
रायगढ़। 41वें चक्रधर समारोह की आठवीं सांस्कृतिक संध्या में जब महज छह वर्ष की नन्हीं कथक नृत्यांगना निमृत पात्रा ने मंच पर कदम रखा, तो देखते ही देखते समारोह का माहौल तालियों की गूंज से भर उठा। छोटी सी उम्र, मासूम चेहरे पर आत्मविश्वास और पैरों में बंधे घुंघरुओं की लय के साथ निमृत ने कथक की ऐसी प्रस्तुति दी कि दर्शक उनकी कला को देखते रह गए। मंच पर उनकी भाव-भंगिमाएं, पदसंचालन, फुटवर्क और नृत्य की बारीकियों ने यह दिखाया कि कला की साधना उम्र की मोहताज नहीं होती। 41वें चक्रधर समारोह जैसे बड़े सांस्कृतिक मंच पर इतनी कम उम्र में प्रस्तुति देना स्वयं में उल्लेखनीय रहा और निमृत की प्रस्तुति आठवीं संध्या के आकर्षणों में शामिल हो गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार निमृत श्रीमती जया मानिकपुरी के मार्गदर्शन में कथक का प्रशिक्षण ले रही हैं और इससे पहले भी कई प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी कला प्रस्तुत कर चुकी हैं।
निमृत पात्रा के मंच पर आने के साथ ही दर्शकों की निगाहें उनकी ओर टिक गईं। छह वर्ष की उम्र में किसी बड़े सांस्कृतिक समारोह के मंच पर शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत करना निरंतर अभ्यास, प्रशिक्षण और मंचीय अनुशासन की मांग करता है। निमृत ने अपनी प्रस्तुति में कथक के विभिन्न पक्षों को सहजता के साथ सामने रखा। उनके पैरों की गति, ताल के साथ कदमों का सामंजस्य और भावों के अनुरूप चेहरे की अभिव्यक्ति ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। मंच पर उनकी नृत्य मुद्रा में आत्मविश्वास दिखाई दिया और प्रस्तुति के दौरान वे पूरे मनोयोग से कथक की भाव-भाषा को अभिव्यक्त करती नजर आईं। प्रस्तुति समाप्त होने के बाद दर्शकों ने तालियों के माध्यम से नन्हीं कलाकार का उत्साह बढ़ाया।
कथक जैसी शास्त्रीय नृत्य विधा में कम उम्र से प्रशिक्षण लेने वाले कलाकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण पक्ष नियमित अभ्यास और गुरु का मार्गदर्शन होता है। निमृत को जया मानिकपुरी के मार्गदर्शन में कथक की शिक्षा मिल रही है। गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय शास्त्रीय कलाओं की महत्वपूर्ण आधारशिला रही है, जहां तकनीकी ज्ञान के साथ मंचीय अनुशासन, भावाभिव्यक्ति, लय की समझ और प्रस्तुति की मर्यादा भी धीरे-धीरे विकसित की जाती है। निमृत की प्रस्तुति में इसी प्रशिक्षण की झलक दिखाई दी। इतनी छोटी उम्र में मंच पर सहजता से प्रस्तुति देना उनके अभ्यास और अब तक के मंचीय अनुभव को दर्शाता है।
चक्रधर समारोह का मंच रायगढ़ की कला और सांस्कृतिक विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है। महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना और रायगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को समर्पित 41वां अंतरराष्ट्रीय चक्रधर समारोह 14 से 23 सितंबर 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। समारोह में देश और प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से कलाकार शास्त्रीय नृत्य, गायन, वादन, लोककला और अन्य सांस्कृतिक विधाओं की प्रस्तुतियां दे रहे हैं। ऐसे मंच पर स्थानीय और युवा प्रतिभाओं को अवसर मिलना उनके कला-सफर के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। निमृत की प्रस्तुति भी इसी व्यापक सांस्कृतिक क्रम का हिस्सा रही।
आठवीं संध्या के कार्यक्रम में निमृत पात्रा की प्रस्तुति निर्धारित कार्यक्रम क्रम का हिस्सा थी। कार्यक्रम की शुरुआत रायगढ़ की कथक कलाकार मायरा श्रीवास्तव की प्रस्तुति से हुई और उसके बाद निमृत पात्रा ने सेमी-क्लासिकल नृत्य प्रस्तुत किया। आगे कार्यक्रम में अन्य नृत्य एवं संगीत प्रस्तुतियां हुईं। शाम से रात तक चलने वाले इस सांस्कृतिक क्रम में कथक, ओडिसी, लोक संगीत, नृत्य नाटिका तथा वादन की अलग-अलग प्रस्तुतियां शामिल थीं। इस विविधतापूर्ण कार्यक्रम में नन्हीं निमृत की प्रस्तुति ने युवा प्रतिभा और शास्त्रीय नृत्य की संभावनाओं को मंच पर सामने रखा।
