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शिक्षक दिवस विशेष आलेख : शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि चरित्र, संस्कार, विचार और राष्ट्र के भविष्य का निर्माता है; वर्ष के 365 दिन शिक्षक के प्रति सम्मान, सहयोग और कृतज्ञता की भावना बनाए रखने की आवश्यकता

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राष्ट्र निर्माता शिक्षक का सम्मान एक ही दिन क्यों?
लेखक – डॉ. अशोक कुमार भार्गव, पूर्व आईएएस, मध्यप्रदेश
शिक्षक दिवस राष्ट्र निर्माता शिक्षकों के प्रति नमन, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। शिक्षक वह व्यक्तित्व है जो ज्ञान की रोशनी के माध्यम से विद्यार्थियों को अज्ञान और अंधकार से निकालकर ज्ञान, विवेक और आत्मविश्वास के प्रकाश की ओर ले जाता है। वह अपने विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपने वर्तमान का एक बड़ा हिस्सा निस्वार्थ भाव से समर्पित करता है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को आकार देने, उनकी प्रतिभा को पहचानने, उनकी जिज्ञासा को दिशा देने और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए उन्हें मानसिक रूप से तैयार करने वाला मार्गदर्शक होता है। एक अच्छे शिक्षक की भूमिका कक्षा की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहती। उसके द्वारा दिया गया ज्ञान, उसके व्यवहार से मिलने वाले संस्कार और उसके व्यक्तित्व से प्राप्त प्रेरणा विद्यार्थी के जीवन में लंबे समय तक बनी रहती है। यही कारण है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु को अत्यंत उच्च स्थान प्रदान किया गया है। शिक्षक विद्यार्थियों में ज्ञान के साथ-साथ अनुशासन, संवेदना, जिम्मेदारी, सत्यनिष्ठा, परिश्रम, आत्मनिर्भरता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करता है। वह आने वाली पीढ़ी को केवल रोजगार के योग्य नहीं बनाता, बल्कि उसे बेहतर नागरिक और बेहतर मनुष्य बनाने की दिशा में कार्य करता है। जीवन संग्राम में आने वाली कठिनाइयों से जूझने का साहस, असफलताओं से सीखने की क्षमता और सफलता मिलने पर विनम्र बने रहने का संस्कार भी शिक्षा के इसी व्यापक स्वरूप का हिस्सा है। इसलिए शिक्षक दिवस केवल पुष्प अर्पित करने, शुभकामनाएं देने अथवा समारोह आयोजित करने का दिन नहीं, बल्कि शिक्षक की वास्तविक भूमिका पर आत्ममंथन करने का अवसर भी है। यह दिन हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि जिन शिक्षकों के माध्यम से राष्ट्र की भावी पीढ़ी तैयार होती है, उनके सम्मान और गरिमा को केवल एक दिन तक सीमित रखना क्या पर्याप्त है? वास्तव में राष्ट्र निर्माण कोई एक दिन में पूरी होने वाली प्रक्रिया नहीं है। जिस प्रकार एक वृक्ष को बड़ा होने में वर्षों लगते हैं, उसी प्रकार एक विद्यार्थी को ज्ञानवान, चरित्रवान, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाने में शिक्षक का निरंतर परिश्रम लगता है। शिक्षक प्रतिदिन विद्यार्थियों के व्यक्तित्व में कुछ न कुछ जोड़ता है और उनके भीतर छिपी संभावनाओं को विकसित करता है। इसी अर्थ में शिक्षक राष्ट्र के वर्तमान को शिक्षित करके भविष्य का निर्माण करता है और इसलिए उसका सम्मान भी केवल एक अवसर विशेष तक सीमित नहीं होना चाहिए।**
भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु का स्थान अत्यंत ऊंचा रहा है। गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समन्वित स्वरूप के रूप में देखने की परंपरा इस बात को स्पष्ट करती है कि शिक्षक की भूमिका कितनी व्यापक मानी गई है। वह विद्यार्थी के भीतर शुभ संस्कारों का सृजन करता है, उनका संरक्षण एवं विकास करता है और उसके भीतर मौजूद नकारात्मक प्रवृत्तियों तथा अवगुणों को दूर करने में सहायता करता है। इसीलिए गुरु को केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का निर्माता माना गया। कबीरदास ने गुरु और शिष्य के संबंध को कुम्हार और घड़े के उदाहरण से समझाया है। कुम्हार जिस