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छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के रंगों से सजी 9वीं सांस्कृतिक संध्या, ‘लहर गंगा’ ने बांधा समां

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रायगढ़, 23 सितंबर 2026। 41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह की 9वीं सांस्कृतिक संध्या छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक लोक कलाओं के रंगों से सराबोर रही। लोक सांस्कृतिक संस्था ‘लहर गंगा’ के कलाकारों ने नृत्य, गीत और संगीत के माध्यम से छत्तीसगढ़ की विविध लोक परंपराओं को मंच पर जीवंत कर दिया। संस्था के संचालक एवं निर्देशक पुरानिक साहू के नेतृत्व में प्रस्तुत कार्यक्रम में गौरी-गौरा, जस जंवारा, पंथी, पंडवानी, राऊत नाचा, सुवा, कर्मा और ददरिया जैसी लोक विधाओं की मनोहारी झलक देखने को मिली। प्रस्तुति के दौरान कलाकारों की ऊर्जा और पारंपरिक रंग-रूप ने दर्शकों को छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन और लोक संस्कृति के करीब ला दिया।
‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति में छत्तीसगढ़ की मिट्टी से जुड़े लोक जीवन की विविधता दिखाई दी। अलग-अलग लोक नृत्यों और गीतों के माध्यम से कलाकारों ने यह बताने का प्रयास किया कि प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान केवल मंचीय प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके पीछे गांवों, लोक परंपराओं, सामुदायिक उत्सवों और पीढ़ियों से चली आ रही कलात्मक अभिव्यक्तियों की लंबी परंपरा मौजूद है। गौरी-गौरा से लेकर पंथी, राऊत नाचा, सुवा और कर्मा तक अलग-अलग विधाओं का मंचन कार्यक्रम को बहुरंगी स्वरूप देता रहा। दर्शकों ने कलाकारों की प्रस्तुतियों का तालियों के साथ उत्साहवर्धन किया।
कार्यक्रम में गौरी-गौरा की प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ की लोक आस्था और पारंपरिक सांस्कृतिक जीवन की झलक प्रस्तुत की। इसके बाद जस जंवारा और अन्य लोक विधाओं के माध्यम से लोकगीतों और सामूहिक नृत्य परंपराओं का रंग मंच पर दिखाई दिया। कलाकारों की वेशभूषा, संगीत और नृत्य की गतियों ने प्रस्तुतियों को पारंपरिक वातावरण प्रदान किया। प्रत्येक लोक विधा की अपनी शैली और अभिव्यक्ति रही, लेकिन सभी प्रस्तुतियां एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में बंधी दिखाई दीं—छत्तीसगढ़ की लोक विरासत और उसके जीवंत जनजीवन का उत्सव।
पंथी नृत्य की प्रस्तुति ने भी कार्यक्रम में विशेष रंग भरा। छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा में पंथी को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और इसकी प्रस्तुति में समूहगत तालमेल, लय तथा शारीरिक गतियों का विशेष महत्व होता है। ‘लहर गंगा’ के कलाकारों ने मंच पर सामूहिक रूप से इस लोक शैली को प्रस्तुत किया। इसके साथ पंडवानी की प्रस्तुति ने लोक गायन और कथात्मक परंपरा का पक्ष सामने रखा। पंडवानी के माध्यम से महाभारत से जुड़े प्रसंगों को लोक शैली में प्रस्तुत करने की समृद्ध परंपरा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
राऊत नाचा और सुवा नृत्य की प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में ग्रामीण जीवन और सामुदायिक लोक उत्सवों के रंगों को सामने रखा। इन प्रस्तुतियों में समूहगत नृत्य, संगीत और पारंपरिक लय का संयोजन देखने को मिला। वहीं कर्मा और ददरिया की प्रस्तुतियों ने छत्तीसगढ़ के लोकगीतों और लोकनृत्य की विविधता को मंच पर स्थान दिया। इस तरह कार्यक्रम में एक के बाद एक विभिन्न लोक विधाओं की प्रस्तुति होती रही और पूरा वातावरण छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के रंगों से भरता गया।
