
रायगढ़। जब शास्त्रीय नृत्य की मुद्राओं में भक्ति का भाव उतरता है, जब पदचाप के साथ कथा आगे बढ़ती है और जब कलाकार अपनी आंखों, मुखमुद्राओं तथा हस्तमुद्राओं के माध्यम से देवी-देवताओं की लीलाओं को मंच पर साकार करता है, तब मंच केवल प्रस्तुति का स्थान नहीं रह जाता, बल्कि वह भावनाओं, आध्यात्मिकता, संस्कृति और भारतीय परंपरा के जीवंत संसार में बदल जाता है। रायगढ़ के रामलीला मैदान में आयोजित 41वें चक्रधर समारोह के चौथे दिन बेंगलुरु की प्रसिद्ध भरतनाट्यम कलाकार एवं शिक्षिका सुश्री शिवरंजनी हरीश की प्रस्तुति ने इसी अनुभूति को साकार किया। उनकी भरतनाट्यम प्रस्तुति में शास्त्रीय नृत्य की तकनीकी सुंदरता के साथ भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक आख्यानों की भावपूर्ण अभिव्यक्ति दिखाई दी। प्रस्तुति की शुरुआत पुष्पांजलि और भगवान शिव की स्तुति से हुई, जिसके बाद नृत्य के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश तक के प्रसंगों को मंच पर प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम के अंतिम चरण में भगवान श्रीराम से जुड़े प्रसंगों को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया, जिनमें अहिल्या की शाप-मुक्ति, सीता स्वयंवर और शबरी मोक्ष जैसे प्रसंगों ने दर्शकों के मन को छुआ। चक्रधर समारोह के चौथे दिन भरतनाट्यम की इस प्रस्तुति ने यह भी दिखाया कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य केवल नृत्य की तकनीक, ताल और लय तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके भीतर कथा, दर्शन, भक्ति, साहित्य, संगीत और भाव-अभिनय की एक व्यापक परंपरा समाहित है। आधिकारिक जिला रायगढ़ की समारोह संबंधी जानकारी में भी 17 सितंबर को शिवरंजनी हरीश की भरतनाट्यम प्रस्तुति को कार्यक्रम का हिस्सा बताया गया है।
सुश्री शिवरंजनी हरीश की प्रस्तुति का आरंभ पुष्पांजलि से हुआ। भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा में पुष्पांजलि का अपना विशिष्ट महत्व है। यह मंच, गुरु, देवता और दर्शकों के प्रति सम्मान तथा कृतज्ञता की अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत की जाती है। जब मंच पर पुष्पांजलि के माध्यम से नृत्य की शुरुआत हुई तो वातावरण में एकाग्रता और श्रद्धा का भाव दिखाई दिया। इसके बाद भगवान शिव की स्तुति को भरतनाट्यम की विशिष्ट मुद्राओं, पदचाप और भावाभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। शिव की आराधना के प्रसंग में नृत्यांगना ने केवल शारीरिक गतियों का प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि भावों के माध्यम से शिव के विभिन्न स्वरूपों को समझाने का प्रयास किया। भरतनाट्यम में आंखों की गति, भौंहों का उतार-चढ़ाव, चेहरे की भाव-भंगिमाएं, हाथों की मुद्राएं और पैरों की लयबद्ध गति मिलकर कथा को आगे बढ़ाती हैं। यही कारण है कि इस प्रस्तुति में दर्शकों को केवल नृत्य देखने का अनुभव नहीं हुआ, बल्कि वे कथा के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ते हुए दिखाई दिए। शिव स्तुति के बाद प्रस्तुति का केंद्र भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उनकी