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मणिपुर की डॉ. मंजू ईलांग्बाम ने चक्रधर समारोह में बिखेरी मणिपुरी नृत्य की मोहक छटा

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रायगढ़। 41वें चक्रधर समारोह की पांचवीं सांस्कृतिक संध्या में मणिपुर की प्रतिष्ठित नृत्यांगना डॉ. मंजू ईलांग्बाम ने अपनी भावपूर्ण मणिपुरी नृत्य प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। शास्त्रीय नृत्य की परंपरा, आध्यात्मिक भावभूमि और कलात्मक अभिव्यक्ति से सजी उनकी प्रस्तुति में मणिपुरी नृत्य की विशिष्ट कोमलता और गरिमा एक साथ दिखाई दी। मंच पर जैसे ही डॉ. मंजू ईलांग्बाम ने अपनी प्रस्तुति आरंभ की, वातावरण में मणिपुर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा की अनुभूति होने लगी। उनकी कोमल भाव-भंगिमाओं, सहज पदचाल, नियंत्रित देह-संचालन और लयकारी ने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। प्रस्तुति के दौरान नृत्य की प्रत्येक मुद्रा और भाव को जिस सहजता से उन्होंने मंच पर व्यक्त किया, उससे कथा और भाव दोनों दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचे। मणिपुरी नृत्य की अपनी विशिष्ट शैली होती है, जिसमें गति की कोमलता, अंगों का संतुलित संचालन और भावों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति प्रमुख होती है। डॉ. मंजू की प्रस्तुति में इन विशेषताओं का सुंदर समन्वय देखने को मिला। उनके नृत्य में जहां एक ओर शास्त्रीय अनुशासन स्पष्ट दिखाई दिया, वहीं दूसरी ओर भावाभिव्यक्ति में सहजता और आत्मीयता भी बनी रही। यही कारण रहा कि प्रस्तुति के दौरान दर्शक पूरे मनोयोग से मंच की ओर देखते रहे और कलाकार की प्रत्येक भाव-भंगिमा को सराहते रहे। चक्रधर समारोह जैसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंच पर देश के विभिन्न हिस्सों की शास्त्रीय कलाओं का एक साथ प्रस्तुत होना भारतीय सांस्कृतिक विविधता को सामने लाता है और पांचवीं सांस्कृतिक संध्या में मणिपुरी नृत्य की प्रस्तुति ने इसी विविधता को एक विशिष्ट रंग प्रदान किया।
डॉ. मंजू ईलांग्बाम की प्रस्तुति में मणिपुर की नृत्य परंपरा के उन पक्षों को विशेष रूप से महसूस किया गया, जिनमें भाव, भक्ति, संगीत और नृत्य एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। उनके नृत्य की गति में अनावश्यक तीव्रता के बजाय एक नियंत्रित प्रवाह था, जिसने प्रस्तुति को अपनी विशिष्ट पहचान दी। पदचाल और हाथों की मुद्राओं के बीच तालमेल, चेहरे के भावों में बदलाव तथा संगीत की लय के साथ शरीर की गतियों का सामंजस्य दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा। मणिपुरी नृत्य की सुंदरता उसकी सूक्ष्म अभिव्यक्ति में मानी जाती है और डॉ. मंजू ने इसी सूक्ष्मता को अपनी प्रस्तुति का आधार बनाया। उनके चेहरे पर बदलते भाव, आंखों की अभिव्यक्ति और हाथों की मुद्राओं के माध्यम से कथा के भावों को सामने लाने का प्रयास दिखाई दिया। मंच पर उनकी उपस्थिति में गरिमा और सहजता का संतुलन बना रहा। नृत्य के दौरान संगीत और ताल के साथ उनकी पदचाल ने प्रस्तुति में निरंतरता बनाए रखी। दर्शकों के लिए यह केवल एक नृत्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि मणिपुर की सांस्कृतिक परंपरा से