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राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु के छत्तीसगढ़ आगमन से बढ़ेगा बस्तर की जनजातीय संस्कृति और गौरवशाली परंपराओं का मान

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ऐतिहासिक बस्तर दशहरा एवं मुरिया दरबार में राष्ट्रपति की गरिमामयी उपस्थिति प्रदेश के लिए गौरव का अवसर, विकसित छत्तीसगढ़ के संकल्प को मिलेगी नई ऊर्जा
रायपुर/जगदलपुर। प्रभु श्रीराम के ननिहाल और माता कौशल्या की पावन धरा छत्तीसगढ़ में भारत की माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी के आगमन का स्वागत करते हुए प्रदेशवासियों की ओर से हार्दिक अभिनंदन व्यक्त किया गया है। राष्ट्रपति की गरिमामयी उपस्थिति को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान, जनजातीय परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत के सम्मान से जोड़कर देखा जा रहा है। विशेष रूप से बस्तर दशहरा और मुरिया दरबार जैसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी उपस्थिति प्रदेश के लिए गौरव का विषय है। बस्तर की पहचान केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की जीवंत लोकसंस्कृति, देवी-देवताओं के प्रति गहरी आस्था, पारंपरिक रीति-रिवाजों, सामुदायिक सहभागिता और जनजातीय जीवनशैली में भी दिखाई देती है। बस्तर दशहरा देश के विशिष्ट सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल है, जिसकी परंपराएं स्थानीय आस्था और सामाजिक एकता से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इस आयोजन की विशेषता यह है कि इसकी पहचान स्थानीय देवी मां दंतेश्वरी की आराधना और बस्तर की विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी है। राष्ट्रपति का इस आयोजन से जुड़ना छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलने का महत्वपूर्ण अवसर माना जा सकता है। वहीं मुरिया दरबार बस्तर की जनजातीय परंपराओं, सामुदायिक संवाद और जनजीवन से जुड़े विषयों का प्रतिनिधित्व करने वाला महत्वपूर्ण मंच है। ऐसे आयोजनों में देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन राष्ट्रपति की उपस्थिति से बस्तर की सांस्कृतिक पहचान, परंपरागत ज्ञान और स्थानीय समुदायों की भूमिका पर व्यापक ध्यान आकर्षित होता है। छत्तीसगढ़ अपनी लोकपरंपराओं, प्राकृतिक संपदा, जनजातीय विरासत और सामाजिक सौहार्द के लिए विशिष्ट स्थान रखता है। राष्ट्रपति के स्वागत और अभिनंदन का संदेश इसी भावना को प्रकट करता है कि प्रदेश अपनी ऐतिहासिक धरोहर पर गर्व करता है और उसे राष्ट्रीय गौरव के साथ जोड़कर आगे बढ़ाना चाहता है। इस अवसर को विकसित छत्तीसगढ़ के संकल्प, सांस्कृतिक संरक्षण और जनजातीय समाज के सम्मान की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बस्तर दशहरा: आस्था, परंपरा और सामुदायिक एकता का अद्वितीय उत्सव
बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह आयोजन अपनी विशिष्ट परंपराओं, धार्मिक आस्था, लोकविश्वास और सामुदायिक सहभागिता के कारण देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान रखता है। सामान्य रूप से दशहरा पर्व को भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और अधर्म पर धर्म की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, लेकिन बस्तर दशहरा की परंपरा का केंद्र स्थानीय देवी मां दंतेश्वरी की आराधना और बस्तर की विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताएं हैं। इस आयोजन में स्थानीय समाज, पारंपरिक सेवक समुदायों, जनजातीय समूहों और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों की भागीदारी इसकी जीवंतता को बनाए रखती है। बस्तर दशहरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों का कार्यक्रम नहीं, बल्कि क्षेत्र की सामूहिक स्मृति, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक निरंतरता का भी प्रतीक है। इसकी परंपराएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं और स्थानीय समुदायों ने इन्हें अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाए रखा है। इस उत्सव के अवसर पर पारंपरिक वेशभूषा, लोकवाद्य, लोकनृत्य, धार्मिक अनुष्ठान और सामूहिक आयोजन बस्तर की सांस्कृतिक समृद्धि को अभिव्यक्त करते हैं। यहां की परंपराओं में प्रकृति, आस्था और समुदाय के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है। बस्तर की सांस्कृतिक विरासत यह बताती है कि किसी समाज की पहचान केवल उसके ऐतिहासिक स्मारकों से नहीं बनती, बल्कि उसकी जीवित परंपराओं, सामाजिक व्यवहार और सांस्कृतिक मूल्यों से भी निर्मित होती है। बस्तर दशहरा इसी जीवंत विरासत का उदाहरण है। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु की गरिमामयी उपस्थिति इस आयोजन को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष महत्व प्रदान करने वाली मानी जा रही है। इससे देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों का ध्यान बस्तर की विशिष्ट परंपराओं और उनके संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका की ओर आकर्षित हो सकता है। ऐसे अवसर सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देते हैं और यह संदेश देते हैं कि भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में बस्तर दशहरा का स्थान विशिष्ट है, क्योंकि यह आयोजन अपनी परंपरागत संरचना और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के साथ आज भी व्यापक जनभागीदारी से जुड़ा हुआ है। इसकी निरंतरता यह दर्शाती है कि आधुनिक समय में भी परंपराएं समाज को जोड़ने, सामूहिक पहचान मजबूत करने और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से परिचित कराने का महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई हैं। राष्ट्रपति की उपस्थिति के अवसर पर बस्तर दशहरा की इस सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करना प्रदेश की गौरवशाली विरासत को सम्मान देने के समान है।
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