प्रकार मिट्टी के घड़े को बाहर से आकार देता है और भीतर से अपने हाथ का सहारा देकर उसे संतुलित करता है, उसी प्रकार आदर्श शिक्षक भी विद्यार्थी को अनुशासन और आवश्यक कठोरता के माध्यम से दिशा देता है, लेकिन भीतर से उसके प्रति सहानुभूति, संवेदना और विश्वास बनाए रखता है। कबीर का प्रसिद्ध दोहा— “गुरु कुम्हार सिख कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अंतर हाथ सहारे दै, बाहर-बाहर चोट।” —शिक्षक की इसी संतुलित भूमिका को सामने रखता है। शिक्षक कभी विद्यार्थी की गलती पर उसे टोकता है, कभी अनुशासन सिखाता है, कभी असफलता के बाद उसका मनोबल बढ़ाता है और कभी उसकी प्रतिभा को पहचानकर उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। उसका उद्देश्य विद्यार्थी को दबाना नहीं, बल्कि उसे बेहतर बनाना होता है। ऐसे ही सुनिर्मित विद्यार्थी आगे चलकर राष्ट्र के भावी कर्णधार बनते हैं। यदि शिक्षक विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण को गंभीरता से करता है तो उसका सकारात्मक प्रभाव समाज और राष्ट्र के भविष्य में दिखाई देता है। महर्षि अरविंद ने भी अध्यापक को राष्ट्र की संस्कृति का माली बताया है। माली जिस प्रकार पौधों की जड़ों को खाद-पानी देकर उन्हें मजबूत बनाता है, उसी प्रकार शिक्षक संस्कारों की जड़ों को सींचकर विद्यार्थियों में महाप्राण शक्तियों का विकास करता है। इसलिए विद्यार्थी के जीवन में शिक्षक का योगदान केवल परीक्षा में अंक प्राप्त कराने तक सीमित नहीं है। शिक्षक उसे जीवन के व्यापक अर्थ समझाता है। वह उसे बताता है कि सफलता केवल पद, पैसा या प्रतिष्ठा हासिल करने का नाम नहीं है, बल्कि जीवन को सार्थक बनाना, समाज के प्रति जिम्मेदार होना और अपने ज्ञान का उपयोग मानव कल्याण के लिए करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी कारण भारतीय परंपरा में गुरु के प्रति कृतज्ञता को जीवन का महत्वपूर्ण संस्कार माना गया। विद्यार्थी को यह समझना चाहिए कि उसे प्राप्त ज्ञान के पीछे शिक्षक का समय, श्रम, धैर्य और स्नेह जुड़ा होता है। गुरु की महिमा का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनके बताए हुए सद्मार्ग पर चलकर किया जाना चाहिए।**
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन शिक्षक की गरिमा का प्रेरक उदाहरण है। महान दार्शनिक, शिक्षाविद् और भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपने जन्मदिवस को व्यक्तिगत उत्सव के बजाय शिक्षकों के सम्मान के अवसर में परिवर्तित करने की प्रेरणा दी। उनके जन्मदिवस 5 सितंबर को वर्ष 1962 से शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। इस परंपरा के पीछे मूल भावना यही थी कि समाज उन शिक्षकों को सम्मान दे, जो आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान और संस्कार प्रदान करने का कार्य करते हैं। शिक्षक दिवस हमें डॉ. राधाकृष्णन के विचारों और शिक्षक की व्यापक भूमिका पर विचार करने का अवसर देता है। किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में शिक्षक की भूमिका अप्रतिम होती है। चाणक्य से जुड़ा प्रसिद्ध विचार है कि “शिक्षक कभी साधारण नहीं होता, प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं।” यह विचार शिक्षक की जिम्मेदारी की व्यापकता को रेखांकित करता है। शिक्षक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान, बौद्धिक परंपराएं, सामाजिक मूल्य और तकनीकी कौशल पहुंचाने का माध्यम होता है। उसका प्रभाव केवल वर्तमान विद्यार्थी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विद्यार्थी के माध्यम से परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता है। शिक्षक की कही हुई एक बात किसी विद्यार्थी के जीवन की दिशा बदल सकती है। उसके द्वारा दिया गया आत्मविश्वास किसी असफल विद्यार्थी को दोबारा प्रयास करने की शक्ति दे सकता है। उसके द्वारा समझाया गया कोई मूल्य जीवन की कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने का आधार बन सकता है। इसी व्यापक प्रभाव के कारण शिक्षक के कार्य का वास्तविक मूल्यांकन केवल परीक्षा परिणाम या विद्यालय के आंकड़ों से नहीं किया जा सकता। एक शिक्षक का प्रभाव कभी-कभी वर्षों बाद सामने आता है, जब उसका विद्यार्थी समाज के किसी क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए उन मूल्यों को आगे बढ़ाता है जो उसने अपने गुरु से सीखे थे। यही कारण है कि शिक्षक का सम्मान वास्तव में भविष्य के सम्मान के समान है। शिक्षक को सम्मान देना उस ज्ञान परंपरा का सम्मान है जिसके आधार पर समाज आगे बढ़ता है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति को केवल जानकारी नहीं मिलती, बल्कि वह विचार करना, प्रश्न करना, तर्क करना, निर्णय लेना और परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को विकसित करना सीखता है। इसलिए शिक्षक दिवस हमें यह याद दिलाता है कि शिक्षक की भूमिका को किसी एक दिन के आयोजन तक सीमित करने के बजाय वर्षभर उनके कार्यों, चुनौतियों और आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए।**
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन, अधिकार प्राप्ति और मुक्ति का अत्यंत शक्तिशाली माध्यम माना। उनके विचारों में शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान हासिल करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यक्ति को जागरूक, आत्मसम्मान से युक्त और अपने अधिकारों एवं दायित्वों के प्रति सजग बनाने का साधन है। इसी व्यापक दृष्टिकोण से शिक्षक की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षक को केवल नौकरी करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र रूपी रथ का सारथी समझना चाहिए। शिक्षा शिक्षक के आचरण और व्यवहार से भी मिलती है। विद्यार्थी शिक्षक की बातों से जितना सीखता है, उससे कहीं अधिक उसके व्यवहार और जीवनशैली से सीख सकता है। इसलिए शिक्षक में करुणा, समता, बंधुता, विवेक, अनुशासन और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था का होना आवश्यक है। शिक्षक का व्यक्तित्व स्वयं एक पाठ्यपुस्तक की तरह होता है। वह समय का सम्मान करता है तो विद्यार्थी समय का महत्व समझता है। वह ईमानदारी से अपना कार्य करता है तो विद्यार्थी भी जिम्मेदारी की भावना सीखता है। वह दूसरों के प्रति संवेदनशील व्यवहार करता है तो विद्यार्थी में भी सहानुभूति विकसित होती है। आज के डिजिटल युग में शिक्षक की भूमिका और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। इंटरनेट, सामाजिक माध्यमों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने ज्ञान तक पहुंच को अत्यंत आसान बना दिया है। अब विद्यार्थी को जानकारी प्राप्त करने के लिए केवल पुस्तक या शिक्षक पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन जानकारी और ज्ञान में अंतर होता है। जानकारी इंटरनेट से मिल सकती है, परंतु सही और गलत के बीच अंतर करने का विवेक, ज्ञान के उपयोग की दिशा और जीवन में मूल्यों की स्थापना अभी भी मानवीय मार्गदर्शन की मांग करती है। यही वह क्षेत्र है जहां शिक्षक की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता चाहे कितनी भी विकसित क्यों न हो जाए, विद्यार्थी के मनोभावों को समझना, उसकी व्यक्तिगत परिस्थितियों को पहचानना, उसकी जिज्ञासा को सही दिशा देना और उसके भीतर मानवीय संवेदनाओं को विकसित करना शिक्षक के मानवीय स्पर्श से ही संभव है। आधुनिक तकनीक शिक्षक की भूमिका को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे नए रूप में अधिक महत्वपूर्ण बनाती है। आज शिक्षक को केवल विषय विशेषज्ञ ही नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, सलाहकार, प्रेरक और मूल्य-निर्माता की भूमिका भी निभानी है। इसलिए शिक्षक के सम्मान का अर्थ केवल मंच पर सम्मानित करना नहीं, बल्कि उसे ऐसा वातावरण देना भी है जिसमें वह बिना अनावश्यक दबाव के अपनी रचनात्मकता और शिक्षकीय प्रतिभा का उपयोग कर सके।**
