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Glimpse of 41st Chakradhar Samaroh 2026 @Raigarh : सुर, ताल, नृत्य और लोककला से सजी रायगढ़ की दस दिवसीय सांस्कृतिक यात्रा

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रायगढ़। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक नगरी रायगढ़ में आयोजित 41वें अंतरराष्ट्रीय चक्रधर समारोह 2026 ने सुर, ताल, लय, घुंघरुओं की झंकार, लोकसंगीत, शास्त्रीय नृत्य, वादन, कविता और नृत्य नाटिका के विविध रंगों से शहर को सांस्कृतिक उत्सव में बदल दिया। 14 सितंबर से शुरू हुआ यह दस दिवसीय समारोह 23 सितंबर तक रामलीला मैदान में आयोजित किया जा रहा है। महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना और रायगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को समर्पित इस आयोजन में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए स्थापित कलाकारों के साथ स्थानीय और युवा प्रतिभाओं को भी मंच मिला। समारोह के आधिकारिक कार्यक्रम में कथक, ओडिसी, कुचिपुड़ी, भरतनाट्यम, मणिपुरी, गोटीपुआ, कथकली, पंडवानी, लोकसंगीत, भजन, वादन और गायन की प्रस्तुतियां शामिल की गईं। इस विविधता ने चक्रधर समारोह को केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय प्रदर्शनकारी कलाओं के व्यापक उत्सव के रूप में प्रस्तुत किया।
41वें चक्रधर समारोह की शुरुआत 14 सितंबर की शाम हुई। उद्घाटन अवसर पर गणेश वंदना की प्रस्तुति स्वर्गीय कला गुरु वेदमणि सिंह ठाकुर के शिष्यों ने की। इसके बाद पद्मश्री डॉ. उषा बारले ने पंडवानी की प्रस्तुति दी और पद्मश्री अनुज शर्मा ने लोक कला एवं संगीत के माध्यम से दर्शकों से संवाद स्थापित किया। समारोह की शुरुआत में ही शास्त्रीय और लोक परंपराओं का ऐसा संयोजन दिखाई दिया, जिसने आगे होने वाली प्रस्तुतियों के लिए सांस्कृतिक वातावरण तैयार किया। गणेश वंदना में सुर, ताल, छंद और घुंघरुओं की परंपरा दिखाई दी, जबकि पंडवानी और लोकसंगीत ने छत्तीसगढ़ की अपनी सांस्कृतिक पहचान को मंच पर सामने रखा। इस तरह पहले ही दिन समारोह ने यह संकेत दे दिया कि आने वाले दस दिनों में दर्शकों को भारतीय कला की अलग-अलग परंपराओं का विस्तृत संसार देखने को मिलेगा।
समारोह के उद्घाटन से जुड़ी जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया। उद्घाटन अवसर पर कलाकारों का सम्मान भी किया गया। समारोह को महाराजा चक्रधर सिंह की कला विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने वाले मंच के रूप में रेखांकित किया गया। महाराजा चक्रधर सिंह संगीत, नृत्य और साहित्य के संरक्षण तथा रायगढ़ में कला की परंपरा को विकसित करने के लिए जाने जाते हैं। चक्रधर समारोह उसी सांस्कृतिक विरासत को वर्तमान समय में मंच प्रदान करता है। समारोह में स्थानीय प्रतिभाओं के साथ देश के विभिन्न क्षेत्रों से कलाकारों की भागीदारी होने से रायगढ़ में कला की अनेक परंपराओं का मिलन दिखाई देता है।
समारोह का दूसरा दिन 15 सितंबर को आयोजित हुआ, जिसमें कथक, राजस्थानी लोककला, कुचिपुड़ी, तबला वादन, पंडवानी और भजन गायन की प्रस्तुतियां हुईं। रायपुर की अनुष्का सुल्तानिया ने कथक प्रस्तुत किया, जबकि राजस्थान के बाड़मेर से स्टॉर्क सोसायटी ने लोक प्रस्तुति दी। दिल्ली के टी. लक्ष्मी रेड्डी की कुचिपुड़ी प्रस्तुति और दिल्ली के निशित गंगानी के तबला वादन ने शास्त्रीय संगीत और नृत्य के अलग-अलग पक्ष सामने रखे। रायपुर की तरुणा साहू एवं समूह ने पंडवानी प्रस्तुत की तथा वृंदावन के माधवदास बैंड ने भजन गायन किया। कार्यक्रमों का यह क्रम दर्शाता है कि समारोह में किसी एक कला शैली को केंद्र में रखने के बजाय अलग-अलग परंपराओं को समान मंच देने का प्रयास किया गया।
तीसरे दिन 16 सितंबर को छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य के साथ कथक, लोककला और भरतनाट्यम की प्रस्तुतियां हुईं। गरियाबंद के भूपेंद्र साहू ने छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य प्रस्तुत किया। दिल्ली की मौमाला नायक और डॉ. यास्मिन सिंह एवं समूह ने कथक की प्रस्तुतियां दीं। दुर्ग की पायल साहू एवं समूह ने लोककला की प्रस्तुति दी, जबकि रायगढ़ की डॉ. दीपिका सरकार ने भरतनाट्यम प्रस्तुत किया। एक ही शाम में छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा और भारतीय शास्त्रीय नृत्य की अलग-अलग विधाओं का यह संयोजन समारोह की व्यापक सांस्कृतिक संरचना को सामने लाता रहा।
17 सितंबर की चौथी सांस्कृतिक संध्या में भी विविधता का क्रम जारी रहा। बिलासपुर के शिवशक्ति कला संस्थान ने कथक, भुवनेश्वर की जाह्नवी बेहरा ने ओडिसी, बेंगलुरु की शिवरंजनी हरीश ने भरतनाट्यम और कोलकाता की मधुमिता रॉय मिश्रा ने कथक प्रस्तुत किया। चेन्नई की श्रीविद्या शैलेश ने भरतनाट्यम की प्रस्तुति दी। इसके साथ बस्तर के बादल-बस्तर अकादमी ऑफ डांस, आर्ट्स एंड लिटरेचर ने गीत एवं नृत्य प्रस्तुति दी। इस दिन मंच पर उत्तर, दक्षिण, पूर्व और मध्य भारत की विभिन्न नृत्य परंपराओं की उपस्थिति ने समारोह के राष्ट्रीय स्वरूप को स्पष्ट किया।
18 सितंबर की पांचवीं संध्या में बिलासपुर की श्वेता नायक एवं समूह की कुचिपुड़ी, मणिपुर की डॉ. मंजू एलांगबम की मणिपुरी प्रस्तुति, रायपुर के पद्मश्री भारती बंधु का कबीर भजन और रायपुर के अनुराग शर्मा का लोकसंगीत प्रस्तुत किया गया। मणिपुरी नृत्य और कुचिपुड़ी जैसे शास्त्रीय नृत्य रूपों के साथ कबीर भजन और लोकसंगीत को एक ही मंच पर स्थान देना समारोह के बहुआयामी स्वरूप को दर्शाता है। इस तरह चक्रधर समारोह में कला की परंपरा केवल नृत्य तक सीमित नहीं रही, बल्कि गायन और लोक अभिव्यक्ति को भी समान महत्व दिया गया।
