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राज्यपाल का पद, योग्यता और संवैधानिक अधिकार: अनुच्छेद 153 से 160 और आगे क्या कहता है भारतीय संविधान

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नई दिल्ली। भारतीय संविधान ने राज्यों के शासन में राज्यपाल के पद को एक महत्वपूर्ण संवैधानिक स्थान दिया है। राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है और उसके पद, नियुक्ति, कार्यकाल, योग्यता, शपथ, अधिकारों तथा विभिन्न परिस्थितियों में कार्य करने की व्यवस्था संविधान के भाग-6 में की गई है। विशेष रूप से अनुच्छेद 153 से 160 तक राज्यपाल के पद की मूल संवैधानिक संरचना को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं, जबकि अनुच्छेद 161 से आगे उसके विभिन्न अधिकारों और राज्य की शासन-व्यवस्था में उसकी भूमिका का विस्तार मिलता है। संविधान के अनुच्छेद 153 में प्रत्येक राज्य के लिए राज्यपाल का प्रावधान किया गया है और यह भी व्यवस्था है कि एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है। अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है और उसका प्रयोग संविधान के अनुसार राज्यपाल स्वयं या उसके अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से किया जाता है। वहीं अनुच्छेद 155 यह निर्धारित करता है कि राज्यपाल की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहरयुक्त अधिपत्र से की जाती है। अनुच्छेद 156 राज्यपाल के कार्यकाल और पद पर बने रहने की संवैधानिक स्थिति बताता है, अनुच्छेद 157 नियुक्ति के लिए आवश्यक योग्यता निर्धारित करता है, अनुच्छेद 158 पद की शर्तों से संबंधित है, अनुच्छेद 159 शपथ या प्रतिज्ञान की व्यवस्था करता है और अनुच्छेद 160 ऐसी परिस्थितियों में राज्यपाल के कार्यों के निर्वहन के लिए प्रावधान करता है जिनके लिए अध्याय में अलग से व्यवस्था नहीं की गई हो। भारतीय संविधान की यह व्यवस्था राज्यपाल को राज्य की राजनीतिक कार्यपालिका से अलग एक संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित करती है। हालांकि राज्य सरकार की सामान्य संसदीय व्यवस्था में मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की केंद्रीय भूमिका रहती है, राज्यपाल का पद संविधान की विभिन्न प्रक्रियाओं—जैसे सरकार के गठन, विधायी प्रक्रिया, विधेयकों पर कार्रवाई, कुछ संवैधानिक परिस्थितियों में निर्णय और राष्ट्रपति से संबंधित संवैधानिक प्रक्रियाओं—में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए राज्यपाल के पद को समझने के लिए केवल अनुच्छेद 156 से 160 को देखना पर्याप्त नहीं है; उससे पहले अनुच्छेद 153 से 155 और उसके बाद अनुच्छेद 161 से 167 तथा राज्य विधानमंडल से संबंधित प्रावधानों को भी साथ में समझना आवश्यक है। यही क्रम हमें यह समझने में सहायता देता है कि राज्यपाल की नियुक्ति कैसे होती है, उसकी योग्यता क्या है, उसका कार्यकाल किस प्रकार निर्धारित है, उसकी संवैधानिक शक्तियां किन सीमाओं में काम करती हैं और राज्य की संसदीय शासन प्रणाली में उसकी भूमिका किस प्रकार निर्धारित होती है।
राज्यपाल के पद की शुरुआत अनुच्छेद 153 से समझी जा सकती है। इस अनुच्छेद में स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। संविधान में यह व्यवस्था भी है कि एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल बनाया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि राज्यपाल का पद प्रत्येक राज्य की संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन आवश्यकता के अनुसार एक व्यक्ति एक से अधिक राज्यों की जिम्मेदारी भी संभाल सकता है। इसके बाद अनुच्छेद 154 राज्य की कार्यपालिका शक्ति के संबंध में महत्वपूर्ण व्यवस्था करता है। इसके अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है और उसका प्रयोग राज्यपाल स्वयं या उसके अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से संविधान के अनुसार करता है। लेकिन इस प्रावधान को राज्यपाल की असीमित व्यक्तिगत कार्यपालिका शक्ति के रूप में नहीं समझना चाहिए। भारतीय शासन व्यवस्था संसदीय प्रणाली पर आधारित है और संविधान के अनुच्छेद 163 में राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद का प्रावधान है। अनुच्छेद 163 यह भी कहता है कि कुछ ऐसे मामले हो सकते हैं जिनमें संविधान राज्यपाल को अपने विवेक से कार्य करने की अपेक्षा करता है। इसलिए राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका को समझते समय अनुच्छेद 154 और अनुच्छेद 163 को साथ पढ़ना आवश्यक है। राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है, जबकि निर्वाचित सरकार के दैनिक शासन में मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की भूमिका केंद्रीय है। अनुच्छेद 155 नियुक्ति की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है। राज्यपाल का चुनाव राज्य की जनता सीधे नहीं करती और न ही राज्य विधानमंडल राज्यपाल की नियुक्ति करता है। संविधान के अनुसार राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहरयुक्त अधिपत्र के माध्यम से की जाती है। इस प्रकार राज्यपाल का पद प्रत्यक्ष चुनाव से बनने वाले पदों से अलग है। नियुक्ति की यह संवैधानिक प्रक्रिया केंद्र और राज्य की संवैधानिक संस्थाओं के बीच संबंधों को भी दर्शाती है। राज्यपाल के पद की संवैधानिक प्रकृति को समझने के लिए यह मूल बात ध्यान में रखना आवश्यक है कि राज्यपाल राज्य का प्रमुख है, लेकिन राज्य की संसदीय कार्यपालिका की राजनीतिक जिम्मेदारी मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद से जुड़ी होती है।