निमृत की खासियत यह रही कि उन्होंने अपनी उम्र के अनुरूप सहजता और आत्मविश्वास के साथ मंच संभाला। बड़े कलाकारों के बीच किसी छोटे कलाकार के लिए मंच पर अपनी उपस्थिति बनाए रखना आसान नहीं होता। दर्शकों की बड़ी संख्या, रोशनी, संगीत, मंच की विशालता और कार्यक्रम की औपचारिकता के बीच कलाकार को अपनी प्रस्तुति पर केंद्रित रहना पड़ता है। निमृत ने इस चुनौती को सहजता के साथ संभालते हुए अपनी प्रस्तुति दी। उनके भाव और पदसंचालन में अभ्यास की झलक दिखाई दी। प्रस्तुति के दौरान दर्शकों का ध्यान लगातार उनकी ओर बना रहा और समाप्ति के बाद तालियों की गूंज सुनाई दी।
निमृत का अब तक का मंचीय सफर भी उनकी छोटी उम्र की तुलना में उल्लेखनीय है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे रायपुर साहित्य उत्सव 2026, पाली महोत्सव 2026 और अमरकंटक नर्मदा महोत्सव जैसे आयोजनों में कथक की प्रस्तुतियां दे चुकी हैं। इन मंचों पर प्रस्तुति का अनुभव किसी भी युवा कलाकार के लिए सीखने और अपने आत्मविश्वास को मजबूत करने का अवसर होता है। अलग-अलग दर्शक समूहों के सामने प्रस्तुति देने से कलाकार को मंच की परिस्थितियों को समझने, संगीत के साथ तालमेल बैठाने और प्रस्तुति के दौरान एकाग्रता बनाए रखने का अनुभव मिलता है। निमृत ने इतनी कम उम्र में ऐसे मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
वर्ष 2025 में भुवनेश्वर के रवीन्द्र मंडप में आयोजित राष्ट्रीय महोत्सव ‘त्रिधारा 39वां श्रद्धांजलि समारोह’ में भी निमृत ने कथक की प्रस्तुति दी थी। किसी राष्ट्रीय स्तर के सांस्कृतिक आयोजन में प्रस्तुति देना उनके अब तक के मंचीय अनुभव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। भुवनेश्वर भारतीय शास्त्रीय नृत्य और विशेष रूप से ओडिसी परंपरा के लिए जाना जाता है। ऐसे सांस्कृतिक वातावरण में कथक की प्रस्तुति देना नन्हीं कलाकार के लिए कला की विविध परंपराओं के बीच अपनी विधा को प्रस्तुत करने का अवसर रहा। उपलब्ध रिपोर्टों में उनके इस प्रदर्शन का भी उल्लेख किया गया है।
निमृत की प्रतिभा को प्रतियोगिताओं में भी पहचान मिली है। रायगढ़ में आयोजित मधुगुंजन सतरंग 2025 की अखिल भारतीय नृत्य, संगीत एवं कला प्रतियोगिता में उन्होंने कथक के माइनर वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त किया। किसी प्रतियोगिता में स्थान प्राप्त करना केवल पुरस्कार हासिल करने तक सीमित नहीं होता, बल्कि कलाकार को अपनी तैयारी, प्रस्तुति और मंचीय अनुशासन को व्यवस्थित करने का अवसर भी देता है। नन्हीं निमृत ने इस प्रतियोगिता में अपनी प्रस्तुति के माध्यम से निर्णायकों का ध्यान आकर्षित किया और प्रथम स्थान हासिल किया। यह उपलब्धि उनकी छोटी उम्र में चल रही कथक साधना का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रही।
इसके अलावा बिलासपुर के स्वदेशी मेला 2024 में आयोजित सब-जूनियर ग्रुप डांस प्रतियोगिता में निमृत ने द्वितीय स्थान हासिल किया था। यह उपलब्धि भी उनके शुरुआती मंचीय सफर का हिस्सा है। कम उम्र में विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने से बच्चों को मंच पर अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने के साथ-साथ अनुशासन, समयबद्ध तैयारी और प्रतिस्पर्धी वातावरण को समझने का अवसर मिलता है। निमृत की अब तक की उपलब्धियां बताती हैं कि कथक के साथ उनकी यात्रा केवल स्थानीय स्तर के मंच तक सीमित नहीं रही है, बल्कि उन्होंने अलग-अलग आयोजनों में अपनी कला प्रस्तुत की है।
निमृत को एसईसीएल के 79वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में कथक नृत्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। यह सम्मान उनके कला सफर में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दर्ज है। छह वर्ष की उम्र में किसी संस्थागत कार्यक्रम में अपनी कला के लिए प्रशस्ति पत्र प्राप्त करना उनके निरंतर अभ्यास और मंचीय भागीदारी को रेखांकित करता है। ऐसे सम्मान बच्चों के लिए अपनी कला के प्रति रुचि और नियमित अभ्यास को बनाए रखने का प्रोत्साहन बन सकते हैं।
