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जल, जमीन और जंगल की चिंता कौन करे? संरक्षण, समाधान और जवाबदेही का सवाल
प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए सरकार, उद्योग, समाज और नागरिकों को निभानी होगी अपनी जिम्मेदारी
लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS)
1. जल, जमीन और जंगल: जीवन के आधार और संरक्षण की साझा जिम्मेदारी
जल, जमीन और जंगल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन, सामाजिक व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, कृषि, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के आधार हैं। पानी के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं, उपजाऊ जमीन के बिना खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती और जंगलों के बिना पर्यावरणीय संतुलन, जैव विविधता तथा प्राकृतिक जल चक्र को सुरक्षित रखना कठिन है। प्रकृति ने इन तीनों संसाधनों को एक-दूसरे से जोड़कर ऐसा संतुलन बनाया है, जिसमें किसी एक की स्थिति बिगड़ने पर दूसरे पर भी प्रभाव पड़ता है। जंगलों का क्षरण मिट्टी के कटाव और जल स्रोतों के प्रभावित होने का कारण बन सकता है। जल स्रोतों के सूखने से कृषि, पशुपालन और ग्रामीण आजीविका प्रभावित होती है। जमीन की उर्वरता घटने पर खाद्य उत्पादन और किसानों की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ता है। इसलिए जल, जमीन और जंगल के संरक्षण को अलग-अलग विभागों या योजनाओं तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे समग्र पर्यावरणीय सुरक्षा और सामाजिक विकास के व्यापक प्रश्न के रूप में समझना आवश्यक है। इसके बावजूद वर्तमान समय में प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। अनियंत्रित दोहन, जल स्रोतों में अपशिष्ट का प्रवेश, भूजल का अत्यधिक उपयोग, अव्यवस्थित निर्माण, मिट्टी का कटाव, प्राकृतिक वनों का क्षरण और पर्यावरणीय प्रभावों की अनदेखी अनेक स्थानों पर समस्याओं को बढ़ा सकती है। विकास की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन विकास की दिशा और उसकी प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें प्रकृति की वहन क्षमता, स्थानीय परिस्थितियों और नागरिकों के अधिकारों को उचित महत्त्व दिया जाए। प्रश्न केवल यह नहीं है कि जल, जमीन और जंगल संकट में क्यों हैं, बल्कि यह भी है कि इनकी रक्षा के लिए कौन जिम्मेदार है, जिम्मेदारी कैसे तय होगी और संरक्षण के प्रयासों का वास्तविक परिणाम किस प्रकार मापा जाएगा। क्या यह काम केवल सरकार का है, क्या उद्योगों और परियोजना संचालकों की कोई जिम्मेदारी नहीं है, क्या स्थानीय निकायों और ग्राम सभाओं की भूमिका सीमित है और क्या नागरिक केवल शिकायत करने तक सीमित रहें? इन प्रश्नों का उत्तर सामूहिक जिम्मेदारी और स्पष्ट जवाबदेही में निहित है। सरकार की भूमिका कानून बनाने, नीतियाँ तैयार करने, संसाधन उपलब्ध कराने, पर्यावरणीय मानकों का पालन सुनिश्चित करने और उल्लंघनों पर नियमानुसार कार्रवाई करने की है। उद्योगों और व्यावसायिक संस्थानों को अपनी गतिविधियों से होने वाले पर्यावरणीय प्रभावों को नियंत्रित करना चाहिए। स्थानीय निकायों और पंचायतों को अपने अधिकार क्षेत्र में जल स्रोतों, सार्वजनिक भूमि, स्वच्छता और स्थानीय पर्यावरण से संबंधित जिम्मेदारियाँ निभानी चाहिए। नागरिकों की भूमिका पानी बचाने, कचरे का उचित प्रबंधन करने, सार्वजनिक संसाधनों को नुकसान से बचाने और पर्यावरणीय समस्याओं की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण है। सामाजिक संगठनों, शिक्षण संस्थानों और मीडिया को जन-जागरूकता तथा जनभागीदारी मजबूत करनी चाहिए। हालांकि साझा जिम्मेदारी का अर्थ यह नहीं कि सभी पक्षों की जवाबदेही एक जैसी है। जिस संस्था या व्यक्ति पर कानून के तहत जो दायित्व निर्धारित है, उसकी जिम्मेदारी उसी के अनुसार तय होनी चाहिए। किसी उद्योग के प्रदूषण के लिए केवल आम नागरिक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता और न ही नागरिकों की लापरवाही के कारण होने वाली हर समस्या का पूरा भार प्रशासन पर डालना उचित होगा। वास्तविक समाधान तभी संभव है, जब जिम्मेदारी का निर्धारण तथ्यों, अधिकारों, कानूनी प्रावधानों और संबंधित पक्षों की भूमिका के आधार पर हो। जल, जमीन और जंगल की चिंता केवल भावनात्मक अपील का विषय नहीं, बल्कि प्रशासनिक दक्षता, कानूनी अनुपालन, वैज्ञानिक योजना और सामाजिक न्याय से जुड़ा प्रश्न है। संरक्षण के प्रयासों में पारदर्शिता होनी चाहिए, योजनाओं का नियमित मूल्यांकन होना चाहिए और जनता को यह जानने का अवसर मिलना चाहिए कि उसके क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति क्या है तथा उन्हें सुरक्षित रखने के लिए क्या कार्रवाई की जा रही है। प्रकृति की रक्षा का अर्थ केवल आज की जरूरतों को पूरा करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन की बुनियादी परिस्थितियों को सुरक्षित रखना भी है। इसी दृष्टि से जल, जमीन और जंगल को सार्वजनिक हित, पर्यावरणीय सुरक्षा और भावी पीढ़ियों के अधिकारों से जोड़कर देखना समय की आवश्यकता है।