अनुच्छेद 156 राज्यपाल के कार्यकाल से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में से एक है। इसके अनुसार राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है। साथ ही राज्यपाल अपने हस्ताक्षरयुक्त लिखित पत्र के माध्यम से राष्ट्रपति को संबोधित करके अपने पद से इस्तीफा दे सकता है। संविधान यह भी कहता है कि सामान्यतः राज्यपाल पांच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करता है, जिसकी गणना उसके पद ग्रहण करने की तारीख से होती है। लेकिन पांच वर्ष की यह अवधि ऐसी कठोर अंतिम समय-सीमा नहीं है जिसके बाद उसी क्षण राज्यपाल का पद स्वतः समाप्त हो जाए, क्योंकि संविधान में यह भी व्यवस्था है कि कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद राज्यपाल तब तक पद पर बना रह सकता है जब तक उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण नहीं कर लेता। इस व्यवस्था का उद्देश्य संवैधानिक पद में रिक्तता से बचना है। इसलिए राज्यपाल के कार्यकाल को समझते समय दो बातें अलग-अलग देखना जरूरी है—एक ओर पांच वर्ष की सामान्य संवैधानिक अवधि और दूसरी ओर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर बने रहने की व्यवस्था। अनुच्छेद 156 राज्यपाल के इस्तीफे की प्रक्रिया भी बताता है। इस्तीफा राष्ट्रपति को संबोधित लिखित पत्र के माध्यम से दिया जाता है। राज्यपाल के पद की संवैधानिक संरचना में यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्यपाल किसी विधानसभा चुनाव के माध्यम से पद पर नहीं आता और उसका पद मुख्यमंत्री या मंत्रिपरिषद के राजनीतिक कार्यकाल से सीधे निर्धारित नहीं होता। राज्यपाल का कार्यकाल राष्ट्रपति के साथ संवैधानिक संबंध और संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर चलता है। इस प्रावधान को समझना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कई बार पांच वर्ष की अवधि को राज्यपाल के पद पर बने रहने की पूर्ण गारंटी समझ लिया जाता है, जबकि अनुच्छेद 156 में राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करने का स्पष्ट उल्लेख है। इसी अनुच्छेद में उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक पद पर बने रहने की व्यवस्था संवैधानिक निरंतरता सुनिश्चित करती है।
राज्यपाल बनने की योग्यता का मूल आधार अनुच्छेद 157 में दिया गया है। इसके अनुसार कोई व्यक्ति राज्यपाल नियुक्त होने के लिए तभी पात्र होगा जब वह भारत का नागरिक हो और उसकी आयु 35 वर्ष पूरी हो चुकी हो। संविधान ने राज्यपाल के लिए कोई शैक्षणिक डिग्री, किसी विशेष प्रशासनिक सेवा का अनुभव या किसी निश्चित राजनीतिक पद पर पहले काम करने की अनिवार्यता नहीं रखी है। अर्थात संवैधानिक रूप से मुख्य स्पष्ट योग्यताएं भारतीय नागरिकता और कम से कम 35 वर्ष की आयु हैं। इसके साथ अनुच्छेद 158 राज्यपाल के पद की कुछ शर्तें निर्धारित करता है। राज्यपाल संसद के किसी सदन या किसी राज्य के विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं रह सकता। यदि संसद या किसी राज्य विधानमंडल का कोई सदस्य राज्यपाल नियुक्त होता है तो जिस दिन वह राज्यपाल के पद पर प्रवेश करता है, उसी दिन उसकी उस सदन की सदस्यता समाप्त मानी जाती है। इसी प्रकार राज्यपाल कोई अन्य लाभ का पद धारण नहीं कर सकता। संविधान राज्यपाल को आधिकारिक निवास के उपयोग तथा संसद द्वारा कानून से निर्धारित वेतन, भत्ते और विशेषाधिकार का अधिकार देता है। जब तक संसद इस संबंध में कानून नहीं बनाती, तब तक दूसरी अनुसूची में निर्दिष्ट व्यवस्था लागू होती है। संविधान यह भी व्यवस्था करता है कि यदि एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जाता है, तो उसके वेतन और भत्तों का राज्यों के बीच बंटवारा राष्ट्रपति के आदेश से निर्धारित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त राज्यपाल के वेतन और भत्तों को उसके कार्यकाल के दौरान कम नहीं किया जा सकता। इन प्रावधानों का उद्देश्य राज्यपाल के पद की संवैधानिक स्वतंत्रता और गरिमा से संबंधित शर्तों को निर्धारित करना है। राज्यपाल को किसी दूसरे लाभ के पद से अलग रखने का प्रावधान इस बात को सुनिश्चित करता है कि वह एक साथ किसी अन्य ऐसे पद पर न रहे जिससे संवैधानिक भूमिका पर हितों के टकराव का प्रश्न पैदा हो। इसी तरह विधानमंडल की सदस्यता से अलगाव राज्यपाल को विधायिका के सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य करने से रोकता है और उसके संवैधानिक पद की अलग प्रकृति को स्पष्ट करता है।