लीलाओं की ओर बढ़ा। कृष्ण जन्म से लेकर श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश तक की यात्रा को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। कृष्ण के बाल रूप, उनके व्यक्तित्व की विविध छवियां और अंततः जीवन तथा धर्म के गूढ़ संदेश से जुड़े प्रसंगों को नृत्य-नाट्य शैली में प्रस्तुत किए जाने से मंच पर कथा का विस्तार हुआ। समारोह की यही विशेषता रही कि शास्त्रीय कला को केवल प्रदर्शन के रूप में नहीं, बल्कि कथा और सांस्कृतिक स्मृति से जोड़कर प्रस्तुत किया गया।
भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े प्रसंगों की प्रस्तुति में भावाभिनय की विशेष भूमिका रही। कृष्ण जन्म का प्रसंग जहां उत्सव और उल्लास की अनुभूति कराता है, वहीं श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश का प्रसंग जीवन, कर्तव्य और धर्म से जुड़े गंभीर विचारों की ओर ले जाता है। इन दोनों छोरों के बीच नृत्य के माध्यम से कथा को आगे बढ़ाना कलाकार के लिए केवल तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि भावात्मक अभिव्यक्ति की भी कसौटी होती है। शिवरंजनी हरीश ने भरतनाट्यम की शैली में इन प्रसंगों को प्रस्तुत करते हुए कथा के अलग-अलग भावों को मंच पर स्थान दिया। एक ओर कृष्ण जन्म की प्रसन्नता और उत्साह की अनुभूति थी, वहीं दूसरी ओर गीता के उपदेश से जुड़ा गंभीर भाव भी प्रस्तुति का हिस्सा बना। नृत्य में जब शब्दों के स्थान पर मुद्राएं और भाव संवाद का माध्यम बनते हैं, तब दर्शक को कथा समझने के लिए कलाकार के चेहरे, आंखों और शरीर की गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करना पड़ता है। यही शास्त्रीय नृत्य की वह विशेषता है, जो उसे दृश्य कला के साथ-साथ कथात्मक कला भी बनाती है। चक्रधर समारोह जैसे मंच पर ऐसी प्रस्तुतियां भारतीय शास्त्रीय नृत्य की उस परंपरा को सामने लाती हैं, जिसमें धार्मिक और साहित्यिक आख्यानों को संगीत, ताल, लय और अभिनय के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता रहा है। रायगढ़ में आयोजित 41वें चक्रधर समारोह में देश-प्रदेश के विभिन्न कलाकार शास्त्रीय नृत्य, संगीत, लोककला और अन्य सांस्कृतिक विधाओं की प्रस्तुतियां दे रहे हैं, जिससे यह आयोजन विविध भारतीय कलाओं के लिए एक साझा मंच के रूप में सामने आया है।
प्रस्तुति का अंतिम चरण भगवान श्रीराम से जुड़े प्रसंगों को समर्पित रहा। गोस्वामी तुलसीदास से जुड़े प्रसिद्ध भजन के माध्यम से रामकथा के चुनिंदा प्रसंगों को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया। इनमें अहिल्या की शाप-मुक्ति, सीता स्वयंवर और शबरी मोक्ष जैसे प्रसंग शामिल रहे। इन कथाओं में अलग-अलग भावों का संसार दिखाई देता है। अहिल्या प्रसंग में मुक्ति और करुणा का भाव है, सीता स्वयंवर में उत्सव, मर्यादा और गौरव का वातावरण है, जबकि शबरी के प्रसंग में भक्ति, प्रतीक्षा और समर्पण की अनुभूति प्रमुख है। इन विविध भावों को एक ही शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुति में पिरोना कलाकार की अभिनय क्षमता और कथानक की समझ को सामने लाता है। भरतनाट्यम की परंपरा में अभिनय