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डॉ. लवली शर्मा की सितार की सुरमयी तान से सजी चक्रधर समारोह की 9वीं शाम

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रायगढ़। 41वें अंतरराष्ट्रीय चक्रधर समारोह की नौवीं सांस्कृतिक संध्या में सितार के मधुर सुरों ने रामलीला मैदान के वातावरण को शास्त्रीय संगीत की गहराई और माधुर्य से भर दिया। इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ की प्रोफेसर डॉ. लवली शर्मा ने सितार वादन की मनोहारी प्रस्तुति देकर श्रोताओं को संगीत की बारीकियों से रूबरू कराया। उनकी प्रस्तुति के दौरान सितार की तारों से निकली स्वर लहरियों ने समारोह के मंच को सुरमयी बना दिया और श्रोताओं ने तालियों के साथ कलाकार का उत्साहवर्धन किया। आधिकारिक समारोह विवरण के अनुसार 22 सितंबर की नौवीं शाम में ओडिसी नृत्य, कथकली, सितार वादन, लोक संगीत तथा सूफी गायन की प्रस्तुतियां निर्धारित थीं।
डॉ. लवली शर्मा की प्रस्तुति में शास्त्रीय संगीत की भावपूर्णता और सितार के मधुर स्वरों का सुंदर समन्वय देखने को मिला। उपलब्ध कार्यक्रम रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने राग सरस्वती की स्वर लहरियों से अपनी प्रस्तुति को सजाया। सितार की तारों से जब राग के सुरों की अभिव्यक्ति हुई तो समारोह स्थल का वातावरण शास्त्रीय संगीत की अनुभूति से भर गया। राग की गंभीरता और सितार की मधुर ध्वनि के बीच कलाकार की साधना और वादन शैली की झलक दिखाई दी। प्रस्तुति के दौरान श्रोता एकाग्र होकर संगीत का आनंद लेते रहे और प्रस्तुति के बाद तालियों की गूंज सुनाई दी।
चक्रधर समारोह की नौवीं शाम में डॉ. लवली शर्मा की प्रस्तुति विशेष रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण रही कि समारोह का मंच अलग-अलग भारतीय शास्त्रीय कलाओं के कलाकारों को एक साथ प्रस्तुत करता है। इसी शाम सारंगढ़ की दीक्षा रथ ने ओडिसी नृत्य, केरल के गुरु कोट्टक्कल नंदकुमारन नायर ने कथकली, पुनरिक साहू-लहरगंगा ने लोक संगीत तथा रायगढ़ के राकेश शर्मा ने सूफी गायन और गजल की प्रस्तुति दी। इस विविध सांस्कृतिक क्रम के बीच सितार वादन ने कार्यक्रम में वाद्य संगीत का शास्त्रीय रंग जोड़ा।
डॉ. लवली शर्मा की संगीत यात्रा भी लंबे अभ्यास और प्रशिक्षण से जुड़ी रही है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में जन्मीं डॉ. शर्मा ने महज 15 वर्ष की आयु में श्रीमती वीणा चंद्रा से सितार की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने विभिन्न गुरुओं से प्रशिक्षण लिया और प्रसिद्ध सितार एवं गिटार वादक पंडित बृज भूषण काबरा की शिष्या बनीं। एक अन्य विस्तृत रिपोर्ट में उनके कोलकाता के सितार वादक श्री कल्याण लहरी से उच्च प्रशिक्षण प्राप्त करने का भी उल्लेख है।
शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में उनकी शैक्षणिक उपलब्धियां भी उल्लेखनीय हैं। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर उपाधि गोल्ड मेडल के साथ प्राप्त की और बड़ौदा विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि हासिल की। उनके बारे में प्रकाशित जानकारी में संगीत में डी.लिट्ट की उपाधि का भी उल्लेख मिलता है। इस प्रकार उनकी कला साधना के साथ उच्च शिक्षा और शोध का पक्ष भी जुड़ा हुआ है।
