
माँ को फुर्सत कहाँ
भारतीय संस्कृति में माँ को सृष्टि की सबसे महान शक्ति माना गया है। माँ के त्याग, ममता, संघर्ष और निस्वार्थ प्रेम को शब्दों में बाँधना सदैव कठिन रहा है। इसी भाव को अत्यंत संवेदनशीलता और सरलता से प्रस्तुत करती कविता “माँ को फुर्सत कहाँ” पाठकों के हृदय को गहराई से स्पर्श कर रही है।
कविता में एक माँ के जीवन के उस पक्ष को उजागर किया गया है, जिसमें वह स्वयं की इच्छाओं, आराम और सपनों का त्याग कर अपने परिवार की खुशियों को प्राथमिकता देती है। रचनाकार ने अत्यंत प्रभावशाली शब्दों में बताया है कि माँ को स्वयं के लिए समय नहीं मिलता, क्योंकि उसका पूरा जीवन अपने बच्चों और परिवार के भविष्य को संवारने में समर्पित रहता है।
कविता की पंक्तियाँ माँ के दैनिक जीवन के संघर्षों को जीवंत करती हैं। भोर होने से पहले जागना, घर-आँगन और परिवार की जिम्मेदारियों को निभाना, स्वयं कठिनाइयाँ सहकर भी अपने बच्चों को सुख और सुरक्षा देना—ये सभी भाव कविता में अत्यंत सहजता से अभिव्यक्त किए गए हैं।
रचना में यह भी दर्शाया गया है कि माँ अपने दर्द और परेशानियों को कभी सामने नहीं आने देती। वह हर परिस्थिति में मुस्कुराते हुए परिवार को संभालती है और अपने त्याग का कभी प्रदर्शन नहीं करती। उसका जीवन शिकायतों से नहीं, बल्कि प्रेम, सेवा और समर्पण से भरा होता है।
कविता का अंतिम भाग माँ को भगवान का स्वरूप बताते हुए उसकी महिमा का वर्णन करता है। रचनाकार का मानना है कि माँ के प्रेम और त्याग की गहराई को पूरी तरह समझ पाना संभव नहीं है। माँ केवल एक संबंध नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति का स्रोत है।
यह कविता पाठकों को अपनी माँ के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और प्रेम व्यक्त करने की प्रेरणा देती है। साथ ही यह संदेश भी देती है कि जिस माँ ने अपने जीवन का हर पल परिवार के लिए समर्पित कर दिया, उसके त्याग और ममता का सम्मान करना हम सभी का कर्तव्य है।
माँ की महानता को समर्पित यह रचना समाज में मातृत्व के महत्व को रेखांकित करती है और यह स्मरण कराती है कि वास्तव में माँ का प्रेम संसार की सबसे अमूल्य धरोहर है। 🌹🙏🌺