को विशेष महत्व दिया जाता है और इसी के माध्यम से किसी कथा के पात्र, परिस्थिति और भाव को दर्शकों तक पहुंचाया जाता है। शिवरंजनी हरीश की प्रस्तुति में भी यही पक्ष प्रमुखता से सामने आया। उनके नृत्य में कथा के साथ भावों का तालमेल दिखाई दिया और अलग-अलग प्रसंगों के अनुसार मंचीय अभिव्यक्ति में बदलाव देखने को मिला। रामकथा के प्रसंगों के साथ प्रस्तुति जैसे-जैसे आगे बढ़ी, मंच पर भक्ति और संवेदना का वातावरण गहराता गया। दर्शकों ने प्रस्तुति को ध्यानपूर्वक देखा और समापन के बाद तालियों के माध्यम से कलाकार का उत्साहवर्धन किया। इस तरह कृष्ण की लीला से रामकथा तक की यह यात्रा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में मौजूद विविध कथाओं और उनके भावात्मक पक्ष को एक मंच पर सामने लाने वाली प्रस्तुति बन गई।
शिवरंजनी हरीश की प्रस्तुति की विशेषता केवल विषय-वस्तु में नहीं, बल्कि भरतनाट्यम की तकनीकी संरचना में भी दिखाई दी। भरतनाट्यम में नृत्य के शुद्ध अंग, भाव-अभिनय, ताल और लय का संतुलन महत्वपूर्ण माना जाता है। कलाकार जब पैरों की निश्चित लय के साथ मुद्राओं और मुखाभिनय को जोड़ता है, तो एक ऐसी दृश्य भाषा तैयार होती है जिसे शब्दों के बिना भी समझा जा सकता है। भगवान शिव की स्तुति से शुरू होकर कृष्ण और राम से जुड़े प्रसंगों तक पहुंची इस प्रस्तुति में इसी दृश्य भाषा का उपयोग हुआ। प्रत्येक प्रसंग के अनुरूप भाव और मुद्रा का प्रयोग कथा को आगे बढ़ाने का माध्यम बना। दर्शकों के लिए यह अनुभव इसलिए भी विशेष रहा क्योंकि एक ही प्रस्तुति में भारतीय संस्कृति के अलग-अलग धार्मिक और साहित्यिक आख्यानों को शास्त्रीय नृत्य की भाषा में देखने का अवसर मिला। चक्रधर समारोह की परंपरा में शास्त्रीय नृत्य को विशेष स्थान प्राप्त है और इस वर्ष भी समारोह में भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, कुचिपुड़ी, मणिपुरी सहित अनेक नृत्य शैलियों को मंच दिया जा रहा है। जिला प्रशासन द्वारा जारी कार्यक्रम विवरण में 17 सितंबर को शिवरंजनी हरीश के साथ जान्हवी बेहरा की ओडिसी, मधुमिता राय मिश्रा का कथक, श्रीविद्या शैलेश का भरतनाट्यम और अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी निर्धारित थीं। इससे समारोह में भारतीय शास्त्रीय नृत्य की विभिन्न परंपराओं की विविधता दिखाई देती है।
चक्रधर समारोह का मंच स्वयं भी इस प्रस्तुति के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ रखता है। महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना और रायगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को समर्पित यह समारोह वर्ष 2026 में अपने 41वें संस्करण में पहुंचा है। इस वर्ष समारोह का आयोजन 14 से 23 सितंबर तक रायगढ़ के रामलीला मैदान में किया जा रहा है। दस दिवसीय आयोजन में देश-प्रदेश के कलाकारों को शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय नृत्य, लोककला, गायन, वादन और अन्य सांस्कृतिक विधाओं के प्रदर्शन का अवसर दिया जा रहा है। ऐसे में शिवरंजनी हरीश की भरतनाट्यम प्रस्तुति को केवल एक अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह उस व्यापक