निमृत ने देश के अन्य सांस्कृतिक मंचों पर भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। उपलब्ध जानकारी में ताज फेस्टिवल, आगरा, ऑल इंडिया डांस फेस्टिवल, भिलाई-दुर्ग और देवप्रसाद फेस्टिवल 2026, भुवनेश्वर जैसे आयोजनों का उल्लेख मिलता है। इन मंचों की विविधता यह दर्शाती है कि उनकी कथक यात्रा अलग-अलग सांस्कृतिक वातावरणों से गुजर रही है। किसी कलाकार के लिए अलग-अलग शहरों और आयोजनों में प्रस्तुति देने का अनुभव उसके मंचीय व्यक्तित्व को विकसित करने में सहायक होता है। निमृत की कम उम्र में ऐसी यात्राएं और प्रस्तुतियां उनके लिए कला सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
चक्रधर समारोह में निमृत की प्रस्तुति को केवल छह साल की बच्ची की प्रस्तुति के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इसे एक ऐसी युवा प्रतिभा के रूप में भी देखा गया जो भारतीय शास्त्रीय नृत्य की परंपरा से जुड़कर आगे बढ़ रही है। कथक में पैरों की गति, ताल की समझ, मुद्राओं की स्पष्टता और चेहरे के भाव एक साथ काम करते हैं। इन सभी पक्षों को विकसित करने में समय लगता है। निमृत ने अपनी प्रस्तुति में इन तत्वों की शुरुआती समझ और प्रशिक्षण को मंच पर सामने रखा। दर्शकों की प्रतिक्रिया ने भी उनकी प्रस्तुति को विशेष बनाया।
कथक की मूल संरचना में लय और ताल का विशेष महत्व है। घुंघरुओं की आवाज के साथ पैरों की गति ताल से जुड़ती है और नृत्य की पूरी संरचना संगीत के साथ आगे बढ़ती है। बच्चों के लिए इसे सीखना नियमित अभ्यास और एकाग्रता की मांग करता है। निमृत की प्रस्तुति में फुटवर्क और भावाभिव्यक्ति के बीच तालमेल दिखाई दिया। मंच पर उनकी छोटी-छोटी गतियों और मुद्राओं में अभ्यास का प्रभाव नजर आया। यही वजह रही कि दर्शकों ने प्रस्तुति के बाद तालियों के माध्यम से उनका उत्साह बढ़ाया।
भावाभिव्यक्ति कथक का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। कलाकार केवल पैरों और हाथों से ही नहीं, बल्कि आंखों, चेहरे और शरीर की मुद्राओं के माध्यम से भी भावों को व्यक्त करता है। छह वर्ष की उम्र में इस प्रकार की अभिव्यक्ति विकसित करना निरंतर प्रशिक्षण का हिस्सा है। निमृत ने अपनी प्रस्तुति में चेहरे के भावों और नृत्य मुद्राओं के माध्यम से दर्शकों का ध्यान खींचा। उनकी मासूम उम्र और मंच पर दिखाई दिया आत्मविश्वास इस प्रस्तुति की विशेषता रहे।
निमृत की प्रस्तुति के दौरान समारोह स्थल का वातावरण भी विशेष रूप से उत्साहपूर्ण रहा। मंच पर जैसे ही नन्हीं कलाकार ने नृत्य शुरू किया, दर्शकों का ध्यान उनकी ओर केंद्रित हो गया। प्रस्तुति आगे बढ़ने के साथ घुंघरुओं की लय और नृत्य की गति ने वातावरण में ऊर्जा भर दी। दर्शकों ने शांत होकर प्रस्तुति का आनंद लिया और समापन के बाद तालियों से अपनी प्रतिक्रिया दी। ऐसे क्षण किसी भी युवा कलाकार के लिए स्मरणीय होते हैं, क्योंकि उन्हें बड़े मंच पर दर्शकों से सीधे प्रतिक्रिया प्राप्त होती है।
चक्रधर समारोह की आठवीं संध्या में केवल कथक ही नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय और लोक कलाओं की अनेक विधाओं का संगम दिखाई दिया। ओडिसी नृत्यांगना आर्या नंदे की प्रस्तुति, नृत्यांजलि समूह का बनारस घराने का कथक, वासंती वैष्णव और उनके शिष्यों की रायगढ़ घराने की प्रस्तुति, रुद्रशंकर मिश्रा का बनारस घराने का कथक, छत्तीसगढ़ी लोक संगीत और अन्य प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को विविधता प्रदान की। इसी क्रम में निमृत की छोटी लेकिन प्रभावशाली प्रस्तुति ने युवा प्रतिभा को इस बड़े सांस्कृतिक मंच पर स्थान दिया।
आठवीं संध्या में नन्हीं निमृत की उपस्थिति इस बात का उदाहरण भी रही कि सांस्कृतिक आयोजनों में नई पीढ़ी के कलाकारों को मंच देना परंपरा को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। शास्त्रीय कला तभी जीवित रहती है जब नई पीढ़ी उसे सीखती है, अभ्यास करती है और मंच पर प्रस्तुत करती है। गुरु से प्राप्त शिक्षा को मंच तक पहुंचाना इस निरंतरता का हिस्सा है। निमृत जैसी छोटी उम्र की कलाकारों की प्रस्तुतियां दर्शकों को यह देखने का अवसर देती हैं कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य के प्रति नई पीढ़ी में रुचि बनी हुई है।