19 सितंबर की छठवीं संध्या ओडिसी और कविता के नाम रही। नई दिल्ली की रीला होता तथा ओडिशा के गौरीशंकर दाश ने ओडिसी प्रस्तुत किया। इसी शाम पद्मश्री सम्मानित कवि सुरेंद्र शर्मा एवं अन्य कवियों के साथ काव्य संध्या आयोजित हुई। नृत्य और कविता के इस संयोजन ने कार्यक्रम को अलग स्वरूप दिया। जहां ओडिसी में शरीर की गति, मुद्राओं और संगीत के माध्यम से भाव व्यक्त हुए, वहीं काव्य संध्या ने शब्द और साहित्य को मंच के केंद्र में रखा। इस तरह समारोह में साहित्य को भी प्रदर्शनकारी कला के साथ जोड़ा गया।
20 सितंबर की सातवीं संध्या विशेष रूप से संगीत और नृत्य की विविध प्रस्तुतियों के कारण चर्चा में रही। भुवनेश्वर के बी. साहू की गोटीपुआ प्रस्तुति, खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का नृत्य, पद्मश्री रामलाल बरेठ के निर्देशन में भूपेंद्र बरेठ एवं समूह की कथक प्रस्तुति और इंडियन आइडल फेम अमित साना का गायन कार्यक्रम का हिस्सा रहा। गोटीपुआ की प्रस्तुति ने ओडिशा की नृत्य परंपरा को सामने रखा, जबकि खैरागढ़ के विद्यार्थियों ने युवा कलाकारों की प्रतिभा प्रस्तुत की। रामलाल बरेठ के निर्देशन में कथक ने रायगढ़ घराने की परंपरा को मंच से जोड़ा और अमित साना के लोकप्रिय गीतों ने शाम को सुगम संगीत का रंग दिया।
अमित साना की प्रस्तुति सातवीं संध्या के लोकप्रिय आकर्षणों में रही। इंडियन आइडल से पहचान बनाने वाले गायक ने लोकप्रिय गीतों के माध्यम से दर्शकों से संवाद किया। उनके गायन के दौरान युवाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला और लोकप्रिय गीतों पर समारोह स्थल तालियों से गूंजता रहा। इस प्रस्तुति ने यह भी दिखाया कि चक्रधर समारोह में शास्त्रीय और लोककलाओं के साथ लोकप्रिय संगीत को भी स्थान दिया जाता है। इससे समारोह का दर्शक वर्ग अलग-अलग संगीत रुचियों के बावजूद एक ही मंच से जुड़ता दिखाई दिया।
21 सितंबर की आठवीं संध्या में समारोह ने एक बार फिर कला की विविधता का व्यापक रूप प्रस्तुत किया। आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार इस दिन संस्कार कला संघ, जबलपुर की नृत्य नाटिका, रायगढ़ के नृत्यांजलि समूह का बनारस घराने का कथक, सोनू गुप्ता एवं लोक कला मंच का लोकसंगीत, वासंती वैष्णव एवं समूह का कथक, बनारस के रुद्रशंकर मिश्रा का कथक और त्रिवेणी संगम की संतूर-पखावज-तबला प्रस्तुति शामिल रही। एक ही शाम में नृत्य नाटिका से लेकर शास्त्रीय नृत्य और वादन तक की विविध विधाओं ने दर्शकों को अलग-अलग सांस्कृतिक अनुभव दिए।
आठवीं संध्या में जबलपुर के संस्कार कला संघ की ‘वंदे मातरम’ आधारित नृत्य नाटिका विशेष आकर्षण बनी। 18 कलाकारों ने नृत्य, अभिनय, संगीत और संवाद के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम, क्रांतिकारियों के संघर्ष और बलिदान की गाथा को मंच पर प्रस्तुत किया। निर्देशक कमलेश यादव के निर्देशन में तैयार प्रस्तुति ने ‘वंदे मातरम’ के ऐतिहासिक महत्व और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े उसके संदर्भ को नाट्य रूप में सामने रखा। इस प्रस्तुति के कारण चक्रधर समारोह की आठवीं शाम में कला के साथ इतिहास और राष्ट्रीय स्मृति का पक्ष भी जुड़ गया।
इसी शाम बनारस घराने के कथक की भी प्रभावशाली उपस्थिति रही। रुद्रशंकर मिश्रा ने तीन ताल, इंद्रजाल, झूला, शिव का झूला और ‘काशी के बसइया’ जैसी प्रस्तुतियों के माध्यम से कथक की विभिन्न भावभूमियों को मंच पर रखा। घुंघरुओं की थाप, लय और भावों के संयोजन में बनारस घराने की शैली दिखाई दी। उनकी प्रस्तुति को महाराजा चक्रधर सिंह के प्रति कला नमन के रूप में भी देखा गया। बनारस की कथक परंपरा और रायगढ़ की कथक विरासत के बीच यह सांस्कृतिक संवाद चक्रधर समारोह के मूल स्वरूप के अनुरूप रहा।
आठवीं संध्या की एक विशेषता यह भी रही कि मंच पर अनुभवी कलाकारों के साथ युवा और बाल कलाकारों को भी स्थान मिला। महज छह वर्ष की निमृत पात्रा ने कथक प्रस्तुति दी और अपनी भाव-भंगिमाओं, फुटवर्क तथा मंचीय आत्मविश्वास से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। जया मानिकपुरी के मार्गदर्शन में कथक सीख रही निमृत की प्रस्तुति ने यह दिखाया कि भारतीय शास्त्रीय कलाओं की परंपरा नई पीढ़ी तक भी पहुंच रही है। इतने बड़े सांस्कृतिक मंच पर बाल कलाकार की प्रस्तुति समारोह की पीढ़ीगत निरंतरता का भी उदाहरण बनी।
समारोह में स्थानीय प्रतिभाओं की भागीदारी लगातार दिखाई देती रही। रायगढ़ की युवा कलाकारों से लेकर खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों तक अनेक कलाकारों को मंच मिला। यह पहल केवल स्थानीय प्रतिभा प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि कलाकारों को राष्ट्रीय स्तर के अनुभवी कलाकारों के साथ एक ही आयोजन का हिस्सा बनने का अवसर भी देती है। इससे युवा कलाकारों को मंचीय अनुभव प्राप्त होता है और दर्शकों को अपने क्षेत्र में विकसित हो रही नई प्रतिभाओं को देखने का अवसर मिलता है।