परंपरा का हिस्सा है जिसमें रायगढ़ की धरती पर विभिन्न भारतीय कला शैलियां एक साथ उपस्थित हो रही हैं। समारोह के मंच पर जब देश के अलग-अलग हिस्सों से आए कलाकार अपनी-अपनी शैली प्रस्तुत करते हैं, तो दर्शकों को भारत की सांस्कृतिक विविधता को एक ही स्थान पर देखने का अवसर मिलता है। भरतनाट्यम दक्षिण भारत की समृद्ध नृत्य परंपरा से जुड़ी शैली है, जबकि रायगढ़ और छत्तीसगढ़ की अपनी लोक एवं शास्त्रीय कला परंपराएं हैं। इन विभिन्न परंपराओं का एक मंच पर आना सांस्कृतिक संवाद की संभावना को मजबूत करता है। इसी संदर्भ में शिवरंजनी हरीश की प्रस्तुति में कृष्ण और राम से जुड़े प्रसंगों का शामिल होना भी उल्लेखनीय रहा, क्योंकि इन कथाओं की सांस्कृतिक पहुंच व्यापक है और उन्हें अलग-अलग भारतीय कला रूपों में प्रस्तुत किया जाता रहा है।
शास्त्रीय नृत्य की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह है कि वह परंपरा को स्थिर रूप में रखने के बजाय उसे मंचीय अभिव्यक्ति के माध्यम से वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाता है। कृष्ण जन्म, गीता का संदेश, अहिल्या की मुक्ति, सीता स्वयंवर और शबरी मोक्ष जैसे प्रसंग भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा रहे हैं, लेकिन जब इन्हें भरतनाट्यम के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है तो वही कथाएं नई दृश्य भाषा में दर्शकों के सामने आती हैं। इस प्रस्तुति में भी कथा और नृत्य का यही संबंध दिखाई दिया। कलाकार ने भावों को केवल चेहरे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि हाथों की मुद्राओं, शरीर की गतियों और लयबद्ध पदचाप के साथ उन्हें व्यापक रूप दिया। दर्शकों के लिए यह प्रस्तुति इसलिए भी आकर्षक रही क्योंकि इसमें नृत्य, संगीत और कथा एक-दूसरे के पूरक दिखाई दिए। मंच पर भगवान शिव की आराधना के समय भक्ति का भाव, कृष्ण प्रसंगों के दौरान विविध भाव और रामकथा के दौरान करुणा, भक्ति तथा मर्यादा से जुड़े भाव अलग-अलग रूपों में उभरते रहे। यही विविधता प्रस्तुति को प्रभावी बनाती है। एक कलाकार के लिए किसी धार्मिक कथा को मंच पर प्रस्तुत करना केवल घटनाओं को क्रम से दिखाना नहीं होता, बल्कि पात्रों के मनोभाव, परिस्थितियों और कथा के मूल संदेश को भी अभिव्यक्त करना होता है। भरतनाट्यम की अभिनय परंपरा इस कार्य के लिए विशेष रूप से सक्षम माध्यम प्रदान करती है।
शिवरंजनी हरीश की कला-साधना भी इस प्रस्तुति के पीछे दिखाई दी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्हें 36 वर्षों का नृत्य-साधना अनुभव और 26 वर्षों का नृत्य-शिक्षण अनुभव है। उन्होंने 2 हजार से अधिक विद्यार्थियों को भरतनाट्यम का प्रशिक्षण दिया है और देश-विदेश के अनेक मंचों पर प्रस्तुतियां दी हैं। कला के माध्यम से शिक्षा तथा सामाजिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी उनके कार्य का उल्लेख किया गया है। इस लंबे अनुभव का प्रभाव मंचीय प्रस्तुति में स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है, क्योंकि वर्षों की साधना से कलाकार के लिए नृत्य की तकनीक सहज अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाती है। जब किसी कलाकार के लिए मुद्राएं, पदचाप और भावाभिनय अभ्यास से आगे बढ़कर उसकी कलात्मक भाषा बन जाते हैं, तब वह कथा को अधिक सहजता से दर्शकों तक पहुंचा सकता है। शिवरंजनी हरीश की प्रस्तुति में भी भरतनाट्यम की इसी परिपक्वता का अनुभव हुआ। विशेष रूप से अलग-अलग धार्मिक प्रसंगों को एक क्रम में प्रस्तुत करते समय भावों के परिवर्तन और कथा की गति को बनाए रखना महत्वपूर्ण होता है। उनकी प्रस्तुति में आरंभिक पुष्पांजलि से लेकर शिव स्तुति, कृष्ण प्रसंग और रामकथा तक एक क्रमबद्ध सांस्कृतिक यात्रा दिखाई दी। इस यात्रा में नृत्य की शास्त्रीय संरचना और कथा की भावात्मकता साथ-साथ चलती रही।
रायगढ़ के चक्रधर समारोह में ऐसी प्रस्तुतियां दर्शकों की भागीदारी को भी एक अलग आयाम देती हैं। मंच पर प्रस्तुति देने वाला कलाकार केवल अपने कला कौशल का प्रदर्शन नहीं करता, बल्कि दर्शकों के सामने एक सांस्कृतिक अनुभव प्रस्तुत करता है। जब दर्शक किसी प्रस्तुति के माध्यम से किसी कथा को नए रूप में देखते हैं, तो कला और दर्शक के बीच एक संवाद स्थापित होता है। शिवरंजनी हरीश की प्रस्तुति में यह संवाद तालियों और दर्शकों की प्रतिक्रिया के माध्यम से दिखाई दिया। भरतनाट्यम की गंभीरता और उसकी लयात्मक संरचना के बीच धार्मिक आख्यानों की भावनात्मकता ने प्रस्तुति को व्यापक प्रभाव दिया। विशेष रूप से अहिल्या, सीता और शबरी जैसे प्रसंगों में कथा के भीतर मौजूद अलग-अलग भावों को मंच पर देखने का अवसर मिला। इन प्रसंगों के माध्यम से भक्ति, प्रतीक्षा, करुणा, सम्मान और मुक्ति जैसे भावों को नृत्य की भाषा में अभिव्यक्त किया गया। वहीं कृष्ण से जुड़े प्रसंगों ने प्रस्तुति में उत्सव और आध्यात्मिक चिंतन दोनों को स्थान दिया। भगवान शिव की स्तुति से शुरुआत होने के कारण प्रस्तुति का आरंभ ही आध्यात्मिक वातावरण के साथ हुआ और अंतिम रामकथा तक यह भाव निरंतर बना रहा। इस प्रकार पूरी प्रस्तुति में भक्ति और शास्त्रीय सौंदर्य का संतुलन दिखाई दिया।
चक्रधर समारोह की व्यापकता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि दस दिनों तक चलने वाले आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों से कलाकार शामिल हो रहे हैं। आधिकारिक कार्यक्रम सूची के अनुसार 14 सितंबर से शुरू हुए समारोह में अलग-अलग दिनों में गणेश वंदना, पंडवानी, लोक कला एवं संगीत, कथक, राजस्थानी फोक, कुचिपुड़ी, तबला वादन, भजन गायन, छत्तीसगढ़ी लोक नृत्य, ओडिसी, भरतनाट्यम और अन्य विधाओं की प्रस्तुतियां रखी गई हैं। इस विविधता के बीच शिवरंजनी हरीश की भरतनाट्यम प्रस्तुति ने दक्षिण भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा को रायगढ़ के सांस्कृतिक मंच पर प्रभावशाली ढंग से सामने रखा। यह आयोजन उन दर्शकों के लिए भी अवसर बन रहा है जो अलग-अलग नृत्य शैलियों को एक ही मंच पर देखना चाहते हैं। एक ओर जहां लोककला स्थानीय सांस्कृतिक जीवन की अभिव्यक्ति करती है, वहीं शास्त्रीय नृत्य देश की दीर्घकालीन कलात्मक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है। इन दोनों का साथ-साथ मंच पर आना सांस्कृतिक विविधता को व्यापक रूप देता है। चक्रधर समारोह की यही प्रकृति उसे केवल एक कार्यक्रम के बजाय कला और संस्कृति के बहुआयामी आयोजन का स्वरूप देती है।