‘लहर गंगा’ संस्था का संबंध बालोद जिले के धनेली स्थित लोक कला ग्राम से बताया गया है। संस्था लंबे समय से छत्तीसगढ़ की लोक सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और उसे मंचीय स्वरूप में प्रस्तुत करने का कार्य कर रही है। संस्था की प्रस्तुतियां छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, मध्यप्रदेश, असम, बिहार और हिमाचल प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में भी हो चुकी हैं। इस तरह संस्था स्थानीय लोक परंपराओं को अलग-अलग सांस्कृतिक मंचों तक पहुंचाने का काम करती रही है।
चक्रधर समारोह के मंच पर ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह समारोह शास्त्रीय और लोक दोनों प्रकार की कलाओं को एक व्यापक मंच उपलब्ध कराता है। जहां एक ओर समारोह में कथक, ओडिसी, भरतनाट्यम, कथकली और अन्य शास्त्रीय विधाओं के कलाकार अपनी साधना प्रस्तुत करते हैं, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की स्थानीय लोक परंपराओं को भी मंच मिलता है। 9वीं सांस्कृतिक संध्या में ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति ने इसी सांस्कृतिक विविधता को सामने रखा।
इस प्रस्तुति में लोक संस्कृति के विभिन्न रूपों का एक साथ मंचन दर्शकों के लिए विशेष अनुभव रहा। सामान्य तौर पर अलग-अलग लोक विधाएं अलग-अलग सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों से जुड़ी होती हैं, लेकिन एक सांस्कृतिक समारोह के मंच पर इनका क्रमबद्ध प्रदर्शन छत्तीसगढ़ की समग्र लोक पहचान का एक व्यापक चित्र प्रस्तुत करता है। गौरी-गौरा की आस्था, पंडवानी की कथात्मक परंपरा, पंथी और राऊत नाचा की सामूहिक ऊर्जा तथा सुवा, कर्मा और ददरिया की लोकधुनों ने कार्यक्रम को विविध आयाम दिए।
‘लहर गंगा’ के कलाकारों की प्रस्तुति में लोक संगीत और नृत्य का समन्वय विशेष रूप से दिखाई दिया। लोक कला का प्रभाव केवल नृत्य की गति में नहीं, बल्कि गायन, वाद्य संगीत, वेशभूषा और सामूहिक प्रस्तुति में भी दिखाई देता है। मंच पर कलाकारों की सामूहिक उपस्थिति ने लोक उत्सव जैसा वातावरण निर्मित किया। दर्शकों ने भी इस प्रस्तुति को उत्साह के साथ देखा और कलाकारों का तालियों से स्वागत किया।
प्रस्तुति के दौरान छत्तीस दलों वाला पुष्प कमल भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। इस मंचीय दृश्य ने कार्यक्रम की दृश्यात्मकता को और बढ़ाया। लोक संस्कृति की प्रस्तुति में ऐसे पारंपरिक और सामूहिक दृश्य दर्शकों के सामने लोक जीवन की व्यापक तस्वीर रखने में सहायक होते हैं। ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति में नृत्य और संगीत के साथ इस विशेष प्रस्तुति ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
चक्रधर समारोह के मंच पर छत्तीसगढ़ी लोक विधाओं की प्रस्तुति स्थानीय कलाकारों और दर्शकों के लिए सांस्कृतिक जुड़ाव का अवसर भी रही। रायगढ़ की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है और यहां आयोजित होने वाला चक्रधर समारोह देशभर के कलाकारों को एक मंच पर लाता है। ऐसे आयोजन में स्थानीय लोक कलाओं की प्रस्तुति से प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को व्यापक दर्शक वर्ग के सामने रखने का अवसर मिलता है।
