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समन्वय, सह-अस्तित्व, कर्तव्य पालन और नैतिक मूल्यों से होगा समस्याओं का समाधान : जोशी

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ग्वालियर। समाज अनेक घटकों, वर्गों, विचारों और भूमिकाओं से मिलकर बनता है और विविधता किसी भी समाज की स्वाभाविक विशेषता है। जहां विविधता होती है, वहां अलग-अलग परिस्थितियों और आवश्यकताओं के कारण समस्याओं का उत्पन्न होना भी स्वाभाविक है, लेकिन प्रत्येक समस्या के समाधान की दिशा भी समाज के भीतर ही मौजूद होती है। इसके लिए आवश्यक है कि समाज के सभी घटकों के बीच समन्वय, सह-अस्तित्व, परस्पर सम्मान और कर्तव्यबोध की भावना मजबूत हो। नैतिक मूल्यों तथा श्रेष्ठ संस्कारों को जीवन में अपनाकर ही सामाजिक समस्याओं के स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। आज समाज में सम्मान, सुरक्षा, सहभागिता और सकारात्मक चिंतन की आवश्यकता है। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य भैया जी जोशी ने शुक्रवार को ग्वालियर में राष्ट्रोत्थान न्यास द्वारा आयोजित ज्ञान प्रबोधिनी व्याख्यान माला में मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किए। एलएनआईपीई के रवीन्द्र नाथ टैगोर सभागार में ‘सांस्कृतिक मूल्यों की संरक्षक एवं संवर्धक मातृशक्ति’ विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने सामाजिक जीवन में समरसता, स्त्री-पुरुष की परस्पर पूरक भूमिका, परिवार एवं समाज में कर्तव्यबोध तथा नैतिक मूल्यों के महत्व पर विस्तार से विचार रखे। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ग्वालियर विभाग संघचालक प्रहलाद सबनानी तथा राष्ट्रोत्थान न्यास के अध्यक्ष डॉ. जगजीत सिंह नामधारी मंचासीन रहे। अपने संबोधन में जोशी ने समाज की संरचना को शरीर के विभिन्न अंगों के उदाहरण से समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार शरीर अलग-अलग अंगों से मिलकर बनता है और प्रत्येक अंग की अपनी भूमिका तथा उपयोगिता होती है, उसी प्रकार समाज भी विभिन्न घटकों से मिलकर निर्मित होता है। किसी एक घटक को अलग करके समाज की पूर्ण कल्पना नहीं की जा सकती। उनके अनुसार सामाजिक जीवन में समरसता और परस्पर सहयोग की भावना जितनी मजबूत होगी, समाज और राष्ट्र के विकास की संभावनाएं भी उतनी ही व्यापक होंगी। उन्होंने कहा कि सामाजिक विविधता को संघर्ष का कारण बनाने के बजाय समन्वय और सहयोग का आधार बनाया जाना चाहिए। उनके संबोधन का प्रमुख केंद्र यह विचार रहा कि समाज की समस्याओं का समाधान केवल अधिकारों की चर्चा से नहीं, बल्कि अपने-अपने दायित्वों और कर्तव्यों के ईमानदार पालन से भी जुड़ा है।

व्याख्यान के दौरान भैया जी जोशी ने स्त्री और पुरुष के संबंधों को परस्पर पूरकता के संदर्भ में रेखांकित करते हुए कहा कि दोनों की प्रकृति और भूमिकाओं में अंतर हो सकता है, लेकिन सामाजिक जीवन में दोनों का महत्व समान है। उन्होंने भारतीय पारिवारिक एवं सांस्कृतिक परंपरा में स्त्री को दिए गए स्थान का उल्लेख करते हुए कहा कि मातृशक्ति और पुरुष को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। उन्होंने इस संदर्भ में ‘अर्धांगिनी’ की अवधारणा का उल्लेख किया तथा लक्ष्मीनारायण, सीताराम और राधेश्याम जैसे नामों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में भी स्त्री-पुरुष की परस्परता और समन्वय की भावना दिखाई देती है। उन्होंने परिवार की संरचना में माता और पिता की भूमिकाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि मां पालन करती है और पिता पोषण करता है, जबकि दोनों मिलकर परिवार और अगली पीढ़ी के निर्माण में योगदान देते हैं। उन्होंने कहा कि समाज का जीवन