2. जल संरक्षण: पानी की उपलब्धता, गुणवत्ता और न्यायपूर्ण उपयोग पर ध्यान जरूरी
जल संकट को केवल वर्षा की कमी से जोड़ना समस्या के वास्तविक स्वरूप को सीमित कर देना होगा। किसी क्षेत्र में पानी की कमी के पीछे वर्षा के बदलते स्वरूप के साथ-साथ जल स्रोतों का कमजोर प्रबंधन, तालाबों और कुओं की उपेक्षा, भूजल का अत्यधिक दोहन, नदियों और नालों में प्रदूषण, जलग्रहण क्षेत्रों में बदलाव तथा उपलब्ध पानी के असमान उपयोग जैसी परिस्थितियाँ भी भूमिका निभा सकती हैं। वर्षा का पानी यदि भूमि में समुचित रूप से समाहित नहीं हो पाता और तेजी से बहकर बाहर निकल जाता है, तो भूजल पुनर्भरण की संभावनाएँ प्रभावित हो सकती हैं। दूसरी ओर, यदि पानी की खपत उसकी प्राकृतिक उपलब्धता से अधिक हो जाए, तो भूजल स्तर पर दबाव बढ़ सकता है। कृषि, घरेलू उपयोग, उद्योग और शहरी विकास सभी के लिए पानी आवश्यक है, इसलिए जल प्रबंधन में किसी एक क्षेत्र की जरूरत को ही प्राथमिकता देकर अन्य जरूरतों की अनदेखी करना दीर्घकालीन समाधान नहीं है। सबसे पहले स्थानीय जल स्रोतों की पहचान, उनकी वर्तमान स्थिति का आकलन और उनके संरक्षण की व्यावहारिक योजना बनानी चाहिए। तालाब, कुएँ, बावड़ियाँ, छोटी नदियाँ, प्राकृतिक नाले, जलग्रहण क्षेत्र और पारंपरिक जल संरचनाएँ अनेक स्थानों पर स्थानीय जल सुरक्षा का महत्त्वपूर्ण आधार हो सकती हैं। इनके संरक्षण के लिए अतिक्रमण, गाद जमाव, कचरे और प्रदूषण जैसी समस्याओं की पहचान करना आवश्यक है। जहाँ तकनीकी रूप से उचित हो, वहाँ तालाबों की सफाई, वर्षाजल संचयन, सोख्ता गड्ढों, पुनर्भरण संरचनाओं और जलग्रहण क्षेत्र के उपचार जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। लेकिन किसी भी जल संरचना पर काम करने से पहले उसकी भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक प्रवाह, मिट्टी की प्रकृति और स्थानीय पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन होना चाहिए। केवल निर्माण कर देना जल संरक्षण की सफलता का प्रमाण नहीं है। संरचना का रखरखाव, पानी की गुणवत्ता और वास्तविक जल उपलब्धता भी देखनी होगी। शहरी क्षेत्रों में छतों से वर्षाजल संचयन, जल रिसाव पर नियंत्रण, उपचारित जल का उपयुक्त पुनः उपयोग और वर्षा जल निकासी की बेहतर व्यवस्था महत्त्वपूर्ण हो सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में खेत तालाब, मेड़बंदी, उपयुक्त जलग्रहण उपचार और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप जल प्रबंधन से लाभ मिल सकता है। कृषि में पानी का विवेकपूर्ण उपयोग करने के लिए फसल चयन, सिंचाई का समय, मिट्टी में नमी बनाए रखने के उपाय और उपयुक्त सिंचाई तकनीकों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। हालांकि प्रत्येक तकनीक हर क्षेत्र के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं होती; उसका चयन स्थानीय जल उपलब्धता, फसल, लागत और किसानों की परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए। जल संरक्षण का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष उसकी गुणवत्ता है। यदि किसी नदी, तालाब या भूजल स्रोत में प्रदूषक पहुँच रहे हों, तो केवल पानी की मात्रा बढ़ाने से समस्या हल नहीं होगी। घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, ठोस कचरे से निकलने वाला दूषित पानी और कृषि गतिविधियों से बहकर आने वाले कुछ रसायन जल स्रोतों की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए अपशिष्ट जल का उचित संग्रहण और उपचार, नालों की निगरानी, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान तथा जल गुणवत्ता की नियमित वैज्ञानिक जाँच आवश्यक है। जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 ने जल प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण के लिए कानूनी