
रायगढ़। 41वें चक्रधर समारोह की आठवीं सांस्कृतिक संध्या में बनारस घराने के प्रख्यात कथक कलाकार रुद्रशंकर मिश्रा ने अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति से दर्शकों को कथक की समृद्ध परंपरा से परिचित कराया। उनके कथक में बनारस घराने की विशिष्ट लयकारी, पदसंचालन, भावाभिव्यक्ति और घुंघरुओं की सधी हुई थाप का सुंदर समन्वय देखने को मिला। उन्होंने तीन ताल, इंद्रजाल, झूला, शिव का झूला और ‘काशी के बसइया’ जैसी प्रस्तुतियों के माध्यम से मंच पर कथक के विविध रंगों को साकार किया। प्रस्तुति के दौरान दर्शक शास्त्रीय नृत्य की बारीकियों से जुड़े रहे और कई अवसरों पर तालियों की गूंज से कलाकार का उत्साह बढ़ाया।
रुद्रशंकर मिश्रा की प्रस्तुति की शुरुआत से ही बनारस घराने की विशिष्ट शैली का प्रभाव दिखाई दिया। तीन ताल की प्रस्तुति में लय और ताल के साथ पदसंचालन की सटीकता सामने आई, वहीं इंद्रजाल में कथक की तकनीकी संरचना और नृत्य की गति का प्रभाव देखने को मिला। घुंघरुओं की थाप के साथ उनके कदम तालबद्ध ढंग से आगे बढ़ते रहे। नृत्य के दौरान शरीर की गतियों, पैरों की थिरकन और भावपूर्ण मुद्राओं ने प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाया। बनारस घराने की कथक परंपरा में नृत्य के तकनीकी पक्ष के साथ प्रस्तुति की ऊर्जा और लयकारी का विशेष महत्व है और रुद्रशंकर मिश्रा ने इसी पक्ष को अपने प्रदर्शन के माध्यम से सामने रखा।
झूला और शिव का झूला उनकी प्रस्तुति के ऐसे हिस्से रहे, जिनमें कथक के साथ भाव और विषयगत अभिव्यक्ति का सुंदर मेल देखने को मिला। इन प्रस्तुतियों में केवल लयबद्ध पदसंचालन ही नहीं, बल्कि भावों को नृत्य के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास भी दिखाई दिया। शिव से जुड़े भावों और कथक की नृत्यभाषा के संयोजन ने मंच पर अलग वातावरण बनाया। कलाकार की मुद्राओं और चेहरे के भावों के माध्यम से प्रस्तुति के विषय को दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। मंच पर नृत्य और संगीत के बीच तालमेल बना रहा, जिससे प्रस्तुति क्रमबद्ध और प्रभावशाली दिखाई दी।
कार्यक्रम में प्रस्तुत ‘काशी के बसइया’ ने बनारस की सांस्कृतिक पहचान को मंच से जोड़ने का काम किया। काशी की लोक और आध्यात्मिक सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़े इस अंश ने प्रस्तुति को एक अलग भावभूमि प्रदान की। रुद्रशंकर मिश्रा ने कथक की शास्त्रीय शैली में इसे प्रस्तुत करते हुए बनारस की सांस्कृतिक संवेदना को रायगढ़ के मंच तक पहुंचाया। इस प्रस्तुति के दौरान भी लय, भाव और पदसंचालन का संयोजन दिखाई दिया। दर्शकों ने प्रस्तुति को ध्यानपूर्वक देखा और कलाकार के प्रदर्शन के दौरान तालियों से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
रुद्रशंकर मिश्रा की प्रस्तुति का एक महत्वपूर्ण पक्ष बनारस और रायगढ़ घराने की सांस्कृतिक परंपराओं का मंचीय जुड़ाव रहा। चक्रधर समारोह स्वयं महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना और सांस्कृतिक विरासत को समर्पित आयोजन है। समारोह में कथक की विभिन्न परंपराओं और शैलियों को स्थान मिलता रहा है। ऐसे मंच पर बनारस घराने के कलाकार द्वारा कथक प्रस्तुत करना रायगढ़ की कथक परंपरा के साथ एक सांस्कृतिक संवाद का अवसर बना। रुद्रशंकर मिश्रा ने अपनी प्रस्तुति को महाराजा चक्रधर सिंह के प्रति कला नमन के रूप में समर्पित किया।
