
विशेष कविता रिपोर्ट | समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में जब भावनात्मक अतिरेक, सतही आशावाद और सुरक्षित अभिव्यक्तियाँ अधिक दिखाई देने लगी हैं, ऐसे समय में कवि संजीव जैन की कविता “बंद कर दो अब…” एक साहसिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। यह कविता न केवल एक रचनात्मक अभिव्यक्ति है, बल्कि समय, समाज और स्वयं से सीधा संवाद करती हुई एक कठोर चेतावनी भी है।
यह कविता पाठक को आराम नहीं देती, बल्कि झकझोरती है। यह आत्मालोचन, सामाजिक विवेक और नैतिक पुनर्मूल्यांकन की माँग करती है। दैनिक समाचार की शैली में देखें तो यह रचना आज के समाज के लिए एक सम्पादकीय वक्तव्य की तरह है—जिसमें कवि प्रश्न भी पूछता है, उत्तर भी सुझाता है और अंत में निर्णय का दायित्व पाठक पर छोड़ देता है।
परछाइयों से प्यार: भ्रम और दिखावे पर पहला प्रहार
“परछाइयों से प्यार जताना—बंद कर दो अब,
पलकों के कालीन बिछाना—बंद कर दो अब।”
कविता की शुरुआत ही एक तीखे बिंब से होती है। परछाइयाँ यहाँ वास्तविकता का भ्रम हैं—वह झूठा सहारा, जो सच का स्थान ले चुका है। कवि पूछता है कि आखिर कब तक हम वास्तविकता से बचते रहेंगे? कब तक हम आंखें मूंदकर झूठी तसल्ली ओढ़े रहेंगे?
पलकों के कालीन बिछाना—यह वाक्य सामाजिक पाखंड और बनावटी संवेदनाओं का प्रतीक है। यह उस दिखावटी करुणा की ओर संकेत करता है, जो केवल शब्दों और औपचारिकताओं तक सीमित रह जाती है। कवि स्पष्ट रूप से कहता है—अब यह सब बंद होना चाहिए।
संघर्ष बनाम समझौता: सपनों की सच्ची राह
“सपने दुश्मन—लड़ कर ही जीते जाते जाएँगे,
समझौतों के गीत सुनाना—बंद कर दो अब।”
यह कविता का सबसे सशक्त वैचारिक खंड है। आज का समाज ‘समझौते’ को बुद्धिमानी और ‘संघर्ष’ को मूर्खता समझने लगा है। कवि इस धारणा को सिरे से खारिज करता है। वह कहता है—सपने कोई दान नहीं हैं, उन्हें हासिल करना पड़ता है।
यह पंक्ति युवाओं के लिए एक सीधा संदेश है कि संघर्ष से भागना आत्मसमर्पण है। समझौतों के गीत सुनाकर पीढ़ियों को निष्क्रिय बनाना एक खतरनाक सामाजिक प्रवृत्ति है, जिसे अब रोका जाना चाहिए।
वक़्त और वक़्त की पहचान
“वक्त आने पर—वक़्त बदलता है सबका ही,
देख कर हुलिया—राय बनाना बंद कर दो अब।”
यहाँ कवि सामाजिक पूर्वाग्रहों पर चोट करता है। किसी व्यक्ति को उसके पहनावे, रूप या बाहरी छवि से आंकने की प्रवृत्ति आज भी हमारे समाज में गहराई से मौजूद है।
कवि याद दिलाता है कि समय सबसे बड़ा न्यायाधीश है। जो आज साधारण दिखता है, वही कल असाधारण हो सकता है। इसलिए हुलिया देखकर राय बनाना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि समाज को विभाजित करने वाला भी है।
पीछे मुड़कर देखने की व्यर्थता
“पीछे जाकर किसे मिला है—कोई मक़सद,