41वें चक्रधर समारोह की एक बड़ी विशेषता विभिन्न कथक घरानों की उपस्थिति रही। रायगढ़ घराने की प्रस्तुतियों के साथ बनारस घराने और अन्य परंपराओं के कलाकारों ने भी मंच साझा किया। कथक की अलग-अलग शैलियों को एक ही समारोह में देखने से दर्शकों को इस नृत्य विधा की विविधता समझने का अवसर मिलता है। रायगढ़ घराना स्वयं महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना से जुड़ी परंपरा है, जबकि बनारस, लखनऊ और अन्य घरानों की अपनी विशिष्ट प्रस्तुति परंपराएं हैं। चक्रधर समारोह इन परंपराओं को संवाद के लिए एक मंच प्रदान करता है।
समारोह में केवल कथक ही नहीं, बल्कि ओडिसी की भी लगातार उपस्थिति रही। नई दिल्ली की रीला होता, ओडिशा के गौरीशंकर दाश, भुवनेश्वर की जाह्नवी बेहरा और अन्य कलाकारों ने ओडिसी प्रस्तुत की। ओडिसी की मुद्राएं, शरीर की त्रिभंगी शैली और भावात्मक प्रस्तुति ने कार्यक्रम को अलग रंग दिया। बाद के दिनों में सारंगढ़ की दीक्षा रथ की ओडिसी प्रस्तुति भी निर्धारित कार्यक्रम का हिस्सा रही। इस तरह ओडिसी की अलग-अलग प्रस्तुतियों के माध्यम से पूर्वी भारत की शास्त्रीय नृत्य परंपरा रायगढ़ के मंच पर दिखाई देती रही।
कुचिपुड़ी और भरतनाट्यम ने भी समारोह में दक्षिण भारतीय शास्त्रीय परंपराओं को स्थान दिया। दिल्ली के टी. लक्ष्मी रेड्डी, बिलासपुर की श्वेता नायक एवं समूह और अन्य कलाकारों ने कुचिपुड़ी प्रस्तुत की। बेंगलुरु की शिवरंजनी हरीश, चेन्नई की श्रीविद्या शैलेश और रायगढ़ की डॉ. दीपिका सरकार की प्रस्तुतियों से भरतनाट्यम की विविध शैली सामने आई। इन प्रस्तुतियों ने चक्रधर समारोह को उत्तर और मध्य भारत तक सीमित न रखकर भारतीय शास्त्रीय नृत्य की व्यापक राष्ट्रीय परंपरा से जोड़ा।
मणिपुरी नृत्य के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत की कला परंपरा भी समारोह तक पहुंची। मणिपुर की डॉ. मंजू एलांगबम की प्रस्तुति ने इस सांस्कृतिक विविधता को और व्यापक बनाया। इसी तरह भुवनेश्वर की गोटीपुआ प्रस्तुति ने ओडिशा की पारंपरिक नृत्य शैली को मंच पर प्रस्तुत किया। केरल की कथकली प्रस्तुति भी नौवें दिन के कार्यक्रम में निर्धारित रही। इस प्रकार दस दिवसीय आयोजन में देश के अलग-अलग क्षेत्रों की कला परंपराओं का एक साथ उपस्थित होना समारोह के राष्ट्रीय स्वरूप को रेखांकित करता है।
22 सितंबर की नौवीं संध्या में भी कार्यक्रम की विविधता बनी रही। आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार सारंगढ़ की दीक्षा रथ की ओडिसी, केरल के गुरु कोट्टक्कल नंदकुमारन नायर की कथकली, खैरागढ़ की प्रो. डॉ. लवनी शर्मा का सितार वादन, बालोद के लहरगंगा पुनरिक साहू का लोकसंगीत और रायगढ़ के राकेश शर्मा का सूफी गायन कार्यक्रम का हिस्सा रहा। इस दिन शास्त्रीय नृत्य, वादन, लोकसंगीत और सूफी गायन एक ही मंच पर आए। इससे समारोह की अंतिम चरण की सांस्कृतिक विविधता भी कायम रही।
23 सितंबर की दसवीं और समापन संध्या के लिए पद्मश्री सम्मानित गायिका श्रीमती कविता कृष्णमूर्ति का गायन निर्धारित है। आधिकारिक कार्यक्रम में समापन समारोह के साथ उनके संगीत कार्यक्रम का उल्लेख किया गया है। इस तरह दस दिनों तक चले कला उत्सव का समापन भारतीय फिल्म और शास्त्रीय-सुगम संगीत की चर्चित गायकी के साथ होना तय है। समापन संध्या समारोह की पूरी सांस्कृतिक यात्रा को एक अंतिम संगीतात्मक पड़ाव देगी।
चक्रधर समारोह की पूरी यात्रा में लोककला की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य, पंडवानी, लोकसंगीत, राजस्थानी लोककला, बस्तर की प्रस्तुति और अन्य क्षेत्रीय कलाओं को मंच दिया गया। लोककला किसी क्षेत्र की सामाजिक स्मृति, जीवनशैली, विश्वास, भाषा और सामुदायिक अनुभवों को अभिव्यक्त करती है। इसलिए जब चक्रधर समारोह में अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों के लोक कलाकार मंच पर आते हैं, तो दर्शकों को भारत की क्षेत्रीय विविधता को एक ही आयोजन में देखने का अवसर मिलता है।
पंडवानी की प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ की विशिष्ट पहचान को समारोह के पहले दिन से ही सामने रखा। पद्मश्री डॉ. उषा बारले की प्रस्तुति के साथ पंडवानी की परंपरा मंच पर आई। बाद में तरुणा साहू एवं समूह ने भी पंडवानी प्रस्तुत की। लोककथा, गायन, अभिनय और वादन के मेल से तैयार पंडवानी प्रस्तुति छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। समारोह में इसे स्थान देकर स्थानीय सांस्कृतिक परंपरा को राष्ट्रीय मंच से जोड़ा गया।
समारोह में कबीर भजन की प्रस्तुति भी हुई। पद्मश्री भारती बंधु ने कबीर भजन प्रस्तुत किए। कबीर की वाणी भारतीय संत परंपरा, सामाजिक प्रश्नों और आध्यात्मिक चिंतन से जुड़ी रही है। संगीत के माध्यम से कबीर की रचनाओं को मंच पर प्रस्तुत करना साहित्य और संगीत का संगम प्रस्तुत करता है। चक्रधर समारोह में भजन गायन को स्थान देकर आयोजन ने शास्त्रीय नृत्य और वादन के साथ संत साहित्य की परंपरा को भी शामिल किया।
काव्य संध्या समारोह के छठवें दिन की विशेष प्रस्तुति रही। पद्मश्री सुरेंद्र शर्मा और अन्य कवियों ने कविता के माध्यम से दर्शकों से संवाद किया। इससे समारोह का दायरा नृत्य और संगीत से आगे बढ़कर साहित्य तक पहुंचा। महाराजा चक्रधर सिंह स्वयं संगीत और साहित्य से जुड़े रहे थे, इसलिए समारोह में साहित्यिक अभिव्यक्ति का शामिल होना आयोजन की व्यापक सांस्कृतिक संरचना से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