लोक संस्कृति किसी भी क्षेत्र की सामाजिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। लोकगीत और लोकनृत्य अक्सर पीढ़ियों के अनुभव, परंपराओं, सामुदायिक जीवन और स्थानीय मान्यताओं को अपने भीतर समेटे रहते हैं। इन्हें मंच पर प्रस्तुत करने से केवल मनोरंजन नहीं होता, बल्कि दर्शकों को उस क्षेत्र की सांस्कृतिक जड़ों से परिचित होने का अवसर भी मिलता है। ‘लहर गंगा’ ने अपनी प्रस्तुति में छत्तीसगढ़ की ऐसी ही अनेक लोक विधाओं को एक साथ सामने रखा।
पंडवानी की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में कथात्मक लोक परंपरा को प्रमुखता दी। छत्तीसगढ़ की पंडवानी परंपरा देशभर में अपनी विशिष्ट शैली के लिए जानी जाती है। इसमें कथा, गायन, संवाद और अभिनय का संयोजन देखने को मिलता है। ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति में पंडवानी को अन्य लोक नृत्य और संगीत विधाओं के साथ शामिल किया गया, जिससे कार्यक्रम में लोक संस्कृति के अलग-अलग रूपों का संतुलित संयोजन देखने को मिला।
इसी प्रकार राऊत नाचा की प्रस्तुति ने सामूहिक लोक नृत्य की ऊर्जा को मंच पर सामने रखा। राऊत नाचा छत्तीसगढ़ की प्रमुख लोक नृत्य परंपराओं में गिना जाता है और विशेष रूप से यादव समुदाय की सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा माना जाता है। मंच पर इसकी सामूहिक प्रस्तुति ने दर्शकों के बीच उत्साह का वातावरण बनाया। कर्मा और सुवा जैसे नृत्यों ने भी लोक जीवन के अलग-अलग भावों को अपनी विशिष्ट शैली में अभिव्यक्त किया।
गौरी-गौरा की प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक आस्था को मंच पर स्थान दिया। लोक संस्कृति में धार्मिक और सामाजिक परंपराएं अक्सर एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। उत्सव, गीत, नृत्य और सामूहिक सहभागिता इन परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति ने इन सांस्कृतिक तत्वों को मंचीय रूप में प्रस्तुत किया।
ददरिया की लोकधुनों ने कार्यक्रम में अलग भाव जोड़ा। छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में ददरिया की अपनी पहचान है और इसे लोकगीत परंपरा की महत्वपूर्ण शैली के रूप में जाना जाता है। मंच पर जब विभिन्न लोकनृत्यों के बीच ददरिया की प्रस्तुति हुई तो कार्यक्रम में लोकगीतों की विविधता भी सामने आई। इसी तरह कर्मा की प्रस्तुति ने सामूहिक नृत्य और लोक लय का रंग जोड़ा।
‘लहर गंगा’ के कलाकारों ने मंच पर केवल अलग-अलग विधाओं की प्रस्तुति नहीं दी, बल्कि उनके माध्यम से छत्तीसगढ़ के ग्रामीण परिवेश की सांस्कृतिक तस्वीर भी सामने रखी। लोक कला का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसकी सहजता है। यह आम जनजीवन, उत्सव और सामूहिक अनुभवों से निकलकर मंच तक पहुंचती है। इस प्रस्तुति में भी यही सहजता दर्शकों को दिखाई दी।
संस्था के संचालक एवं निर्देशक पुरानिक साहू के नेतृत्व में कलाकारों ने कार्यक्रम को आकार दिया। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार बालोद जिले के धनेली स्थित लोक कला ग्राम से जुड़ी यह संस्था छत्तीसगढ़ की लोक सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने और विभिन्न मंचों पर प्रस्तुत करने से जुड़ी है। दूसरे राज्यों में भी प्रस्तुतियां देने के अनुभव के साथ रायगढ़ के चक्रधर समारोह में उनकी भागीदारी ने स्थानीय लोक कला को राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंच से जोड़ने का अवसर दिया।