चक्रधर समारोह का आयोजन 14 से 23 सितंबर 2026 तक रायगढ़ के रामलीला मैदान में किया जा रहा है। दस दिवसीय समारोह में शास्त्रीय नृत्य, लोककला, पंडवानी, लोकसंगीत, गायन, वादन और साहित्य सहित विभिन्न विधाओं के कलाकार प्रस्तुति दे रहे हैं। समारोह का उद्देश्य महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को मंच के माध्यम से आगे बढ़ाना है। आठवीं सांस्कृतिक संध्या में रुद्रशंकर मिश्रा की कथक प्रस्तुति इसी व्यापक सांस्कृतिक क्रम का हिस्सा रही।
बनारस घराने के कथक की विशेषताओं को समझने के लिए रुद्रशंकर मिश्रा की प्रस्तुति में दिखाई दिए अलग-अलग नृत्य पक्ष महत्वपूर्ण रहे। तीन ताल के माध्यम से तालबद्ध संरचना, इंद्रजाल में नृत्य की तकनीकी क्षमता और झूला तथा शिव का झूला में भावात्मक अभिव्यक्ति को सामने लाया गया। घुंघरुओं की थाप के साथ कदमों की गति और संगीत की लय के बीच सामंजस्य बना रहा। कथक की प्रस्तुति में कलाकार के पैरों की गति, चक्कर, मुद्राएं, भाव और ताल की समझ एक साथ सामने आती है। इस प्रस्तुति में भी इन पक्षों का संयोजन दर्शकों को देखने को मिला।
रुद्रशंकर मिश्रा की प्रस्तुति को लेकर समारोह स्थल पर मौजूद दर्शकों में भी उत्सुकता दिखाई दी। शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति के दौरान दर्शकों का ध्यान मंच पर केंद्रित रहा। अलग-अलग रचनाओं के पूरा होने के बाद तालियों के माध्यम से कलाकार का स्वागत किया गया। घुंघरुओं की लयात्मक आवाज और तबले सहित संगीत की संगत के बीच कथक की प्रस्तुति आगे बढ़ती रही। नृत्य की गति और भावों में बदलाव के साथ प्रस्तुति का स्वरूप भी बदलता रहा, जिससे दर्शकों को कथक के अलग-अलग रंग देखने का अवसर मिला।
महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना को समर्पित समारोह में कथक की विभिन्न परंपराओं का प्रस्तुतीकरण इसकी सांस्कृतिक विविधता को सामने लाता है। रायगढ़ घराने की अपनी विशिष्ट पहचान है और देश के अन्य कथक घरानों की शैलियां भी अपनी अलग विशेषताओं के लिए जानी जाती हैं। बनारस घराने से आए रुद्रशंकर मिश्रा ने अपने प्रदर्शन के माध्यम से इसी विविधता को मंच पर प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति में बनारस की नृत्य परंपरा का स्वरूप दिखाई दिया, वहीं मंच रायगढ़ की उस सांस्कृतिक भूमि का था, जहां कथक की अपनी समृद्ध परंपरा विकसित हुई है। इस दृष्टि से यह प्रस्तुति दोनों सांस्कृतिक परंपराओं के बीच संवाद का अवसर बनी।
आठवीं सांस्कृतिक संध्या के कार्यक्रम क्रम में कथक के साथ अन्य लोक और शास्त्रीय प्रस्तुतियां भी शामिल रहीं। उपलब्ध कार्यक्रम विवरण के अनुसार 21 सितंबर की शाम बनारस घराने के कथक के अलावा लोकगीत, कथक, संतूर-पखावज-तबला वादन और नृत्य नाटिका जैसी प्रस्तुतियां भी निर्धारित थीं। इससे समारोह की एक ही शाम में अलग-अलग कला विधाओं का संयोजन देखने को मिला। रुद्रशंकर मिश्रा की प्रस्तुति इस सांस्कृतिक विविधता में शास्त्रीय कथक की मजबूत उपस्थिति के रूप में सामने आई।
रुद्रशंकर मिश्रा के कथक में लय, ताल और भाव का संतुलन प्रस्तुति का प्रमुख पक्ष रहा। कथक में पैरों की गति के साथ ताल की स्पष्टता और शरीर की मुद्राओं के माध्यम से भावों को व्यक्त करने की क्षमता कलाकार की प्रस्तुति को प्रभावी बनाती है। तीन ताल और इंद्रजाल जैसे अंशों में तकनीकी पक्ष उभरकर सामने आया, जबकि झूला, शिव का झूला और ‘काशी के बसइया’ में भावात्मक तथा सांस्कृतिक पक्ष प्रमुख रहा। इस तरह पूरी प्रस्तुति में कथक के तकनीकी और भावात्मक दोनों रूप दर्शकों के सामने आए।