वाद्य संगीत भी समारोह की महत्वपूर्ण धुरी रहा। तबला वादन से लेकर संतूर, पखावज और तबले के संयुक्त कार्यक्रम तथा सितार वादन तक विभिन्न प्रस्तुतियां हुईं। 21 सितंबर को बनारस के त्रिवेणी संगम ने संतूर-पखावज-तबला वादन प्रस्तुत किया, जबकि 22 सितंबर को खैरागढ़ की प्रो. डॉ. लवनी शर्मा का सितार वादन निर्धारित था। ऐसे कार्यक्रम शास्त्रीय संगीत के वाद्य पक्ष को सामने लाते हैं और दर्शकों को नृत्य एवं गायन से अलग एक विशुद्ध वादन अनुभव प्रदान करते हैं।
चक्रधर समारोह की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रायगढ़ घराना है। महाराजा चक्रधर सिंह की कला साधना से जुड़ी यह परंपरा कथक के इतिहास में विशेष स्थान रखती है। समारोह में रामलाल बरेठ के निर्देशन में कथक, वासंती वैष्णव एवं समूह की प्रस्तुति और अन्य स्थानीय कलाकारों के कार्यक्रमों ने इस विरासत को मंच पर बनाए रखा। साथ ही देश के दूसरे घरानों के कलाकारों की उपस्थिति ने रायगढ़ घराने को व्यापक भारतीय कथक परंपरा के साथ संवाद का अवसर दिया।
समारोह की तस्वीरों और वीडियो में बार-बार दिखाई देने वाला दृश्य घुंघरुओं, तबले और मंच की रोशनी का रहा। कथक की प्रस्तुति में पैरों की थाप और घुंघरुओं की ध्वनि मंच को विशिष्ट ऊर्जा देती है। जब इसके साथ तबले की संगत और गायन जुड़ता है तो नृत्य एक पूर्ण संगीतात्मक प्रस्तुति का रूप लेता है। रायगढ़ में आयोजित इस समारोह में अलग-अलग कलाकारों ने अपनी-अपनी शैली के अनुसार इस परंपरा को प्रस्तुत किया। यही कारण है कि ‘Glimpse of 41st Chakradhar Samaroh 2026’ केवल मंच पर कलाकारों की तस्वीरों का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय कला की विविध ध्वनियों और गतियों की स्मृति भी बनता है।
समारोह में युवा प्रतिभाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की प्रस्तुति, रायगढ़ के युवा कथक कलाकार, छह वर्षीय निमृत पात्रा जैसी बाल कलाकार और अन्य युवा प्रतिभाएं कार्यक्रम का हिस्सा बनीं। बड़े कलाकारों के साथ नई पीढ़ी को मंच देना सांस्कृतिक परंपराओं के भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण पक्ष है। जब युवा कलाकार बड़े मंच पर प्रदर्शन करते हैं तो उन्हें कला के वरिष्ठ कलाकारों से सीखने और दर्शकों के सामने अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है।
नन्हीं निमृत पात्रा की प्रस्तुति ने इस पक्ष को खास तौर पर सामने रखा। छह वर्ष की उम्र में कथक प्रस्तुत करने वाली निमृत ने दर्शकों से तालियां हासिल कीं। उनकी प्रस्तुति में भाव, फुटवर्क और आत्मविश्वास दिखाई दिया। जया मानिकपुरी के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण ले रही इस बाल कलाकार की मौजूदगी ने आठवीं संध्या में नई पीढ़ी की कला साधना को मंच पर स्थान दिया। यह दृश्य समारोह के उन क्षणों में शामिल रहा जिसमें अनुभवी कलाकारों के साथ बच्चों की कला यात्रा भी दिखाई दी।
इसी तरह रायगढ़ की युवा कथक नृत्यांगना आद्या अग्रवाल ने भी छठवीं संध्या में प्रस्तुति दी। भाव, लय और ताल के सुंदर संयोजन के साथ उनकी प्रस्तुति को दर्शकों ने सराहा। गुरु शरद वैष्णव के मार्गदर्शन में कथक सीख रही आद्या की प्रस्तुति स्थानीय युवा प्रतिभाओं के लिए चक्रधर समारोह के मंच की उपयोगिता को दर्शाती है। ऐसे मंचों पर प्रस्तुति से कलाकारों को अपनी साधना को बड़े दर्शक वर्ग के सामने रखने का अवसर मिलता है।
चक्रधर समारोह में संगीत और नृत्य का संवाद लगातार दिखाई दिया। कथक कलाकारों के साथ गायन, तबला और पढ़ंत की संगत रही। ओडिसी और भरतनाट्यम में भी संगीत की भूमिका महत्वपूर्ण रही। वादन की स्वतंत्र प्रस्तुतियों ने संगीत के शुद्ध स्वरूप को सामने रखा। लोकसंगीत ने क्षेत्रीय धुनों को मंच दिया। इस प्रकार दस दिवसीय समारोह में संगीत की अनेक धाराएं एक साथ प्रवाहित होती रहीं।
रायगढ़ में आयोजित इस महोत्सव का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि दर्शकों को एक ही मंच पर भारत की अनेक सांस्कृतिक परंपराओं को देखने का अवसर मिला। एक शाम बनारस घराने का कथक, दूसरी शाम ओडिसी, किसी दिन कुचिपुड़ी और भरतनाट्यम, किसी दिन पंडवानी और लोकसंगीत, तो किसी दिन कवि सम्मेलन या सूफी गायन—कार्यक्रम का स्वरूप लगातार बदलता रहा। इस विविधता ने दर्शकों को अलग-अलग कला रूपों से परिचित कराया।
समारोह का आयोजन रामलीला मैदान में किया गया। दस दिनों तक शाम के समय सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का क्रम चलता रहा। आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार 14 से 23 सितंबर तक कार्यक्रम निर्धारित किए गए थे। आयोजन स्थल पर कलाकारों, दर्शकों, आयोजकों और कला प्रेमियों की मौजूदगी ने रायगढ़ को इन दिनों सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बनाए रखा।
चक्रधर समारोह केवल मंच पर होने वाली प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं है। यह रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुका है। समारोह के दौरान शहर में देश के विभिन्न हिस्सों से कलाकार और कला प्रेमी पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों को विभिन्न कला विधाओं को प्रत्यक्ष देखने का अवसर मिलता है। कलाकारों के लिए रायगढ़ की कला भूमि पर प्रस्तुति देना उनके मंचीय सफर का महत्वपूर्ण अनुभव हो सकता है। इस तरह समारोह कला और समाज के बीच संवाद का अवसर भी तैयार करता है।