प्रश्न यह है कि जिस धरा पर गुरु को गोविंद से पहले सम्मान देने की परंपरा रही है, वहां शिक्षक का सम्मान केवल एक दिन क्यों हो? क्या शिक्षक दिवस के अवसर पर फूल अर्पित करना, शुभकामनाएं देना और समारोह आयोजित करना पर्याप्त है? निश्चित रूप से यह सम्मान आवश्यक है, लेकिन शिक्षक की गरिमा इससे कहीं व्यापक है। राष्ट्र का निर्माण केवल एक दिन में नहीं होता। राष्ट्र निर्माण के लिए वर्षों की साधना, निरंतर परिश्रम और पीढ़ियों के निर्माण की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार शिक्षक भी किसी विद्यार्थी को एक दिन में संपूर्ण नहीं बना देता। वह प्रतिदिन उसके ज्ञान, व्यवहार, विचार और व्यक्तित्व में सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है। इसलिए शिक्षक को वर्ष में केवल एक दिन नहीं, बल्कि प्रत्येक दिन सम्मान, सहयोग और विश्वास मिलना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि शिक्षक समुदाय को किसी भी प्रकार की जवाबदेही से मुक्त कर दिया जाए। शिक्षकों के अधिकारों के साथ उनके दायित्व भी जुड़े हुए हैं। विशाल शिक्षकीय समुदाय में अधिकांश शिक्षक पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ अपना दायित्व निभाते हैं। यदि कहीं कोई शिक्षक अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन रहता है, समय पर विद्यालय नहीं पहुंचता अथवा शिक्षण कार्य में अपेक्षित गंभीरता नहीं बरतता, तो नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए। कुछ व्यक्तियों की कमियों के आधार पर पूरे शिक्षक समुदाय को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। जैसे एक तालाब में कुछ गंदी मछलियां होने से पूरा तालाब गंदा नहीं हो जाता, वैसे ही कुछ लोगों की कमियों के कारण संपूर्ण शिक्षक समाज की निष्ठा पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। शिक्षक भी अनेक सामाजिक, प्रशासनिक और व्यावहारिक चुनौतियों के बीच अपना कार्य करते हैं। उन्हें पर्याप्त संसाधन, सम्मानजनक कार्य वातावरण, प्रशिक्षण, आवश्यक शैक्षणिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा मिले, यह भी उतना ही आवश्यक है। शिक्षक यदि लगातार तनाव में रहेगा, अनावश्यक प्रशासनिक दबावों से घिरा रहेगा या उसे शिक्षण के अतिरिक्त ऐसे कार्यों में अत्यधिक व्यस्त रखा जाएगा जो उसके मूल दायित्व से संबंधित नहीं हैं, तो उसकी शिक्षण क्षमता प्रभावित हो सकती है। राष्ट्र निर्माता कहने भर से राष्ट्र का निर्माण नहीं होगा। राष्ट्र निर्माण के लिए शिक्षक को अपने दायित्वों का निर्वहन करने की पर्याप्त स्वतंत्रता और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना भी जरूरी है। शिक्षक का सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक उत्थान शिक्षा की गुणवत्ता से सीधे जुड़ा विषय है। यदि शिक्षक सम्मान, सुरक्षा और प्रोत्साहन के वातावरण में काम करेगा तो वह विद्यार्थियों को भी आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर सकेगा। इसलिए शिक्षक दिवस पर केवल शिक्षक को सम्मानित करने की बात न हो, बल्कि शिक्षक को बेहतर ढंग से कार्य करने के लिए आवश्यक वातावरण उपलब्ध कराने पर भी गंभीर विचार होना चाहिए।**
शिक्षक के दायित्व की कठिनाई को समझने के लिए यह विचार पर्याप्त है कि भवन बनाना, सड़क बनाना या नदी पर बांध बनाना कठिन अवश्य हो सकता है, लेकिन एक आदर्श पीढ़ी का निर्माण उससे भी अधिक जटिल कार्य है। गगनचुंबी इमारतों का निर्माण इंजीनियरिंग और तकनीकी कौशल से किया जा सकता है, उफनती नदी के वेग को नियंत्रित करने के लिए वैज्ञानिक साधनों का उपयोग किया जा सकता है और चट्टानों को काटकर सड़कें बनाई जा सकती हैं, लेकिन मनुष्य के मन, विचार और चरित्र का निर्माण केवल तकनीकी प्रक्रिया से संभव नहीं है। यह कार्य संवेदना, धैर्य, अनुभव, ज्ञान और निरंतर संवाद मांगता है। माता-पिता बच्चे के प्रथम गुरु होते हैं और उनके बाद शिक्षक उसके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी कारण शिक्षक