अनुच्छेद 159 राज्यपाल के पद की शपथ या प्रतिज्ञान से संबंधित है और इसका संवैधानिक महत्व अत्यंत गहरा है। राज्यपाल तथा राज्यपाल के कार्यों का निर्वहन करने वाला व्यक्ति पद ग्रहण करने से पहले शपथ या प्रतिज्ञान करता है। यह शपथ संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की उपस्थिति में दिलाई जाती है और यदि मुख्य न्यायाधीश उपलब्ध नहीं हों तो उस उच्च न्यायालय के उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश की उपस्थिति में शपथ या प्रतिज्ञान किया जाता है। शपथ का मूल आशय यह है कि राज्यपाल अपने पद का निष्ठापूर्वक निर्वहन करेगा, संविधान और कानून की रक्षा, संरक्षण और प्रतिरक्षा करेगा तथा राज्य के लोगों की सेवा और कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करेगा। इस प्रकार राज्यपाल की शपथ केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उसके संवैधानिक दायित्वों का सार्वजनिक स्वीकार भी है। राज्यपाल का पद किसी व्यक्ति की निजी राजनीतिक या प्रशासनिक प्राथमिकताओं से ऊपर संविधान और कानून के प्रति दायित्व से जुड़ा हुआ है। शपथ के शब्दों में संविधान और कानून की रक्षा का विशेष उल्लेख राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका की प्रकृति को स्पष्ट करता है। राज्यपाल को राज्य के लोगों के कल्याण के लिए कार्य करने की प्रतिबद्धता भी शपथ में शामिल करनी होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्यपाल स्वयं राज्य सरकार की तरह रोजमर्रा की प्रशासनिक नीतियां संचालित करता है; बल्कि उसका दायित्व संविधान द्वारा उसे सौंपे गए पद और कार्यों के दायरे में रहता है। अनुच्छेद 159 इस संवैधानिक दायित्व को औपचारिक और स्पष्ट रूप प्रदान करता है। राज्यपाल के पद की गरिमा के संदर्भ में शपथ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पद ग्रहण करते समय व्यक्ति संविधान और कानून के प्रति अपनी प्रतिबद्धता स्वीकार करता है।
अनुच्छेद 160 राज्यपाल के कार्यों के निर्वहन से संबंधित एक विशेष व्यवस्था करता है। इसमें कहा गया है कि ऐसी किसी आकस्मिक परिस्थिति में, जिसके लिए इस अध्याय में कोई प्रावधान नहीं किया गया है, राष्ट्रपति राज्यपाल के कार्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक व्यवस्था कर सकता है। यह प्रावधान संवैधानिक निरंतरता के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। शासन व्यवस्था में ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं जिनके लिए संविधान के संबंधित अध्याय में सीधे कोई विस्तृत व्यवस्था न दी गई हो। ऐसी स्थिति में राज्यपाल के संवैधानिक कार्यों के निर्वहन में व्यवधान न आए, इसके लिए राष्ट्रपति को आवश्यक प्रावधान करने का अधिकार दिया गया है। इस अनुच्छेद का उद्देश्य किसी नियमित राजनीतिक निर्णय की व्यवस्था करना नहीं, बल्कि ऐसी आकस्मिक स्थिति में संवैधानिक कार्यों की निरंतरता बनाए रखना है। अनुच्छेद 153 से 160 तक की पूरी श्रृंखला को साथ देखें तो एक स्पष्ट ढांचा सामने आता है—राज्यपाल का पद, कार्यपालिका शक्ति, नियुक्ति, कार्यकाल, योग्यता, पद की शर्तें, शपथ और आकस्मिक परिस्थितियों में कार्यों के निर्वहन की व्यवस्था। इसके बाद संविधान राज्यपाल की वास्तविक संवैधानिक शक्तियों और राज्य सरकार के साथ उसके संबंधों को और विस्तार देता है। अनुच्छेद 161 में राज्यपाल को कुछ मामलों में क्षमा, दंडादेश को स्थगित करने, कम करने या बदलने से संबंधित शक्ति दी गई है। यह शक्ति उन अपराधों से संबंधित है जिन मामलों में राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार होता है। अनुच्छेद 162 राज्य की कार्यपालिका शक्ति की सीमा बताता है और इसे उन विषयों से जोड़ता है जिन पर राज्य विधानमंडल कानून बना सकता है, हालांकि समवर्ती क्षेत्र तथा संसद द्वारा विशेष रूप से संघ को दी गई कार्यपालिका शक्ति के संबंध में संवैधानिक सीमाएं लागू रहती हैं। इस प्रकार अनुच्छेद 160 के बाद राज्यपाल की भूमिका केवल पद और नियुक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कार्यपालिका और अन्य संवैधानिक प्रक्रियाओं तक विस्तृत हो जाती है।
राज्यपाल की शक्तियों को समझने में अनुच्छेद 161 का विशेष महत्व है। इस अनुच्छेद के तहत राज्यपाल को कुछ मामलों में क्षमादान, दंडादेश को स्थगित करने, दंड को कम करने या दंडादेश को बदलने की शक्ति दी गई है। संविधान इस शक्ति को उन अपराधों से जोड़ता है जो ऐसे विषयों से संबंधित कानूनों के अंतर्गत आते हैं जिन पर राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है। इसलिए राज्यपाल की यह शक्ति राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति से पूरी तरह समान नहीं है; दोनों की संवैधानिक सीमाएं अलग-अलग हैं। राज्यपाल की क्षमादान संबंधी शक्ति को समझते समय अपराध की प्रकृति, संबंधित कानून और राज्य की कार्यपालिका शक्ति की सीमा देखना आवश्यक होता है। यह भी समझना जरूरी है कि संवैधानिक शक्ति का प्रयोग कानून और संविधान के ढांचे के भीतर होता है। राज्यपाल की भूमिका को व्यक्तिगत न्यायिक निर्णय की तरह समझना उचित नहीं होगा। इसके बाद अनुच्छेद 162 राज्य की कार्यपालिका शक्ति की सीमा निर्धारित करता है। सामान्य रूप से राज्य की कार्यपालिका शक्ति उन विषयों तक विस्तृत होती है जिन पर राज्य विधानमंडल को कानून बनाने की शक्ति है। लेकिन जहां संविधान या संसद द्वारा बनाए गए कानून के माध्यम से संघ या उसके अधिकारियों को स्पष्ट कार्यपालिका शक्ति प्रदान की गई है, वहां राज्य की कार्यपालिका शक्ति उस व्यवस्था के अधीन रहती है। इस प्रकार राज्यपाल के संवैधानिक अधिकारों को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि राज्य की कार्यपालिका शक्ति किन विषयों तक विस्तृत है। राज्यपाल के पद को अलग से देखने के बजाय राज्य की कार्यपालिका, विधायिका और मंत्रिपरिषद की पूरी संवैधानिक संरचना के साथ समझना अधिक उचित है। भारतीय संविधान ने विभिन्न संस्थाओं के बीच अधिकारों और दायित्वों का एक ढांचा बनाया है, जिसमें राज्यपाल भी एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कड़ी है।