निमृत की उपलब्धियों में प्रतियोगिता और सांस्कृतिक मंचों की विविधता भी दिखाई देती है। एक ओर उन्होंने प्रतियोगिताओं में भाग लेकर स्थान प्राप्त किया, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रस्तुति दी। इससे उन्हें अलग-अलग प्रकार के मंचीय अनुभव प्राप्त हुए। कभी प्रतियोगिता में निर्धारित समय और नियमों के भीतर प्रस्तुति देनी होती है, तो कभी बड़े सांस्कृतिक समारोह में विस्तृत मंचीय प्रस्तुति का हिस्सा बनना होता है। इन अनुभवों के बीच कलाकार का आत्मविश्वास धीरे-धीरे विकसित होता है।
रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में कथक का विशेष स्थान है। महाराजा चक्रधर सिंह की कला साधना से जुड़ी रायगढ़ घराने की परंपरा ने देशभर में कथक की अपनी पहचान बनाई। चक्रधर समारोह उसी सांस्कृतिक विरासत को मंच देता है। ऐसे आयोजन में स्थानीय कलाकारों और नई पीढ़ी के कथक साधकों की उपस्थिति इस परंपरा की निरंतरता को दर्शाती है। निमृत की प्रस्तुति इसी वातावरण में हुई, जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से आए अनुभवी कलाकारों के साथ युवा प्रतिभाओं को भी अपनी कला दिखाने का अवसर मिला।
निमृत का मंचीय सफर यह भी बताता है कि किसी कलाकार की तैयारी केवल समारोह के दिन नहीं होती। मंच पर कुछ मिनट की प्रस्तुति के पीछे लंबे समय का अभ्यास, गुरु का मार्गदर्शन और परिवार का सहयोग शामिल होता है। छह वर्ष की उम्र में कथक सीखने और विभिन्न मंचों पर प्रस्तुति देने वाली निमृत के लिए यह यात्रा अभी शुरुआती चरण में है। चक्रधर समारोह की प्रस्तुति उनके लिए अपने सीखे हुए नृत्य को बड़े दर्शक वर्ग के सामने प्रस्तुत करने का एक और अवसर बनी।
छोटी उम्र में मंच पर आने वाले कलाकारों के लिए दर्शकों की प्रतिक्रिया भी सीखने का हिस्सा होती है। तालियां जहां उत्साह बढ़ाती हैं, वहीं मंच का अनुभव कलाकार को आगे की तैयारी के लिए प्रेरित करता है। निमृत की प्रस्तुति के बाद मिली तालियां उनके लिए इसी तरह का उत्साहवर्धन रही होंगी। उनकी भाव-भंगिमाओं और फुटवर्क को दर्शकों ने सराहा। उपलब्ध रिपोर्टों में भी उनकी प्रस्तुति को आठवीं संध्या के उल्लेखनीय आकर्षणों में शामिल किया गया है।
निमृत के कथक प्रशिक्षण में गुरु जया मानिकपुरी की भूमिका महत्वपूर्ण है। भारतीय शास्त्रीय कलाओं में गुरु का मार्गदर्शन कलाकार के तकनीकी विकास के साथ-साथ उसकी प्रस्तुति शैली को आकार देता है। कथक सीखते समय कलाकार को ताल, लय, तत्कार, मुद्राएं, चक्कर, भाव और विभिन्न रचनाओं की संरचना से परिचित कराया जाता है। इन सभी पक्षों को उम्र और प्रशिक्षण के स्तर के अनुसार धीरे-धीरे विकसित किया जाता है। निमृत ने मंच पर जो प्रस्तुति दी, उसमें उनके प्रशिक्षण की शुरुआती झलक दिखाई दी।
किसी भी शास्त्रीय कला के प्रशिक्षण में निरंतरता महत्वपूर्ण होती है। एक दिन अभ्यास करने और दूसरे दिन लंबे समय तक विराम लेने से वह तकनीकी सहजता विकसित नहीं होती जो मंच पर दिखाई देती है। बच्चों के लिए नियमित अभ्यास के साथ पढ़ाई और सामान्य बाल गतिविधियों के बीच संतुलन भी जरूरी होता है। निमृत की उपलब्धियां बताती हैं कि कम उम्र में ही उन्होंने कथक के मंचीय वातावरण को समझना शुरू कर दिया है। आगे की यात्रा में प्रशिक्षण, अभ्यास और मंचीय अनुभव उनके कला कौशल को और विकसित करने का आधार बन सकते हैं।
चक्रधर समारोह की आठवीं संध्या में निमृत की प्रस्तुति के साथ ही दर्शकों को यह संदेश भी मिला कि मंच केवल बड़े और अनुभवी कलाकारों के लिए नहीं, बल्कि उन बच्चों के लिए भी है जो कम उम्र में किसी कला विधा को सीख रहे हैं। सांस्कृतिक आयोजनों में ऐसे अवसर बच्चों को अपनी प्रतिभा सामने लाने के साथ-साथ दर्शकों के सामने प्रस्तुति का आत्मविश्वास देते हैं। बड़े कलाकारों को देखकर सीखना और उनके साथ एक ही समारोह में प्रस्तुति देना भी युवा कलाकारों के लिए अनुभव का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
निमृत ने जिस सहजता से मंच पर अपनी प्रस्तुति दी, वह उनकी अब तक की मंचीय यात्राओं से भी जुड़ी दिखाई देती है। रायपुर साहित्य उत्सव, पाली महोत्सव, अमरकंटक नर्मदा महोत्सव, रवीन्द्र मंडप भुवनेश्वर और अन्य आयोजनों में प्रस्तुति का अनुभव उन्हें अलग-अलग दर्शकों के सामने नृत्य करने का अवसर दे चुका है। इस अनुभव का प्रभाव चक्रधर समारोह जैसे बड़े मंच पर दिखाई दिया, जहां उन्होंने अपनी प्रस्तुति को आत्मविश्वास के साथ पूरा किया।
