
पटना/पूसा। नीति आयोग और डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (RPCAU), पूसा, बिहार के संयुक्त तत्वावधान में 25 सितंबर 2026 को “Green Minds for a Green Nation: Agri-Education & Skilling for 2047” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का मुख्य केंद्र कृषि शिक्षा, कौशल विकास, तकनीक, नवाचार और भविष्य की कृषि आवश्यकताओं के अनुरूप मानव संसाधन तैयार करने पर रहा। उद्घाटन सत्र में बिहार के शिक्षा मंत्री श्री मिथिलेश तिवारी, नीति आयोग के सदस्य (कृषि) प्रो. के.वी. राजू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी.एस. पबडेय तथा नीति आयोग की वरिष्ठ सलाहकार डॉ. नीलम पटेल सहित कृषि शिक्षा, अनुसंधान और कौशल विकास से जुड़े प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। कार्यशाला ऐसे समय आयोजित की गई, जब भारतीय कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ तकनीकी बदलाव, जलवायु संबंधी चुनौतियों, संसाधनों के बेहतर उपयोग, डिजिटल तकनीक और बदलती रोजगार आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षित मानव संसाधन की जरूरत पर लगातार जोर दिया जा रहा है। आयोजन में कृषि शिक्षा को पारंपरिक पाठ्यक्रमों से आगे ले जाकर आधुनिक तकनीक, व्यावहारिक प्रशिक्षण और कौशल आधारित शिक्षा से जोड़ने पर चर्चा का अवसर मिला। “ग्रीन माइंड्स फॉर ए ग्रीन नेशन” की अवधारणा के माध्यम से यह विचार सामने आया कि कृषि के भविष्य को मजबूत बनाने के लिए केवल खेतों में नई तकनीक पहुंचाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसी नई पीढ़ी तैयार करना भी जरूरी है जो कृषि विज्ञान, डिजिटल तकनीक, उद्यमिता, संसाधन प्रबंधन और नवाचार को समझकर उनका व्यावहारिक उपयोग कर सके। कार्यशाला में कृषि शिक्षा और कौशल विकास को भविष्य की कृषि अर्थव्यवस्था से जोड़ने पर विशेष ध्यान रहा। कृषि क्षेत्र में रोजगार और उद्यमिता के बदलते अवसरों को देखते हुए विद्यार्थियों, युवाओं और कृषि से जुड़े कार्यबल को नई तकनीकों के अनुरूप प्रशिक्षित करने की आवश्यकता पर विचार किया गया। कार्यक्रम में यह भी रेखांकित किया गया कि वर्ष 2047 के व्यापक विकास लक्ष्यों के संदर्भ में कृषि क्षेत्र को ज्ञान, कौशल और नवाचार आधारित बनाना महत्वपूर्ण होगा। इस दृष्टि से कृषि विश्वविद्यालयों, नीति संस्थानों, शिक्षकों, वैज्ञानिकों और प्रशिक्षण संस्थानों के बीच समन्वय को उपयोगी माना गया। कार्यशाला का उद्देश्य कृषि शिक्षा और कौशल विकास के ऐसे पहलुओं पर विचार करना रहा, जिनके माध्यम से आने वाले वर्षों में कृषि क्षेत्र के लिए तकनीकी रूप से सक्षम, नवाचारी और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप कार्य करने वाला मानव संसाधन तैयार किया जा सके।
कार्यशाला में कृषि शिक्षा को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप मजबूत करने के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श हुआ। कृषि आज केवल पारंपरिक खेती तक सीमित क्षेत्र नहीं है, बल्कि इसमें कृषि मशीनरी, जैव प्रौद्योगिकी, डिजिटल कृषि, ड्रोन तकनीक, सटीक कृषि, कृषि विपणन, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि-आधारित उद्यमिता, जल प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य और आपूर्ति श्रृंखला जैसे अनेक क्षेत्र जुड़े हुए हैं। इन क्षेत्रों में तेजी से हो रहे तकनीकी बदलावों के कारण कृषि शिक्षा में भी लगातार परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की जा रही है। नई पीढ़ी के विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान देने के बजाय उन्हें खेत, प्रयोगशाला, बाजार और तकनीकी संस्थानों से जुड़े व्यावहारिक अनुभव उपलब्ध कराना कृषि शिक्षा को अधिक उपयोगी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है। इसी संदर्भ में कार्यशाला में कृषि शिक्षा और स्किलिंग को एक-दूसरे से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया गया। कृषि क्षेत्र में प्रशिक्षित मानव संसाधन की भूमिका किसानों तक तकनीकी जानकारी पहुंचाने, नई कृषि तकनीकों को