की जिम्मेदारी अत्यंत पवित्र और चुनौतीपूर्ण है। शिक्षकों की इसी भूमिका को समझने के लिए एक प्रेरक प्रसंग सामने आता है। एक विद्यालय में तीन विद्यार्थी देर से पहुंचे और तब तक प्रार्थना समाप्त हो चुकी थी। विद्यालय के प्राचार्य ने अनुशासन और समय की महत्ता समझाने के उद्देश्य से उन्हें मैदान के तीन चक्कर लगाने की सजा दी। तीनों विद्यार्थी आदेश के अनुसार मैदान में दौड़ने लगे। दो चक्कर पूरे करने के बाद उन्होंने देखा कि उनके पीछे विद्यालय के प्राचार्य भी दौड़ रहे हैं। प्राचार्य की उम्र लगभग पचपन वर्ष थी और वे भी दौड़ते हुए हांफ रहे थे। विद्यार्थियों ने रुककर उनसे पूछा कि वे क्यों दौड़ रहे हैं। प्राचार्य ने जो उत्तर दिया, वह शिक्षक के आत्ममंथन और जिम्मेदारी का उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि यदि अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद वे विद्यार्थियों को अनुशासन और समय की महत्ता नहीं समझा सके, तो इसका अर्थ है कि उनके प्रयासों में कहीं न कहीं कमी रही है। इसलिए जितनी गलती विद्यार्थियों की है, उससे अधिक जिम्मेदारी उनकी अपनी है। चूंकि उन्हें कोई अलग से दंड नहीं दे सकता, इसलिए उन्होंने स्वयं अपने लिए दंड निर्धारित किया और विद्यार्थियों के साथ मैदान के चक्कर लगाने लगे। इस प्रसंग का संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। आदर्श शिक्षक केवल विद्यार्थी की गलती नहीं देखता, बल्कि अपनी शिक्षण प्रक्रिया और अपने प्रयासों की भी समीक्षा करता है। वह विद्यार्थी की असफलता को केवल विद्यार्थी की कमजोरी मानकर स्वयं को जिम्मेदारी से अलग नहीं करता। वह सोचता है कि क्या मैंने पर्याप्त प्रयास किया, क्या मैंने विद्यार्थी को सही ढंग से समझाया, क्या मैंने उसके स्तर और परिस्थिति को समझा? यही आत्ममंथन एक सामान्य शिक्षक और आदर्श शिक्षक के बीच अंतर पैदा करता है। कुछ शिक्षक केवल पढ़ाते हैं, कुछ शिक्षक विषय की व्याख्या करते हैं और कुछ उत्कृष्ट शिक्षक विद्यार्थियों के मन में सीखने की जिज्ञासा पैदा करते हैं। वास्तव में शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य जिज्ञासा जगाना है। जब विद्यार्थी स्वयं प्रश्न पूछने लगता है, सीखने में आनंद अनुभव करता है और ज्ञान को जीवन से जोड़ने लगता है, तभी शिक्षा सार्थक होती है। ऐसे शिक्षक समाज के लिए वास्तविक प्रेरणास्तंभ होते हैं।**
आज सोशल मीडिया, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के चमत्कारी दौर में भी शिक्षक की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है, बल्कि उसका स्वरूप और अधिक व्यापक हो गया है। विद्यार्थियों के सामने आज सूचनाओं की भरमार है, लेकिन इतनी अधिक सूचनाओं के बीच सही ज्ञान का चयन करना भी एक चुनौती है। ऐसे समय में शिक्षक विद्यार्थी को विवेकपूर्ण ढंग से सोचने, तथ्यों की जांच करने, प्रश्न पूछने और तकनीक का जिम्मेदारी से उपयोग करने की क्षमता प्रदान करता है। वह विद्यार्थियों को केवल परीक्षा के लिए तैयार नहीं करता, बल्कि जीवन के लिए तैयार करता है। आज का विद्यार्थी वैश्विक दुनिया का हिस्सा है। उसके सामने शिक्षा, रोजगार, तकनीकी परिवर्तन, सामाजिक बदलाव और प्रतिस्पर्धा से जुड़ी अनेक चुनौतियां हैं। ऐसे वातावरण में शिक्षक उसकी मानसिक शक्ति, आत्मविश्वास और नैतिक दृष्टि को मजबूत करता है। वह उसे असफलता से घबराने के बजाय उससे सीखने की प्रेरणा देता है। वह उसे बताता है कि जीवन में परिस्थितियां हमेशा अनुकूल नहीं रहतीं, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति, परिश्रम और सही दिशा के माध्यम से कठिनाइयों को अवसरों में बदला जा सकता है। शिक्षक विद्यार्थियों के चिंतन का क्षितिज व्यापक करता है और उनके विचारों को परिष्कृत करता है। आज भारत के विभिन्न क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर उपलब्धियां प्राप्त कर रहे युवाओं के पीछे कहीं न कहीं उनके शिक्षकों का योगदान भी मौजूद