कार्यक्रम के दौरान कलाकारों की ऊर्जा और सामूहिक तालमेल दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा। लोक नृत्य में समूह के प्रत्येक कलाकार की गति और ताल का सामंजस्य महत्वपूर्ण होता है। मंच पर बड़ी संख्या में कलाकारों की एक साथ प्रस्तुति में तालमेल बनाए रखना भी अभ्यास और तैयारी की मांग करता है। ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति में कलाकारों ने सामूहिक रूप से विभिन्न लोक विधाओं को प्रस्तुत किया और दर्शकों से सराहना प्राप्त की।
41वें चक्रधर समारोह की 9वीं सांस्कृतिक संध्या में केवल लोक संस्कृति ही नहीं, बल्कि शास्त्रीय नृत्य और संगीत की भी विभिन्न प्रस्तुतियां हुईं। इसी संध्या में कथक, ओडिसी, तबला वादन, भरतनाट्यम और अन्य कलाओं के कलाकारों ने भी अपनी प्रतिभा दिखाई। इस बहुविध सांस्कृतिक कार्यक्रम में ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति को विशेष स्थान दिया।
समारोह में स्थानीय और बाहरी दोनों प्रकार के कलाकारों की मौजूदगी ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान का अवसर बनाया। एक ही मंच पर शास्त्रीय और लोक विधाओं की प्रस्तुतियां होने से दर्शकों को भारतीय कला की विविधता को समझने का अवसर मिलता है। रायगढ़ में आयोजित चक्रधर समारोह इसी व्यापक सांस्कृतिक स्वरूप के लिए जाना जाता है। ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति ने इस विविधता में छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं का मजबूत रंग जोड़ा।
लोक संस्कृति को मंच तक लाने का कार्य कई बार कलाकारों के लंबे अभ्यास और स्थानीय परंपराओं की समझ पर आधारित होता है। लोक विधाओं की प्रस्तुति में केवल नृत्य की तकनीक पर्याप्त नहीं होती, बल्कि गीत, ताल, वाद्य, वेशभूषा और सांस्कृतिक संदर्भों की जानकारी भी आवश्यक होती है। ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति में इन विभिन्न पक्षों का संयोजन दिखाई दिया।
रायगढ़ की धरती पर छत्तीसगढ़ के अलग-अलग अंचलों की लोक परंपराओं का एक साथ प्रस्तुत होना भी सांस्कृतिक दृष्टि से उल्लेखनीय रहा। छत्तीसगढ़ के अलग-अलग क्षेत्रों की लोक विधाओं की अपनी विशेषताएं हैं। इन्हें एक मंच पर लाने से राज्य की सांस्कृतिक विविधता का व्यापक चित्र सामने आता है। ‘लहर गंगा’ ने इसी विविधता को नृत्य, गीत और संगीत के माध्यम से दर्शकों के सामने रखा।
बालोद के धनेली स्थित लोक कला ग्राम से निकलकर विभिन्न राज्यों में प्रस्तुतियां देने वाली संस्था का चक्रधर समारोह में शामिल होना इस बात का भी उदाहरण है कि स्थानीय लोक कलाएं क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर जाकर व्यापक मंच हासिल कर सकती हैं। संस्था की प्रस्तुतियां महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, मध्यप्रदेश, असम, बिहार और हिमाचल प्रदेश में होने की जानकारी उपलब्ध है। इससे संस्था की मंचीय यात्रा के विस्तार का पता चलता है।
लोक कला की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामुदायिक जड़ों में होती है। जब किसी लोक विधा को मंच पर प्रस्तुत किया जाता है तो उसके साथ उस क्षेत्र की भाषा, संगीत, सामाजिक जीवन और परंपराएं भी दर्शकों तक पहुंचती हैं। ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति में छत्तीसगढ़ी लोक जीवन के अनेक ऐसे ही पक्ष दिखाई दिए। दर्शकों ने कलाकारों की प्रस्तुतियों को तालियों के साथ सराहा और कार्यक्रम का वातावरण लगातार जीवंत बना रहा।