महाराजा चक्रधर सिंह की विरासत इस आयोजन की केंद्रीय धुरी है। उनके नाम से आयोजित समारोह में कथक की रायगढ़ परंपरा को विशेष स्थान मिलना स्वाभाविक है, लेकिन आयोजन की व्यापक संरचना में उनकी कला दृष्टि से जुड़े संगीत, नृत्य, साहित्य और लोक परंपराओं के विभिन्न पक्ष भी दिखाई देते हैं। समारोह के उद्घाटन अवसर पर राज्यपाल रमेन डेका ने भी इसे महाराजा चक्रधर सिंह की कला विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने वाला माध्यम बताया।
महाराजा चक्रधर सिंह से जुड़ी विरासत में कथक के साथ साहित्य और संगीत भी शामिल हैं। उद्घाटन से संबंधित रिपोर्टों में उनकी रचनाओं और ग्रंथों के संरक्षण तथा प्रकाशन की आवश्यकता का उल्लेख भी सामने आया। इससे यह संकेत मिलता है कि चक्रधर समारोह का सांस्कृतिक संदर्भ केवल मंचीय नृत्य तक सीमित नहीं, बल्कि उस व्यापक कला संसार से जुड़ा है जिसमें संगीत, साहित्य और नृत्य एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं।
समारोह के दौरान स्थानीय और राष्ट्रीय कला परंपराओं का मिलन सबसे प्रमुख दृश्यों में से एक रहा। रायगढ़ के कलाकारों के साथ दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, भुवनेश्वर, मणिपुर, केरल, राजस्थान और अन्य क्षेत्रों से कलाकार आए। यह भौगोलिक विविधता समारोह को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करती है। अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों के कलाकार एक ही मंच पर अपनी कला प्रस्तुत करते हैं और दर्शक उन्हें एक साथ देखते हैं।
41वें चक्रधर समारोह की झलकियों में यदि कोई एक दृश्य लगातार उभरता है, तो वह है घुंघरुओं की आवाज और तालियों की गूंज। कथक कलाकार मंच पर आते हैं, तबले की थाप शुरू होती है और घुंघरुओं के साथ ताल का क्रम आगे बढ़ता है। प्रस्तुति के बाद दर्शकों की तालियां कलाकार और दर्शक के बीच संवाद का रूप लेती हैं। यही जीवंत संवाद किसी भी सांस्कृतिक समारोह की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक होता है।
इसके साथ ही लोकसंगीत की प्रस्तुतियों में क्षेत्रीय वाद्यों और स्थानीय धुनों का रंग दिखाई दिया। छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत, राजस्थान की लोक परंपरा, बस्तर की प्रस्तुति और पंडवानी ने कार्यक्रम में लोकजीवन का पक्ष जोड़ा। शास्त्रीय नृत्य की तकनीकी संरचना और लोककला की सहज अभिव्यक्ति एक ही समारोह में दिखाई देना भारतीय संस्कृति की विविधता का प्रत्यक्ष अनुभव रहा।
‘वंदे मातरम’ की नृत्य नाटिका ने समारोह में इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति को जोड़ा। जबलपुर के 18 कलाकारों ने स्वतंत्रता आंदोलन के प्रसंगों को नृत्य, अभिनय, संगीत और संवाद के माध्यम से प्रस्तुत किया। यह प्रस्तुति समारोह के अन्य शास्त्रीय कार्यक्रमों से अलग विषय लेकर आई, लेकिन कला के माध्यम से कहानी कहने की परंपरा से जुड़ी रही। ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष के राष्ट्रीय स्मरणोत्सव के संदर्भ में इसका मंचन समकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रमों के व्यापक परिप्रेक्ष्य से भी जुड़ता है।
2025-26 में ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने का राष्ट्रीय स्मरणोत्सव चल रहा है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अनुसार यह स्मरणोत्सव 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से इस ऐतिहासिक अवसर को याद किया जा रहा है। रायगढ़ के चक्रधर समारोह में नृत्य नाटिका के रूप में इसकी प्रस्तुति इसी व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ का हिस्सा रही।
चक्रधर समारोह के मंच पर महिला कलाकारों की भागीदारी भी व्यापक रही। कथक, ओडिसी, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और अन्य विधाओं में महिला कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं। युवा कलाकारों से लेकर अनुभवी कलाकारों तक की भागीदारी ने कार्यक्रम की विविधता को बढ़ाया। कला के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी आज भारतीय सांस्कृतिक मंचों की एक प्रमुख विशेषता है और चक्रधर समारोह में भी यह स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
समारोह में गुरु-शिष्य परंपरा का पक्ष भी बार-बार सामने आया। कई प्रस्तुतियां किसी गुरु के निर्देशन में तैयार समूहों द्वारा दी गईं। रामलाल बरेठ के निर्देशन में कथक, वासंती वैष्णव एवं समूह की प्रस्तुति और अन्य गुरु-शिष्य आधारित कार्यक्रमों ने भारतीय शास्त्रीय कलाओं में प्रशिक्षण की पारंपरिक पद्धति को मंच पर दिखाया। गुरु से सीखकर शिष्य का मंच पर प्रस्तुति देना भारतीय कला परंपरा की निरंतरता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
रायगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में ऐसे समारोहों की भूमिका को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। मंच पर कलाकार आते हैं, प्रस्तुति देते हैं और दर्शकों तक कला पहुंचती है। युवा कलाकार वरिष्ठ कलाकारों को देखते हैं और अपने प्रशिक्षण को आगे बढ़ाते हैं। दर्शक विभिन्न विधाओं से परिचित होते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में कला केवल प्रदर्शन नहीं रहती, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभव बन जाती है।