है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, प्रशासन, रक्षा, उद्योग, कृषि, खेल, कला, साहित्य और अन्य क्षेत्रों में देश की प्रगति की नींव शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी है और शिक्षा व्यवस्था के केंद्र में शिक्षक है। इसलिए शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहना केवल एक भावनात्मक संबोधन नहीं, बल्कि एक वास्तविक सामाजिक तथ्य है। हालांकि शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहने के साथ समाज और सरकार की यह जिम्मेदारी भी बनती है कि शिक्षक के कार्य की गरिमा को व्यवहार में सम्मान मिले। शिक्षकों को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों, विद्यालयों में आवश्यक सुविधाएं हों, प्रशिक्षण के अवसर मिलें, नवाचार को प्रोत्साहन मिले और उन्हें अनावश्यक दबाव से मुक्त वातावरण मिले। शिक्षा की गुणवत्ता तभी बेहतर हो सकती है जब शिक्षक स्वयं मानसिक रूप से स्वस्थ, सम्मानित और प्रेरित महसूस करे। एक प्रसिद्ध भावार्थ यह बताता है कि यदि शिक्षक स्वयं अभाव और तनाव से जूझ रहा हो तो ज्ञान के प्रसार की क्षमता भी प्रभावित होती है। इसलिए शिक्षक के कल्याण को शिक्षा की गुणवत्ता से अलग करके नहीं देखा जा सकता। शिक्षक का सम्मान केवल शाब्दिक सम्मान नहीं, बल्कि उसकी कार्य परिस्थितियों में सुधार, उसकी प्रतिभा का सम्मान और उसके निर्णयों में आवश्यक विश्वास से भी जुड़ा है।**
शिक्षक दिवस का वास्तविक संदेश यही होना चाहिए कि शिक्षक का सम्मान केवल 5 सितंबर तक सीमित न रहे। 5 सितंबर निश्चित रूप से शिक्षकों के प्रति सार्वजनिक रूप से कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर है, लेकिन शिक्षक के योगदान का प्रभाव वर्ष के हर दिन विद्यार्थी के जीवन में उपस्थित रहता है। इसलिए वर्ष के बाकी 364 दिन भी शिक्षक के प्रति सम्मान की भावना व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए। इसका सबसे अच्छा तरीका यही है कि विद्यार्थी अपने शिक्षक से प्राप्त ज्ञान और संस्कार को अपने जीवन में उतारें, समाज के प्रति जिम्मेदार बनें और आगे चलकर दूसरों के जीवन में भी ज्ञान का प्रकाश फैलाएं। शिक्षक के प्रति सच्चा सम्मान तब होगा जब उसका विद्यार्थी ईमानदारी से अपना दायित्व निभाए, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करे, कमजोर व्यक्ति के प्रति संवेदनशील बने, कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखे और अपने देश तथा समाज के प्रति जिम्मेदारी को समझे। इसी प्रकार समाज का शिक्षक के प्रति सम्मान तब सार्थक होगा जब शिक्षकों को गरिमापूर्ण स्थान, उचित संसाधन और स्वतंत्र वातावरण प्रदान किया जाए। हमें यह भी समझना होगा कि शिक्षक समाज से अलग कोई वर्ग नहीं, बल्कि समाज के भविष्य को तैयार करने वाला महत्वपूर्ण अंग है। भारत की सांस्कृतिक चेतना में शिक्षा और समाज का संबंध अत्यंत प्राचीन है। वेद, उपनिषद, पुराण और भारतीय दर्शन की परंपरा से लेकर नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों तक ज्ञान की समृद्ध परंपरा दिखाई देती है। गुरुकुल व्यवस्था में शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका नहीं, बल्कि पूर्ण मनुष्य का निर्माण माना जाता था। विद्यार्थी ज्ञान, चरित्र, आत्मअनुशासन और जीवन-मूल्यों से संपन्न होकर समाज में प्रवेश करता था। इतिहास के विभिन्न कालखंडों में शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप में परिवर्तन हुए और औपनिवेशिक काल में शिक्षा के उद्देश्य तथा स्वरूप में भी महत्वपूर्ण बदलाव आया। स्वतंत्रता के बाद भारत ने शिक्षा के विस्तार और विकास के लिए अनेक प्रयास किए। आधुनिक समय में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषाओं, कौशल, समग्र शिक्षा, रचनात्मकता और विद्यार्थी-केंद्रित दृष्टिकोण को महत्व देने का प्रयास किया गया है। शिक्षा नीति का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा जब शिक्षक उसके केंद्र में रहकर अपने ज्ञान और अनुभव के माध्यम से विद्यार्थियों तक उसके उद्देश्यों को पहुंचाएंगे। इसलिए शिक्षा में किसी भी सुधार की सफलता शिक्षक की सक्रिय भूमिका के बिना संभव नहीं है। शिक्षक को नीति का केवल क्रियान्वयनकर्ता नहीं, बल्कि शिक्षा परिवर्तन का प्रमुख सहभागी बनाना होगा।**