अनुच्छेद 163 राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के संबंध को समझने की कुंजी है। इसमें राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद का प्रावधान किया गया है। सामान्य संवैधानिक व्यवस्था में राज्यपाल अपने कार्यों के निर्वहन में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से कार्य करता है, सिवाय उन मामलों के जिनमें संविधान राज्यपाल को अपने विवेक से कार्य करने की आवश्यकता बताता है। यही कारण है कि राज्यपाल को राज्य की निर्वाचित सरकार का समानांतर राजनीतिक प्रमुख समझना संविधान की संसदीय प्रणाली की पूरी तस्वीर नहीं देता। राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख है, जबकि मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद राज्य की राजनीतिक कार्यपालिका है। अनुच्छेद 164 मंत्रियों से संबंधित व्यवस्था करता है और मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है। मंत्रिपरिषद राज्य की विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। इस व्यवस्था से स्पष्ट होता है कि राज्य में वास्तविक राजनीतिक उत्तरदायित्व विधानसभा के प्रति मंत्रिपरिषद का होता है। राज्यपाल संवैधानिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी संसदीय शासन की आधारभूत विशेषता है। अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री के लिए राज्यपाल को जानकारी देने से संबंधित कर्तव्यों का भी प्रावधान करता है। मुख्यमंत्री को राज्य प्रशासन और विधायी प्रस्तावों से संबंधित ऐसी जानकारी राज्यपाल को देनी होती है जो संविधान के अनुसार अपेक्षित हो। यदि राज्यपाल किसी प्रशासनिक या विधायी विषय से संबंधित जानकारी मांगता है, तो मुख्यमंत्री की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह निर्धारित व्यवस्था के अनुसार जानकारी उपलब्ध कराए। इस तरह राज्यपाल और मुख्यमंत्री का संबंध केवल औपचारिक नहीं है; संविधान ने दोनों के बीच सूचनात्मक और संवैधानिक संपर्क की व्यवस्था भी बनाई है।
राज्यपाल की विधायी भूमिका भी संविधान में महत्वपूर्ण रूप से निर्धारित की गई है। राज्य विधानमंडल से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों में राज्यपाल का स्थान एक आवश्यक घटक के रूप में है। राज्य विधानमंडल की संरचना, सत्र, विधेयकों और अन्य प्रक्रियाओं से जुड़े अनेक प्रावधानों में राज्यपाल की भूमिका दिखाई देती है। संविधान के अनुच्छेद 174 के अनुसार राज्यपाल समय-समय पर राज्य विधानमंडल के सदन या सदनों को ऐसे समय और स्थान पर बुला सकता है जिन्हें वह उचित समझे, लेकिन एक सत्र की अंतिम बैठक और अगले सत्र की पहली बैठक के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। राज्यपाल विधानमंडल का सत्रावसान कर सकता है और विधानसभा को भंग भी कर सकता है। ये शक्तियां संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इन्हें संसदीय शासन की व्यापक व्यवस्था के भीतर समझना आवश्यक है। अनुच्छेद 175 के तहत राज्यपाल विधानमंडल के सदन या सदनों को संबोधित कर सकता है और संदेश भेज सकता है। अनुच्छेद 176 में प्रत्येक आम चुनाव के बाद विधानसभा के प्रथम सत्र तथा प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के प्रारंभ में विशेष अभिभाषण की व्यवस्था है। इसके माध्यम से राज्य सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों से संबंधित व्यापक दिशा विधानमंडल के समक्ष रखी जाती है। विधेयकों के संबंध में अनुच्छेद 200 महत्वपूर्ण है। जब कोई विधेयक राज्य विधानमंडल द्वारा पारित होकर राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तो संविधान राज्यपाल को उस विधेयक पर स्वीकृति देने, स्वीकृति रोकने, उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेजने की कुछ परिस्थितियों में अनुमति देता है और कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी करता है। धन विधेयक के संबंध में संवैधानिक व्यवस्था अलग है। इसलिए राज्यपाल की विधायी भूमिका को केवल हस्ताक्षर करने की औपचारिकता मानना पर्याप्त नहीं है; संविधान ने विधेयक प्रक्रिया में उसके लिए स्पष्ट संवैधानिक कार्य निर्धारित किए हैं। साथ ही इन शक्तियों का प्रयोग संविधान में निर्धारित प्रक्रिया और न्यायिक व्याख्याओं के अधीन होता है।
राज्यपाल की भूमिका राज्य सरकार के गठन की संवैधानिक प्रक्रिया में भी सामने आती है। विधानसभा चुनाव के बाद सरकार गठन की स्थिति में राज्यपाल को संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति करनी होती है। सामान्यतः विधानसभा में बहुमत रखने वाले दल या गठबंधन के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाता है। लेकिन यदि चुनाव परिणाम में किसी एक दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत न मिले, तो सरकार गठन की प्रक्रिया अधिक जटिल हो सकती है और राज्यपाल को संविधान के अनुरूप परिस्थितियों का आकलन करना पड़ सकता है। ऐसी स्थितियों में राज्यपाल की भूमिका को लेकर सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा भी होती है, लेकिन संवैधानिक दृष्टि से मुख्य बात यह है कि सरकार को विधानसभा के विश्वास के आधार पर काम करना होता है। राज्यपाल का पद विधानसभा के बहुमत की जगह लेने वाला पद नहीं है। मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद को विधानसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व निभाना होता है। यदि किसी सरकार की बहुमत स्थिति पर प्रश्न उठता है तो संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया के माध्यम से बहुमत का परीक्षण किया जा सकता है। राज्यपाल की भूमिका ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि वह सरकार गठन और संवैधानिक प्रक्रियाओं के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है। इसी प्रकार मुख्यमंत्री के त्यागपत्र या विधानसभा में बहुमत खोने जैसी परिस्थितियों में भी राज्यपाल को संविधान के अनुसार आगे की प्रक्रिया सुनिश्चित करनी होती है। हालांकि किसी विशिष्ट परिस्थिति में राज्यपाल की कार्रवाई की वैधता का मूल्यांकन संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक निर्णयों के आधार पर किया जाता है। इसलिए राज्यपाल की सरकार गठन संबंधी भूमिका को राजनीतिक पसंद या व्यक्तिगत निर्णय के बजाय संवैधानिक प्रक्रिया के संदर्भ में समझना अधिक उचित है। राज्यपाल के पद की यही विशेषता है कि वह राज्य की निर्वाचित राजनीति और संवैधानिक व्यवस्था के बीच एक औपचारिक-संवैधानिक सेतु का कार्य करता है, जबकि शासन की राजनीतिक जवाबदेही मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के पास रहती है।
राज्यपाल की शक्तियों की चर्चा करते समय अध्यादेश जारी करने की शक्ति का भी उल्लेख आवश्यक है। संविधान का अनुच्छेद 213 राज्यपाल को कुछ परिस्थितियों में अध्यादेश जारी करने की शक्ति देता है, जब राज्य विधानमंडल के दोनों सदन सत्र में न हों या एक सदन वाले राज्य में विधानसभा सत्र में न हो और ऐसी परिस्थिति हो जिसमें तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो। लेकिन यह शक्ति सामान्य विधायी प्रक्रिया का विकल्प नहीं है। अध्यादेश की संवैधानिक अवधि और उसके विधानमंडल के समक्ष रखे जाने की व्यवस्था संविधान में निर्धारित है। यदि विधानमंडल निर्धारित समय के भीतर उसे स्वीकृति नहीं देता तो उसकी स्थिति संविधान के अनुसार बदल जाती है। इसके अतिरिक्त कुछ परिस्थितियों में राज्यपाल को राष्ट्रपति के निर्देश के बिना अध्यादेश जारी करने की अनुमति नहीं होती। इसलिए अध्यादेश की शक्ति को राज्यपाल की स्वतंत्र और असीमित विधायी शक्ति के रूप में देखना उचित नहीं है। यह एक संवैधानिक आपात विधायी तंत्र है, जिसका उपयोग संविधान में निर्धारित परिस्थितियों और सीमाओं के भीतर किया जाता है। इसी तरह राज्यपाल को कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखने का संवैधानिक अधिकार भी प्राप्त है। राज्यपाल की यह भूमिका संघ और राज्य के संवैधानिक संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखने की परिस्थितियां भी संविधान और संबंधित कानूनों से निर्धारित होती हैं। इसलिए राज्यपाल की विधायी शक्तियों का अध्ययन करते समय अनुच्छेद 200 और 201 के साथ अनुच्छेद 213 को देखना आवश्यक है। इन प्रावधानों से यह स्पष्ट होता है कि राज्यपाल राज्य विधानमंडल की प्रक्रिया में एक संवैधानिक भूमिका निभाता है, लेकिन विधायी सत्ता का मूल स्रोत निर्वाचित विधानमंडल है और राज्यपाल की शक्तियां संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं में ही काम करती हैं। यही संसदीय लोकतंत्र की संवैधानिक संरचना का मूल तत्व है।
राज्यपाल की एक अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका राष्ट्रपति शासन से संबंधित प्रक्रिया में सामने आ सकती है। संविधान का अनुच्छेद 356 तब लागू होता है जब राष्ट्रपति को राज्यपाल से रिपोर्ट मिलने या अन्यथा यह संतोष हो कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें राज्य सरकार का संचालन संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं किया जा सकता। ऐसे मामले में राष्ट्रपति संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार उद्घोषणा जारी कर सकता है। राज्यपाल द्वारा भेजी गई रिपोर्ट इस संवैधानिक प्रक्रिया का एक स्रोत हो सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय राष्ट्रपति के स्तर पर होता है और वह संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अधीन रहता है। इस विषय को लेकर भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में न्यायिक समीक्षा का भी महत्वपूर्ण स्थान है। इसलिए राज्यपाल की रिपोर्ट को अपने आप राष्ट्रपति शासन लगाने के समान नहीं माना जा सकता। यह केंद्र-राज्य संबंधों से जुड़ी गंभीर संवैधानिक प्रक्रिया है और इसमें संविधान के विभिन्न प्रावधानों का पालन आवश्यक है। राज्यपाल की भूमिका यहां सूचना और संवैधानिक आकलन से जुड़ सकती है, जबकि राष्ट्रपति की उद्घोषणा और उसके बाद की संसदीय प्रक्रिया अलग संवैधानिक चरण हैं। इस विषय को समझने के लिए यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि राज्यपाल का पद केंद्र सरकार का प्रशासनिक अधिकारी नहीं है; वह संविधान द्वारा स्थापित राज्य का संवैधानिक पद है। इसी कारण राज्यपाल के कार्यों का मूल्यांकन संविधान, कानून और न्यायिक सिद्धांतों के आधार पर किया जाता है। राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच मतभेद की किसी भी स्थिति को केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय यह देखना आवश्यक है कि संविधान ने संबंधित परिस्थिति के लिए कौन-सी प्रक्रिया निर्धारित की है। इस दृष्टि से राज्यपाल का पद संघीय ढांचे में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था के रूप में सामने आता है।