समारोह की झलकियों में कविता, संगीत, नृत्य और रंगमंच एक साथ दिखाई दिए। एक ओर सुरेंद्र शर्मा की काव्य संध्या, दूसरी ओर अमित साना का लोकप्रिय गायन, कहीं रुद्रशंकर मिश्रा का बनारस घराने का कथक और कहीं संस्कार कला संघ की नृत्य नाटिका। यह विविधता बताती है कि चक्रधर समारोह की संरचना किसी एक कला विधा पर निर्भर नहीं है। यह भारतीय सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के अनेक रूपों को एक साथ मंच देने वाला आयोजन है।
समारोह के अंतिम दिनों में भी कार्यक्रमों की विविधता बनी रही। 22 सितंबर की शाम ओडिसी, कथकली, सितार, लोकसंगीत और सूफी गायन को स्थान दिया गया। कथकली के माध्यम से केरल की रंग-नृत्य परंपरा, सितार से शास्त्रीय वादन, लोकसंगीत से छत्तीसगढ़ी क्षेत्रीय अभिव्यक्ति और सूफी गायन से आध्यात्मिक संगीत की परंपरा मंच पर आई।
23 सितंबर को होने वाली समापन संध्या में पद्मश्री कविता कृष्णमूर्ति का गायन समारोह की दस दिवसीय यात्रा को अंतिम संगीतात्मक पड़ाव देगा। समापन कार्यक्रम के साथ 41वें संस्करण की मंचीय प्रस्तुतियों का क्रम पूरा होगा। इसके बाद भी इस समारोह से जुड़ी स्मृतियां कलाकारों, दर्शकों और रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनी रहेंगी।
‘Glimpse of 41st Chakradhar Samaroh 2026 @Raigarh’ की तस्वीर में इसलिए केवल कलाकारों के मंचीय प्रदर्शन नहीं दिखाई देते, बल्कि एक पूरा सांस्कृतिक संसार दिखाई देता है। कहीं घुंघरुओं की झंकार है, कहीं तबले की थाप, कहीं सितार के तार, कहीं पखावज की गंभीर ध्वनि, कहीं लोकवाद्य और लोकगीतों की सहज लय, कहीं कविता के शब्द और कहीं नृत्य नाटिका के माध्यम से इतिहास की कथा। इन सभी ध्वनियों और अभिव्यक्तियों ने मिलकर रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को दस दिनों तक जीवंत बनाए रखा।
चक्रधर समारोह की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक इसकी पीढ़ियों को जोड़ने की क्षमता है। एक ओर वरिष्ठ और पद्मश्री सम्मानित कलाकार मंच पर आते हैं, दूसरी ओर छह वर्ष की निमृत पात्रा जैसी बाल प्रतिभा भी उसी मंच पर कथक प्रस्तुत करती है। एक ओर देश के प्रतिष्ठित कलाकार हैं, दूसरी ओर खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय के विद्यार्थी और स्थानीय कलाकार हैं। यह पीढ़ियों का संवाद कला परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है।
स्थानीय कलाकारों की भागीदारी ने समारोह को रायगढ़ से जोड़े रखा। यदि किसी सांस्कृतिक आयोजन में केवल बाहर से आए कलाकार हों तो वह मंचीय उत्सव तो बन सकता है, लेकिन स्थानीय सांस्कृतिक पहचान का प्रत्यक्ष पक्ष कम दिखाई दे सकता है। चक्रधर समारोह में रायगढ़ के कलाकारों और समूहों को भी लगातार मंच मिला। इस कारण समारोह स्थानीय समाज और राष्ट्रीय सांस्कृतिक जगत के बीच एक सेतु की तरह दिखाई दिया।
रायगढ़ के लिए यह समारोह केवल दस दिनों का कार्यक्रम नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान का वार्षिक अवसर है। समारोह के दौरान शहर में कला की चर्चा बढ़ती है, स्थानीय दर्शक प्रस्तुतियों से जुड़ते हैं और बाहर से आए कलाकार रायगढ़ की कला भूमि से परिचित होते हैं। कला प्रेमियों के लिए यह आयोजन अलग-अलग विधाओं को एक ही मंच पर देखने का अवसर बनता है। इसी वजह से चक्रधर समारोह की लोकप्रियता रायगढ़ से आगे व्यापक सांस्कृतिक क्षेत्र में दिखाई देती है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य की परंपरा में अभ्यास, अनुशासन और गुरु का महत्व बहुत अधिक है। चक्रधर समारोह के मंच पर प्रस्तुतियां देने वाले कलाकार अपने-अपने वर्षों के अभ्यास और साधना को लेकर आते हैं। दर्शकों को मंच पर दिखाई देने वाली कुछ मिनट या एक घंटे की प्रस्तुति के पीछे कलाकार की लंबी तैयारी होती है। कथक के घुंघरू हों या सितार के तार, तबले की थाप हो या गायन की तान—हर प्रस्तुति के पीछे निरंतर अभ्यास का योगदान होता है।
इसीलिए चक्रधर समारोह की झलकियों में मंच के साथ-साथ कलाकारों की तैयारी और अनुशासन को भी समझना जरूरी है। किसी समूह नृत्य में एक साथ कई कलाकारों का तालमेल, नृत्य नाटिका में संवाद और गति का समन्वय, वादन में कलाकारों की आपसी संगति और कथक में तबले तथा घुंघरुओं का मेल—ये सभी मंचीय प्रस्तुति को आकार देते हैं। दर्शकों को जो दृश्य सहज दिखाई देता है, उसके पीछे लंबे समय की साधना रहती है।
रायगढ़ की सांस्कृतिक भूमि पर बनारस और रायगढ़ घरानों का संवाद भी इस समारोह की खास झलकियों में रहा। रुद्रशंकर मिश्रा और नृत्यांजलि समूह की बनारस घराने की प्रस्तुतियों के साथ रायगढ़ घराने के कलाकारों ने भी अपनी कला प्रस्तुत की। अलग-अलग घरानों की प्रस्तुतियां एक ही समारोह में आने से दर्शकों को कथक की विविध शैलियों का अनुभव मिला। यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान कथक की व्यापक परंपरा को समझने का अवसर देता है।
समारोह में गोटीपुआ जैसी परंपरागत शैली की उपस्थिति भी महत्वपूर्ण रही। भुवनेश्वर के कलाकारों ने इस शैली को मंच पर प्रस्तुत किया। इसके साथ ओडिसी, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, मणिपुरी और कथकली की प्रस्तुतियां हुईं। एक ही आयोजन में इतनी विविध शास्त्रीय नृत्य शैलियों का आना भारतीय नृत्य परंपराओं की व्यापकता का प्रत्यक्ष उदाहरण रहा।
लोक और शास्त्रीय कला के इस संगम में छत्तीसगढ़ की स्थानीय पहचान लगातार बनी रही। छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य, पंडवानी, लोकसंगीत, बस्तर की कला और रायगढ़ के कलाकारों की प्रस्तुतियों ने स्थानीय संस्कृति को केंद्र में रखा। बाहर से आए कलाकारों की राष्ट्रीय उपस्थिति के बीच स्थानीय कला का यह पक्ष समारोह को अपनी विशिष्ट पहचान देता रहा।