ढाँचा उपलब्ध कराया है। इस व्यवस्था के अंतर्गत संबंधित प्राधिकरणों और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। जहाँ किसी इकाई या गतिविधि पर लागू मानकों अथवा स्वीकृति की शर्तों का पालन आवश्यक है, वहाँ संबंधित दायित्वों की निगरानी की जानी चाहिए। शिकायत मिलने पर केवल औपचारिक जवाब देना पर्याप्त नहीं है; शिकायत की प्रकृति के अनुसार स्थल निरीक्षण, नमूना संग्रह, प्रयोगशाला परीक्षण और अन्य आवश्यक जाँच की जरूरत हो सकती है। कार्रवाई वैज्ञानिक साक्ष्य और लागू कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए। यदि प्रदूषण की पुष्टि होती है, तो संबंधित कानूनों के तहत उचित कदम उठाए जाने चाहिए। नागरिकों को भी यह समझना होगा कि जल स्रोतों में कचरा डालना, घरेलू अपशिष्ट को बिना उचित व्यवस्था के छोड़ना और सार्वजनिक जल संरचनाओं को नुकसान पहुँचाना स्थानीय जल सुरक्षा को कमजोर कर सकता है। दूसरी ओर, जल संरक्षण का पूरा भार केवल लोगों पर डाल देना भी उचित नहीं है। प्रशासन को सुरक्षित पेयजल, जल संरचनाओं के रखरखाव, सीवेज प्रबंधन और प्रभावी निगरानी की जिम्मेदारी निभानी होगी। उद्योगों को अपने अपशिष्ट का निर्धारित मानकों के अनुसार उपचार करना चाहिए और संबंधित शर्तों का पालन करना चाहिए। जल संरक्षण योजनाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाई जानी चाहिए, क्योंकि वे अपने क्षेत्र के पुराने जल स्रोतों, पानी के प्रवाह और मौसमी बदलावों के बारे में उपयोगी जानकारी रखते हैं। जल संकट के समाधान के लिए उपलब्धता, गुणवत्ता और न्यायपूर्ण वितरण—तीनों को साथ लेकर चलना आवश्यक है। पानी की प्रत्येक बूँद का महत्त्व तभी सुरक्षित होगा, जब जल प्रबंधन केवल संकट के समय की प्रतिक्रिया न रहकर नियमित प्रशासनिक और सामाजिक प्राथमिकता बने।
3. जमीन की रक्षा: कृषि, आजीविका, पर्यावरण और जन-अधिकारों के बीच संतुलन
जमीन को अक्सर संपत्ति, निर्माण स्थल या आर्थिक निवेश के रूप में देखा जाता है, जबकि उसका महत्त्व इससे कहीं व्यापक है। भूमि खाद्य उत्पादन, ग्रामीण रोजगार, पशुपालन, प्राकृतिक आवास, जल पुनर्भरण और सामाजिक सुरक्षा का आधार है। उपजाऊ मिट्टी बनने में लंबा समय लगता है, लेकिन अनुचित उपयोग, कटाव, प्रदूषण और भूमि प्रबंधन की कमी से उसकी गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। जब खेती योग्य भूमि का उपयोग बिना समुचित योजना के बदलता है, तो स्थानीय खाद्य उत्पादन, किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। इसी प्रकार, निर्माण कार्यों के दौरान मिट्टी का कटाव, जल निकासी मार्गों का अवरोध और प्राकृतिक ढलानों में बदलाव आसपास के क्षेत्रों में पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए भूमि उपयोग की योजना बनाते समय केवल तत्काल आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि भूमि की गुणवत्ता, जल स्रोतों की स्थिति, प्राकृतिक जोखिम, स्थानीय आजीविका और भविष्य की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। भूमि संरक्षण का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना है। इसके लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार मिट्टी की जाँच, संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन, जैविक पदार्थों का उचित उपयोग, फसल चक्र, भूमि पर वनस्पति आवरण और कटाव नियंत्रण जैसे उपाय उपयोगी हो सकते हैं। ढलान वाले क्षेत्रों में वर्षा के पानी के तेज बहाव को नियंत्रित करने और मिट्टी को बहने से रोकने के उपाय विशेष महत्त्व रखते हैं। लेकिन कोई भी उपाय बिना स्थानीय परिस्थिति समझे लागू नहीं किया जाना चाहिए। भूमि की प्रकृति, वर्षा, फसल, सिंचाई व्यवस्था और किसानों की आर्थिक क्षमता के अनुसार योजना बनाना आवश्यक है। भूमि संरक्षण का संबंध शहरी नियोजन से भी है। शहरों के विस्तार के दौरान जल निकासी मार्गों, प्राकृतिक जलाशयों, हरित क्षेत्रों और आसपास की कृषि भूमि पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन होना चाहिए। निर्माण योजनाओं में जल निकासी की पर्याप्त व्यवस्था न होने से जलभराव की समस्या बढ़ सकती है। प्राकृतिक नालों और जलग्रहण क्षेत्रों को बाधित करने से वर्षा के पानी का प्रवाह बदल सकता है। इसलिए विकास परियोजनाओं की योजना में स्थानीय पर्यावरणीय परिस्थितियों को शामिल करना जरूरी है। सड़क, उद्योग, खनन, ऊर्जा परियोजना या अन्य सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भूमि अर्जन