भी सह-अस्तित्व और परस्पर सहयोग के आधार पर आगे बढ़ता है। अपने संबोधन में उन्होंने समानता और एकरूपता के बीच अंतर को भी रेखांकित किया। उनके अनुसार समानता का अर्थ यह नहीं कि सभी व्यक्तियों की प्रकृति, क्षमता अथवा भूमिका बिल्कुल एक जैसी हो जाए, बल्कि अलग-अलग विशेषताओं के बावजूद प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान और महत्व को स्वीकार किया जाना चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने मातृशक्ति और पुरुष के स्वभाव में अंतर होने की बात कही, लेकिन दोनों की भूमिका और महत्व को सामाजिक जीवन के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि शोषण और भेदभाव से मुक्त वातावरण सामाजिक एवं राष्ट्रीय विकास के लिए महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार जब समाज के विभिन्न वर्गों और घटकों को सम्मान तथा सहभागिता का अवसर मिलता है, तब सामाजिक समरसता मजबूत होती है और विकास की प्रक्रिया अधिक व्यापक बनती है। उन्होंने सामाजिक संबंधों में टकराव के स्थान पर संवाद, सहयोग और पारस्परिक सम्मान की आवश्यकता पर जोर दिया। कार्यक्रम का विषय मातृशक्ति के सांस्कृतिक योगदान पर केंद्रित होने के कारण उन्होंने परिवार, संस्कार और सामाजिक जीवन के निर्माण में महिलाओं की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके संबोधन में यह विचार प्रमुख रहा कि परिवार और समाज को मजबूत बनाने के लिए स्त्री और पुरुष दोनों की भूमिका को सम्मानपूर्वक स्वीकार करते हुए उनके बीच सहयोग और समन्वय का वातावरण विकसित करना आवश्यक है।
जोशी ने अपने संबोधन में संस्कार, शिक्षा और श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि किसी समाज की स्थिति केवल उसके बाहरी विकास से निर्धारित नहीं होती, बल्कि वहां रहने वाले व्यक्तियों के आचरण और चरित्र का भी उस पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उन्होंने इसे समझाने के लिए तालाब में एक मछली के मरने का उदाहरण दिया और कहा कि जिस प्रकार एक मछली के मरने से पूरे तालाब का पानी प्रभावित हो सकता है, उसी प्रकार किसी एक व्यक्ति के दूषित आचरण का प्रभाव व्यापक सामाजिक वातावरण पर भी पड़ सकता है। इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने व्यक्ति और समाज के बीच संबंध को रेखांकित किया। उनका कहना था कि समाज को स्वस्थ और सकारात्मक बनाए रखने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में संस्कार, शिक्षा और श्रेष्ठ मूल्य आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए केवल बाहरी व्यवस्थाओं पर निर्भर रहने के बजाय व्यक्ति के आचरण और जिम्मेदारी पर भी ध्यान देना होगा। यदि व्यक्ति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करे तो अनेक ऐसी समस्याएं उत्पन्न ही नहीं होंगी, जिनके समाधान के लिए बाद में अलग-अलग स्तरों पर प्रयास करने पड़ते हैं। उन्होंने कर्तव्य और अधिकार के संबंध पर भी अपने विचार रखे। उनके अनुसार जब प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से के दायित्व को ठीक प्रकार से निभाता है, तो सामाजिक व्यवस्था में संतुलन बना रहता है और अधिकारों को लेकर संघर्ष की स्थितियां भी कम हो सकती हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि व्यक्ति को केवल अपने अधिकारों की अपेक्षा करने के बजाय अपने कर्तव्यों के प्रति भी उतना ही सजग होना चाहिए। उनके संबोधन में शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र और सामाजिक दृष्टिकोण के निर्माण का माध्यम मानने पर भी जोर दिखाई दिया। उन्होंने श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को व्यवहार में उतारने की आवश्यकता बताई और कहा कि सामाजिक परिवर्तन केवल नीतियों अथवा व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि व्यक्तियों के आचरण में आने वाले सकारात्मक बदलाव से भी संभव होता है। इसी संदर्भ में उन्होंने समन्वय, सह-अस्तित्व, कर्तव्य पालन और नैतिक मूल्यों को सामाजिक समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण आधार बताया। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने उनके संबोधन को सामाजिक जीवन में परिवार, संस्कार और नैतिक जिम्मेदारी की भूमिका से जोड़कर सुना।
कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रोत्थान न्यास के अध्यक्ष डॉ. जगजीत सिंह नामधारी ने न्यास की गतिविधियों और उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राष्ट्रोत्थान न्यास सामाजिक चेतना के केंद्र के रूप में विभिन्न क्षेत्रों में गतिविधियां संचालित करता है। उनके अनुसार न्यास द्वारा चिकित्सा केंद्र और योग केंद्र के माध्यम से स्वास्थ्य एवं जीवनशैली से संबंधित गतिविधियों को बढ़ावा देने के साथ सामाजिक समरसता को मजबूत करने के लिए भी निरंतर प्रयास किए जाते हैं। उन्होंने बताया कि समाज में धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता से संबंधित विचारों तथा साहित्य के प्रसार की दिशा में भी न्यास की गतिविधियां संचालित हैं। इसी क्रम में ज्ञान प्रबोधिनी व्याख्यान माला का आयोजन किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर विचार-विमर्श के लिए मंच उपलब्ध कराना है। ‘सांस्कृतिक मूल्यों की संरक्षक एवं संवर्धक मातृशक्ति’ विषय पर आयोजित शुक्रवार के कार्यक्रम में मातृशक्ति की सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका के साथ परिवार एवं समाज के निर्माण में संस्कारों के महत्व पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने सामाजिक जीवन में सहयोग, समन्वय, सहभागिता और नैतिक मूल्यों की आवश्यकता को रेखांकित किया। न्यास की गतिविधियों के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. नामधारी ने चिकित्सा और योग से जुड़ी पहलों के साथ सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक मूल्यों तथा सामाजिक समरसता को लेकर किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि साहित्य के माध्यम से भी धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता से जुड़े विषयों को समाज तक पहुंचाने का कार्य किया जा रहा है। इस प्रकार कार्यक्रम को केवल एक व्याख्यान के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर संवाद की एक पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया। व्याख्यान माला के माध्यम से अलग-अलग विषयों पर समाज के बीच चर्चा और चिंतन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात भी सामने आई। कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों एवं श्रोताओं के बीच विषय को लेकर संवाद का वातावरण रहा और वक्ताओं ने अपने विचारों के माध्यम से परिवार तथा सामाजिक व्यवस्था में मूल्यों की भूमिका को रेखांकित किया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों का परिचय माधवी सिंह तोमर ने प्रस्तुत किया। इसके बाद प्रियंका कुशवाह और सुमन सिकरवार ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में व्यक्तिगत गीत की प्रस्तुति निधि मिश्रा ने दी। कार्यक्रम का संचालन अंजलि भार्गव ने किया, जबकि अंत में राष्ट्रोत्थान न्यास के अध्यक्ष डॉ. जगजीत सिंह नामधारी ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का समापन वंदेमातरम् के सामूहिक गान के साथ हुआ। पूरे आयोजन में ‘सांस्कृतिक मूल्यों की संरक्षक एवं संवर्धक मातृशक्ति’ विषय को केंद्र में रखते हुए परिवार, समाज, संस्कार