अपनाने, कृषि उद्यमों को विकसित करने और उत्पादन प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिकोण बढ़ाने में महत्वपूर्ण हो सकती है। डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग ने कृषि क्षेत्र में नए प्रकार के कौशल की मांग पैदा की है। खेतों में सेंसर आधारित तकनीक, मौसम और बाजार संबंधी डिजिटल जानकारी, कृषि मशीनों का आधुनिक संचालन, ड्रोन आधारित निगरानी और डेटा आधारित निर्णय जैसी तकनीकों के उपयोग के लिए प्रशिक्षित युवाओं की जरूरत होगी। कृषि शिक्षा संस्थानों में इस प्रकार के कौशल को शामिल करने से विद्यार्थियों को रोजगार और उद्यमिता के नए अवसरों से जोड़ने की संभावना बढ़ सकती है। कार्यशाला में तकनीक और नवाचार को कृषि शिक्षा से जोड़ने की दिशा में विचार हुआ ताकि भविष्य के कृषि कार्यबल को केवल वर्तमान जरूरतों के लिए नहीं, बल्कि आने वाले दशकों में होने वाले परिवर्तनों के लिए भी तैयार किया जा सके। कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन, जल उपलब्धता, भूमि की गुणवत्ता और संसाधनों पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियां भी शिक्षा और प्रशिक्षण की नई जरूरतें पैदा करती हैं। किसानों, कृषि विद्यार्थियों, तकनीकी विशेषज्ञों और ग्रामीण युवाओं को इन विषयों पर वैज्ञानिक जानकारी और व्यावहारिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराना आवश्यक होगा। कृषि शिक्षा में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कौशल विकास को शामिल करना भी महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में फसलें, जलवायु, मिट्टी, सिंचाई व्यवस्था और कृषि पद्धतियां अलग-अलग हैं। इसलिए भविष्य की कृषि शिक्षा को स्थानीय जरूरतों के साथ राष्ट्रीय और वैश्विक तकनीकी बदलावों का समन्वय करना होगा। कार्यशाला इसी व्यापक विचार-विमर्श के लिए मंच बनी, जहां कृषि शिक्षा और कौशल विकास को वर्ष 2047 की दीर्घकालिक आवश्यकताओं से जोड़कर देखने का अवसर मिला।
“Green Minds for a Green Nation” की अवधारणा में कृषि क्षेत्र के लिए ऐसे मानव संसाधन तैयार करने पर जोर दिखाई दिया, जो वैज्ञानिक ज्ञान के साथ पर्यावरणीय और सामाजिक जिम्मेदारियों को भी समझते हों। कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखना, जल का विवेकपूर्ण उपयोग, ऊर्जा दक्षता और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी आवश्यकताओं को भी कृषि के भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है। ऐसे में कृषि शिक्षा का दायरा केवल उत्पादन तकनीकों तक सीमित नहीं रह सकता। विद्यार्थियों और कृषि क्षेत्र से जुड़े युवाओं को टिकाऊ कृषि, संसाधन संरक्षण और पर्यावरणीय प्रभावों की जानकारी देना भी आवश्यक होगा। कार्यशाला में तकनीक और नवाचार के उपयोग के माध्यम से कृषि को अधिक सक्षम बनाने की दिशा में विचार किया गया। तकनीकी नवाचार का उपयोग कृषि में लागत, उत्पादकता, संसाधन उपयोग और बाजार से जुड़ी समस्याओं के समाधान में किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए तकनीक को समझने और उसे स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप लागू करने वाले प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता होगी। कृषि विश्वविद्यालयों और प्रशिक्षण संस्थानों की भूमिका यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। विश्वविद्यालयों में शोध और शिक्षा के साथ कौशल आधारित प्रशिक्षण को बढ़ावा देने से विद्यार्थियों को कृषि क्षेत्र में बदलती जरूरतों के अनुरूप तैयार किया जा सकता है। इसी प्रकार उद्योग, कृषि उद्यम, शोध संस्थान और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग से व्यावहारिक प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। कृषि क्षेत्र में रोजगार की बदलती प्रकृति को देखते हुए युवाओं को केवल सरकारी या पारंपरिक रोजगार की ओर देखने के बजाय कृषि आधारित उद्यमिता, स्टार्टअप, तकनीकी सेवाओं, खाद्य प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन जैसे क्षेत्रों के अवसरों से भी परिचित कराना आवश्यक