डॉ. लवली शर्मा ने देश-विदेश के विभिन्न मंचों पर सितार वादन प्रस्तुत किया है। उन्हें ऑल इंडिया रेडियो तथा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की सूचीबद्ध सितार वादक के रूप में भी उल्लेखित किया गया है। कला क्षेत्र में उन्हें ‘कला भूषण’ सहित विभिन्न सम्मानों से सम्मानित किए जाने की जानकारी प्रकाशित हुई है। उनकी कला यात्रा में शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति के साथ शिक्षण और संगीत संस्थानों से जुड़ाव भी रहा है।
चक्रधर समारोह के मंच से डॉ. लवली शर्मा का संबंध नया नहीं है। वर्ष 2025 के 40वें चक्रधर समारोह में भी उन्होंने सितार वादन प्रस्तुत किया था। उस प्रस्तुति में राग सरस्वती की स्वर लहरियों के माध्यम से सितार वादन किया गया था और श्रोताओं ने तालियों से उनका उत्साह बढ़ाया था। 2026 के समारोह में दोबारा उनकी सितार प्रस्तुति ने उनके कला-संबंध को आगे बढ़ाया।
इस वर्ष की नौवीं शाम में उनकी प्रस्तुति के दौरान सितार के सुरों ने समारोह के नृत्य और गायन प्रधान कार्यक्रमों के बीच वाद्य संगीत का अलग वातावरण तैयार किया। चक्रधर समारोह में शास्त्रीय नृत्य के साथ वाद्य संगीत को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। आधिकारिक कार्यक्रम विवरण में सितार, संतूर, तबला और अन्य वाद्य प्रस्तुतियों को समारोह की सांस्कृतिक विविधता का हिस्सा बताया गया है। ऐसे में डॉ. लवली शर्मा की प्रस्तुति ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए श्रोताओं के सामने सितार वादन की शास्त्रीय अभिव्यक्ति रखी।
सितार वादन में स्वर, लय, राग की संरचना और वाद्य की ध्वनि का संतुलन प्रस्तुति को प्रभावी बनाता है। डॉ. लवली शर्मा की प्रस्तुति में भी सितार की तारों से निकलती स्वर लहरियों के माध्यम से राग की अनुभूति कराई गई। राग सरस्वती की प्रस्तुति ने शाम को शास्त्रीय संगीत का विशिष्ट रंग दिया। श्रोताओं की प्रतिक्रिया तालियों के रूप में सामने आई, जिससे कलाकार के प्रति उनकी सराहना और कार्यक्रम के प्रति उनकी रुचि दिखाई दी।
41वें चक्रधर समारोह की नौवीं सांस्कृतिक संध्या का स्वरूप भी काफी विविध रहा। एक ही शाम में ओडिसी, कथकली, सितार, लोक संगीत और सूफी गायन जैसी अलग-अलग विधाओं को स्थान मिला। इससे दर्शकों को भारतीय कला परंपरा के अलग-अलग रूपों को एक ही मंच पर देखने-सुनने का अवसर मिला। डॉ. लवली शर्मा की सितार प्रस्तुति इस सांस्कृतिक क्रम में शास्त्रीय वाद्य संगीत की महत्वपूर्ण कड़ी रही।
चक्रधर समारोह का मंच महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना और रायगढ़ की सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा है। आधिकारिक पर्यटन विवरण के अनुसार समारोह भारतीय संगीत और नृत्य की विविध विधाओं को मंच प्रदान करता है और देशभर के कलाकार यहां अपनी कला प्रस्तुत करते हैं। कथक और ओडिसी जैसे शास्त्रीय नृत्यों के साथ सितार वादन जैसे वाद्य संगीत को भी समारोह में स्थान दिया जाता है। इसी व्यापक सांस्कृतिक स्वरूप में डॉ. लवली शर्मा की प्रस्तुति ने नौवीं शाम को संगीत का एक विशिष्ट आयाम दिया।
डॉ. लवली शर्मा की प्रस्तुति का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनका कलाकार और शिक्षिका दोनों रूपों में योगदान भी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे संगीत शिक्षा से भी जुड़ी रही हैं और सितार वादन की परंपरा को आगे बढ़ाने में सक्रिय हैं। उनके लंबे प्रशिक्षण और मंचीय अनुभव ने उनकी प्रस्तुति को एक परिपक्व शास्त्रीय स्वरूप दिया। सितार के सुरों में वर्षों की साधना और संगीत के प्रति निरंतर समर्पण की झलक दिखाई दी।