और नैतिक मूल्यों के विभिन्न पहलुओं पर विचार रखे गए। मुख्य वक्ता भैया जी जोशी ने अपने संबोधन में समाज की विविधता को स्वीकार करते हुए समन्वय और सह-अस्तित्व की आवश्यकता पर बल दिया तथा स्त्री और पुरुष की परस्पर पूरक भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने सामाजिक जीवन में सम्मान, सुरक्षा और सहभागिता को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि समाज के सभी घटकों के बीच संतुलन और सहयोग आवश्यक है। साथ ही उन्होंने व्यक्ति के आचरण को सामाजिक वातावरण से जोड़ते हुए संस्कार और शिक्षा की भूमिका को रेखांकित किया। कार्यक्रम में यह संदेश प्रमुखता से सामने आया कि सामाजिक समस्याओं का समाधान केवल किसी एक वर्ग या व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक सदस्य के आचरण और दायित्व से जुड़ा विषय है। अपने-अपने कर्तव्यों का जिम्मेदारी से निर्वहन, परस्पर सम्मान, नैतिक मूल्यों का पालन और सामाजिक सहभागिता ऐसे आधार हैं, जिनके माध्यम से समाज में सकारात्मक वातावरण बनाया जा सकता है। कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित लोगों ने सामूहिक रूप से वंदेमातरम् का गान किया। आयोजन से जुड़े पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम की व्यवस्था में सहभागिता की और अतिथियों तथा उपस्थित श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
ज्ञान प्रबोधिनी व्याख्यान माला के इस आयोजन में सामने आए विचारों का केंद्रीय विषय सामाजिक समन्वय, सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक मूल्यों के माध्यम से सामाजिक जीवन को मजबूत करने से जुड़ा रहा। कार्यक्रम में मातृशक्ति की भूमिका पर चर्चा करते हुए परिवार को संस्कारों के निर्माण की महत्वपूर्ण इकाई के रूप में रेखांकित किया गया। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि समाज में स्थायी सकारात्मक परिवर्तन के लिए व्यक्ति के आचरण और कर्तव्यबोध को मजबूत करना आवश्यक है। भैया जी जोशी ने अपने संबोधन में कहा कि समाज विभिन्न घटकों से मिलकर बनता है और सभी घटकों की अपनी भूमिका होती है। उनके अनुसार समरसता और परस्पर सहयोग के माध्यम से ही समाज एवं राष्ट्र के हित में आगे बढ़ा जा सकता है। उन्होंने स्त्री-पुरुष के बीच समान सम्मान और पूरकता की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि दोनों की भूमिकाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन सामाजिक जीवन में दोनों का महत्व समान है। साथ ही उन्होंने शोषण और भेदभाव से मुक्त वातावरण की आवश्यकता बताई। संस्कार और शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के चरित्र निर्माण को उन्होंने सामाजिक व्यवस्था की मजबूती से जोड़ा। कार्यक्रम में राष्ट्रोत्थान न्यास की गतिविधियों का भी उल्लेख हुआ और बताया गया कि चिकित्सा, योग, सामाजिक समरसता तथा धर्म-संस्कृति और राष्ट्रीयता से संबंधित साहित्य के माध्यम से विभिन्न स्तरों पर गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। इस आयोजन के माध्यम से सामाजिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर सार्वजनिक संवाद की आवश्यकता को भी सामने रखा गया। कार्यक्रम के अंत में वंदेमातरम् के सामूहिक गान के साथ आयोजन संपन्न हुआ। आयोजन में मंचासीन अतिथियों, वक्ताओं, कार्यक्रम संचालन से जुड़े सदस्यों और उपस्थित श्रोताओं की सहभागिता रही। इस प्रकार ग्वालियर में आयोजित ज्ञान प्रबोधिनी व्याख्यान माला का यह कार्यक्रम मातृशक्ति, पारिवारिक संस्कार, सामाजिक समरसता, कर्तव्यबोध और नैतिक मूल्यों पर केंद्रित विचार-विमर्श के रूप में संपन्न हुआ।

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