निमृत की उपलब्धियों का एक पहलू यह भी है कि उनकी कला को केवल एक ही स्थान तक सीमित मंच नहीं मिला। रायगढ़, बिलासपुर, रायपुर, पाली, अमरकंटक, भुवनेश्वर, भिलाई-दुर्ग और आगरा जैसे अलग-अलग सांस्कृतिक संदर्भों में प्रस्तुति का उल्लेख मिलता है। प्रत्येक स्थान का दर्शक वर्ग और कार्यक्रम की प्रकृति अलग हो सकती है। इस विविधता से कलाकार को मंच की अलग-अलग परिस्थितियों का अनुभव मिलता है। कम उम्र में यह अनुभव भविष्य की कला यात्रा में उपयोगी हो सकता है।
नन्हीं निमृत की प्रस्तुति में दर्शकों ने जिस तरह तालियों से प्रतिक्रिया दी, वह सांस्कृतिक कार्यक्रमों में दर्शक और कलाकार के बीच बने संबंध का उदाहरण है। मंच पर कलाकार अपने अभ्यास और कला को प्रस्तुत करता है, जबकि दर्शकों की प्रतिक्रिया उसे भावनात्मक ऊर्जा देती है। खासकर बच्चों के लिए बड़े मंच की तालियां आत्मविश्वास बढ़ाने वाली हो सकती हैं। चक्रधर समारोह की इस शाम में निमृत को मिली सराहना उनके लिए यादगार अनुभव रही।
आठवीं संध्या के कार्यक्रम में वरिष्ठ और अनुभवी कलाकारों के साथ बच्चों और युवाओं की प्रस्तुतियां भी थीं। मायरा श्रीवास्तव, निमृत पात्रा और अन्य युवा कलाकारों की प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में नई पीढ़ी की उपस्थिति दर्ज कराई। इसके बाद बनारस घराने के कलाकारों, रायगढ़ घराने के कलाकारों, ओडिसी नृत्यांगना और लोक कलाकारों ने कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। इस क्रम में विभिन्न आयु और अनुभव के कलाकार एक ही सांस्कृतिक मंच पर दिखाई दिए।
निमृत के लिए चक्रधर समारोह का मंच इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि यह वही सांस्कृतिक वातावरण है जहां कथक की रायगढ़ परंपरा को लंबे समय से मंच मिलता रहा है। महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना से जुड़े इस समारोह में कथक की विभिन्न शैलियों और घरानों के कलाकार आते हैं। आठवीं संध्या में बनारस घराने के रुद्रशंकर मिश्रा तथा नृत्यांजलि समूह की प्रस्तुति के साथ रायगढ़ घराने के कलाकार भी उपस्थित रहे। इसी मंच पर निमृत जैसी छह वर्षीय कलाकार का प्रदर्शन नई पीढ़ी के जुड़ाव को सामने लाता है।
नन्हीं कलाकार की प्रस्तुति में सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाली बात उनका आत्मविश्वास रहा। मंच पर नृत्य करते समय कलाकार को दर्शकों की निगाहों के साथ-साथ संगीत और ताल पर भी ध्यान रखना होता है। छह वर्ष की उम्र में इन सभी चीजों को एक साथ संभालना प्रशिक्षण की मांग करता है। निमृत ने अपने प्रस्तुति क्रम में भाव-भंगिमाओं और फुटवर्क को संतुलित किया। दर्शकों की प्रतिक्रिया से उनकी प्रस्तुति का प्रभाव स्पष्ट हुआ।
निमृत की कहानी उन बच्चों के लिए भी प्रेरक हो सकती है जो छोटी उम्र से किसी कला को सीखना शुरू करते हैं। हालांकि प्रत्येक बच्चे की रुचि और गति अलग होती है, लेकिन किसी कला में नियमित प्रशिक्षण और अभ्यास उसे मंच तक ले जा सकता है। बच्चों पर उपलब्धि का अनावश्यक दबाव डालने के बजाय उनकी रुचि और आनंद को बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। निमृत की अब तक की यात्रा में प्रशिक्षण और मंचीय अवसर दोनों दिखाई देते हैं। आगे उनकी कला यात्रा किस दिशा में जाती है, यह आने वाले वर्षों में उनके निरंतर अभ्यास और रुचि पर निर्भर करेगा।
कथक केवल नृत्य की गतिविधियों का क्रम नहीं है, बल्कि संगीत, लय, ताल, अभिनय और भावों का संयोजन है। कलाकार के पैरों में बंधे घुंघरू नृत्य की ताल को स्पष्ट करते हैं। हाथों की मुद्राएं और चेहरे के भाव कथा या भाव को व्यक्त करने में सहायता करते हैं। तबला, गायन और अन्य वाद्य संगत नृत्य को संगीतात्मक आधार देते हैं। निमृत की प्रस्तुति में इन तत्वों का बाल कलाकार के प्रशिक्षण स्तर के अनुरूप समन्वय दिखाई दिया और दर्शकों ने इसे सराहा।