इस प्रस्तुति को महाराजा चक्रधर सिंह को कला नमन के रूप में प्रस्तुत किया जाना भी समारोह के मूल भाव से जुड़ा रहा। महाराजा चक्रधर सिंह का नाम रायगढ़ की कला और संगीत परंपरा के विकास से जुड़ा है और चक्रधर समारोह उनकी स्मृति में आयोजित किया जाता है। दस दिवसीय समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले कलाकार अपनी-अपनी कला विधाओं के माध्यम से इस विरासत को मंच पर प्रस्तुत करते हैं। रुद्रशंकर मिश्रा ने बनारस घराने के कथक के माध्यम से इसी सांस्कृतिक परंपरा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की।
समारोह में प्रस्तुत ‘काशी के बसइया’ ने प्रस्तुति को काशी की सांस्कृतिक भूमि से जोड़ा। काशी और रायगढ़ दोनों ही भारतीय संगीत एवं नृत्य परंपराओं के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्रों के रूप में अपनी-अपनी पहचान रखते हैं। रुद्रशंकर मिश्रा के प्रदर्शन में काशी की नृत्य-संवेदना और रायगढ़ के चक्रधर समारोह का मंच एक साथ दिखाई दिया। यह संगम दर्शकों के लिए कथक की विविध परंपराओं को एक ही प्रस्तुति के माध्यम से देखने का अवसर बना।
रुद्रशंकर मिश्रा की प्रस्तुति ने यह भी सामने रखा कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य की परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित होने के बावजूद एक-दूसरे से संवाद करती रही हैं। कथक की अलग-अलग शैलियों में तकनीकी और प्रस्तुति संबंधी विशेषताएं भिन्न हो सकती हैं, लेकिन लय, ताल, भाव और संगीत इनके साझा आधार हैं। चक्रधर समारोह जैसे मंच पर विभिन्न परंपराओं के कलाकारों की मौजूदगी इन विविधताओं को दर्शकों तक पहुंचाने का अवसर देती है। बनारस घराने के कथक की प्रस्तुति इसी सांस्कृतिक विविधता का हिस्सा रही।
रायगढ़ में आयोजित आठवीं सांस्कृतिक संध्या का यह कार्यक्रम कथक प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण लेकर आया। घुंघरुओं की थाप, तालबद्ध पदसंचालन, भावपूर्ण मुद्राएं और संगीत के साथ नृत्य का सामंजस्य पूरे प्रदर्शन में बना रहा। रुद्रशंकर मिश्रा ने तीन ताल से लेकर इंद्रजाल, झूला, शिव का झूला और ‘काशी के बसइया’ तक कथक के अलग-अलग रंग प्रस्तुत किए। दर्शकों ने प्रस्तुति के विभिन्न चरणों में तालियों से कलाकार का उत्साह बढ़ाया।
41वें चक्रधर समारोह की आठवीं सांस्कृतिक संध्या में रुद्रशंकर मिश्रा की बनारस घराने की कथक प्रस्तुति ने रायगढ़ के मंच पर काशी की कला परंपरा का रंग बिखेरा। तीन ताल, इंद्रजाल, झूला, शिव का झूला और ‘काशी के बसइया’ के माध्यम से उन्होंने लय, ताल, पदसंचालन और भावों का सुंदर संयोजन प्रस्तुत किया। घुंघरुओं की थाप और कथक की बारीकियों ने दर्शकों का ध्यान बनाए रखा। उनकी प्रस्तुति में बनारस घराने की शैली के साथ रायगढ़ की कला विरासत के प्रति सम्मान भी दिखाई दिया और उन्होंने अपने कथक के माध्यम से महाराजा चक्रधर सिंह को कला नमन किया। इस तरह आठवीं संध्या में बनारस और रायगढ़ की कथक परंपराओं का सांस्कृतिक जुड़ाव मंच पर साकार हुआ और दर्शकों को शास्त्रीय नृत्य की विविधता का अनुभव मिला।