शिवरंजनी हरीश की भरतनाट्यम प्रस्तुति के माध्यम से यह भी स्पष्ट हुआ कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य में धार्मिक आख्यानों को प्रस्तुत करने की परंपरा आज भी दर्शकों से संवाद करने में सक्षम है। आधुनिक समय में मंचीय प्रस्तुतियों के रूप और माध्यम भले बदल रहे हों, लेकिन भारतीय कथाओं, देव-परंपराओं और सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़ी कला की मांग बनी हुई है। जब किसी प्रस्तुति में कृष्ण जन्म से गीता तक और रामकथा के विभिन्न प्रसंगों को नृत्य के माध्यम से दिखाया जाता है, तो वह प्रस्तुति दर्शकों को केवल मनोरंजन नहीं देती, बल्कि उन्हें भारतीय कथा-संसार से जोड़ती भी है। इसी तरह शिव की स्तुति के माध्यम से प्रस्तुति का आरंभ भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ता है। भरतनाट्यम की मुद्रा और अभिनय इन कथाओं को दृश्य रूप देते हैं और दर्शक उन्हें शब्दों के बजाय नृत्य की भाषा में ग्रहण करते हैं। इस प्रस्तुति का प्रभाव इसलिए भी रहा क्योंकि इसमें कथा की विविधता और नृत्य की शास्त्रीयता दोनों को साथ रखा गया। मंच पर अलग-अलग प्रसंगों के बीच भावों का परिवर्तन दिखाई दिया और प्रत्येक प्रसंग के अनुरूप नृत्य की अभिव्यक्ति में भी बदलाव आया।
समारोह के चौथे दिन की इस प्रस्तुति ने रायगढ़ की सांस्कृतिक धरती पर देश की विविध नृत्य परंपराओं के समागम को और समृद्ध किया। 17 सितंबर के आधिकारिक कार्यक्रम में शिवरंजनी हरीश के अलावा ओडिसी, कथक, भरतनाट्यम तथा बस्तर की लोक कला एवं संगीत की प्रस्तुतियां भी शामिल थीं। इसका अर्थ यह रहा कि एक ही सांस्कृतिक संध्या में दर्शकों को अलग-अलग नृत्य और कला परंपराओं का अनुभव प्राप्त हुआ। शिवरंजनी हरीश की प्रस्तुति इस क्रम में विशेष रूप से इसलिए अलग रही क्योंकि इसमें एक विस्तृत धार्मिक कथा-यात्रा को भरतनाट्यम के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। पुष्पांजलि और शिव स्तुति से शुरू हुई प्रस्तुति कृष्ण जन्म और गीता तक पहुंची तथा फिर रामकथा के प्रसंगों के साथ अपने भावपूर्ण समापन तक आई। यह क्रम मंचीय संरचना के स्तर पर भी एक पूर्ण यात्रा जैसा अनुभव देता है—आराधना से कथा तक, कथा से दर्शन तक और दर्शन से भक्ति एवं भाव की ओर। दर्शकों के लिए यह एक ऐसी प्रस्तुति बनी जिसमें नृत्य की सुंदरता और कथा की शक्ति एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई दी।
रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में चक्रधर समारोह का अपना विशेष स्थान है। वर्ष 2026 का 41वां आयोजन 14 से 23 सितंबर तक रामलीला मैदान में आयोजित किया जा रहा है और इसमें शास्त्रीय नृत्य, संगीत, लोक कला तथा अन्य सांस्कृतिक विधाओं के कलाकार हिस्सा ले रहे हैं। इस मंच पर शिवरंजनी हरीश की प्रस्तुति ने भरतनाट्यम की परंपरा को दर्शकों के सामने रखने के साथ-साथ यह संदेश भी दिया कि शास्त्रीय कलाएं अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आज भी नए दर्शकों तक पहुंच सकती हैं। नृत्य