होगा। आधुनिक कृषि में किसान और कृषि विशेषज्ञ के बीच तकनीकी ज्ञान का आदान-प्रदान महत्वपूर्ण है। प्रशिक्षित युवा किसानों को डिजिटल सेवाओं, वैज्ञानिक खेती, बाजार की जानकारी और आधुनिक कृषि उपकरणों के उपयोग में सहायता कर सकते हैं। इससे कृषि शिक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच संबंध मजबूत हो सकते हैं। कार्यशाला में भविष्य के कृषि कार्यबल को “फ्यूचर-रेडी” बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। इसका आशय ऐसे कार्यबल से है जो नई तकनीकों को सीखने, बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने और कृषि क्षेत्र में उभरती समस्याओं के समाधान खोजने में सक्षम हो। वर्ष 2047 तक भारत के विकास लक्ष्यों को देखते हुए कृषि क्षेत्र में ज्ञान और कौशल की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। कृषि केवल खाद्य उत्पादन का माध्यम नहीं बल्कि ग्रामीण रोजगार, खाद्य प्रसंस्करण, व्यापार, उद्योग और व्यापक अर्थव्यवस्था से जुड़ा क्षेत्र है। इसलिए कृषि शिक्षा में किए जाने वाले सुधारों का प्रभाव कई अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।
राष्ट्रीय कार्यशाला में नीति आयोग, कृषि विश्वविद्यालय और शिक्षा क्षेत्र के प्रतिनिधियों की सहभागिता ने कृषि शिक्षा और कौशल विकास से जुड़े मुद्दों पर संस्थागत संवाद का अवसर प्रदान किया। नीति निर्माण के स्तर पर कृषि क्षेत्र की आवश्यकताओं और शैक्षणिक संस्थानों में उपलब्ध प्रशिक्षण व्यवस्था के बीच समन्वय स्थापित करना महत्वपूर्ण माना जाता है। विश्वविद्यालयों में होने वाले शोध को खेतों और कृषि व्यवसाय से जोड़ने तथा किसानों की वास्तविक समस्याओं को शिक्षा और अनुसंधान के विषयों में शामिल करने से कृषि शिक्षा अधिक उपयोगी बन सकती है। इसी प्रकार कृषि क्षेत्र में उभरती तकनीकों की पहचान कर उन्हें प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में शामिल करना भी आवश्यक होगा। भविष्य में कृषि से जुड़े युवाओं को डेटा, डिजिटल प्लेटफॉर्म, मशीनरी संचालन, बाजार विश्लेषण, उद्यमिता और तकनीकी सेवाओं जैसे नए क्षेत्रों में कौशल की जरूरत पड़ सकती है। इसके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों को समय-समय पर अद्यतन करना होगा। कृषि शिक्षा और स्किलिंग के क्षेत्र में महिलाओं और ग्रामीण युवाओं की सहभागिता भी महत्वपूर्ण है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका कृषि उत्पादन, पशुपालन, प्रसंस्करण और स्थानीय उद्यमों में महत्वपूर्ण रहती है। यदि उन्हें आधुनिक तकनीक और व्यवसायिक कौशल का प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए तो कृषि आधारित गतिविधियों में उनकी भागीदारी को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इसी तरह छोटे और सीमांत किसानों से जुड़े परिवारों के युवाओं को कौशल आधारित कृषि शिक्षा उपलब्ध कराना ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और उद्यमिता के अवसरों को बढ़ाने में सहायक हो सकता है। कार्यशाला में तकनीक और नवाचार को कृषि क्षेत्र के भविष्य से जोड़ते हुए यह विचार सामने आया कि नई तकनीक तभी प्रभावी होगी जब उसे समझने, अपनाने और स्थानीय जरूरतों के अनुसार उपयोग करने वाले प्रशिक्षित लोग उपलब्ध हों। कृषि शिक्षा के साथ कौशल विकास को जोड़ना इसी आवश्यकता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस संदर्भ में कृषि विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित न रहकर अनुसंधान, प्रशिक्षण, नवाचार और तकनीकी हस्तांतरण के व्यापक केंद्र के रूप में विकसित हो सकती है। कार्यशाला जैसे मंच विभिन्न संस्थानों के बीच विचारों और अनुभवों के आदान-प्रदान का अवसर देते हैं। इससे कृषि शिक्षा की वर्तमान स्थिति, भविष्य की जरूरतों और प्रशिक्षण में संभावित बदलावों पर संवाद को आगे बढ़ाया जा सकता है। वर्ष 2047 को ध्यान में रखते हुए कृषि क्षेत्र में मानव संसाधन विकास की योजना दीर्घकालिक होनी आवश्यक है, क्योंकि आज शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले विद्यार्थी आने वाले वर्षों में कृषि क्षेत्र के वैज्ञानिक, उद्यमी, तकनीकी विशेषज्ञ, प्रशिक्षक और सेवा प्रदाता बनेंगे। इसीलिए भविष्य की कृषि व्यवस्था को मजबूत करने के लिए शिक्षा, कौशल, शोध और तकनीक के बीच समन्वय महत्वपूर्ण होगा।
दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का व्यापक संदर्भ विकसित भारत@2047 की दीर्घकालिक दृष्टि से जुड़ा रहा। कृषि क्षेत्र को इस व्यापक विकास प्रक्रिया में महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका, कृषि आधारित उद्योग, रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि से जुड़ा है। ऐसे में कृषि क्षेत्र के भविष्य के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना विकास की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। कार्यशाला में कृषि शिक्षा और कौशल विकास को तकनीक तथा नवाचार से जोड़ने की आवश्यकता पर विशेष ध्यान रहा। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था की दिशा में विचार करना रहा जिसमें कृषि से जुड़े विद्यार्थी और कार्यबल तेजी से बदलती तकनीकी परिस्थितियों के साथ आगे बढ़ सकें। भविष्य की कृषि में केवल पारंपरिक ज्ञान पर्याप्त नहीं होगा; वैज्ञानिक जानकारी, डिजिटल उपकरणों का उपयोग, डेटा की समझ, संसाधन प्रबंधन, बाजार की जानकारी और उद्यमिता जैसे कौशल भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसी तरह कृषि क्षेत्र में पर्यावरणीय स्थिरता और संसाधन संरक्षण की आवश्यकता को देखते हुए प्रशिक्षण में इन विषयों को भी उचित स्थान देना जरूरी होगा। कार्यशाला ने कृषि शिक्षा को व्यापक सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में देखने का अवसर प्रदान किया। कृषि क्षेत्र की समस्याओं का समाधान केवल कृषि विभाग या किसान स्तर पर नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, तकनीकी विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और निजी क्षेत्र के सहयोग से विकसित किया जा सकता है। इसके लिए ज्ञान और कौशल का निरंतर आदान-प्रदान आवश्यक है। राष्ट्रीय स्तर की कार्यशालाएं ऐसे संवाद को संस्थागत रूप देने में उपयोगी हो सकती हैं। आयोजन में शामिल विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों ने कृषि शिक्षा तथा कौशल विकास के महत्व को रेखांकित किया और भविष्य के कृषि कार्यबल को तकनीक एवं नवाचार के अनुरूप तैयार करने की आवश्यकता पर विचार किया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा जैसे कृषि शिक्षा संस्थानों की भूमिका इस दिशा में महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऐसे संस्थान शिक्षा, अनुसंधान और कृषि क्षेत्र से जुड़े व्यावहारिक प्रशिक्षण को एक मंच पर जोड़ सकते हैं। नीति आयोग की सहभागिता से कार्यशाला को नीति और शिक्षा के बीच संवाद का अवसर भी मिला। आगे इस प्रकार के विचार-विमर्श से प्राप्त सुझावों को कृषि शिक्षा और कौशल विकास की योजनाओं में किस रूप में शामिल किया जाता है, यह भविष्य की प्रक्रिया का विषय होगा। फिलहाल कार्यशाला ने इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि वर्ष 2047 की दिशा में आगे बढ़ते भारत के लिए कृषि क्षेत्र में ज्ञान, कौशल, तकनीक और नवाचार से युक्त मानव संसाधन की तैयारी आवश्यक है। “ग्रीन माइंड्स फॉर ए ग्रीन नेशन” का संदेश इसी सोच को सामने रखता है कि टिकाऊ और आधुनिक कृषि व्यवस्था के निर्माण में शिक्षित, प्रशिक्षित और नवाचार के प्रति सजग मानव संसाधन की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। समापन की ओर बढ़ते इस राष्ट्रीय विमर्श ने कृषि शिक्षा को भविष्य की जरूरतों से जोड़ने, युवाओं के कौशल को मजबूत करने और तकनीकी नवाचार को कृषि क्षेत्र में उपयोगी बनाने की दिशा में संवाद का आधार तैयार किया। कार्यशाला में सहभागिता करने वाले सभी विशेषज्ञों, शिक्षकों, वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और प्रतिनिधियों के लिए यह आयोजन कृषि शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में अनुभव साझा करने तथा भविष्य की आवश्यकताओं पर विचार करने का महत्वपूर्ण अवसर रहा।