की स्थिति में प्रभावित लोगों के अधिकारों का सम्मान भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। भूमि केवल बाजार मूल्य वाली संपत्ति नहीं होती; अनेक परिवारों के लिए वह रोजगार, सामाजिक पहचान, स्थानीय संबंधों और पीढ़ियों से चले आ रहे जीवन का आधार होती है। भूमि से विस्थापन होने पर परिवारों को केवल आर्थिक क्षति ही नहीं, बल्कि आजीविका, आवास, सामाजिक संबंधों और स्थानीय संसाधनों तक पहुँच से जुड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए ऐसी परियोजनाओं की प्रक्रिया में पारदर्शिता, आवश्यक जानकारी, लागू कानूनी प्रक्रियाओं का पालन और प्रभावित लोगों की परिस्थितियों का उचित आकलन होना चाहिए। भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 उन मामलों में महत्त्वपूर्ण कानूनी संदर्भ है जहाँ वह लागू होता है। संबंधित परियोजना, भूमि की प्रकृति और लागू प्रावधानों के अनुसार प्रतिकर, पुनर्वासन, पुनर्व्यवस्थापन तथा अन्य प्रक्रियाओं की जाँच आवश्यक है। इस कानून का उल्लेख करने का अर्थ यह नहीं है कि हर भूमि विवाद या हर प्रकार का अधिग्रहण एक ही प्रक्रिया से संचालित होता है; संबंधित मामले में लागू कानून और संशोधनों की अलग से पुष्टि की जानी चाहिए। विकास परियोजनाओं के औचित्य का मूल्यांकन करते समय यह देखना भी जरूरी है कि उनसे मिलने वाला लाभ किसे मिलेगा और उनकी लागत कौन वहन करेगा। यदि किसी परियोजना से व्यापक सार्वजनिक लाभ होने की संभावना है, तब भी प्रभावित परिवारों की वैधानिक सुरक्षा और आजीविका से जुड़े प्रश्नों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। कमजोर समुदायों पर अनुचित बोझ डालकर विकास की उपलब्धि का दावा करना सामाजिक न्याय के सिद्धांत के अनुरूप नहीं होगा। भूमि से संबंधित निर्णयों में स्थानीय समुदायों की जानकारी और भागीदारी को उचित स्थान दिया जाना चाहिए। किसानों, भूमिहीन मजदूरों, ग्रामीण परिवारों और अन्य प्रभावित समूहों की आवश्यकताएँ अलग-अलग हो सकती हैं, इसलिए एक ही समाधान सभी पर लागू नहीं किया जा सकता। भूमि संरक्षण के लिए प्रशासनिक विभागों के बीच समन्वय, भू-अभिलेखों की पारदर्शिता, पर्यावरणीय मानकों का पालन और शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है। किसी भी अनियमितता का निष्कर्ष तथ्यों और लागू कानून के आधार पर निकाला जाना चाहिए। इसी प्रकार, भूमि संरक्षण को केवल प्रतिबंधों का विषय बनाने के बजाय बेहतर योजना, टिकाऊ कृषि, प्राकृतिक संसाधनों के पुनर्जीवन और प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा से जोड़ना चाहिए। जमीन बचेगी, उसकी उर्वरता सुरक्षित रहेगी और भूमि उपयोग के निर्णय न्यायपूर्ण होंगे, तभी विकास का लाभ व्यापक समाज तक पहुँच सकेगा।
4. जंगलों का संरक्षण: प्राकृतिक वन, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के अधिकार
जंगल पर्यावरणीय संतुलन के महत्त्वपूर्ण आधार हैं। वे अनेक वन्यजीवों और वनस्पतियों के प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराते हैं, मिट्टी के संरक्षण में योगदान देते हैं और जल चक्र तथा स्थानीय जलवायु से जुड़े अनेक प्राकृतिक कार्यों में भूमिका निभाते हैं। वन क्षेत्र अनेक ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की आजीविका, परंपराओं तथा स्थानीय जीवन व्यवस्था से भी जुड़े होते हैं। जंगलों से मिलने वाले संसाधन, जहाँ उनका उपयोग कानूनी और टिकाऊ तरीके से किया जाता है, स्थानीय परिवारों के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रख सकते हैं। इसलिए जंगलों की रक्षा को केवल पेड़ों की संख्या बढ़ाने तक सीमित करना उचित नहीं है। प्राकृतिक वन की संरचना, स्थानीय प्रजातियों की विविधता, वन्यजीवों के आवास, मिट्टी की स्थिति, जल स्रोतों और समुदायों के अधिकारों को साथ लेकर संरक्षण की योजना बनानी चाहिए। पौधरोपण उपयोगी उपाय हो सकता है, लेकिन हर जगह एक ही प्रकार के पौधे लगा देना प्राकृतिक वन के संरक्षण के समान नहीं है। किसी क्षेत्र की पारिस्थितिकी के अनुरूप स्थानीय प्रजातियों का चयन, पौधों की देखभाल, सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था और उनके जीवित रहने का मूल्यांकन आवश्यक है। पौधरोपण के बाद यदि पौधे सूख जाएँ, क्षेत्र की प्राकृतिक वनस्पति को नुकसान पहुँचे या लगाए गए पौधे स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल न हों, तो केवल पौधों की संख्या बताकर सफलता का दावा नहीं किया जा सकता। जंगलों