राज्यपाल की भूमिका को समझने के लिए यह भी जानना जरूरी है कि राज्यपाल स्वयं राज्य सरकार के रोजमर्रा के प्रशासन को व्यक्तिगत रूप से संचालित नहीं करता। संविधान की संसदीय व्यवस्था में मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद शासन चलाती है और विधानसभा के प्रति उत्तरदायी रहती है। राज्यपाल के पास संविधान द्वारा प्रदत्त कई महत्वपूर्ण शक्तियां हैं, लेकिन उनका प्रयोग संवैधानिक प्रावधानों, मंत्रिपरिषद की सलाह, विवेकाधीन परिस्थितियों और न्यायिक व्याख्याओं के अनुरूप होता है। अनुच्छेद 154 में कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होने की बात कही गई है, लेकिन अनुच्छेद 163 मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह की व्यवस्था करता है। इन दोनों प्रावधानों को साथ पढ़ने पर राज्यपाल की वास्तविक संवैधानिक स्थिति अधिक स्पष्ट होती है। राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है और मुख्यमंत्री राज्य की राजनीतिक कार्यपालिका का प्रमुख है। इसी तरह विधानसभा कानून बनाती है और मंत्रिपरिषद उन कानूनों तथा नीतियों के अनुसार शासन संचालित करती है। राज्यपाल संविधान के अनुसार इन संस्थाओं के बीच निर्धारित प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। यह व्यवस्था भारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली की मूल विशेषताओं में से एक है। इसलिए राज्यपाल को न तो केवल औपचारिक पद मानना उचित है और न ही उसे राज्य की निर्वाचित सरकार से ऊपर एक स्वतंत्र राजनीतिक शासक के रूप में समझना संविधान की पूरी व्यवस्था को दर्शाता है। राज्यपाल की वास्तविक भूमिका अलग-अलग संवैधानिक परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है। किसी सामान्य प्रशासनिक मामले में मंत्रिपरिषद की सलाह प्रमुख होती है, जबकि कुछ विशिष्ट संवैधानिक परिस्थितियों में राज्यपाल की विवेकाधीन भूमिका का प्रश्न उठ सकता है। इसीलिए राज्यपाल के अधिकारों का अध्ययन हमेशा संबंधित अनुच्छेदों को एक साथ पढ़कर किया जाना चाहिए।
राज्यपाल के पद की संवैधानिक गरिमा उसकी शपथ और जिम्मेदारियों से भी जुड़ी हुई है। अनुच्छेद 159 के तहत राज्यपाल संविधान और कानून की रक्षा, संरक्षण और प्रतिरक्षा करने तथा राज्य के लोगों की सेवा और कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करने की शपथ लेता है। यह दायित्व राज्यपाल के पद को केवल प्रशासनिक पद नहीं रहने देता, बल्कि उसे संवैधानिक मूल्यों से जोड़ता है। राज्यपाल को अपने पद पर रहते हुए संविधान के विभिन्न प्रावधानों के अनुरूप कार्य करना होता है। राज्यपाल के कार्यालय से जुड़े निर्णयों में संविधान की भाषा, संबंधित कानून और न्यायिक व्याख्याओं का महत्व रहता है। राज्यपाल के पद की स्वतंत्र गरिमा के लिए संविधान ने यह भी सुनिश्चित किया है कि कार्यकाल के दौरान उसके वेतन और भत्तों को कम नहीं किया जाएगा। राज्यपाल किसी अन्य लाभ के पद पर नहीं रह सकता और यदि वह पहले संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य रहा हो तो पद ग्रहण करते ही उसकी सदस्यता समाप्त मानी जाती है। इन प्रावधानों का उद्देश्य राज्यपाल के पद को अन्य संवैधानिक और राजनीतिक भूमिकाओं से अलग रखना है। राज्यपाल का पद किसी व्यक्तिगत प्रशासनिक करियर की अगली सीढ़ी के रूप में संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है, बल्कि यह एक स्वतंत्र संवैधानिक कार्यालय है। नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है, कार्यकाल संविधान द्वारा निर्धारित है, शपथ संविधान की रक्षा के प्रति होती है और शक्तियां भी संविधान से ही आती हैं। इसलिए राज्यपाल की प्रत्येक शक्ति का मूल स्रोत भारतीय संविधान है। संविधान के बाहर राज्यपाल के लिए कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है। किसी भी शक्ति का प्रयोग संविधान या कानून के आधार पर ही किया जाना चाहिए। यही संवैधानिक शासन की बुनियादी अवधारणा है।
राज्यपाल की शक्तियों को तीन व्यापक क्षेत्रों में समझा जा सकता है—कार्यपालिका, विधायी और कुछ विशेष संवैधानिक शक्तियां। कार्यपालिका क्षेत्र में राज्य सरकार के महत्वपूर्ण संवैधानिक कार्यों में राज्यपाल की भूमिका होती है। विधायी क्षेत्र में विधानमंडल के सत्र, अभिभाषण और विधेयकों से संबंधित संवैधानिक प्रक्रियाओं में उसका स्थान है। विशेष संवैधानिक क्षेत्र में क्षमादान संबंधी शक्ति, कुछ परिस्थितियों में विवेकाधीन भूमिका और संवैधानिक तंत्र विफल होने से संबंधित रिपोर्ट जैसे विषय शामिल होते हैं। इसके अलावा राज्यपाल कुछ संवैधानिक पदों की नियुक्ति संबंधी प्रक्रियाओं में भी भूमिका निभाता है, हालांकि प्रत्येक नियुक्ति की प्रक्रिया संबंधित संवैधानिक या वैधानिक प्रावधानों से निर्धारित होती है। राज्यपाल की भूमिका को लेकर अक्सर यह प्रश्न उठता है कि वह कितनी स्वतंत्रता से कार्य कर सकता है। इसका उत्तर किसी एक अनुच्छेद से नहीं बल्कि संविधान के विभिन्न प्रावधानों के संयुक्त अध्ययन से मिलता है। सामान्य नियम के रूप में राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह प्राप्त होती है, लेकिन संविधान कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में विवेक की गुंजाइश भी देता है। इन परिस्थितियों की सीमा और प्रकृति को न्यायालयों ने समय-समय पर स्पष्ट किया है। इसलिए राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों को भी असीमित नहीं माना जा सकता। संवैधानिक पदों पर कार्य करने वाले सभी व्यक्तियों की तरह राज्यपाल भी संविधान और कानून से बंधा हुआ है। राज्यपाल की शक्ति का उद्देश्य शासन व्यवस्था को संविधान के अनुरूप चलाना है, न कि व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णयों के आधार पर शासन की दिशा बदलना। इस अंतर को समझना भारतीय संविधान में राज्यपाल की वास्तविक स्थिति समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
