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जब घुंघरुओं में गूंजी रायगढ़ घराने की पहचान, गुरु सोमा दास के कलाकारों ने बांधा समां

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रायगढ़। 41वें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चक्रधर समारोह-2026 की सातवीं सांस्कृतिक संध्या में रायगढ़ घराने की कथक परंपरा की सजीव झलक देखने को मिली। गुरु सोमा दास के मार्गदर्शन में श्री नटराज नृत्य कला केंद्र के कलाकारों ने कथक की भाव, लय और ताल से सजी प्रस्तुति देकर समारोह के मंच को शास्त्रीय नृत्य की गरिमा से भर दिया। घुंघरुओं की झंकार, सधी हुई पदचाप, लयबद्ध नृत्य-संचालन और भावपूर्ण मुद्राओं के माध्यम से कलाकारों ने कथक की विविध रंगत को मंच पर प्रस्तुत किया। प्रस्तुति के दौरान कलाकारों के कदमों की लय और संगीत के साथ उनका सामंजस्य दर्शकों का ध्यान लगातार अपनी ओर खींचता रहा। नृत्य की प्रत्येक गत और भावाभिव्यक्ति में प्रशिक्षण की झलक दिखाई दी, वहीं प्रस्तुति के दौरान दर्शकों की तालियां कलाकारों का उत्साह बढ़ाती रहीं। समारोह की यह प्रस्तुति इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि रायगढ़ की अपनी विशिष्ट कथक परंपरा को स्थानीय कलाकारों ने उसी सांस्कृतिक मंच पर प्रस्तुत किया, जो महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना और संगीत-नृत्य की समृद्ध विरासत से जुड़ा हुआ है।
कथक की प्रस्तुति में भाव, लय और ताल का संतुलन शास्त्रीय नृत्य की मूल विशेषताओं में शामिल है और गुरु सोमा दास के मार्गदर्शन में कलाकारों की प्रस्तुति में इन तीनों पक्षों का समन्वय दिखाई दिया। घुंघरुओं की स्पष्ट झंकार के साथ पदचाप की सटीकता ने प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाया, जबकि भावपूर्ण मुद्राओं ने नृत्य को केवल तकनीकी प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहने दिया। मंच पर कलाकारों की सामूहिक प्रस्तुति के दौरान एकरूपता और तालमेल दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा। जैसे-जैसे प्रस्तुति आगे बढ़ी, कलाकारों की लयकारी और नृत्य-संचालन ने वातावरण में शास्त्रीय कला का रंग और गहरा किया। दर्शकों ने तालियों के माध्यम से कलाकारों की प्रस्तुति का उत्साह बढ़ाया। चक्रधर समारोह की सांस्कृतिक संध्याएं स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न कला विधाओं को मंच प्रदान करती रही हैं और इस क्रम में रायगढ़ घराने के कलाकारों की प्रस्तुति ने स्थानीय सांस्कृतिक परंपरा को केंद्र में रखा। समारोह में कथक, शास्त्रीय नृत्य और अन्य कला विधाओं के साथ स्थानीय प्रतिभाओं की प्रस्तुतियां भी कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
गुरु सोमा दास स्वयं पिछले करीब 15 वर्षों से कथक के प्रशिक्षण और उसके प्रचार-प्रसार से जुड़ी हुई हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने भातखंडे संगीत महाविद्यालय, बिलासपुर से कथक में विशारद तथा कमला देवी संगीत महाविद्यालय से एमए कथक की शिक्षा प्राप्त की है। उन्होंने डॉ. विजया सिंह के मार्गदर्शन में गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत कथक की साधना की। उनकी कला यात्रा में प्रशिक्षण के साथ मंचीय प्रस्तुतियों और विभिन्न स्तरों पर मिले सम्मान भी जुड़े रहे हैं। वर्ष 2019 में पुणे, नेपाल और मलेशिया में आयोजित विभिन्न नृत्य प्रतियोगिताओं में उन्हें पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त होने की जानकारी सामने आई है। कथक के प्रशिक्षण और प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय रहते हुए उन्होंने नई पीढ़ी के कलाकारों को इस शास्त्रीय नृत्य विधा से जोड़ने का कार्य किया है। वर्तमान में वे श्री नटराज नृत्य कला केंद्र की संचालिका होने के साथ ओपी जिंदल स्कूल, तमनार में नृत्य शिक्षिका के रूप में भी कार्यरत हैं।