चक्रधर समारोह में संगीत और साहित्य का संबंध भी दिखाई दिया। काव्य संध्या के साथ गायन और वादन कार्यक्रमों ने शब्द और सुर के बीच संवाद बनाया। महाराजा चक्रधर सिंह की बहुआयामी कला रुचि को देखते हुए यह व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि समारोह के स्वरूप में भी दिखाई देती है। संगीत, नृत्य और साहित्य अलग-अलग विधाएं होते हुए भी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं।
समारोह में देशभक्ति से जुड़े विषयों को भी मंच मिला। ‘वंदे मातरम’ की नृत्य नाटिका ने स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति को कला के माध्यम से प्रस्तुत किया। यह कार्यक्रम इस बात का उदाहरण रहा कि सांस्कृतिक समारोह केवल मनोरंजन का मंच नहीं होते, बल्कि इतिहास और सामाजिक स्मृति को भी अभिव्यक्त करने का माध्यम बन सकते हैं।
रायगढ़ के दर्शकों के लिए दस दिनों में प्रस्तुत हुई विविध कला विधाओं ने एक व्यापक सांस्कृतिक अनुभव तैयार किया। किसी दर्शक को कथक पसंद हो सकता है, किसी को लोकसंगीत, किसी को ओडिसी या भरतनाट्यम, किसी को कविता और किसी को लोकप्रिय गायन। चक्रधर समारोह की संरचना ऐसी रही कि अलग-अलग रुचियों वाले दर्शकों को कार्यक्रम में अपने लिए कुछ देखने-सुनने को मिला।
समारोह की एक और झलक तालियों से भरे सभागार और मैदान की रही। कलाकारों की प्रस्तुति के बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया उन्हें ऊर्जा देती है। युवा कलाकारों के लिए यह अनुभव विशेष महत्व रखता है। वरिष्ठ कलाकारों के लिए भी दर्शकों की सक्रिय भागीदारी प्रस्तुति को जीवंत बनाती है। चक्रधर समारोह में कई प्रस्तुतियों के बाद दर्शकों ने तालियों के माध्यम से कलाकारों का उत्साह बढ़ाया।
यह समारोह कला और दर्शक के बीच सीधा संबंध स्थापित करता है। डिजिटल माध्यमों के दौर में कला को ऑनलाइन देखा जा सकता है, लेकिन लाइव मंच की ऊर्जा अलग होती है। कलाकार और दर्शक एक ही स्थान पर मौजूद होते हैं। घुंघरुओं की आवाज, तबले की थाप, गायन की तान और दर्शकों की तालियां एक ही वातावरण में सुनाई देती हैं। यही लाइव सांस्कृतिक अनुभव किसी समारोह को स्मरणीय बनाता है।
41वें चक्रधर समारोह का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल सकती हैं। पारंपरिक कथक, ओडिसी और भरतनाट्यम के साथ लोकप्रिय गायन और आधुनिक मंचीय प्रस्तुति भी कार्यक्रम में शामिल हुई। बाल कलाकारों को मंच मिला और वरिष्ठ कलाकारों ने अपनी कला प्रस्तुत की। इतिहास आधारित नृत्य नाटिका और समकालीन प्रस्तुति एक ही आयोजन में दिखाई दी। यह मिश्रण वर्तमान सांस्कृतिक जीवन की विविधता को दर्शाता है।
रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में चक्रधर समारोह की भूमिका इसी व्यापक संदर्भ में देखी जा सकती है। यह आयोजन महाराजा चक्रधर सिंह की विरासत को स्मरण करता है, लेकिन साथ ही नई पीढ़ी के कलाकारों को वर्तमान समय में अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर देता है। पुराने घरानों और नई प्रतिभाओं के बीच मंच साझा होता है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों की कला परंपराएं रायगढ़ में एक साथ आती हैं।
आधिकारिक कार्यक्रम में दर्ज कलाकारों की सूची इस विविधता को स्पष्ट रूप से सामने रखती है। पहले दिन से अंतिम दिन तक पंडवानी, लोककला, कथक, कुचिपुड़ी, तबला, भजन, छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य, भरतनाट्यम, ओडिसी, मणिपुरी, कबीर भजन, गोटीपुआ, कविता, बनारस घराना, संतूर, पखावज, सितार, कथकली और सूफी गायन जैसे अनेक रूप शामिल रहे। इस व्यापक कार्यक्रम ने चक्रधर समारोह को भारतीय कला की विविध परंपराओं के साझा मंच में बदल दिया।
समारोह की झलकियों में कलाकारों के साथ रायगढ़ की जनता की भागीदारी भी महत्वपूर्ण रही। सांस्कृतिक कार्यक्रम तभी जीवंत होते हैं जब दर्शक उन्हें देखने और समझने के लिए उपस्थित हों। स्थानीय दर्शकों ने शास्त्रीय नृत्य से लेकर लोकसंगीत और लोकप्रिय गायन तक अलग-अलग कार्यक्रमों में रुचि दिखाई। बच्चों और युवाओं की मौजूदगी ने समारोह को नई पीढ़ी से जोड़ा।
चक्रधर समारोह में नई पीढ़ी की भागीदारी का महत्व इसलिए भी है क्योंकि किसी भी सांस्कृतिक परंपरा का भविष्य उसके युवा दर्शकों और कलाकारों पर निर्भर करता है। यदि बच्चे और युवा कथक, ओडिसी, लोककला, संगीत और साहित्य को मंच पर देखते हैं, तो उनके भीतर इन विधाओं के प्रति जिज्ञासा विकसित हो सकती है। छह वर्ष की निमृत पात्रा जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियां इस जुड़ाव को और प्रत्यक्ष बनाती हैं।
41वें संस्करण की एक और महत्वपूर्ण झलक अंतरराज्यीय सांस्कृतिक संवाद रही। जबलपुर, भुवनेश्वर, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, मणिपुर, केरल, राजस्थान और अन्य स्थानों से कलाकार रायगढ़ पहुंचे। अलग-अलग राज्यों की कला परंपराओं के कलाकारों का एक मंच पर आना भारत की सांस्कृतिक विविधता का प्रत्यक्ष अनुभव है। यह संवाद कलाकारों के बीच भी होता है और दर्शकों के बीच भी।
इस सांस्कृतिक यात्रा में रायगढ़ की स्थानीय पहचान लगातार केंद्र में रही। शहर की कथक परंपरा, स्थानीय कलाकार, लोकसंगीत और महाराजा चक्रधर सिंह की स्मृति आयोजन की आधारभूमि रहे। बाहर से आए कलाकारों की प्रस्तुतियों ने इस स्थानीय आधार को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़ा।