के संरक्षण में प्राकृतिक पुनर्जनन, वन्यजीवों के आवास की सुरक्षा और वन क्षेत्र के दीर्घकालीन स्वास्थ्य का मूल्यांकन महत्त्वपूर्ण है। वन भूमि का उपयोग बदलने वाली परियोजनाओं में लागू कानूनी प्रावधानों, आवश्यक स्वीकृतियों और निर्धारित शर्तों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए। वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980, अपने लागू प्रावधानों और समय-समय पर हुए संशोधनों के साथ, वन भूमि के उपयोग और संरक्षण से संबंधित कानूनी व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। किसी विशेष परियोजना पर कौन-से प्रावधान लागू होते हैं, यह उसके तथ्यों, भूमि की स्थिति और वर्तमान कानून के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए। वन संरक्षण का प्रश्न केवल कानूनी अनुमति तक सीमित नहीं है; परियोजनाओं के संभावित पर्यावरणीय प्रभाव, स्थानीय जल स्रोतों, जैव विविधता और समुदायों की आजीविका पर पड़ने वाले असर का भी गंभीरता से आकलन होना चाहिए। जहाँ कानून के अनुसार पर्यावरणीय मूल्यांकन, अनुमति या अन्य प्रक्रिया आवश्यक हो, वहाँ उसका पालन केवल औपचारिकता के रूप में नहीं, बल्कि वास्तविक जोखिमों को समझने और कम करने के उद्देश्य से होना चाहिए। जंगलों से जुड़े मामलों में स्थानीय समुदायों के अधिकार भी महत्त्वपूर्ण हैं। अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006, निर्धारित पात्रता और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार पात्र व्यक्तियों तथा समुदायों के वन अधिकारों की मान्यता की व्यवस्था करता है। इस कानून का उद्देश्य वन पर निर्भर समुदायों के ऐतिहासिक अधिकारों और आजीविका से जुड़े प्रश्नों को कानूनी ढाँचे में संबोधित करना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक दावे को बिना जाँच के स्वीकार किया जाए या हर परिस्थिति में समान अधिकार लागू हों; दावों का निर्धारण कानून में निर्धारित पात्रता, साक्ष्य और प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। इसी तरह, वन संरक्षण के नाम पर पात्र समुदायों के अधिकारों की अनदेखी करना भी उचित नहीं है। संरक्षण और अधिकारों को परस्पर विरोधी मानने के बजाय ऐसे समाधान विकसित करने चाहिए, जिनमें प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा और समुदायों की गरिमा दोनों सुरक्षित रहें। ग्राम सभा और स्थानीय समुदायों की भूमिका संबंधित कानूनों तथा परिस्थितियों के अनुसार सुनिश्चित की जानी चाहिए। स्थानीय लोग वन क्षेत्र की परिस्थितियों, मौसमी बदलावों, वनस्पतियों, जल स्रोतों और वन्यजीवों की गतिविधियों के बारे में उपयोगी जानकारी रखते हैं। उनकी भागीदारी संरक्षण योजनाओं को अधिक व्यावहारिक और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप बना सकती है। जंगलों में आग की रोकथाम, अवैध कटाई पर नियंत्रण, वन्यजीव आवासों की सुरक्षा, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग के लिए विभागीय प्रयासों के साथ स्थानीय सहयोग आवश्यक है। यदि जंगलों के आसपास रहने वाले समुदायों को संरक्षण से अलग कर दिया जाए, उनकी समस्याओं की सुनवाई न हो या वैकल्पिक आजीविका की जरूरतों पर ध्यान न दिया जाए, तो संरक्षण की प्रक्रिया में अविश्वास पैदा हो सकता है। दूसरी ओर, प्राकृतिक वन के अनियंत्रित दोहन को केवल स्थानीय परंपरा या आर्थिक आवश्यकता का नाम देकर अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। हर गतिविधि का मूल्यांकन संबंधित कानून, पर्यावरणीय प्रभाव और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए। वन विभाग, प्रशासन, स्थानीय निकाय, ग्राम सभाएँ, सामाजिक संगठन और समुदायों के बीच नियमित संवाद तथा स्पष्ट जिम्मेदारी संरक्षण को मजबूत कर सकते हैं। वन क्षेत्र में किसी अनियमितता की शिकायत होने पर निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए और कार्रवाई साक्ष्य तथा लागू कानून के अनुसार की जानी चाहिए। जंगलों की सफलता का मूल्यांकन केवल लगाए गए पौधों या खर्च की गई राशि से नहीं, बल्कि प्राकृतिक वन की स्थिति, जैव विविधता, वन्यजीव आवास, जल और मिट्टी की सुरक्षा तथा स्थानीय समुदायों के अधिकारों के सम्मान से होना चाहिए। जंगल बचाना भविष्य बचाना है, लेकिन यह कार्य तभी स्थायी हो सकता है जब संरक्षण वैज्ञानिक समझ, कानूनी जवाबदेही और सामाजिक न्याय के साथ आगे बढ़े।
5. संविधान, सरकार, उद्योग और नागरिक: किसकी क्या जवाबदेही होनी चाहिए?