इस प्रस्तुति ने यह भी दिखाया कि आधुनिक मंच और पारंपरिक लोक कला के बीच बेहतर तालमेल बनाया जा सकता है। मंचीय प्रस्तुति के लिए प्रकाश, ध्वनि और व्यवस्था आधुनिक हो सकती है, लेकिन कला की मूल पहचान उसके पारंपरिक गीत, नृत्य, वेशभूषा और प्रस्तुति शैली में बनी रहती है। ‘लहर गंगा’ ने इसी पारंपरिक स्वरूप को बड़े सांस्कृतिक मंच पर प्रस्तुत किया।
41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह के दस दिवसीय आयोजन में देश की अनेक कला परंपराओं को स्थान मिला। ऐसे आयोजन में छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की प्रस्तुति राज्य की अपनी सांस्कृतिक पहचान को सामने रखने का अवसर देती है। 9वीं सांस्कृतिक संध्या में ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति ने यही भूमिका निभाई और समारोह के सांस्कृतिक रंगों में लोक परंपरा का एक विशिष्ट अध्याय जोड़ा।
दर्शकों के लिए यह प्रस्तुति केवल एक नृत्य कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की एक यात्रा जैसी रही। एक के बाद एक लोक विधाओं की प्रस्तुति ने कार्यक्रम को विविधता प्रदान की। कलाकारों की सामूहिक ऊर्जा, पारंपरिक संगीत और नृत्य की लय ने पूरे वातावरण को जीवंत बनाए रखा। प्रस्तुति के दौरान कलाकारों को दर्शकों की ओर से लगातार सराहना मिली।
चक्रधर समारोह जैसे मंचों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यहां कला की अलग-अलग धाराएं एक साथ दिखाई देती हैं। शास्त्रीय कला अपनी तकनीकी और अनुशासित परंपरा के साथ सामने आती है, वहीं लोक कला अपनी सहजता और सामुदायिक ऊर्जा के साथ दर्शकों से जुड़ती है। ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति ने इस लोक पक्ष को प्रभावी ढंग से सामने रखा।
छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के संरक्षण और प्रसार के लिए लोक कलाकारों तथा संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। जब लोक विधाओं को मंच मिलता है तो उन्हें नई पीढ़ी और व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने का अवसर मिलता है। ‘लहर गंगा’ जैसी संस्था का विभिन्न राज्यों में प्रदर्शन करना और चक्रधर समारोह जैसे मंच पर लोक परंपराओं को प्रस्तुत करना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
इस सांस्कृतिक संध्या में गौरी-गौरा, जस जंवारा, पंथी, पंडवानी, राऊत नाचा, सुवा, कर्मा और ददरिया की प्रस्तुतियों ने छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं की व्यापकता को एक साथ सामने रखा। हर प्रस्तुति ने लोक संस्कृति के अलग पक्ष को अभिव्यक्त किया, लेकिन सभी का केंद्र छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत रही।
41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह की 9वीं सांस्कृतिक संध्या में ‘लहर गंगा’ की प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की विविधता और जीवंतता को मंच पर साकार किया। पुरानिक साहू के नेतृत्व में कलाकारों ने गौरी-गौरा, जस जंवारा, पंथी, पंडवानी, राऊत नाचा, सुवा, कर्मा और ददरिया जैसी लोक विधाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत, ग्रामीण जीवन और लोक परंपराओं की मनोहारी झलक प्रस्तुत की। कलाकारों की ऊर्जा और सामूहिक प्रस्तुति को दर्शकों ने तालियों के साथ सराहा।
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