वास्तव में शिक्षक दिवस हमें शिक्षक का सम्मान करने के साथ-साथ अपने भीतर यह प्रश्न पैदा करने का अवसर देता है कि हम शिक्षक की भूमिका को कितना समझते हैं। क्या हम शिक्षक को केवल परीक्षा परिणाम देने वाली व्यवस्था का हिस्सा मानते हैं या उसे राष्ट्र और चरित्र निर्माण की केंद्रीय शक्ति के रूप में स्वीकार करते हैं? क्या हम चाहते हैं कि शिक्षक विद्यार्थियों में रचनात्मकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवेदनशीलता, लोकतांत्रिक मूल्य और आत्मनिर्भरता विकसित करे, तो क्या हम उसे इसके लिए आवश्यक स्वतंत्रता और संसाधन भी देते हैं? क्या हम चाहते हैं कि शिक्षक विद्यार्थियों को जीवन की कठिन परिस्थितियों से लड़ना सिखाए, तो क्या हम स्वयं शिक्षक के सामने मौजूद कठिनाइयों को समझने और उनका समाधान करने के लिए तैयार हैं? इन प्रश्नों पर गंभीर चिंतन आवश्यक है। शिक्षक की गरिमा केवल सम्मान समारोहों में नहीं, बल्कि समाज के व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए। शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहने का अर्थ तभी सार्थक होगा जब उसकी आवाज को शिक्षा संबंधी निर्णयों में महत्व मिले, उसकी व्यावसायिक क्षमता को विकसित करने के अवसर मिलें और उसके कार्य का मूल्यांकन न्यायपूर्ण एवं संतुलित तरीके से किया जाए। इसी के साथ शिक्षक समुदाय की भी जिम्मेदारी है कि वह अपने पद की गरिमा के अनुरूप आचरण करे। समय की पाबंदी, विषय का गहन ज्ञान, विद्यार्थियों के प्रति संवेदनशीलता, निरंतर अध्ययन, तकनीकी बदलावों को समझना और अपने ज्ञान को अद्यतन रखना एक आदर्श शिक्षक की पहचान होनी चाहिए। विद्यार्थी भी शिक्षक को केवल अंक देने वाला व्यक्ति न समझें। गुरु-शिष्य संबंध का आधार विश्वास, सम्मान और संवाद होना चाहिए। शिक्षक विद्यार्थी की प्रतिभा को पहचानता है और विद्यार्थी शिक्षक के अनुभव से सीखता है। जब दोनों के बीच यह संबंध मजबूत होता है, तब शिक्षा केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की प्रक्रिया नहीं रहती, बल्कि जीवन निर्माण की यात्रा बन जाती है। आज आवश्यकता है कि शिक्षक दिवस को औपचारिकता से आगे ले जाकर शिक्षा और शिक्षक की भूमिका पर समाजव्यापी संवाद का अवसर बनाया जाए। विद्यालयों में ऐसे वातावरण का निर्माण हो जहां विद्यार्थी प्रश्न पूछ सकें, शिक्षक प्रयोग कर सकें और सीखने की प्रक्रिया आनंददायक बन सके। माता-पिता भी शिक्षक को केवल परीक्षा परिणाम के आधार पर न आंकें, बल्कि बच्चे के समग्र विकास में शिक्षक के योगदान को समझें। समाज भी शिक्षकों के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण रखे और उनकी समस्याओं को संवेदनशीलता से समझे।**
हमारे देश में ऐसे आदर्श शिक्षकों की कमी नहीं है जिनका जीवन स्वयं प्रेरणा और प्रोत्साहन का प्रकाशस्तंभ है। ऐसे शिक्षक कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने विद्यार्थियों के भविष्य को संवारते हैं। वे सीमित साधनों में भी बेहतर करने का प्रयास करते हैं। वे विद्यार्थियों के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानते हैं और उसे आगे बढ़ने का अवसर देते हैं। वे केवल यह नहीं देखते कि विद्यार्थी आज कहां खड़ा है, बल्कि यह देखते हैं कि उसमें भविष्य में क्या बनने की क्षमता है। यही शिक्षक राष्ट्र की वास्तविक संपदा हैं। किसी विद्यार्थी की सफलता के पीछे उसके माता-पिता के साथ-साथ शिक्षक का मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण होता है। विद्यार्थी जब जीवन में आगे बढ़ता है तो उसके साथ उसके शिक्षक की शिक्षाएं भी आगे बढ़ती हैं। एक चिकित्सक अपने रोगियों की सेवा करता है, अभियंता निर्माण करता है, वैज्ञानिक नए ज्ञान की खोज करता है, प्रशासक व्यवस्था चलाता है, सैनिक देश की सुरक्षा करता है और उद्यमी रोजगार के अवसर पैदा करता है, लेकिन इन सभी क्षेत्रों के लिए आवश्यक मानव संसाधन तैयार करने में शिक्षक की भूमिका प्रारंभिक और आधारभूत होती है। इस दृष्टि से शिक्षक की भूमिका को किसी एक पेशे की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। वह अन्य सभी क्षेत्रों के लिए प्रतिभा तैयार करने वाला मार्गदर्शक है। इसलिए शिक्षक का सम्मान वास्तव में उन सभी संभावनाओं का सम्मान है जो देश के भविष्य में मौजूद हैं। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि राष्ट्र का वास्तविक निर्माण विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के विचारों और चरित्र के निर्माण से होता है। यदि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम बन जाए और चरित्र, विवेक तथा सामाजिक उत्तरदायित्व पीछे छूट जाएं, तो विकास अधूरा रह जाएगा। इसके विपरीत यदि शिक्षा ज्ञान के साथ मानवीय मूल्यों को जोड़ती है, तो वही शिक्षा राष्ट्र को मजबूत आधार प्रदान करती है। शिक्षक इस समन्वय का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाते हुए हमें केवल बधाई देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह संकल्प भी लेना चाहिए कि हम शिक्षकों की गरिमा का सम्मान वर्षभर करेंगे, उनके कार्य को समझेंगे, उनकी चुनौतियों के प्रति संवेदनशील रहेंगे और शिक्षा को समाज की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में स्थान देंगे।**
अंततः यही कहा जा सकता है कि शिक्षक का सम्मान एक दिन का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के प्रति हमारी निरंतर प्रतिबद्धता का प्रतीक होना चाहिए। शिक्षक विद्यार्थियों के वर्तमान को ज्ञान से प्रकाशित करता है, उनके व्यक्तित्व को संस्कारों से समृद्ध करता है और उन्हें भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करता है। वह अपने विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, जिज्ञासा, अनुशासन, विवेक और मानवीय संवेदना का विकास करता है। उसके योगदान का वास्तविक मूल्यांकन किसी एक समारोह, प्रमाणपत्र या सम्मान से नहीं किया जा सकता। शिक्षक का सबसे बड़ा सम्मान उसका विद्यार्थी है, जो उसके बताए रास्ते पर चलकर समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बनता है। इसलिए शिक्षक दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि शिक्षक के प्रति सम्मान केवल फूलों और शुभकामनाओं तक सीमित नहीं रहेगा। हम उनके ज्ञान का सम्मान करेंगे, उनके श्रम को समझेंगे, उनके दायित्वों को स्वीकार करेंगे और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में अपना योगदान देंगे। जिस समाज में शिक्षक सम्मानित होता है, वहां ज्ञान का वातावरण मजबूत होता है और जिस राष्ट्र में ज्ञान एवं चरित्र को प्राथमिकता मिलती है, उसका भविष्य अधिक सशक्त बनता है। राष्ट्र का निर्माण लगातार चलने वाली प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया में शिक्षक की भूमिका निरंतर बनी रहती है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि “शिक्षक दिवस क्यों मनाएं?” बल्कि उससे भी बड़ा सवाल है—“शिक्षक का सम्मान केवल एक दिन क्यों करें?” 5 सितंबर हमें अवसर देता है कि हम अपने गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें, लेकिन 6 सितंबर से लेकर अगले 4 सितंबर तक भी उनके प्रति वही सम्मान हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। यही शिक्षक दिवस की वास्तविक भावना होगी। यही राष्ट्र निर्माता शिक्षक के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। और यही उस भारतीय परंपरा का सम्मान होगा, जिसने गुरु को ज्ञान, संस्कार और जीवन-दर्शन का प्रकाशस्तंभ माना है। शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। 🌸🌸🌸🌸🌸
लेखक – डॉ. अशोक कुमार भार्गव, पूर्व आईएएस, मध्यप्रदेश
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