परिचय कराने वाला कलात्मक अनुभव भी रहा। कार्यक्रम में मौजूद कला प्रेमियों ने प्रस्तुति के विभिन्न चरणों में कलाकार का उत्साहवर्धन किया। शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुतियों में कलाकार की तकनीकी दक्षता के साथ भावों की गहराई भी महत्वपूर्ण होती है और डॉ. मंजू की प्रस्तुति में दोनों पक्षों का संतुलन देखने को मिला। उनकी प्रस्तुति ने यह भी दिखाया कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपराएं अपने-अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को संजोते हुए किस प्रकार राष्ट्रीय मंच पर एक-दूसरे से जुड़ती हैं। चक्रधर समारोह में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले कलाकारों के माध्यम से दर्शकों को ऐसी ही विविध कलात्मक परंपराओं को करीब से देखने का अवसर मिलता है।
पांचवीं सांस्कृतिक संध्या का यह आयोजन कला और संस्कृति के विविध रूपों से सजा रहा, जिसमें डॉ. मंजू ईलांग्बाम की मणिपुरी नृत्य प्रस्तुति ने अपनी अलग छाप छोड़ी। मंच पर नृत्य की शुरुआत से लेकर प्रस्तुति के समापन तक उनकी देहभाषा और भावाभिव्यक्ति में निरंतरता दिखाई दी। मणिपुरी नृत्य की विशेषता उसके सौम्य और प्रवाहपूर्ण आंदोलनों में भी दिखाई देती है और डॉ. मंजू ने इसी शैली को आत्मसात करते हुए प्रस्तुति दी। उनके नृत्य में पदचाल और हाथों की मुद्राएं संगीत की लय के साथ आगे बढ़ती रहीं। कहीं भावों की कोमलता दिखाई दी तो कहीं लय के साथ गति में परिवर्तन ने प्रस्तुति को प्रभावी बनाया। दर्शकों ने शांत भाव से पूरी प्रस्तुति का आनंद लिया और समापन के बाद तालियों के माध्यम से कलाकार का उत्साहवर्धन किया। इस अवसर पर मणिपुरी नृत्य के माध्यम से उत्तर-पूर्व भारत की सांस्कृतिक विरासत को रायगढ़ के मंच पर देखने का अवसर मिला। देश की सांस्कृतिक परंपराओं में उत्तर-पूर्व का योगदान अत्यंत विशिष्ट है और मणिपुर की शास्त्रीय नृत्य शैली उसकी समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। डॉ. मंजू की प्रस्तुति के माध्यम से इस परंपरा की सुंदरता, अनुशासन और भावात्मक पक्ष दर्शकों के सामने आया। चक्रधर समारोह का मंच इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि यहां अलग-अलग शास्त्रीय नृत्य शैलियों के कलाकारों को अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। इससे दर्शकों को देश की विविध नृत्य परंपराओं को एक ही सांस्कृतिक आयोजन के माध्यम से समझने और अनुभव करने का अवसर प्राप्त होता है। पांचवीं सांस्कृतिक संध्या में मणिपुरी नृत्य की प्रस्तुति ने इसी सांस्कृतिक आदान-प्रदान को आगे बढ़ाया और कार्यक्रम की कलात्मक विविधता को और समृद्ध किया।
डॉ. मंजू ईलांग्बाम की प्रस्तुति में शास्त्रीय नृत्य की तकनीकी बारीकियों के साथ भावनात्मक अभिव्यक्ति का भी विशेष महत्व रहा। नृत्य के दौरान उनकी मुद्राएं केवल शारीरिक गतियों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि चेहरे के भावों और आंखों की अभिव्यक्ति के साथ मिलकर प्रस्तुति के भाव पक्ष को सामने लाती रहीं। उनकी पदचाल में संतुलन और लय का ध्यान रखा गया, वहीं हाथों की मुद्राओं ने नृत्य की कथा और भावों को विस्तार दिया। मणिपुरी शैली की कोमलता को बनाए रखते हुए उन्होंने मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। प्रस्तुति के दौरान संगीत के साथ उनका तालमेल दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण रहा। नृत्य में जब कलाकार संगीत, ताल और भाव को एक साथ साधता है, तब प्रस्तुति केवल प्रदर्शन नहीं रहती बल्कि दर्शक के लिए अनुभव का रूप ले लेती है। डॉ. मंजू की प्रस्तुति में भी यही भाव दिखाई दिया। दर्शकों ने उनकी प्रस्तुति को ध्यानपूर्वक देखा और प्रस्तुति के महत्वपूर्ण क्षणों पर तालियों के साथ प्रतिक्रिया दी। इस दौरान मंच और दर्शक दीर्घा के बीच कला के माध्यम से एक आत्मीय संवाद बनता हुआ दिखाई दिया। मणिपुरी नृत्य की गरिमा और डॉ. मंजू की अभिव्यक्ति ने समारोह की पांचवीं सांस्कृतिक संध्या को एक अलग कलात्मक रंग प्रदान किया। उनके नृत्य में परंपरा के प्रति सम्मान और मंचीय प्रस्तुति की सहजता का संयोजन देखने को मिला। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियां केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृतियों, परंपराओं और भावनाओं को आगे बढ़ाने का माध्यम भी हैं। रायगढ़ के दर्शकों को मणिपुर की इस नृत्य परंपरा का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ और समारोह के मंच पर उत्तर-पूर्व भारत की कला की यह प्रस्तुति सांस्कृतिक विविधता का प्रभावी उदाहरण बनी।
41वें चक्रधर समारोह की पांचवीं सांस्कृतिक संध्या में डॉ. मंजू ईलांग्बाम की प्रस्तुति ने कार्यक्रम की सांस्कृतिक व्यापकता को रेखांकित किया। रायगढ़ में आयोजित इस समारोह के माध्यम से देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले कलाकार अपनी-अपनी कला परंपराओं को दर्शकों तक पहुंचा रहे हैं। इसी क्रम में मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति ने दर्शकों को मणिपुर की सांस्कृतिक दुनिया से जोड़ने का अवसर दिया। डॉ. मंजू ने अपनी प्रस्तुति में कोमल भाव-भंगिमाओं, सहज पदचाल और लयकारी का ऐसा संयोजन प्रस्तुत किया, जिसमें मणिपुरी नृत्य की विशिष्ट पहचान स्पष्ट दिखाई दी। मंच पर उनके संतुलित संचालन और भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने दर्शकों को प्रस्तुति से जोड़े रखा। सांस्कृतिक समारोहों की सार्थकता इसी में है कि वे विभिन्न क्षेत्रों की कलाओं को एक साझा मंच उपलब्ध कराते हैं और दर्शकों को देश की विविध परंपराओं को समझने का अवसर देते हैं। चक्रधर समारोह में भी शास्त्रीय संगीत और नृत्य की विभिन्न विधाओं के कलाकारों की सहभागिता से ऐसा ही सांस्कृतिक वातावरण तैयार होता है। डॉ. मंजू ईलांग्बाम की प्रस्तुति ने इस वातावरण में मणिपुर की कला परंपरा का रंग जोड़ा। उनके नृत्य में दिखाई दी भावपूर्णता, लय का अनुशासन और गति की सहजता दर्शकों के बीच लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रही। प्रस्तुति के समापन पर दर्शकों की तालियों ने कलाकार के प्रति सम्मान और सराहना को व्यक्त किया। इस प्रकार पांचवीं सांस्कृतिक संध्या में मणिपुरी नृत्य की यह प्रस्तुति चक्रधर समारोह के विविधतापूर्ण सांस्कृतिक स्वरूप का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी और रायगढ़ के कला प्रेमियों को देश की एक विशिष्ट शास्त्रीय नृत्य परंपरा से रूबरू कराने में सफल रही।
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