के माध्यम से कृष्ण और राम जैसे व्यापक रूप से पहचाने जाने वाले सांस्कृतिक पात्रों की कथाओं को प्रस्तुत करना कला को लोगों की स्मृतियों और भावनाओं से जोड़ता है। इसी तरह शिव की आराधना प्रस्तुति को आध्यात्मिक आधार प्रदान करती है। जब इन सभी तत्वों को संगीत, ताल, लय, मुद्राओं और अभिनय के साथ जोड़ा जाता है तो मंच पर एक समग्र कलात्मक अनुभव निर्मित होता है। चक्रधर समारोह में ऐसी प्रस्तुतियां दर्शकों को भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों को देखने और समझने का अवसर प्रदान कर रही हैं।
इस पूरी प्रस्तुति में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भाव और भक्ति का संतुलन रहा। नृत्य में तकनीकी दक्षता आवश्यक है, लेकिन जब कथा धार्मिक और आध्यात्मिक संदर्भों से जुड़ी हो तो भाव-अभिनय उसकी आत्मा बन जाता है। शिवरंजनी हरीश की प्रस्तुति में पुष्पांजलि के साथ विनम्रता, शिव स्तुति में आराधना, कृष्ण जन्म में उल्लास, गीता के प्रसंग में गंभीरता और रामकथा के प्रसंगों में करुणा तथा भक्ति के भावों को स्थान मिला। अहिल्या की शाप-मुक्ति, सीता स्वयंवर और शबरी मोक्ष जैसे प्रसंगों ने प्रस्तुति को मानवीय संवेदनाओं से भी जोड़ा। इन कथाओं में केवल धार्मिक घटनाएं नहीं हैं, बल्कि प्रतीक्षा, विश्वास, सम्मान, मुक्ति, समर्पण और संबंधों जैसे अनेक मानवीय भाव भी जुड़े हुए हैं। शास्त्रीय नृत्य इन भावों को मंच पर दृश्य रूप देने का माध्यम बनता है। यही कारण है कि प्रस्तुति के दौरान दर्शक कथा के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ते दिखाई दिए। कार्यक्रम के समापन के बाद तालियों की प्रतिक्रिया ने भी कलाकार की प्रस्तुति के प्रति दर्शकों की सराहना को व्यक्त किया।
चक्रधर समारोह में प्रस्तुत शिवरंजनी हरीश का भरतनाट्यम कार्यक्रम इस मायने में भी उल्लेखनीय रहा कि इसमें भारतीय संस्कृति की कई प्रमुख कथात्मक धाराओं को एक साथ मंच मिला। भगवान शिव की आराधना, भगवान श्रीकृष्ण की लीला और श्रीमद्भगवद्गीता से जुड़े प्रसंग तथा भगवान श्रीराम की कथा—इन सभी को भरतनाट्यम की शास्त्रीय भाषा में प्रस्तुत किया गया। इससे मंच पर नृत्य और कथा के बीच एक ऐसा संबंध बना, जिसमें दर्शकों को भारतीय परंपरा के विभिन्न भावों को एक साथ अनुभव करने का अवसर मिला। रायगढ़ की सांस्कृतिक धरती पर आयोजित यह कार्यक्रम इस बात का उदाहरण बना कि कला जब अपनी परंपरा से जुड़कर प्रस्तुत होती है तो वह मनोरंजन से आगे बढ़कर सांस्कृतिक अनुभव में बदल जाती है। शिवरंजनी हरीश की प्रस्तुति ने भरतनाट्यम की लय, मुद्रा, अभिनय और कथा-अभिव्यक्ति के माध्यम से इसी अनुभव को साकार किया। चक्रधर समारोह के मंच पर उनकी प्रस्तुति के साथ कृष्ण की लीला, राम की कथा और शिव की आराधना केवल अलग-अलग प्रसंग नहीं रहे, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक यात्रा का हिस्सा बन गए जिसमें भक्ति, सौंदर्य, साहित्य और नृत्य एक साथ दिखाई दिए। इस कारण चौथे दिन की यह प्रस्तुति समारोह की उन प्रस्तुतियों में शामिल रही जिसने मंच को केवल प्रदर्शन का स्थान न बनाकर भावों और सांस्कृतिक स्मृतियों के संसार में बदल दिया।