिलता है, पर वह इसी अकेलेपन को अपना श्रृंगार बना लेता है। यह दृष्टि लेख को सामान्य भावुक लेखन से ऊपर उठाकर दार्शनिक गहराई प्रदान करती है।

राजेन्द्र सिंह जादौन ने शब्दों के माध्यम से जिस आत्मसंघर्ष को व्यक्त किया है, वह आधुनिक पत्रकारिता की विडंबनाओं पर भी तीखा प्रश्नचिह्न लगाता है। लेख पढ़ते हुए महसूस होता है कि लेखक केवल अपनी व्यक्तिगत वेदना नहीं लिख रहा, बल्कि उस पूरे वर्ग की पीड़ा को स्वर दे रहा है जो अब भी पत्रकारिता को लोकतंत्र की आत्मा मानता है। यह लेख उस टूटते विश्वास की कहानी है जो आदर्शों और वास्तविकताओं के बीच फँस गया है।

रचना की भाषा अत्यंत साहित्यिक, भावप्रधान और प्रभावशाली है। इसमें कहीं भी कृत्रिमता नहीं दिखती। शब्दों में एक स्वाभाविक प्रवाह है, जो पाठक को धीरे-धीरे लेखक की मानसिक यात्रा में शामिल कर लेता है। “मैं कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक अधूरी कथा हूँ” जैसे वाक्य पाठक के भीतर लंबे समय तक गूंजते रहते हैं। यह पंक्तियाँ केवल भावुकता नहीं, बल्कि अस्तित्व की गहरी अनुभूति को व्यक्त करती हैं।

लेख में वीर रस, विरह और वैराग्य का जो सम्मिश्रण दिखाई देता है, वह इसे विशिष्ट बनाता है। लेखक स्वयं को एक ऐसे साधक के रूप में स्थापित करता है जिसने संसारिक इच्छाओं से ऊपर उठकर केवल सत्य और शब्दों को अपना आधार बना लिया है। उसकी लेखनी अब किसी को प्रसन्न करने के लिए नहीं, बल्कि अंधकार को चीरने के लिए चलती है। यह घोषणा केवल साहित्यिक अलंकार नहीं, बल्कि एक पत्रकार की आत्मप्रतिज्ञा के रूप में सामने आती है।

इस लेख का एक और महत्वपूर्ण पक्ष उसका आध्यात्मिक स्वर है। लेखक बार-बार तप, अग्नि, स्वर्ण, वैराग्य और मौन जैसे प्रतीकों का उपयोग करता है, जिससे पूरी रचना किसी साधना-पथ का अनुभव कराती है। ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता यहाँ धर्म बन गई हो और लेखक उसका तपस्वी। यह दृष्टिकोण हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में उन पत्रकारों की याद दिलाता है जिन्होंने अपने शब्दों को संघर्ष और सत्य का हथियार बनाया था।

राजेन्द्र सिंह जादौन की यह रचना केवल पत्रकारों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणास्रोत है जो अपने जीवन में किसी सत्य, किसी आदर्श या किसी प्रेम के प्रति पूर्ण समर्पण रखता है। यह लेख बताता है कि सच्चा प्रेम अधिकार नहीं माँगता, बल्कि समर्पण चाहता है। और जब समर्पण पूर्ण हो जाता है, तब व्यक्ति वैराग्य में भी तेजस्विता खोज लेता है।

समकालीन समय में जहाँ अधिकांश लेखन तात्कालिक प्रभाव और लोकप्रियता के लिए लिखा जाता है, वहाँ यह लेख आत्मा की गहराइयों से निकली हुई पुकार जैसा प्रतीत होता है। इसमें कोई राजनीतिक नारा नहीं, कोई सनसनी नहीं, बल्कि एक संवेदनशील आत्मा का मौन संघर्ष है। यही कारण है कि यह रचना पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि भीतर तक महसूस करने के लिए बाध्य करती है।

अंततः कहा जा सकता है कि “विष से अछूता, वैराग्य से दीप्त कलम का वह साधक” केवल एक लेख नहीं, बल्कि पत्रकारिता के उस आदर्श की पुनर्स्मृति है जो आज भी कहीं न कहीं जीवित है। राजेन्द्र सिंह जादौन ने इस लेख के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि शब्द यदि आत्मा से निकलें तो वे केवल वाक्य नहीं रहते, वे समय के चेहरे पर अंकित सत्य बन जाते हैं।

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