भारत में पर्यावरण संरक्षण केवल प्रशासनिक नीति का विषय नहीं है, बल्कि संविधान और विभिन्न कानूनों से भी जुड़ा हुआ है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार तथा वन एवं वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए प्रयास करने का निर्देश देता है। अनुच्छेद 51A(g) प्रत्येक नागरिक के मूल कर्तव्यों में प्राकृतिक पर्यावरण—जिसमें वन, झीलें, नदियाँ और वन्यजीव शामिल हैं—की रक्षा और सुधार तथा जीवित प्राणियों के प्रति करुणा रखने की बात करता है। इन प्रावधानों का व्यापक संदेश यह है कि पर्यावरण की सुरक्षा शासन और नागरिक जीवन दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है। हालांकि संवैधानिक प्रावधानों की प्रकृति और उनके कानूनी प्रभाव को समझते हुए ही उनका उपयोग किया जाना चाहिए। राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व और नागरिकों के मूल कर्तव्य पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शक हैं, जबकि विशिष्ट दायित्व और कार्रवाई संबंधित कानूनों तथा लागू नियमों के अनुसार निर्धारित होते हैं। सरकार और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी में पर्यावरणीय कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन, संसाधनों का उचित प्रबंधन, निगरानी व्यवस्था, वैज्ञानिक जानकारी का उपयोग और शिकायतों पर नियमानुसार कार्रवाई शामिल है। सरकारी योजनाओं की घोषणा के बाद यह देखना भी आवश्यक है कि उनका क्रियान्वयन किस स्तर पर हुआ, किन क्षेत्रों में बाधाएँ आईं और क्या निर्धारित उद्देश्य प्राप्त हुए। यदि किसी जल स्रोत की सफाई के लिए राशि खर्च की गई है, तो उसके परिणामों की जाँच होनी चाहिए। यदि पौधरोपण किया गया है, तो पौधों के जीवित रहने और क्षेत्रीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव का मूल्यांकन होना चाहिए। यदि प्रदूषण नियंत्रण के लिए निर्देश जारी किए गए हैं, तो उनका अनुपालन किस हद तक हुआ, यह भी स्पष्ट होना चाहिए। प्रशासनिक जवाबदेही का अर्थ केवल रिपोर्ट तैयार करना नहीं, बल्कि परिणामों को मापना, कमियों को स्वीकार करना और आवश्यक सुधार करना है। उद्योगों तथा परियोजना संचालकों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट होनी चाहिए। जिन गतिविधियों पर पर्यावरणीय अनुमति, प्रदूषण नियंत्रण, अपशिष्ट उपचार या अन्य शर्तें लागू हैं, उन्हें उन शर्तों का पालन करना चाहिए। उत्पादन, रोजगार और आर्थिक विकास महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके नाम पर प्रदूषण या प्राकृतिक संसाधनों को होने वाले नुकसान की अनदेखी नहीं की जा सकती। संबंधित उद्योगों को अपनी गतिविधियों से जुड़े जोखिमों का आकलन करना, निर्धारित नियंत्रण उपाय अपनाना और लागू मानकों के अनुरूप संचालन करना चाहिए। यदि किसी उल्लंघन की शिकायत आती है, तो उसकी जाँच निष्पक्ष रूप से की जानी चाहिए। आरोप लगने मात्र से किसी संस्था को दोषी घोषित करना उचित नहीं है, लेकिन विश्वसनीय साक्ष्य मिलने पर कानून के अनुसार कार्रवाई में अनावश्यक देरी भी नहीं होनी चाहिए। नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही आवश्यक है, हालांकि नागरिकों पर उनकी क्षमता और कानूनी दायित्व से परे जिम्मेदारी नहीं डाली जानी चाहिए। पानी का विवेकपूर्ण उपयोग, कचरे का उचित निपटान, सार्वजनिक जल स्रोतों को नुकसान से बचाना, स्थानीय हरित क्षेत्रों की देखभाल और पर्यावरणीय समस्याओं की सूचना संबंधित प्राधिकरणों को देना उपयोगी कदम हैं। नागरिकों को अपने अधिकारों और शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी होनी चाहिए। सामाजिक संगठन पर्यावरणीय शिक्षा, समुदायों की भागीदारी, स्थानीय समस्याओं का दस्तावेजीकरण और संबंधित अधिकारियों के साथ संवाद के माध्यम से योगदान दे सकते हैं। मीडिया की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह पर्यावरणीय समस्याओं को सार्वजनिक विमर्श में स्थान दे सकता है और योजनाओं के परिणामों पर सवाल उठा सकता है। लेकिन मीडिया रिपोर्टिंग में तथ्यों की पुष्टि, आरोपों और सिद्ध तथ्यों के बीच अंतर तथा संबंधित पक्षों का दृष्टिकोण शामिल करना आवश्यक है। स्थानीय निकायों और पंचायतों को अपने अधिकार क्षेत्र में उपलब्ध कानूनी शक्तियों के अनुसार संरक्षण योजनाओं, स्वच्छता, जल प्रबंधन और जनभागीदारी को आगे बढ़ाना चाहिए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तक तक सीमित न रखकर स्थानीय जल स्रोतों, कचरा प्रबंधन, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति से जोड़ा जा सकता है। युवा वर्ग स्थानीय स्तर पर सर्वेक्षण, जागरूकता गतिविधियों और उपयुक्त संरक्षण अभियानों में भाग ले सकता है। फिर भी स्वयंसेवी गतिविधियों को सरकारी दायित्वों का विकल्प नहीं बनाया जाना चाहिए। नागरिक सहभागिता प्रशासन को मजबूत कर सकती है, लेकिन कानून लागू करने और नियामक निगरानी की जिम्मेदारी संबंधित संस्थाओं की ही रहती है। पर्यावरण संरक्षण की जवाबदेही तय करते समय तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए—किसकी कानूनी जिम्मेदारी थी, वास्तव में क्या हुआ और उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं। किसी भी कार्रवाई में निष्पक्षता, पारदर्शिता और उचित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। पर्यावरणीय मामलों में राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत स्थापित राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों पर विचार कर सकता है। हालाँकि प्रत्येक पर्यावरणीय विवाद स्वतः उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता; संबंधित कानून, विवाद की प्रकृति और लागू प्रक्रिया के अनुसार उचित मंच निर्धारित होता है। इसलिए लोगों को शिकायत दर्ज करने से पहले उपलब्ध कानूनी विकल्पों और प्रक्रियाओं की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। संविधान, कानून और नागरिक भागीदारी तभी प्रभावी होंगे, जब उनका उपयोग जिम्मेदारी, प्रमाण और पारदर्शिता के साथ किया जाए।