चक्रधर समारोह में सितार वादन की प्रस्तुति केवल एक वाद्य कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि शास्त्रीय संगीत की उस परंपरा का प्रदर्शन भी रही जिसमें राग और स्वर के माध्यम से भावों को अभिव्यक्त किया जाता है। डॉ. लवली शर्मा ने इसी परंपरा में अपनी प्रस्तुति दी। राग सरस्वती के सुरों के साथ सितार की मधुर ध्वनि ने वातावरण को शांत और संगीतप्रधान बनाया। दर्शकों की एकाग्रता और प्रस्तुति के बाद हुई तालियों ने कार्यक्रम की प्रभावशीलता को रेखांकित किया।
नौवीं शाम के कार्यक्रम में ओडिसी नृत्यांगना दीक्षा रथ की प्रस्तुति ने जहां शास्त्रीय नृत्य का रंग जोड़ा, वहीं कथकली ने केरल की रंग-नृत्य परंपरा को सामने रखा। इसके बाद डॉ. लवली शर्मा के सितार वादन ने शास्त्रीय वाद्य संगीत की धारा को आगे बढ़ाया। लोक संगीत और सूफी गायन ने शाम के सांस्कृतिक स्वरूप को और विस्तृत किया। इस तरह पूरा कार्यक्रम भारतीय कला की विविध परंपराओं के बीच संवाद का मंच बना।
डॉ. लवली शर्मा की सितार प्रस्तुति ने चक्रधर समारोह की उस परंपरा को भी रेखांकित किया, जिसमें मंच पर स्थापित कलाकारों के साथ अलग-अलग कला विधाओं को समान स्थान दिया जाता है। रायगढ़ का यह समारोह वर्षों से शास्त्रीय संगीत, नृत्य और लोककला के कलाकारों को मंच देता रहा है। इस वर्ष की नौवीं संध्या में भी यही विविधता दिखाई दी। सितार के मधुर सुरों से लेकर कथकली की मंचीय अभिव्यक्ति और ओडिसी की नृत्यगत लय तक, कार्यक्रम ने भारतीय कला की व्यापकता को सामने रखा।
डॉ. लवली शर्मा की कला यात्रा में शिक्षा, प्रशिक्षण, मंचीय अनुभव और सम्मान—चारों पक्ष दिखाई देते हैं। कम उम्र में सितार सीखने से शुरू हुई उनकी साधना आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंची। ऑल इंडिया रेडियो और आईसीसीआर से जुड़ाव, उच्च शैक्षणिक उपलब्धियां तथा कला सम्मान उनके संगीत जीवन के विभिन्न पड़ावों को दर्शाते हैं। चक्रधर समारोह के मंच पर उनकी प्रस्तुति इसी लंबी संगीत साधना की एक और कड़ी रही।
रायगढ़ की सांस्कृतिक धरती पर सितार की स्वर लहरियों का यह कार्यक्रम समारोह के दर्शकों के लिए शास्त्रीय संगीत का अनुभव लेकर आया। प्रस्तुति के दौरान वातावरण में संगीत की गंभीरता और माधुर्य दोनों दिखाई दिए। सितार की ध्वनि ने कार्यक्रम को एक शांत और सुरमयी आयाम दिया, जबकि प्रस्तुति के बाद दर्शकों की तालियों ने कलाकार के प्रति सम्मान और सराहना व्यक्त की।
41वें अंतरराष्ट्रीय चक्रधर समारोह की नौवीं सांस्कृतिक संध्या में डॉ. लवली शर्मा की सितार प्रस्तुति ने शास्त्रीय संगीत के प्रेमियों को एकाग्र होकर संगीत सुनने का अवसर दिया। राग सरस्वती की स्वर लहरियों से सजी प्रस्तुति, सितार की मधुर तान और कलाकार की दीर्घ साधना ने कार्यक्रम में विशेष संगीतात्मक वातावरण बनाया। समारोह के मंच पर उनकी उपस्थिति ने यह भी दिखाया कि चक्रधर समारोह में नृत्य के साथ-साथ भारतीय शास्त्रीय वाद्य संगीत को भी निरंतर प्रमुखता मिलती रही है।
सितार के सुरों और राग की भावपूर्ण अभिव्यक्ति के साथ डॉ. लवली शर्मा ने चक्रधर समारोह की नौवीं शाम को शास्त्रीय संगीत के रंग से भर दिया। उनकी प्रस्तुति के दौरान श्रोताओं ने संगीत का आनंद लिया और तालियों से कलाकार का उत्साहवर्धन किया। 41वें चक्रधर समारोह की यह शाम ओडिसी, कथकली, सितार, लोक संगीत और सूफी गायन की विविध प्रस्तुतियों के कारण भारतीय कला-संस्कृति के अनेक रंगों को एक साथ समेटे रही।
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