बीच राह से लौट कर आना—बंद कर दो अब।”
यह पंक्तियाँ आत्मविश्वास और निरंतरता का संदेश देती हैं। आज की पीढ़ी में असफलता का डर इतना गहरा है कि लोग बीच रास्ते से ही लौट जाते हैं। कवि कहता है—पीछे मुड़कर कुछ नहीं मिलता, सिवाय पछतावे के।
यह पंक्ति जीवन, करियर, रिश्तों और संघर्ष—हर क्षेत्र में लागू होती है। यह आत्म-प्रेरणा का सशक्त घोष है।
ठहराव का सड़ना: जीवन दर्शन की गहराई
“ठहरे पानी का सड़ जाना—सबने देखा है,
बंद कुएँ में बंद हो जाना—बंद कर दो अब।”
यह कविता का सबसे दार्शनिक और प्रभावशाली बिंब है। ठहरा पानी जीवन की जड़ता का प्रतीक है। जब विचार, समाज और व्यक्ति आगे बढ़ना छोड़ देते हैं, तब सड़न शुरू हो जाती है।
बंद कुआँ उस मानसिकता को दर्शाता है, जो स्वयं में सिमटकर बाहरी दुनिया से कट जाती है। कवि इस आत्म-कैद के खिलाफ आवाज उठाता है।
प्रकृति से सीख और मज़हब की दीवारें
“नदी, हवा, पंछी, जुगनू से कुछ तो सीखो,
मज़हब की दीवार बनाना—बंद कर दो अब।”
यहाँ कविता एक व्यापक मानवीय स्तर पर पहुंच जाती है। कवि प्रकृति को शिक्षक मानता है। नदी बहना सिखाती है, हवा सीमाओं को नहीं मानती, पंछी स्वतंत्रता का प्रतीक हैं और जुगनू अंधेरे में भी रोशनी देता है।
इन सबके विपरीत मज़हब की दीवारें मानव द्वारा निर्मित हैं—जो बाँटती हैं, रोकती हैं और टकराव पैदा करती हैं। कवि स्पष्ट कहता है—अब इन दीवारों को गिराने का समय है।
अंतिम आत्मस्वीकृति: सबसे तीखा वार
“उम्र बेच कर नाम ख़रीदा—क्या कर डाला,
संजू सब हिसाब लगाना—बंद कर अब।”
कविता का अंत आत्मस्वीकृति और आत्म-आलोचना से होता है। कवि स्वयं को भी कटघरे में खड़ा करता है। उम्र बेचकर नाम खरीदना—यह आज के सामाजिक मूल्यबोध पर सबसे तीखा व्यंग्य है।
यह पंक्ति सवाल करती है—क्या हमने जीवन की सच्ची खुशियाँ, रिश्ते और सच्चाई केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए त्याग दीं?
समकालीन संदर्भ में कविता का महत्व
आज जब समाज—
- दिखावे को सफलता समझ रहा है
- समझौते को विवेक और संघर्ष को जोखिम
- पहचान को इंसान से ऊपर रख रहा है
ऐसे समय में “बंद कर दो अब…” एक नैतिक घोषणापत्र बन जाती है।
यह कविता—
- युवाओं को संघर्ष की राह दिखाती है
- समाज को आत्मनिरीक्षण के लिए मजबूर करती है
- साहित्य को केवल सौंदर्य नहीं, जिम्मेदारी भी बनाती है
संजीव जैन की यह कविता केवल पढ़ने की चीज़ नहीं है, बल्कि जीने की चुनौती है। यह पाठक से संवाद नहीं, बल्कि बहस करती है। यह हमें असहज करती है—और यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।
दैनिक कविता समाचार के रूप में कहा जा सकता है कि—
“बंद कर दो अब…” आज के समय की ज़रूरत है—
झूठ, ठहराव, पाखंड और डर के विरुद्ध एक स्पष्ट, निर्भीक और मानवीय आवाज़।
— साहित्य डेस्क