राज्यपाल और राज्य विधानमंडल के संबंधों में विधेयक पर कार्रवाई विशेष रूप से महत्वपूर्ण विषय है। जब कोई विधेयक विधानसभा या जहां आवश्यक हो वहां विधानमंडल के दोनों सदनों से पारित होकर राज्यपाल के पास जाता है, तब संविधान उसके लिए निर्धारित विकल्पों की व्यवस्था करता है। राज्यपाल किसी विधेयक को स्वीकृति दे सकता है या संविधान के अनुसार स्वीकृति रोक सकता है। सामान्य विधेयक को कुछ परिस्थितियों में पुनर्विचार के लिए विधानमंडल के पास लौटाया जा सकता है। यदि विधानमंडल उसे पुनः पारित कर देता है, तो संविधान के अनुसार राज्यपाल के विकल्प की स्थिति बदलती है। कुछ विधेयक राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखे जा सकते हैं। धन विधेयक की स्थिति अलग है और उसकी प्रस्तुति तथा स्वीकृति से संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया में विधानसभा की विशेष भूमिका है। इन प्रावधानों का उद्देश्य विधायी प्रक्रिया में संवैधानिक जांच और संतुलन बनाए रखना है। राज्यपाल को विधेयक पर कार्रवाई करते समय संविधान के संबंधित अनुच्छेदों का पालन करना होता है। विधेयक से संबंधित राज्यपाल की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह राज्य की विधायिका और संवैधानिक प्रमुख के बीच एक औपचारिक संवैधानिक चरण का निर्माण करती है। हाल के वर्षों में विधेयकों पर राज्यपाल की कार्रवाई की समयसीमा और अधिकारों को लेकर न्यायिक तथा सार्वजनिक चर्चा हुई है, इसलिए ऐसे मामलों में सामान्य संवैधानिक सिद्धांत के साथ वर्तमान न्यायिक स्थिति को भी देखना आवश्यक होता है। किसी विशिष्ट विधेयक या राज्य से जुड़े मामले पर निष्कर्ष निकालने के लिए उस मामले के तथ्य और उस समय लागू न्यायिक निर्णयों का अध्ययन जरूरी होता है।
राज्यपाल के पद की एक विशेषता यह भी है कि उसका कार्यालय राज्य की सीमाओं के भीतर संवैधानिक निरंतरता का प्रतिनिधित्व करता है। मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद बदल सकते हैं, विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो सकता है और नई राजनीतिक सरकार बन सकती है, लेकिन राज्य की संवैधानिक व्यवस्था निरंतर बनी रहती है। राज्यपाल उस संवैधानिक निरंतरता का एक प्रमुख संस्थागत हिस्सा है। इसी कारण संविधान ने राज्यपाल की नियुक्ति, कार्यकाल और शपथ को विशेष रूप से परिभाषित किया है। राज्यपाल के उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक उसके पद पर बने रहने की व्यवस्था भी इसी निरंतरता का हिस्सा है। इसी तरह अनुच्छेद 160 आकस्मिक परिस्थितियों में संवैधानिक कार्यों के निर्वहन की व्यवस्था का अधिकार राष्ट्रपति को देता है। ये प्रावधान बताते हैं कि संविधान केवल सामान्य परिस्थितियों के लिए नहीं, बल्कि असामान्य परिस्थितियों में शासन की निरंतरता के लिए भी व्यवस्था करता है। राज्यपाल का कार्यालय राज्य और संघ के संवैधानिक संबंधों में भी एक महत्वपूर्ण कड़ी है। राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होने के कारण उसका संबंध संघीय संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ता है, जबकि उसके कार्य मुख्य रूप से राज्य के संवैधानिक ढांचे में होते हैं। यही कारण है कि राज्यपाल के पद को भारतीय संघवाद के संदर्भ में भी अध्ययन किया जाता है। हालांकि राज्यपाल को केंद्र सरकार का कर्मचारी कहना संवैधानिक रूप से सही अभिव्यक्ति नहीं होगी। वह संविधान द्वारा स्थापित राज्य का संवैधानिक पदाधिकारी है। उसके कार्यों की वैधता का आधार केंद्र या राज्य की राजनीतिक इच्छा नहीं, बल्कि संविधान और कानून हैं। यही सिद्धांत राज्यपाल के पद की संवैधानिक स्वतंत्रता और जिम्मेदारी दोनों को समझने में सहायता करता है।
राज्यपाल की भूमिका में मुख्यमंत्री के साथ संवाद भी महत्वपूर्ण है। अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री को राज्यपाल को जानकारी देने और राज्य प्रशासन से संबंधित कुछ मामलों में संवैधानिक दायित्व निभाने के लिए बाध्य करता है। मुख्यमंत्री को मंत्रिपरिषद के उन सभी निर्णयों की जानकारी राज्यपाल को देनी होती है जो राज्य प्रशासन और विधायी प्रस्तावों से संबंधित हों। यदि राज्यपाल किसी प्रशासनिक या विधायी विषय से संबंधित जानकारी मांगता है, तो मुख्यमंत्री का संवैधानिक दायित्व है कि वह जानकारी उपलब्ध कराए। यदि किसी मंत्री ने कोई निर्णय लिया हो और मंत्रिपरिषद ने उस पर विचार नहीं किया हो, तो राज्यपाल मुख्यमंत्री से उस विषय को मंत्रिपरिषद के समक्ष रखने के लिए कह सकता है। यह व्यवस्था राज्यपाल को सरकार के दैनिक प्रशासन का संचालक नहीं बनाती, बल्कि संवैधानिक सूचना-संबंधी संबंध को सुनिश्चित करती है। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच यह संवाद संसदीय शासन की पारदर्शी संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है। राज्यपाल को राज्य प्रशासन की स्थिति और मंत्रिपरिषद के निर्णयों की जानकारी मिलती रहती है, जबकि मुख्यमंत्री संविधान के अनुसार राज्यपाल के साथ आवश्यक संपर्क बनाए रखता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य संस्थाओं के बीच संवैधानिक समन्वय है। राज्यपाल के कार्यालय और मुख्यमंत्री कार्यालय के बीच किसी भी प्रकार की बातचीत या पत्राचार को समझने के लिए संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और विषय की परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। सामान्य राजनीतिक बहस से अलग संविधान ने दोनों पदों के बीच अधिकारों और जिम्मेदारियों की स्पष्ट रूपरेखा तैयार की है।