6. समाधान और निष्कर्ष: घोषणाओं से आगे बढ़कर परिणाम आधारित संरक्षण जरूरी
जल, जमीन और जंगल की रक्षा के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है कि संरक्षण को अल्पकालिक अभियान के बजाय निरंतर सार्वजनिक प्राथमिकता बनाया जाए। केवल विश्व पर्यावरण दिवस पर पौधे लगाना, जल संरक्षण सप्ताह में जागरूकता कार्यक्रम करना या किसी योजना की घोषणा करना पर्याप्त नहीं है। इन प्रयासों की वास्तविक सफलता तभी सामने आती है, जब वर्ष भर उनकी देखभाल हो, स्थानीय समस्याओं का नियमित आकलन किया जाए और परिणामों के आधार पर योजनाओं में सुधार किया जाए। जल संरक्षण के लिए प्रत्येक क्षेत्र की जल उपलब्धता और जरूरतों का आकलन होना चाहिए। तालाबों, कुओं, नदियों और प्राकृतिक नालों की स्थिति का रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है। जहाँ आवश्यक और तकनीकी रूप से उचित हो, वहाँ वर्षाजल संचयन तथा भूजल पुनर्भरण के उपाय अपनाए जा सकते हैं। जल गुणवत्ता की नियमित जाँच और प्रदूषण के स्रोतों की पहचान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। शहरों में सीवेज उपचार और वर्षा जल निकासी की व्यवस्था को बेहतर बनाने की आवश्यकता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय जल संरचनाओं, कृषि जल प्रबंधन और जलग्रहण क्षेत्र के संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए। जल स्रोतों से संबंधित शिकायतों के लिए स्पष्ट प्रक्रिया और जिम्मेदार अधिकारी की जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि नागरिकों को यह पता रहे कि समस्या किस विभाग के सामने रखनी है और उसकी प्रगति की जानकारी कैसे प्राप्त करनी है। जमीन के संरक्षण के लिए भूमि उपयोग की योजना, मिट्टी की गुणवत्ता, कृषि भूमि की सुरक्षा, प्राकृतिक जल निकासी और स्थानीय आजीविका के बीच संतुलन स्थापित करना जरूरी है। विकास परियोजनाओं के निर्णयों में लागू कानूनी प्रक्रियाओं और प्रभावित समुदायों के अधिकारों का सम्मान होना चाहिए। भूमि अर्जन और पुनर्वासन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता तथा उचित प्रक्रिया सुनिश्चित की जानी चाहिए। किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए टिकाऊ भूमि प्रबंधन के बारे में व्यावहारिक जानकारी तथा तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना भी महत्त्वपूर्ण है। जंगलों के संरक्षण में प्राकृतिक वन की स्थिति, स्थानीय जैव विविधता, वन्यजीव आवास, पौधों के जीवित रहने और समुदायों के अधिकारों का नियमित मूल्यांकन होना चाहिए। पौधरोपण अभियानों के साथ दीर्घकालीन देखभाल और स्थानीय प्रजातियों की उपयुक्तता पर ध्यान देना चाहिए। वन क्षेत्र में किसी परियोजना या गतिविधि से संबंधित निर्णय लेते समय लागू कानून, पर्यावरणीय प्रभाव और समुदायों की परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। संरक्षण योजनाओं को सफल बनाने के लिए पंचायतों, स्थानीय निकायों, संबंधित विभागों, शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों और समुदायों के बीच समन्वय बढ़ाया जाना चाहिए। स्कूलों में विद्यार्थियों को अपने क्षेत्र के जल स्रोतों, स्थानीय पेड़-पौधों और कचरा प्रबंधन की जानकारी देने वाले कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। सामाजिक संगठन जनजागरूकता के साथ-साथ स्थानीय समस्याओं के दस्तावेजीकरण और समाधान के लिए संवाद की भूमिका निभा सकते हैं। नागरिकों को भी यह समझना होगा कि सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा में उनका व्यवहार महत्त्वपूर्ण है। अनावश्यक पानी की बर्बादी रोकना, कचरे को जल स्रोतों में न डालना, सार्वजनिक स्थानों को साफ रखना और पर्यावरणीय नियमों का पालन करना ऐसे कदम हैं जिन्हें व्यक्ति अपने स्तर पर अपना सकता है। लेकिन जब समस्या बड़े पैमाने पर प्रदूषण, भूमि उपयोग परिवर्तन या वन क्षेत्र से जुड़ी हो, तब व्यक्तिगत प्रयासों के साथ संस्थागत कार्रवाई भी आवश्यक है। जवाबदेही को प्रभावी बनाने के लिए संरक्षण योजनाओं की प्रगति और परिणामों की नियमित समीक्षा होनी चाहिए। मूल्यांकन में यह देखा जाना चाहिए कि जल स्रोतों की स्थिति में क्या बदलाव आया, जल गुणवत्ता के आँकड़े क्या बताते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकने के प्रयास कितने प्रभावी रहे, प्राकृतिक वन और स्थानीय जैव विविधता की स्थिति कैसी है तथा प्रभावित समुदायों की आजीविका और अधिकार सुरक्षित हैं या नहीं। केवल बजट खर्च, आयोजित बैठकों, जारी आदेशों या लगाए गए पौधों की संख्या को सफलता का अंतिम पैमाना नहीं बनाया जाना चाहिए। परिणामों