‘Glimpse’ के रूप में यदि पूरे समारोह को देखा जाए तो यह दस दिनों की ऐसी तस्वीर बनती है जिसमें हर दिन का अपना रंग है। पहले दिन गणेश वंदना और पंडवानी, दूसरे दिन कथक और राजस्थानी लोक, तीसरे दिन छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य और भरतनाट्यम, चौथे दिन ओडिसी और कथक, पांचवें दिन कुचिपुड़ी और मणिपुरी, छठवें दिन ओडिसी और कविता, सातवें दिन गोटीपुआ और अमित साना, आठवें दिन नृत्य नाटिका और बनारस घराना, नौवें दिन कथकली और सितार तथा दसवें दिन कविता कृष्णमूर्ति का गायन—यह क्रम समारोह की व्यापक सांस्कृतिक तस्वीर प्रस्तुत करता है।
महाराजा चक्रधर सिंह की स्मृति में आयोजित यह समारोह कला के माध्यम से अतीत और वर्तमान को जोड़ता है। एक ओर पुरानी कला परंपराएं हैं, दूसरी ओर नई पीढ़ी के कलाकार हैं। एक ओर गुरु-शिष्य परंपरा है, दूसरी ओर आधुनिक मंच और दर्शक। एक ओर लोककला है, दूसरी ओर शास्त्रीय नृत्य और लोकप्रिय संगीत। इन सभी का संगम चक्रधर समारोह की विशिष्ट पहचान बनाता है।
41वें संस्करण की झलकियों में पद्मश्री सम्मानित कलाकारों की उपस्थिति भी रही। डॉ. उषा बारले, अनुज शर्मा, भारती बंधु, सुरेंद्र शर्मा और अन्य सम्मानित कलाकारों ने विभिन्न दिनों में अपनी प्रस्तुतियां दीं। साथ ही ऐसे कलाकार भी मंच पर आए जो अपने-अपने क्षेत्र में सक्रिय नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार समारोह ने अनुभव और युवा ऊर्जा के बीच संतुलन बनाया।
समारोह में कला के कई रूपों का सम्मान दिखाई दिया। कोई कला छोटी या बड़ी नहीं, बल्कि प्रत्येक की अपनी सांस्कृतिक भूमिका है। कथक की तकनीकी जटिलता, पंडवानी की कथात्मक शक्ति, लोकसंगीत की सहजता, कविता की भाषा, वादन की सूक्ष्मता और नृत्य नाटिका की दृश्यात्मकता—सभी ने मिलकर आयोजन की सांस्कृतिक तस्वीर तैयार की।
रायगढ़ में दस दिनों तक चली इस सांस्कृतिक गतिविधि ने शहर के वातावरण को भी प्रभावित किया। कला प्रेमियों के लिए यह समय अलग-अलग कार्यक्रम देखने का अवसर रहा। कलाकारों के लिए रायगढ़ की कला भूमि पर प्रस्तुति का अनुभव रहा। स्थानीय प्रतिभाओं के लिए बड़े मंच पर आने का अवसर रहा। और नई पीढ़ी के लिए भारतीय कला की विविध परंपराओं को करीब से देखने का अवसर रहा।
चक्रधर समारोह की मूल भावना को यदि संक्षेप में देखा जाए तो यह कला की साधना, परंपरा की निरंतरता और नई पीढ़ी तक सांस्कृतिक विरासत पहुंचाने की प्रक्रिया है। आधिकारिक और अन्य उपलब्ध विवरणों में भी समारोह को महाराजा चक्रधर सिंह की कला विरासत से जोड़ते हुए नई पीढ़ी के लिए मंच के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
41वें चक्रधर समारोह 2026 की यात्रा में अनेक यादगार दृश्य बने—मंच पर पद्मश्री डॉ. उषा बारले की पंडवानी, अनुज शर्मा का लोकसंगीत, विभिन्न घरानों का कथक, ओडिसी की मुद्राएं, भरतनाट्यम की लय, कुचिपुड़ी की गतियां, मणिपुरी की शैली, गोटीपुआ की ऊर्जा, अमित साना के लोकप्रिय गीत, रुद्रशंकर मिश्रा का बनारस घराना, नन्हीं निमृत की प्रस्तुति, ‘वंदे मातरम’ की नृत्य नाटिका, सितार और संतूर की ध्वनि और अंत में कविता कृष्णमूर्ति का गायन। इन सभी क्षणों ने मिलकर 41वें संस्करण की सांस्कृतिक स्मृति तैयार की।
कुल मिलाकर 41वां चक्रधर समारोह 2026 रायगढ़ की कला-संस्कृति, भारतीय शास्त्रीय परंपराओं, लोककला और नई पीढ़ी की प्रतिभाओं का व्यापक संगम बनकर सामने आया। 14 सितंबर से 23 सितंबर तक चल रहे इस दस दिवसीय आयोजन में देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आए कलाकारों ने कथक, ओडिसी, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, मणिपुरी, कथकली, गोटीपुआ, पंडवानी, लोकसंगीत, भजन, कविता, वादन, सूफी गायन और नृत्य नाटिका के माध्यम से अपनी कला प्रस्तुत की। आधिकारिक कार्यक्रम में दर्ज प्रस्तुतियां इस विविधता को स्पष्ट करती हैं।
रायगढ़ के रामलीला मैदान में सजी यह सांस्कृतिक यात्रा महाराजा चक्रधर सिंह की विरासत को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ने का अवसर बनी। वरिष्ठ कलाकारों से लेकर छह वर्ष की नन्हीं निमृत पात्रा तक, देश के प्रतिष्ठित कलाकारों से लेकर स्थानीय और विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों तक—अलग-अलग पीढ़ियों और क्षेत्रों की प्रतिभाएं एक ही मंच पर दिखाई दीं। बनारस और रायगढ़ घराने के कथक का संवाद, ‘वंदे मातरम’ की नृत्य नाटिका, लोकसंगीत की धुनें, शास्त्रीय वादन की गंभीरता और लोकप्रिय गायन की ऊर्जा ने समारोह को बहुरंगी स्वरूप दिया।
41वें चक्रधर समारोह 2026 की सबसे बड़ी झलक यही रही कि रायगढ़ में कला केवल मंच पर प्रस्तुत नहीं हुई, बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान का जीवंत हिस्सा बनकर दिखाई दी। घुंघरुओं की थाप से लेकर तबले की संगत तक, लोकगीतों की सहज धुन से लेकर शास्त्रीय संगीत की गहराई तक, बाल प्रतिभाओं की मासूम ऊर्जा से लेकर अनुभवी कलाकारों की साधना तक—हर प्रस्तुति ने इस दस दिवसीय आयोजन को अपनी अलग पहचान दी। समारोह की अंतिम संध्या में पद्मश्री कविता कृष्णमूर्ति के गायन के साथ यह यात्रा अपने समापन की ओर बढ़ रही है, लेकिन 41वें चक्रधर समारोह की ये सांस्कृतिक झलकियां रायगढ़ की कला-स्मृति में लंबे समय तक बनी रहेंगी।
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