चक्रधर समारोह में छह वर्ष की निमृत पात्रा की प्रस्तुति यह भी बताती है कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य की परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि वर्तमान पीढ़ी के बच्चे भी इसे सीख रहे हैं। जब छोटे बच्चे कथक, ओडिसी, भरतनाट्यम या अन्य शास्त्रीय विधाओं का प्रशिक्षण लेते हैं और मंच पर प्रस्तुतियां देते हैं, तो कला परंपरा की अगली कड़ी तैयार होती है। इस प्रक्रिया में गुरु, परिवार, सांस्कृतिक संस्थाएं और मंच प्रदान करने वाले आयोजनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
निमृत की प्रस्तुति के बाद मिली तालियां उनके लिए उस शाम की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रहीं। मंच से उतरते समय किसी बच्चे को दर्शकों की सराहना मिलना उसके लिए यादगार अनुभव बन सकता है। चक्रधर समारोह जैसे प्रतिष्ठित आयोजन में ऐसा अवसर मिलना उनकी कला यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। उपलब्ध रिपोर्टों ने भी उनकी प्रस्तुति को आठवीं संध्या के उल्लेखनीय कार्यक्रमों में स्थान दिया है।
निमृत की उपलब्धियों में 2024 से लेकर 2026 तक के अलग-अलग आयोजनों का उल्लेख मिलता है। बिलासपुर के स्वदेशी मेले से लेकर रायगढ़ के मधुगुंजन सतरंग, भुवनेश्वर के त्रिधारा समारोह, रायपुर साहित्य उत्सव, पाली महोत्सव और अमरकंटक नर्मदा महोत्सव तक उनका मंचीय सफर जारी रहा। इतनी कम उम्र में अलग-अलग आयोजनों में प्रस्तुति देने का अनुभव उन्हें लगातार सीखने का अवसर देता है।
रायगढ़ में आयोजित मधुगुंजन सतरंग 2025 की अखिल भारतीय प्रतियोगिता में कथक के माइनर वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त करना उनकी यात्रा का उल्लेखनीय पड़ाव है। प्रतियोगिता में प्रथम स्थान के लिए कलाकार को अपनी प्रस्तुति में तकनीकी पक्ष और मंचीय प्रभाव दोनों पर ध्यान देना पड़ता है। निमृत ने वहां सफलता हासिल की और बाद में चक्रधर समारोह जैसे बड़े मंच पर प्रस्तुति दी। इससे उनके अब तक के अनुभवों की निरंतरता सामने आती है।
एसईसीएल के 79वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रशस्ति पत्र मिलना भी उनके कला सफर का हिस्सा है। किसी संस्थान द्वारा युवा कलाकार की प्रस्तुति को प्रमाण-पत्र के माध्यम से सम्मानित करना उनके परिवार और गुरु के लिए भी उत्साह का अवसर रहा होगा। हालांकि किसी भी बच्चे की कला यात्रा को केवल पुरस्कारों से नहीं आंका जा सकता; नियमित सीखना और कला के प्रति आनंद भी उतना ही महत्वपूर्ण है। निमृत के मामले में मंचीय अनुभव और प्रशिक्षण दोनों साथ-साथ आगे बढ़ते दिखाई देते हैं।
चक्रधर समारोह की आठवीं संध्या में निमृत की प्रस्तुति के साथ दर्शकों ने एक ऐसी कलाकार को देखा जो अभी अपने कला जीवन की शुरुआत में है, लेकिन मंच पर आने का अनुभव प्राप्त कर रही है। छह वर्ष की उम्र में कथक सीखना और बड़े मंचों पर प्रस्तुतियां देना उनके लिए आगे की लंबी यात्रा की शुरुआत है। इस उम्र में प्राप्त मंचीय अनुभव आने वाले वर्षों में उनके नृत्य कौशल को विकसित करने में सहायक हो सकते हैं। गुरु जया मानिकपुरी का मार्गदर्शन इस प्रशिक्षण यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आठवीं सांस्कृतिक संध्या का पूरा कार्यक्रम भारतीय कला की विविधता का उदाहरण रहा। कार्यक्रम में कथक की अलग-अलग शैलियों के साथ ओडिसी, लोक संगीत, नृत्य नाटिका और वादन की प्रस्तुतियां हुईं। नन्हीं निमृत की प्रस्तुति ने इस विविधता में बाल प्रतिभा का रंग जोड़ा। एक ही मंच पर छह वर्षीय कलाकार से लेकर अनुभवी कलाकारों तक की प्रस्तुतियां दर्शकों को देखने को मिलीं। यही किसी बड़े सांस्कृतिक समारोह की विशेषता होती है कि वह कला की विभिन्न पीढ़ियों को एक मंच पर लेकर आता है।
चक्रधर समारोह की यह शाम निमृत के लिए इसलिए भी विशेष रही क्योंकि उन्होंने जिस मंच पर प्रस्तुति दी, वहां देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए कलाकार मौजूद थे। समारोह के कार्यक्रम में रुद्रशंकर मिश्रा जैसे बनारस घराने के कलाकार और वासंती वैष्णव जैसे रायगढ़ घराने से जुड़े कलाकार भी शामिल थे। इस तरह के मंच पर प्रस्तुति देना किसी युवा कलाकार के लिए कला के बड़े संसार को करीब से देखने का अवसर भी है।