की जानकारी यथासंभव सरल भाषा में सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि नागरिक योजनाओं की प्रगति समझ सकें। जहाँ अपेक्षित परिणाम न मिलें, वहाँ कारणों की जाँच और सुधार की कार्रवाई होनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध कार्रवाई तथ्यों, साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर होनी चाहिए; साथ ही, शिकायत करने वाले नागरिकों को निष्पक्ष प्रक्रिया और उचित सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए। प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा को सामाजिक न्याय से अलग नहीं किया जा सकता। स्वच्छ पानी, सुरक्षित पर्यावरण और स्वस्थ प्राकृतिक परिस्थितियाँ जीवन की गुणवत्ता से जुड़ी हैं। जिन समुदायों की आजीविका सीधे जंगल, जमीन या स्थानीय जल स्रोतों पर निर्भर है, उनकी समस्याओं और अधिकारों को संरक्षण योजनाओं में उचित स्थान मिलना चाहिए। इसी प्रकार, आर्थिक विकास और रोजगार की आवश्यकता को भी स्वीकार करते हुए ऐसी योजनाएँ तैयार करनी चाहिए, जिनमें पर्यावरणीय जोखिमों को कम किया जा सके। विकास का अर्थ केवल सड़कें, इमारतें, उद्योग और उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि नागरिकों को स्वच्छ जल, सुरक्षित आवास, उपजाऊ भूमि, स्वस्थ पर्यावरण और सम्मानजनक आजीविका उपलब्ध कराने की दिशा में प्रगति करना भी है। यदि किसी परियोजना से आर्थिक लाभ प्राप्त होता है, लेकिन उसके कारण प्राकृतिक संसाधनों को गंभीर नुकसान पहुँचता है और प्रभावित लोगों की समस्याएँ बढ़ती हैं, तो उसके पर्यावरणीय तथा सामाजिक प्रभावों की गंभीर समीक्षा आवश्यक है। प्रकृति की कीमत को विकास की गणना से बाहर रखना भविष्य की चुनौतियों को बढ़ा सकता है। इसलिए विकास की योजना बनाते समय पर्यावरणीय सुरक्षा को बाधा नहीं, बल्कि दीर्घकालीन स्थिरता की आवश्यक शर्त के रूप में देखना चाहिए। जल, जमीन और जंगल की चिंता सरकार, उद्योग, समाज और नागरिक—सभी को करनी है, लेकिन प्रत्येक पक्ष की जवाबदेही उसकी भूमिका, क्षमता और कानूनी दायित्व के अनुरूप होनी चाहिए। सरकार को नियमों के पालन और प्रभावी निगरानी की जिम्मेदारी निभानी होगी; उद्योगों को लागू पर्यावरणीय मानकों का पालन करना होगा; स्थानीय निकायों और पंचायतों को अपने क्षेत्र की समस्याओं पर काम करना होगा; और नागरिकों को प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा में जिम्मेदार भागीदारी करनी होगी। सामाजिक संगठनों और मीडिया को जागरूकता, संवाद और तथ्य आधारित निगरानी को मजबूत करना चाहिए। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि संरक्षण की प्रक्रिया में न तो कानून को केवल कागज तक सीमित रखा जाए और न ही किसी आरोप को बिना जाँच के अंतिम निष्कर्ष मान लिया जाए। निष्पक्ष जाँच, वैज्ञानिक जानकारी, पारदर्शी निर्णय और कानून के अनुसार कार्रवाई ही विश्वसनीय जवाबदेही का आधार हैं। जल बचेगा तो जीवन और आजीविका सुरक्षित रखने की संभावना मजबूत होगी; जमीन की उर्वरता बचेगी तो खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा मिलेगा; जंगल सुरक्षित रहेंगे तो जैव विविधता, प्राकृतिक जल चक्र और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में मदद मिलेगी। यह केवल वर्तमान पीढ़ी का सवाल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और रहने योग्य पृथ्वी छोड़ने का दायित्व भी है। प्रकृति के संरक्षण का संकल्प तभी सार्थक होगा, जब वह व्यवहार, नीति, प्रशासनिक कार्रवाई और सामाजिक भागीदारी में दिखाई दे। इसलिए आज आवश्यकता है कि जल, जमीन और जंगल की रक्षा को साझा चिंता के साथ-साथ स्पष्ट जवाबदेही का विषय बनाया जाए। प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखना किसी एक व्यक्ति, संस्था या विभाग का अकेला काम नहीं है, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सामूहिक जिम्मेदारी के नाम पर किसी की वास्तविक जिम्मेदारी धुँधली न हो। संरक्षण का उद्देश्य केवल नुकसान रोकना नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग, स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा और बेहतर जीवन परिस्थितियों का निर्माण करना भी है। जब योजनाओं का मूल्यांकन वास्तविक परिणामों से होगा, शिकायतों की निष्पक्ष जाँच होगी और कानून का पालन सुनिश्चित किया जाएगा, तभी जल, जमीन और जंगल की सुरक्षा के प्रयास प्रभावी बन सकेंगे। प्रकृति सुरक्षित होगी, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।
प्रमुख संदर्भ
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भारत का संविधान—अनुच्छेद 48A और 51A(g)।
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जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974।
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वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 तथा लागू संशोधन।
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अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006।
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भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013।
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राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010।