राज्यपाल के अधिकारों में विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति जैसी भूमिकाओं का उल्लेख अक्सर किया जाता है, लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि ऐसी भूमिका हर राज्य में सीधे भारतीय संविधान के अनुच्छेदों से स्वतः नहीं आती। कई राज्यों में राज्यपाल को विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति संबंधित राज्य कानूनों के तहत बनाया गया है। इसलिए राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों और राज्य कानूनों से प्राप्त अतिरिक्त भूमिकाओं के बीच अंतर करना आवश्यक है। इसी तरह किसी राज्य में राज्यपाल के पास कोई विशेष वैधानिक शक्ति है या नहीं, यह उस राज्य के संबंधित कानून पर निर्भर करता है। भारतीय संविधान राज्यपाल के मूल संवैधानिक अधिकारों की व्यवस्था करता है, जबकि राज्य विधानमंडल कुछ विषयों पर कानून बनाकर राज्यपाल की वैधानिक भूमिका निर्धारित कर सकता है, बशर्ते वह संविधान के अनुरूप हो। इसलिए यदि कोई व्यक्ति राज्यपाल की पूरी भूमिका समझना चाहता है तो उसे केवल संविधान के अनुच्छेद 153 से 160 ही नहीं, बल्कि अनुच्छेद 161 से आगे, राज्य विधानमंडल से संबंधित प्रावधान, संबंधित राज्य कानून और आवश्यक न्यायिक निर्णय भी देखने चाहिए। इसी तरह राज्यपाल की किसी विशिष्ट कार्रवाई की संवैधानिक वैधता पर विचार करते समय केवल पद की सामान्य शक्तियों का उल्लेख पर्याप्त नहीं होता। उस कार्रवाई के लिए लागू संवैधानिक अनुच्छेद, कानून, परिस्थितियां और न्यायालयों की व्याख्या भी देखनी पड़ती है। यही कानूनी अध्ययन का सही तरीका है और इससे संवैधानिक पदों के संबंध में गलतफहमी कम होती है।
राज्यपाल के पद को समझने का सबसे सरल तरीका यह है कि इसे भारतीय संसदीय संघीय व्यवस्था की एक संवैधानिक संस्था के रूप में देखा जाए। राज्यपाल का पद राष्ट्रपति के समान प्रत्यक्ष चुनाव से नहीं बनता, बल्कि राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति की संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से बनता है। राज्यपाल की न्यूनतम योग्यता भारतीय नागरिकता और 35 वर्ष की आयु है। उसका सामान्य कार्यकाल पांच वर्ष है, लेकिन वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है और उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक पद पर बना रह सकता है। वह संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रह सकता और कोई अन्य लाभ का पद भी नहीं धारण कर सकता। पद ग्रहण करने से पहले उसे संविधान और कानून की रक्षा तथा राज्य के लोगों की सेवा और कल्याण की शपथ लेनी होती है। राज्यपाल की कार्यपालिका शक्ति संविधान के अनुसार चलती है और सामान्यतः मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद उसे सहायता और सलाह देती है। राज्यपाल के पास विधायी प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका है, कुछ मामलों में क्षमादान संबंधी शक्ति है, और विशिष्ट संवैधानिक परिस्थितियों में उसका विवेक महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन इन सभी शक्तियों की सीमा संविधान द्वारा निर्धारित है।
इस पूरी संवैधानिक व्यवस्था का मूल संदेश यही है कि राज्यपाल का पद अधिकार के साथ-साथ संवैधानिक जिम्मेदारी का पद भी है। अनुच्छेद 156 से 160 तक राज्यपाल के कार्यकाल, योग्यता, पद की शर्तों, शपथ और आकस्मिक परिस्थितियों में कार्यों के निर्वहन की व्यवस्था करते हैं, लेकिन राज्यपाल की पूरी भूमिका अनुच्छेद 153 से शुरू होकर आगे के अनेक प्रावधानों में फैली हुई है। अनुच्छेद 153 राज्यपाल के अस्तित्व और नियुक्ति व्यवस्था का आधार बनाता है, अनुच्छेद 154 कार्यपालिका शक्ति की स्थिति बताता है, अनुच्छेद 155 नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित करता है, अनुच्छेद 156 कार्यकाल और पद पर बने रहने की व्यवस्था देता है, अनुच्छेद 157 योग्यता बताता है, अनुच्छेद 158 पद की शर्तों को निर्धारित करता है, अनुच्छेद 159 संवैधानिक शपथ का प्रावधान करता है और अनुच्छेद 160 आकस्मिक परिस्थितियों में कार्यों के निर्वहन की व्यवस्था करता है। इसके बाद अनुच्छेद 161 से राज्यपाल की अन्य संवैधानिक शक्तियों और राज्य शासन से जुड़े प्रावधानों का विस्तार मिलता है। इसलिए जब हम कहते हैं कि “महामहिम राज्यपाल” का पद संविधान में निहित है, तो इसका आशय केवल एक औपचारिक पद से नहीं, बल्कि ऐसी संवैधानिक संस्था से है जो राज्य की कार्यपालिका, विधायिका और संघीय व्यवस्था के बीच संविधान द्वारा निर्धारित कई प्रक्रियाओं में भूमिका निभाती है। राज्यपाल के अधिकारों को समझने के लिए संविधान के शब्दों को उनके पूरे संदर्भ में पढ़ना आवश्यक है। यही संवैधानिक अध्ययन हमें यह समझाता है कि किसी भी पद की शक्ति केवल अधिकार से नहीं, बल्कि उसकी सीमाओं, प्रक्रियाओं और जवाबदेही से भी निर्धारित होती है। भारतीय संविधान में राज्यपाल का पद इसी संतुलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
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