निमृत की प्रस्तुति के दौरान भाव-भंगिमाओं के साथ फुटवर्क पर विशेष ध्यान दिखाई दिया। कथक में पैरों की गति को ताल के साथ साधना अभ्यास का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। घुंघरुओं की ध्वनि से कदमों की स्पष्टता सामने आती है और दर्शक ताल की गति को महसूस कर पाते हैं। नन्हीं कलाकार ने अपने प्रशिक्षण के अनुरूप फुटवर्क प्रस्तुत किया और उसके साथ भावों को जोड़ने का प्रयास किया। यही संयोजन उनकी प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाने में सहायक रहा।
छह साल की उम्र में मंच पर आत्मविश्वास दिखाना परिवार और गुरु के सहयोग से भी जुड़ा होता है। बच्चे के लिए मंच पर जाना, रोशनी के बीच प्रदर्शन करना और दर्शकों के सामने अपनी कला प्रस्तुत करना नया अनुभव हो सकता है। लगातार मंचीय अवसर मिलने से धीरे-धीरे झिझक कम होती है और प्रस्तुति में सहजता आती है। निमृत के मामले में विभिन्न मंचों पर पूर्व प्रस्तुतियों का अनुभव चक्रधर समारोह में उनकी सहजता के रूप में दिखाई दिया। यह तथ्य उनके मंचीय सफर की निरंतरता को दर्शाता है।
निमृत पात्रा की कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात उनकी उम्र नहीं, बल्कि इतनी कम उम्र में कला के प्रति उनका जुड़ाव है। छह वर्ष की उम्र में कथक की बारीकियों को सीखना और बड़े मंच पर प्रस्तुत करना किसी भी बाल कलाकार के लिए एक विशेष अनुभव है। उनके अब तक के मंचीय सफर में प्रतियोगिताएं, राष्ट्रीय महोत्सव, क्षेत्रीय आयोजन और सांस्कृतिक समारोह शामिल हैं। चक्रधर समारोह की प्रस्तुति इस क्रम में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव रही।
कथक की शिक्षा में गुरु की भूमिका केवल नृत्य की तकनीक सिखाने तक सीमित नहीं होती। गुरु कलाकार को मंचीय अनुशासन, संगीत की समझ, भावों की अभिव्यक्ति और प्रस्तुति की मर्यादा से भी परिचित कराता है। जया मानिकपुरी के निर्देशन में प्रशिक्षण ले रही निमृत ने चक्रधर समारोह में अपनी कला का प्रदर्शन किया। उनकी प्रस्तुति में गुरु से प्राप्त प्रशिक्षण के शुरुआती परिणाम दिखाई दिए।
चक्रधर समारोह में स्थानीय प्रतिभाओं की मौजूदगी रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करती है। जब स्थानीय बच्चे अपने शहर के बड़े सांस्कृतिक मंच पर प्रदर्शन करते हैं, तो दर्शकों को अपने आसपास विकसित हो रही कला प्रतिभाओं से परिचित होने का अवसर मिलता है। निमृत की प्रस्तुति में यही स्थानीय जुड़ाव भी दिखाई दिया। उनके प्रदर्शन के दौरान दर्शकों की प्रतिक्रिया ने स्थानीय प्रतिभा के प्रति उत्साह को सामने रखा।
निमृत ने अपनी कम उम्र में जिन उपलब्धियों को हासिल किया है, वे उनके आगे के कला सफर के लिए आधार तैयार करती हैं। मधुगुंजन सतरंग में प्रथम स्थान, बिलासपुर स्वदेशी मेले में दूसरा स्थान, एसईसीएल समारोह में प्रशस्ति पत्र और राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न मंचों पर प्रस्तुतियां उनके अब तक के सफर का हिस्सा हैं। इन उपलब्धियों के साथ चक्रधर समारोह में मिली तालियां भी उनके लिए एक महत्वपूर्ण स्मृति रहेंगी।
रायगढ़ की सांस्कृतिक भूमि पर आयोजित 41वें चक्रधर समारोह में नन्हीं निमृत का प्रदर्शन एक ऐसी तस्वीर सामने लाता है जिसमें परंपरा और नई पीढ़ी का मेल दिखाई देता है। एक ओर महाराजा चक्रधर सिंह की विरासत और कथक की पुरानी परंपरा है, तो दूसरी ओर छह वर्ष की बच्ची उस परंपरा को सीखकर मंच पर प्रस्तुत कर रही है। यही निरंतरता किसी भी जीवंत कला परंपरा की पहचान होती है।
निमृत की प्रस्तुति के बाद दर्शकों की तालियों ने यह स्पष्ट किया कि मंच पर आयु छोटी हो सकती है, लेकिन कला के प्रति समर्पण और अभ्यास का प्रभाव दर्शकों तक पहुंच सकता है। उनकी भाव-भंगिमाओं, फुटवर्क और आत्मविश्वास ने प्रस्तुति को विशेष बनाया। छह वर्ष की नन्हीं कलाकार ने अपनी प्रस्तुति से न केवल तालियां बटोरीं, बल्कि समारोह की आठवीं संध्या में युवा प्रतिभा की उपस्थिति भी दर्ज कराई।
आठवीं संध्या में निमृत के साथ अन्य युवा कलाकारों ने भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। मायरा श्रीवास्तव ने कथक प्रस्तुत किया, जबकि आर्या नंदे ने ओडिसी की प्रस्तुति दी। वासंती वैष्णव और उनके शिष्य-शिष्याओं ने रायगढ़ घराने की कथक परंपरा प्रस्तुत की और नृत्यांजलि समूह ने बनारस घराने के कथक की प्रस्तुति दी। इस पूरे कार्यक्रम में निमृत की छह वर्ष की उम्र विशेष रूप से दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने वाली रही।