गुरु सोमा दास के कला-प्रशिक्षण कार्य का एक महत्वपूर्ण पक्ष बच्चों और युवा कलाकारों को कथक से जोड़ना भी रहा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार उन्होंने श्री चक्रधर बालिका सदन की बालिकाओं को करीब पांच वर्षों तक कथक का प्रशिक्षण दिया और वर्ष 2023 में इन्हीं बालिकाओं के साथ चक्रधर समारोह में प्रस्तुति भी दी थी। इस तरह उनका जुड़ाव केवल मंचीय प्रस्तुति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशिक्षण और अगली पीढ़ी तक कला परंपरा को पहुंचाने के स्तर पर भी दिखाई देता है। किसी भी शास्त्रीय कला की निरंतरता उसके मंचीय प्रदर्शन के साथ-साथ नियमित अभ्यास, गुरु-शिष्य परंपरा और नए कलाकारों को प्रशिक्षण देने से बनी रहती है। रायगढ़ जैसे सांस्कृतिक शहर में स्थानीय कलाकारों को बड़े समारोह के मंच पर अवसर मिलना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। चक्रधर समारोह के मंच पर स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियां रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े कलाकारों और संस्थाओं को दर्शकों के सामने अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर देती हैं। सातवीं सांस्कृतिक संध्या में श्री नटराज नृत्य कला केंद्र के कलाकारों की प्रस्तुति ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए रायगढ़ घराने के कथक की रंगत को मंच पर सामने रखा।
41वां चक्रधर समारोह-2026 रायगढ़ में 14 से 23 सितंबर तक आयोजित किया जा रहा है और इसमें शास्त्रीय नृत्य, लोककला, संगीत तथा विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारतीय कला परंपराओं के अनेक रंग मंच पर दिखाई दे रहे हैं। 20 सितंबर की सांस्कृतिक संध्या के कार्यक्रम क्रम में भी स्थानीय कथक प्रस्तुतियों के साथ अन्य शास्त्रीय और पारंपरिक नृत्य विधाओं को स्थान दिया गया था। उपलब्ध कार्यक्रम विवरण के अनुसार शाम की शुरुआत स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियों से हुई, जिसमें सोमा दास की कथक प्रस्तुति भी निर्धारित कार्यक्रम का हिस्सा रही। इसके बाद खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय के कलाकारों तथा गोटीपुआ जैसी पारंपरिक नृत्य शैली की प्रस्तुतियों सहित विभिन्न कार्यक्रम हुए। इस विस्तृत सांस्कृतिक क्रम में स्थानीय कथक कलाकारों की उपस्थिति रायगढ़ की अपनी कला पहचान को सामने लाने का माध्यम बनी।
चक्रधर समारोह का महत्व केवल एक सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रायगढ़ की उस कला परंपरा को मंच देता है जिसकी पहचान देश के शास्त्रीय नृत्य जगत में अलग स्थान रखती है। सातवीं सांस्कृतिक संध्या में गुरु सोमा दास के मार्गदर्शन में श्री नटराज नृत्य कला केंद्र के कलाकारों की प्रस्तुति इसी सांस्कृतिक निरंतरता की एक कड़ी रही। घुंघरुओं की झंकार से लेकर सधी हुई पदचाप और भावपूर्ण मुद्राओं तक प्रस्तुति के विभिन्न पक्षों ने दर्शकों को कथक की लयात्मकता और अभिव्यक्ति से जोड़े रखा। कलाकारों के प्रदर्शन के दौरान मिली तालियां इस बात का हिस्सा रहीं कि मंच पर प्रस्तुत कला और दर्शकों के बीच सीधा संवाद बना रहा। गुरु और शिष्यों की यह प्रस्तुति रायगढ़ घराने की परंपरा, प्रशिक्षण और नई पीढ़ी तक कला को पहुंचाने के प्रयासों को एक साथ सामने लाती है। चक्रधर समारोह जैसे मंच पर ऐसी प्रस्तुतियां स्थानीय कलाकारों को अपनी साधना प्रदर्शित करने के साथ-साथ रायगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने का अवसर भी देती हैं।
रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में कथक की यह परंपरा लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना से जुड़ी विरासत ने रायगढ़ को शास्त्रीय संगीत और नृत्य के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान दिलाई और चक्रधर समारोह उसी विरासत को सार्वजनिक मंच पर निरंतर सामने लाने वाला प्रमुख आयोजन है। वर्तमान समारोह में स्थानीय कलाकारों के साथ देश के विभिन्न हिस्सों से आए कलाकारों की प्रस्तुतियां भी हो रही हैं। ऐसे वातावरण में गुरु सोमा दास के मार्गदर्शन में स्थानीय कलाकारों की कथक प्रस्तुति ने रायगढ़ घराने की अपनी शैली और प्रशिक्षण परंपरा को दर्शकों के सामने रखा। सातवीं सांस्कृतिक संध्या की यह प्रस्तुति घुंघरुओं की लय, ताल की सटीकता, भावों की अभिव्यक्ति और सामूहिक नृत्य-सामंजस्य के कारण दर्शकों के बीच आकर्षण का केंद्र बनी। मंच से उठती घुंघरुओं की आवाज और कलाकारों की सधी हुई पदचाप ने समारोह के सांस्कृतिक वातावरण में कथक की विशिष्ट छाप छोड़ी और रायगढ़ की कला परंपरा को एक बार फिर मंच के केंद्र में ला दिया।
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