
डॉ. श्रीवास्तव द्वारा रचित यह ग़ज़ल आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक यथार्थ, नैतिक मूल्यों और देशभक्ति का सुंदर संगम प्रस्तुत करती है। सरल शब्दों में गहरी बात कहने की कला इस रचना को विशेष बनाती है। ग़ज़ल का हर शेर अपने भीतर एक स्वतंत्र विचार और संदेश समेटे हुए है, जो पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।
ग़ज़ल की शुरुआत ही ईश्वर की सत्ता और उसकी सर्वोच्चता को स्थापित करती है—
“ज़मीं फ़लक़ नहीं सूरज भी तब नहीं होता
ये दो जहाँ नहीं होता जो रब नहीं होता”
यह शेर सृष्टि के मूल में ईश्वर की उपस्थिति को दर्शाता है। कवि स्पष्ट करता है कि संसार की हर रचना उसी परम सत्ता की देन है। यदि ईश्वर न होता तो न धरती होती, न आकाश और न ही जीवन का कोई अस्तित्व। यह भाव सूफियाना दर्शन की झलक देता है।
दूसरे शेर में कवि मानव स्वभाव की उस प्रवृत्ति पर कटाक्ष करता है, जहाँ व्यक्ति अपनी असफलताओं के लिए बहाने खोजता रहता है—
“जो काम होना है तुमसे वो जब नहीं होता
नया बहाना बताओ के कब नहीं होता”
यह शेर वर्तमान समाज की मानसिकता को अत्यंत सहज ढंग से उजागर करता है। व्यक्ति कर्म से अधिक बहानों में विश्वास करने लगा है। कवि यहाँ आत्मनिरीक्षण का संदेश देता है।
ग़ज़ल का तीसरा शेर इंसानी कमजोरी और ईश्वर की दया को अभिव्यक्त करता है—
“गुनाह करते ही रहते हैं रोज़ो शब हम सब
करम ही होता है रब का गज़ब नहीं होता”
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि मनुष्य से भूल और पाप होते रहते हैं, लेकिन ईश्वर अपनी दया और करुणा से संसार को संभाले हुए है। यदि उसका केवल ग़ज़ब प्रकट हो जाए तो मनुष्य का अस्तित्व कठिन हो जाए। यह शेर इंसान को विनम्रता और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है।
“जो चाहते हैं वही काम करते रहते हैं
मगर वो काम के राज़ी हो रब नहीं होता”
इस शेर में कवि बताता है कि मनुष्य अपनी इच्छाओं के अनुसार कार्य करता है, लेकिन हर कार्य ईश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं होता। यह पंक्ति कर्म और धर्म के बीच संतुलन बनाने की प्रेरणा देती है।
देशभक्ति का स्वर ग़ज़ल में अत्यंत प्रभावशाली रूप से उभरता है—
“वतन के वास्ते हम खून भी बहाते हैं
वतन के शत्रू का हमसे अदब नहीं होता”
यह शेर राष्ट्रप्रेम और स्वाभिमान का प्रतीक है। कवि स्पष्ट करता है कि देश की रक्षा सर्वोपरि है और राष्ट्र के दुश्मनों के प्रति सम्मान की भावना नहीं हो सकती। यहाँ वीर रस की झलक दिखाई देती है।
“खुदा ही काम बनाता है कारसाज़ है वो
उसी से बोलो कोई काम जब नहीं होता”
इस शेर में कवि ईश्वर को अंतिम सहारा मानता है। जब संसार के सारे मार्ग बंद हो जाते हैं, तब मनुष्य उसी परम शक्ति की ओर लौटता है। यह आस्था और विश्वास का अत्यंत सुंदर चित्रण है।
“जुबाँ चलाने के आदी हैं वो करें भी क्या
सिवा बस इसके कोई काम अब नहीं होता”
यह शेर समाज के उन लोगों पर व्यंग्य है जो केवल आलोचना और वाद-विवाद में लगे रहते हैं, लेकिन स्वयं कोई सकारात्मक कार्य नहीं करते। कवि यहाँ कर्मप्रधान जीवन का संदेश देता है।
“दिखावा करने को हरगिज़ अदब नहीं कहते
अदब तो होता है लेकिन अदब नहीं होता”
यह शेर ग़ज़ल का अत्यंत गूढ़ और प्रभावशाली शेर है। कवि बताता है कि केवल बाहरी दिखावा या औपचारिकता वास्तविक संस्कार और सम्मान नहीं हो सकते। सच्चा अदब मन की विनम्रता और व्यवहार की सच्चाई में होता है।
अंतिम शेर—
“वहाँ भी करते हैं गौहर मुखालेफत कुछ लोग
मुखालेफत का जहाँ पर सबब नहीं होता”
यहाँ “गौहर” तखल्लुस के माध्यम से कवि समाज की उस प्रवृत्ति को सामने लाता है जहाँ लोग बिना कारण भी विरोध करते रहते हैं। यह शेर वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक वातावरण पर भी सटीक टिप्पणी करता है।
समग्र रूप से यह ग़ज़ल आध्यात्म, नैतिकता, सामाजिक यथार्थ और देशभक्ति का संतुलित मिश्रण है। डॉ. श्रीवास्तव ने सरल उर्दू-हिंदी शब्दावली में गहरी बात कही है, जो सीधे हृदय तक पहुँचती है। ग़ज़ल में सूफियाना रंग भी है, सामाजिक चेतना भी और जीवन-दर्शन भी। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।