समारोह की आठवीं शाम का कार्यक्रम देर रात तक चला। उपलब्ध कार्यक्रम विवरण के अनुसार कार्यक्रम शाम 4:45 बजे से रात 11:30 बजे तक विभिन्न प्रस्तुतियों के साथ निर्धारित था। निमृत की प्रस्तुति इसी सांस्कृतिक क्रम का हिस्सा रही। इसके बाद कार्यक्रम में लोकमंच, ओडिसी, नृत्य नाटिका, कथक, लोक संगीत और वादन की प्रस्तुतियां हुईं। इस विविधता के बीच एक छह वर्षीय कथक कलाकार का मंच पर आना दर्शकों के लिए अलग अनुभव रहा।
नन्हीं निमृत के लिए चक्रधर समारोह की यह प्रस्तुति आने वाले समय में उनकी कला यात्रा की एक महत्वपूर्ण स्मृति बन सकती है। मंच पर प्राप्त अनुभव, दर्शकों की प्रतिक्रिया और बड़े कलाकारों की प्रस्तुतियों को करीब से देखने का अवसर उनके सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है। अभी उनकी उम्र बहुत कम है और कथक की यात्रा लंबी है। नियमित प्रशिक्षण और अभ्यास के साथ वे इस कला को आगे सीखती रहेंगी, यही उनके वर्तमान सफर का महत्वपूर्ण पक्ष है।
भारतीय शास्त्रीय नृत्य की परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए ऐसे मंचों की भूमिका महत्वपूर्ण है। बच्चों को कला सीखने के अवसर मिलने के साथ जब उन्हें मंच भी मिलता है, तो वे सीखी हुई कला को वास्तविक दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर पाते हैं। इससे कला के प्रति उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और दर्शकों को भी नई प्रतिभाओं से परिचित होने का अवसर मिलता है। चक्रधर समारोह ने निमृत को ऐसा ही मंच उपलब्ध कराया।
निमृत की प्रस्तुति ने यह भी दिखाया कि शास्त्रीय नृत्य के प्रति बच्चों की रुचि को उचित प्रशिक्षण और मंच मिलने पर वे कम उम्र में भी दर्शकों के सामने अपनी प्रतिभा रख सकते हैं। हालांकि बाल कलाकारों के लिए प्रशिक्षण के साथ पढ़ाई, आराम और बचपन की सामान्य गतिविधियों का संतुलन भी महत्वपूर्ण है। कला यात्रा आनंद और सीखने की प्रक्रिया बनी रहे, यही किसी भी बाल कलाकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार है।
चक्रधर समारोह के मंच पर छह वर्षीय निमृत की प्रस्तुति इसलिए यादगार रही क्योंकि इसमें एक ओर बाल सुलभ सहजता थी, तो दूसरी ओर मंचीय अनुशासन और कथक प्रशिक्षण की झलक भी थी। घुंघरुओं की लय के साथ उनके कदम आगे बढ़े, भाव-भंगिमाओं ने प्रस्तुति को आकार दिया और आत्मविश्वास ने मंच को जीवंत बनाए रखा। दर्शकों की तालियों ने उनके प्रदर्शन को और खास बना दिया।
41वें चक्रधर समारोह की आठवीं सांस्कृतिक संध्या में महज छह वर्ष की निमृत पात्रा ने अपनी कथक प्रस्तुति से यह साबित किया कि कला के प्रति लगन और अभ्यास की कोई निश्चित उम्र नहीं होती। श्रीमती जया मानिकपुरी के मार्गदर्शन में कथक सीख रही निमृत ने भाव-भंगिमाओं, फुटवर्क और नृत्य की बारीकियों का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। रायपुर साहित्य उत्सव 2026, पाली महोत्सव, अमरकंटक नर्मदा महोत्सव, भुवनेश्वर के त्रिधारा समारोह सहित विभिन्न मंचों पर प्रस्तुति दे चुकी निमृत ने रायगढ़ के मधुगुंजन सतरंग 2025 में कथक के माइनर वर्ग में प्रथम स्थान हासिल किया है। बिलासपुर के स्वदेशी मेला 2024 में सब-जूनियर ग्रुप डांस में द्वितीय स्थान और एसईसीएल के 79वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में प्रशस्ति-पत्र भी उनके अब तक के सफर का हिस्सा हैं।
चक्रधर समारोह की इस शाम में नन्हीं निमृत की प्रस्तुति केवल कुछ मिनटों का नृत्य कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि रायगढ़ की सांस्कृतिक भूमि पर नई पीढ़ी की प्रतिभा की एक सुंदर झलक बनकर सामने आई। बड़े सांस्कृतिक मंच पर अनुभवी कलाकारों के साथ छह वर्षीय कलाकार की उपस्थिति ने समारोह की विविधता को और बढ़ाया। उनकी भावपूर्ण प्रस्तुति के बाद गूंजती तालियों ने उस शाम को उनके लिए यादगार बना दिया। आने वाले वर्षों में कथक की साधना के साथ निमृत का कला सफर किस दिशा में आगे बढ़ता है, यह भविष्य तय करेगा, लेकिन चक्रधर समारोह की आठवीं संध्या पर उनकी प्रस्तुति ने दर्शकों के बीच उनकी प्रतिभा की एक पहचान जरूर दर्ज कर दी।